Red PURPLE BLACK

विशेष वार्ता

 लाईव्ह अपडेट :  शुभवार्ता >>  बीकेवार्ता पाठक संख्या एक करोड के नजदिक -  दिनदूगीनी रात चौगुनी बढरही  पाठकसंख्या बीकेवार्ता की ---- पाठको को लगातार नई जानकारी देनें मेे अग्रेसर रही बीकेवार्ता , इसी नवीनता के लिए पाठको का आध्यात्तिक प्यार बढा ---- सभी का दिलसे धन्यवाद --- देखीयें हमारी नई सेवायें >>>  ब्रहमाकुमारीज द्वारा आंतरराष्टीय सेवायें  | ब्रहमाकुमारीज वर्गीकत सेवायें |आगामी कार्यक्रम | विश्व और भारत महत्वपूर्ण दिवस | विचारपुष्प |


 

Raj Yoga Exhibitaiton

Visitor Meter

Articles View Hits
5662836

ब्रहमाकुमारीज राजयोग

ब्रहमाकुमारीज राजयोग

तपस्वी मूर्त - प्रकाशमणि दादीजी

तपस्वी मूर्त & दादीजी एक अद्वितीय अध्यात्मिक शिक्षिका - प्रकाशमणि दादीजी



तपस्वी मूर्त - प्रकाशमणि दादीजी
ऐसे  तो दादीजी का नेचर  सहज तपस्या का ही था . उनका मन सहज ही उपराम अवस्था में रहती थी ..जैसे आप सभी को पता है बरसात की दिनों में मधुबन में भट्टिया चलती है  उसमें  हर साल अस्पताल की भाई -बेहने भी भाग लेते है . १९९४ की बात है जब सुखधाम  में तीसरी मंजिल में भट्टिया आयोजन किया था . बहुत ही जबरदस्त वायुमंडल बना था . शाम की समय विशेष योप्ग करने दादीजी पधारे .दादीजी  का ऐसे स्वरुप बनता गया  जो भूल नहीं सकता  चारो तरफ  लाईट ही लाईट दिखाई देने लगा दादीजी का चेहरा बिलकुल गोल्डेन रंग में परिवर्तन होते होते फिर सब कुछ अद्दृश्य  होने लगा ....सब कुछ ....फिर सन्नाटा ही सन्नाटा ऐसे लग रहा था  जैसे  बिलकुल सागर की किनारे पर है और  अतीन्द्रिय सुख की रंग भी रंग की किरणों के बीच हम सब उपस्थित है फिर  कुछ समय के बाद दादीजी  धीरे धीरे आवाज में आई और सूक्ष्म वतन की दृश्य बाबाने जो दिखाया वो सब हमें सुनाने लगी. ऐसे थी हमारे दादीजी ...आज भी वो दृश्य हमें शांतिवन में  अशरीरी स्तिति के द्वारा अनुभूति होती है ...दादीजी सदा अव्यक्त .....सदा शांत ...सदा उपराम ...सदा लाइट के कार्ब में रहनेवाली ..एक अवतरित फरिश्ता थी ...जो हम सब के जीवन के लिए प्रेरणा स्त्रोत है दृश्य  नयनो के सामने आते ही ...स्नेह की आँसू  आ जाते है ...मन मन स्पस्ट होते जा रहा था की दादी माना बाबा ...बस ..ऐसे महसूस  करने की इच्छा  हमेशा रहता था सदा उनके दुआ की चात्रचाया में पलते रहे ....आज भी मधुबन में उनके द्वारा बनाया हुआ अव्यक्त वायुमंडल है ......

 

दादीजी एक अद्वितीय अध्यात्मिक शिक्षिका

१ दादीजी कुछ बोल के द्वारा सिखाती थी , कुछ दिव्या चलन द्वारा सिखाती थी , कुछ दिव्या अध्यात्मिक 
प्रकाम्पनो द्वारा सिकाती थी

२ नित्य सुबह हर राज्रिशियोंके संघटन को उध्भोधन कराती थी . जिन अध्यात्मिक राजो भरा महावाक्य वो
उच्छारते थे उसको हम मुरली कहते है .नित्य सही समय पर सभी को सम्भोदन करते थे . कई आयामों वाला
इस महान विभुतियोमें थोड़ी सी जहलक मैंने जो देखा वो इस प्रकार है

३ जब वो इस ईश्वरीय महावाक्य पड़ती थी ऐसे लगता था जैसे एक आकाशवाणी हो रही एक अवतरित फरिश्ता
दिव्या स्मृति में वो ईश्वरीय महावाक्य पद रहे है

४ जब भी वो इन् महाव्क्य उच्चारते थे ..सुनने वाले अनुभुतियोमें खो जाते थे ..खुद वो इस स्वरुप में रहकर मुरली
पदाठी थी

५ हमें ऐसा लगता था की दादीजी महावाक्य बहुत गहराई में बहुत न्यारापन से अपने लिए पढ़ रही है .खुद वो
ईश्वरीय नशे में रहती थी की भगवान् खुद उनको पढ़ा रहे है

६ महावाक्य सुनाने वालोंको पता ही नहीं चलता था समय कब पूरा हुआ है ...पूरा एक घंटा ऐसे ही चला जाता था .

७ उन् महाव्क्यो में जितना भी बाते सरल हो उन् छोटी बातो नकी गहराई की अनुभूति वो करती थी

८ जभ भी इसके उंदर धारनओंकी ओंकी बात आती थी .खुद उन् स्वरुप में रहकर ..सभी को ऐसे महसूस कराती
थी की ऐ सब ऊंची धारानाये नेचरल है .सहज है ,बहुत ऊंची सच्चाई वाला है .इसको अपनाने में सहज ख़ुशी
की भंडार है .सदा इन् धारणा ओमें वो चिपकी हुयी जैसे लगती थी .सामने वाले विद्यार्थी ऐसे महससू करते
की असत्यता वाला धारणा फीखा फीखा है ..जैसे नकारात्मक धारणा ओमें कोई दम नहीं है

१० उनके बोल सुनते बुद्धि एकाग्र हो जाती थी

११ कोई भी विद्यार्थी उनके द्वारा सुनी महावाक्यो ओंको फिर से जभ भी एकांत में जभ सुनता था
वही दिव्या अनुभूतियाँ करता था .हुम थो रात को जागकर २ बजे एकांत में वही महाव्क्य सुनाते थे ऐसे थी हमारे प्यारे दादीजी ...जो एक इतिहास बन गयी ...एक यादगार बन गयी ...साधानाओंके प्रेरणा स्त्रोत
बन गयी .जो उन के द्वारा ऐ पालना लिया वो थो पदमा पदम् भाग्यशाली है ही

सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है

सर्व आत्माओं का पिता परमात्मा एक है और निराकार है

altप्राय: लोग यह नारा तो लगते है कि “हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई सभी आपस में भाई-भाई है”, परन्तु वे सभी आपस में भाई-भाई कैसे है और यदि वे भाई-भाई है तो उन सभी का एक पिता कौन है- इसे वे नहीं जानते | देह की दृष्टि से तो वे सभी भाई-भाई हो नहीं सकते क्योंकि उनके माता-पिता अलग-अलग है, आत्मिक दृष्टि से ही वे सभी एक परमपिता परमात्मा की सन्तान होने के नाते से भाई-भाई है | यहाँ सभी आत्माओं के एक परमपिता का परिचय दिया गया है | इस स्मृति में स्थित होने से राष्ट्रीय एकता हो सकती है |प्राय: सभी धर्मो के लोग कहते है कि परमात्मा एक है और सभी का पिता है और सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई है | परन्तु प्रश्न उठता है कि वह एक पारलौकिक परमपिता कौन है जिसे सभी मानते है ? आप देखगें कि भले ही हर एक धर्म के स्थापक अलग-अलग है परन्तु हर एक धर्म के अनुयायी निराकार, ज्योति-स्वरूप परमात्मा शिव की प्रतिमा (शिवलिंग) को किसी-न-किसी प्रकार से मान्यता देते है | भारतवर्ष में तो स्थान-स्थान पर परमपिता परमात्मा शिव के मंदिर है ही और भक्त-जन ‘ओम् नमों शिवाय’ तथा ‘तुम्हीं हो माता तुम्हीं पिता हो’ इत्यादि शब्दों से उसका गायन व पूजन भी करते है और शिव को श्रीकृष्ण तथा श्री राम इत्यादि देवों के भी देव अर्थात परमपूज्य मानते ही है परन्तु भारत से बाहर, दूसरे धर्मों के लोग भी इसको मान्यता देते है | यहाँ सामने दिये चित्र में दिखाया गया है कि शिव का स्मृति-चिन्ह सभी धर्मों में है |अमरनाथ, विश्वनाथ, सोमनाथ और पशुपतिनाथ इत्यादि मंदिरों में परमपिता परमात्मा शिव ही के स्मरण चिन्ह है | ‘गोपेश्वर’ तथा ‘रामेश्वर’ के जो मंदिर है उनसे स्पष्ट है कि ‘शिव’ श्री कृष्ण तथा श्री राम के भी पूज्य है | रजा विक्रमादित्य भी शिव ही की पूजा करते थे | मुसलमानों के मुख्य तीर्थ मक्का में भी एक इसी आकार का पत्थर है जिसे कि सभी मुसलमान यात्री बड़े प्यार व सम्मान से चूमते है | उसे वे ‘संगे-असवद’ कहते है और इब्राहिम तथा मुहम्मद द्वारा उनकी स्थापना हुई मानते है | परन्तु आज वे भी इस रहस्य को नहीं जानते कि उनके धर्म में बुतपरस्ती (प्रतिमा पूजा) की मान्यता न होते हुए भी इस आकार वाले पत्थर की स्थपना क्यों की गई है और उनके यहाँ इसे प्यार व सम्मान से चूमने की प्रथा क्यों चली आती है ? इटली में कई रोमन कैथोलिक्स ईसाई भी इसी प्रकार वाली प्रतिमा को ढंग से पूजते है | ईसाइयों के धर्म-स्थापक ईसा ने तथा सिक्खों के धर्म स्थापक नानक जी ने भी परमात्मा को एक निराकार ज्योति (Kindly Light) ही माना है | यहूदी लोग तो परमात्मा को ‘जेहोवा’ (Jehovah) नाम से पुकार्तेहाई जो नाम शिव (Shiva) का ही रूपान्तर मालूम होता है | जापान में भी बौद्ध-धर्म के कई अनुयायी इसी प्रकार की एक प्रतिमा अपने सामने रखकर उस पर अपना मन एकाग्र करते है |परन्तु समयान्तर में सभी धर्मों के लोग यह मूल बात भूल गये है कि शिवलिंग सभी मनुष्यात्माओं के परमपिता का स्मरण-चिन्ह है | यदि मुसलमान यह बात जानते होते तो वे सोमनाथ के मंदिर को कभी न लूटते, बल्कि मुसलमान, ईसाई इत्यादि सभी धर्मों के अनुयायी भारत को ही परमपिता परमात्मा की अवतार-भूमि मानकर इसे अपना सबसे मुख्य तीर्थ मानते और इस प्रकार संसार का इतिहास ही कुछ और होता | परन्तु एक पिता को भूलने के कारण संसार में लड़ाई-झगड़ा दुःख तथा क्लेश हुआ और सभी अनाथ व कंगाल बन गये |

गीता ज्ञान कब क्यों और किसके द्वारा दिया गया ?

गीता ज्ञान कब क्यों और किसके द्वारा दिया गया ?

alt

दिव्य गुण

alt

 

राजयोग की यात्रा – स्वर्ग की और दौड़

राजयोग की यात्रा – स्वर्ग की और दौड़

alt

राजयोग के निरंतर अभ्यास से मनुष्य को अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती है | इन शक्तियों के द्वारा ही मनुष्य सांसारिक रुकावटों को पार कर्ता हुआआध्यात्मित्क मार्ग की और अग्रसर होता है | आज मनुष्य अनेक प्रकार के रोग, शोक, चिन्ता और परेशानियों से ग्रसित है और यह सृष्टि ही घोर नरक बन गई है | इससे निकलकर स्वर्ग में जाना हर एक प्राणी चाहता है लेकिन नरक से स्वर्ग की और का मार्ग कई रुकावटों से युक्त है | काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसके रास्ते में मुख्य बाधा डालते है | पुरुषोतम संगम युग में ज्ञान सागर परमात्मा शिव जो सहज राजयोग की शिक्षा प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा दे रहे है, उसे धारण करने से ही मनुष्य इन प्रबल शत्रुओं (५ विकारों) को जीत सकता है |चित्र में दिखाया है कि नरक से स्वर्ग में जाने के लिए पहले-पहले मनुष्य को काम विकार की ऊंची दीवार को पार करना पड़ता है जिसमे नुकीले शीशों की बाढ़ लगी हुई है | सको पार करने में कई व्यक्ति देह-अभिमान के कारण से सफलता नहीं प् सकते है और इसीलिए नुकीलें शीशों पर गिरकर लहू-लुहान हो जाते है | विकारी दृष्टी, कृति, वृति ही मनुष्य को इस दीवार को पार नहीं करने देती | अत: पवित्र दृष्टी (Civil Eye) बनाना इन विकारों को जीतने के लिए अति आवश्यक है |दूसरा भयंकर विघ्न क्रोध रूपी अग्नि-चक्र है | क्रोध के वश होकर मनुष्य सत्य और असत्य की पहचान भी नहीं कर पाता है और साथ ही उसमे ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि विकारों का समावेश हो जाता है जिसकी अग्नि में वह स्वयं तो जलता ही है साथ में अन्य मनुष्यों को भी जलाता है | इस भधा को पार करने के लिए ‘स्वधर्म’ में अर्थात ‘मैं आत्मा शांत स्वरूप हूँ’ – इस स्तिथि में स्थित होना अत्यावश्यक है | लोभ भी मनुष्य को उसके सत्य पथ से प्रे हटाने के लिए मार्ग में खड़ा है | लोभी मनुष्य को कभी भी शान्ति नहीं मिल सकती और वह मन को परमात्मा की याद में नहीं टिका सकता | अत: स्वर्ग की प्राप्ति के लिए मनुष्य को धन व खजाने के लालच और सोने की चमक के आकर्षण पर भी जीत पानी है |मोह भी एक ऐसी बाधा है जो जाल की तरह खड़ी रहती है | मनुष्य मोह के कड़े बन्धन-वश, अपने धर्म व कार्य को भूल जाता है और पुरुषार्थ हींन बन जाता है | तभी गीता में भगवान ने कहा है कि ‘नष्टोमोहा स्मृतिर्लब्धा:’ बनो, अर्थात देह सहित देह के सर्व सम्बन्धों के मोह-जाल से निकल कर परमात्मा की याद में स्थित हो जाओ और अपने कर्तव्य को करो, इससे ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकेगी | इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्यात्मा मोह के बन्धनों से मुक्ति पाए, तभी माया के बन्धनों से छुटकारा मिलेगा और स्वर्ग की प्राप्ति होगी |अंहकार भी मनुष्य की उन्नति के मार्ग में पहाड़ की तरह रुकावट डालता है | अहंकारी मनुष्य कभी भी परमात्मा के निकट नहीं पहुँच सकता है | अहंकार के वश ,मनुष्य पहाड़ की ऊंची छोटी से गिरने के समान चकनाचूर हो जाता है | अत: स्वर्ग में जाने के लिए अहंकार को भी जीतना आवश्यक है | अत: याद रहे कि इन विकारों पर विजय प्राप्त करके मनुष्य से देवता बनने वाले ही नर-नारी स्वर्ग में जा सकती है, वरना हर एक व्यक्ति के मरने के बाद जो यह ख दिया जाता है कि ‘वह स्वर्गवासी हुआ’, यह सरासर गलत है | यदि हर कोई मरने के बाद स्वर्ग जा रहा होता तो जन-संख्या कम हो जाती और स्वर्ग में भीड़ लग जाती और मृतक के सम्बन्धी मातम न करते |

नई टेक्नॉलॉजि(IT)

मनोरंजन