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बायोडाटा - मुख्य

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24-01-2022

24-01-2022 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - 21 जन्मों के लिए सदा सुखी बनने के लिए इस थोड़े समय में देही-अभिमानी बनने की आदत डालो''

प्रश्नः-
दैवी राजधानी स्थापन करने के लिए हर एक को कौन सा शौक होना चाहिए?

उत्तर:-
सर्विस का। ज्ञान रत्नों का दान कैसे करें, यह शौक रखो। तुम्हारी यह मिशन है - पतितों को पावन बनाने की इसलिए बच्चों को राजाई की वृद्धि करने के लिए खूब सर्विस करनी है। जहाँ भी मेले आदि लगते हैं, लोग स्नान करने जाते हैं वहाँ पर्चे छपाकर बांटने हैं। ढिंढोरा पिटवाना है।

गीत:-
तुम्हें पाकर हमने जहाँ पा लिया है...

ओम् शान्ति। निराकार शिवबाबा बैठकर बच्चों को समझाते हैं कि बच्चे देही-अभिमानी भव। अपने को आत्मा समझो और बाप को याद करो। हम आत्मा हैं, हमको बाप पढ़ाते हैं। बाबा ने समझाया है - संस्कार सब आत्मा में ही रहते हैं। जब माया रावण का राज्य होता है अथवा भक्ति मार्ग शुरू होता है तो देह-अभिमानी बन जाते हैं। फिर जब भक्ति मार्ग का अन्त होता है तो बाप आकर बच्चों को कहते हैं - अभी देही-अभिमानी बनो। तुमने जो जप तप दान पुण्य आदि किये हैं, उनसे कुछ भी फायदा नहीं मिला। 5 विकार तुम्हारे में प्रवेश होने से तुम देह-अभिमानी बन पड़े हो। रावण ही तुमको देह-अभिमानी बनाते हैं। वास्तव में असुल तुम देही-अभिमानी थे फिर से अभी यह प्रैक्टिस कराई जाती है कि अपने को आत्मा समझो। यह पुराना शरीर हमको छोड़ नया जाकर लेना है। सतयुग में यह 5 विकार होते नहीं हैं। देवी-देवता, जिनको श्रेष्ठ पावन कहा जाता है वह सदैव आत्म-अभिमानी होने के कारण 21 जन्म सदा सुखी रहते हैं। फिर जब रावणराज्य होता है तो तुम बदलकर देह-अभिमानी बन जाते हो। इनको सोल-कान्सेस और उनको बॉडीकान्सेस कहा जाता है। निराकारी दुनिया में तो बॉडी कान्सेस और सोल कान्सेस का प्रश्न ही नहीं उठता है, वह तो है ही साइलेन्स वर्ल्ड। यह संस्कार इस संगमयुग पर ही होते हैं। तुमको देह-अभिमानी से देही-अभिमानी बनाया जाता है। सतयुग में तुम देही-अभिमानी होने कारण दु:ख नहीं उठाते हो क्योंकि नॉलेज है कि हम आत्मा हैं। यहाँ तो सब अपने को देह समझते हैं। बाप आकर समझाते हैं बच्चे अभी देही-अभिमानी बनो तो विकर्म विनाश होंगे। फिर तुम विकर्माजीत बन जाते हो। शरीर भी है, राज्य भी करते हो तो आत्म-अभिमानी हो। यह जो तुमको शिक्षा मिलती है, इससे तुम आत्म-अभिमानी बन जाते हो। सदैव सुखी रहते हो। सोल कान्सेस होने से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होते हैं इसलिए बाबा समझाते हैं मुझे याद करते रहो तो विकर्म विनाश होंगे। वह गंगा स्नान जाकर करते हैं, परन्तु वह कोई पतित-पावनी तो है नहीं। न योग अग्नि है जिससे विकर्म भस्म हों। ऐसे-ऐसे मौके पर तुम बच्चों को सर्विस करने का चांस मिलता है। जैसा समय वैसी सर्विस। कितने ढेर मनुष्य स्नान करने जाते होंगे। कुम्भ के मेले पर सब जगह स्नान करते हैं। कोई सागर पर, कोई नदी में भी जाते हैं। तो सबको बांटने के लिए कितने पर्चे छपाने पड़े। खूब बांटने चाहिए। प्वाइंट ही सिर्फ यह हो - बहनों-भाइयों विचार करो पतित-पावन, ज्ञान सागर और उनसे निकली हुई ज्ञान नदियों द्वारा तुम पावन बन सकते हो वा इस पानी के सागर और नदियों से तुम पावन बन सकते हो? इस पहेली को हल किया तो सेकेण्ड में तुम जीवनमुक्ति पा सकते हो। राज्य भाग्य का वर्सा भी पा सकते हो। ऐसे-ऐसे पर्चे हर एक सेन्टर छपा ले। नदियां तो सब जगह हैं। नदियां निकलती हैं बहुत दूर से। नदियां तो जहाँ तहाँ बहुत हैं। फिर क्यों कहते कि इसी ही नदी में स्नान करने से पावन होंगे। खास एक जगह पर इतना खर्चा कर तकलीफ करके क्यों जाते हैं! ऐसे तो नहीं एक दिन स्नान करने से पावन हो जायेंगे। स्नान तो जन्म-जन्मान्तर करते हैं। सतयुग में भी स्नान करते हैं। वहाँ तो हैं ही पावन। यहाँ तो ठण्डी में कितनी तकलीफ लेकर जाते हैं स्नान करने। तो उन्हों को समझाना है, अन्धों की लाठी बनना है। सुजाग करना है। पतित-पावन आकर पावन बनाते हैं। तो दु:खियों को रास्ता बताना चाहिए। यह छोटे-छोटे पर्चे सब भाषाओं में छपे हुए होने चाहिए। लाख दो लाख छपाने चाहिए। जिन्हों की बुद्धि में ज्ञान का नशा चढ़ा हुआ है, उन्हों की बुद्धि काम करेगी। यह चित्र 2-3 लाख सभी भाषाओं में होने चहिए। जगह-जगह पर सर्विस करनी है। एक ही प्वाइंट मुख्य है, आकर समझो कि सेकेण्ड में मुक्ति-जीवनमुक्ति कैसे मिलती है। मुख्य सेन्टर्स की एड्रेस डाल दो, फिर पढ़े वा न पढ़े। तुम बच्चों को त्रिमूर्ति के चित्र पर समझाना चाहिए कि ब्रह्मा द्वारा स्थापना जरूर होनी है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य समझते जायेंगे कि बरोबर विनाश तो सामने खड़ा है। यह झगड़े आदि बढ़ते ही जायेंगे। मिलकियत के ऊपर भी कितना झंझट चलता है। फिर नहीं तो मारामारी भी कर लेते हैं। विनाश तो सामने है ही है। जो अच्छी रीति गीता भागवत आदि पढ़े होंगे वह समझेंगे बरोबर यह तो पहले भी हुआ था। तो तुम बच्चों को अच्छी रीति समझाना चाहिए कि क्या पानी में स्नान करने से मनुष्य पतित से पावन बनेंगे वा योग अग्नि से पावन बनेंगे। भगवानुवाच - मुझे याद करने से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। जहाँ-जहाँ भी तुम्हारे सेन्टर्स हैं तो विशेष मौके पर ऐसे पर्चे निकालने चाहिए। मेले भी बहुत लगते हैं, जिसमें ढेर मनुष्य जाते हैं। परन्तु समझेंगे कोई मुश्किल ही। पर्चे बांटने के लिए भी बहुत चाहिए, जो फिर समझा सकें। ऐसी जगह खड़ा रहना चाहिए। यह हैं ज्ञान रत्न। सर्विस का बहुत शौक रखना चाहिए। हम अपनी दैवी बादशाही स्थापन करते हैं ना। यह है ही मनुष्य को देवता अथवा पतित को पावन बनाने की मिशन। यह भी तुम लिख सकते हो कि बाप ने समझाया है मनमनाभव। पतित-पावन बेहद के बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे। यात्रा की प्वाइंट भी तुम बच्चों को बार-बार समझाई जाती है। बाप को बार-बार याद करो। सिमर सिमर सुख पाओ, कलह क्लेष मिटे सब तन के अर्थात् तुम एवरहेल्दी बन जायेंगे। बाप ने मन्त्र दिया है कि मुझे सिमरो अर्थात् याद करो, ऐसे नहीं कि शिव-शिव बैठ सिमरो। शिव के भगत ऐसे शिव-शिव कह माला जपते हैं। वास्तव में है रूद्र माला। शिव और सालिग्राम। ऊपर में है शिव। बाकी हैं छोटे-छोटे दाने अर्थात् आत्माएं। आत्मा इतनी छोटी बिन्दी है। काले दानों की भी माला होती है। तो शिव की माला भी बनी हुई है। आत्मा को अपने बाप को याद करना है। बाकी मुख से शिव, शिव बोलना नहीं है। शिव-शिव कहने से फिर बुद्धियोग माला तरफ चला जाता है। अर्थ तो कोई समझते नहीं हैं। शिव-शिव जपने से विकर्म थोड़ेही विनाश होंगे। माला फेरने वालों के पास यह ज्ञान नहीं है कि विकर्म तब विनाश होते हैं जब संगम पर डायरेक्ट शिवबाबा आकर मंत्र देते हैं कि मामेकम् याद करो। बाकी तो कोई कितना भी बैठ शिव-शिव कहे, विकर्म विनाश नहीं होंगे। काशी में भी जाकर रहते हैं। तो शिव काशी, शिव काशी कहते रहते हैं। कहते हैं काशी में शिव का प्रभाव है। शिव के मन्दिर तो बहुत आलीशान बने हुए हैं। यह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री।

तुम समझा सकते हो कि बेहद का बाप कहते हैं - मेरे साथ योग लगाने से ही तुम पावन बनेंगे। बच्चों को सर्विस का शौक होना चाहिए। बाप कहते हैं मुझे पतितों को पावन बनाना है। तुम बच्चे भी पावन बनाने की सर्विस करो। पर्चे ले जाकर समझाओ। बोलो, इनको अच्छी रीति पढ़ो। मौत तो सामने खड़ा है। यह दु:खधाम है। अब ज्ञान स्नान एक ही बार करने से सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिलती है। फिर नदियों में स्नान करने, भटकने की क्या दरकार है। हमको सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिलती है तब ढिंढोरा पिटवाते हैं। नहीं तो कोई थोड़ेही ऐसे पर्चे छपवा सकते हैं। बच्चों को सर्विस का बहुत शौक होना चाहिए। पहेलियां भी जो बनवाई हैं वह सर्विस के लिए हैं। बहुत हैं जिनको सर्विस का शौक नहीं है। ध्यान में ही नहीं आता है कि कैसे सर्विस करें, इसमें बड़ी अच्छी चमत्कारी बुद्धि चाहिए, जिनके पैरों में देह-अभिमान की कड़ियां (जंजीरें) पड़ी हैं तो देही-अभिमानी बन नहीं सकते हैं। समझा जाता है, यह क्या जाकर पद पायेंगे। तरस पड़ता है। सब सेन्टर्स में देखा जाता है - कौन-कौन पुरुषार्थ में तीखे जा रहे हैं। कोई तो अक के फूल भी हैं, कोई गुलाब के फूल भी हैं। हम फलाने फूल हैं। हम बाबा की सर्विस नहीं करते तो समझना चाहिए हम अक के फूल जाकर बनेंगे। बाप तो बहुत अच्छी रीति समझा रहे हैं। तुम हीरे जैसा बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। कोई तो सच्चा हीरा है, कोई काले झुंझार भी हैं। हर एक को अपना ख्याल करना चाहिए। हमको हीरे जैसा बनना है। अपने से पूछना है हम हीरे जैसा बने हैं! अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह-अभिमान की कड़ियां (जंजीर) काट देही-अभिमानी बनना है। सोल कान्सेस रहने का संस्कार डालना है।

2) सर्विस का बहुत शौक रखना है। बाप समान पतित से पावन बनाने की सेवा करनी है। सच्चा हीरा बनना है।

वरदान:-
कर्म करते हुए न्यारी और प्यारी अवस्था में रह, हल्के पन की अनुभूति करने वाले कर्मातीत भव

कर्मातीत अर्थात् न्यारा और प्यारा। कर्म किया और करने के बाद ऐसा अनुभव हो जैसे कुछ किया ही नहीं, कराने वाले ने करा लिया। ऐसी स्थिति का अनुभव करने से सदा हल्कापन रहेगा। कर्म करते तन का भी हल्कापन, मन की स्थिति में भी हल्कापन, जितना ही कार्य बढ़ता जाए उतना हल्कापन भी बढ़ता जाए। कर्म अपनी तरफ आकर्षित न करे, मालिक होकर कर्मेन्द्रियों से कर्म कराना और संकल्प में भी हल्के-पन का अनु-भव करना - यही कर्मातीत बनना है।

स्लोगन:-
सर्व प्राप्तियों से सदा सम्पन्न रहो तो सदा हर्षित, सदा सुखी और खुशनसीब बन जायेंगे।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य - “किस्मत बनाने वाला परमात्मा, किस्मत बिगाड़ने वाला खुद मनुष्य है''

अब यह तो हम जानते हैं कि मनुष्य आत्मा की किस्मत बनाने वाला कौन है? और किस्मत बिगाड़ने वाला कौन है? हम ऐसे नहीं कहेंगे कि किस्मत बनाने वाला, बिगाड़ने वाला वही परमात्मा है। बाकी यह जरूर है कि किस्मत को बनाने वाला परमात्मा है और किस्मत को बिगाड़ने वाला खुद मनुष्य है। अब यह किस्मत बने कैसे? और फिर गिरे कैसे? इस पर समझाया जाता है। मनुष्य जब अपने को जानते हैं और पवित्र बनते हैं तो फिर से वो बिगड़ी हुई तकदीर को बना लेते हैं। अब जब हम बिगड़ी हुई तकदीर कहते हैं तो इससे साबित है कोई समय अपनी तकदीर बनी हुई थी, जो फिर बिगड़ गई है। अब वही फिर बिगड़ी तकदीर को परमात्मा खुद आकर बनाते हैं। अब कोई कहे परमात्मा खुद तो निराकार है वो तकदीर को कैसे बनायेगा? इस पर समझाया जाता है, निराकार परमात्मा कैसे अपने साकार ब्रह्मा तन द्वारा, अविनाशी नॉलेज द्वारा हमारी बिगड़ी हुई तकदीर को बनाते हैं। अब यह नॉलेज देना परमात्मा का काम है, बाकी मनुष्य आत्मायें एक दो की तकदीर को नहीं जगा सकती हैं। तकदीर को जगाने वाला एक ही परमात्मा है तभी तो उन्हों का यादगार मन्दिर कायम है। अच्छा।

लवलीन स्थिति का अनुभव करो

जिस समय जिस सम्बन्ध की आवश्यकता हो, उसी सम्बन्ध से भगवान को अपना बना लो। दिल से कहो मेरा बाबा, और बाबा कहे मेरे बच्चे, इसी स्नेह के सागर में समा जाओ। यह स्नेह छत्रछाया का काम करता है, इसके अन्दर माया आ नहीं सकती।

10-12-2021

10-12-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - देह-अभिमान में आने से पाप होते हैं, इसलिए देही-अभिमानी बनो, तुम्हारे मैनर्स बहुत अच्छे होने चाहिए, किसी को भी दु:ख नहीं देना है''

प्रश्नः-
21 जन्मों की प्रालब्ध बनाने के लिए बाप कौन सी सहज युक्ति बताते हैं?

उत्तर:-
बच्चे, यह ईश्वरीय बैंक है, इसमें जितना जमा करेंगे उतना 21 जन्म प्रालब्ध पायेंगे। ईश्वरीय स्थापना के कार्य में सफल करने से ही जमा होगा। बाकी तो सबका देवाला निकलना ही है। यह है ही दु:खधाम। अर्थक्वेक होगी, आग लगेगी... सबको घाटा पड़ना है इसलिए कहते हैं - किनकी दबी रहेगी धूल में, किनकी राजा खाए...

ओम् शान्ति। बच्चों को अभी रचता और रचना के आदि मध्य अन्त का नॉलेज तो बुद्धि में है, यह भी समझते हैं कि हम भारतवासी पहले-पहले सतयुग में सतोप्रधान थे। यह याद बच्चों के लिए बहुत जरूरी है। हरदम याद की यात्रा में रहना, इसमें तो बड़ी मेहनत चाहिए। परन्तु रचता और रचना का ज्ञान तो बुद्धि में होना चाहिए ना। हम सतयुग में देवी-देवता थे, उसको स्वर्ग कहा जाता है। देवी-देवतायें विश्व के मालिक थे। एक ही धर्म था। अक्षरों को भी पूरा समझना चाहिए। तुम बच्चे जानते हो सतयुग आदि में ही हम सूर्यवंशी घराने में थे। रचता बाबा ने जो आदि मध्य अन्त का ज्ञान सुनाया है वह तो हर एक की बुद्धि में रहना चाहिए। यह कभी भूलना नहीं चाहिए। यह भी तुम जानते हो। हम पुनर्जन्म लेते-लेते फिर त्रेता में आये हैं तो दो कला कम हो गई। सृष्टि भी पुरानी होती जाती है। यह अच्छी रीति बुद्धि में रखना है। जितना तुम याद करते रहेंगे उतना खुशी का पारा चढ़ा रहेगा फिर त्रेता के अन्त बाद आता है द्वापर। द्वापर शुरू होने से दूसरे धर्म स्थापन होते हैं और हम उतरते-उतरते भक्ति मार्ग में आते हैं। ऐसे नहीं कहेंगे कि उस समय और धर्म भी भक्ति मार्ग में हैं, नहीं। यह कहानी सारी तुम भारतवासियों के लिए है। भल रावण राज्य है परन्तु उन्हों के लिए रावण राज्य नहीं कहेंगे। वह अपने समय पर सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो में आते हैं। धर्मों की स्थापना होनी है फिर वृद्धि को पाते जाते हैं फिर गिरते भी रहते हैं। चक्र तो फिरना ही है। इस समय तुम जानते हो द्वापर के बाद भक्ति मार्ग शुरू हुआ है और भी धर्म स्थापन हुए हैं। अभी तो है कलियुग तमोप्रधान दुनिया। सृष्टि पुरानी होने के कारण सब तमोप्रधान हो गये हैं। अब यह ज्ञान तुम बच्चे ही जानते हो। यह है सहज ते सहज बात, जो बच्चा भी याद कर ले परन्तु वह याद करेंगे तोते मुआफिक। तुम बच्चों को तो भासना आती है, उस अनुसार तुम समझायेंगे। तुम जानते हो सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। पहले-पहले जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म था उनका फाउन्डेशन अब है नहीं। भल है भी तो वह अपने को हिन्दू कहलाते हैं इसलिए कहा जाता है देवी-देवता धर्म है नहीं, प्राय:लोप है। सब पतित बन गये हैं इसलिए अपने को देवता कोई कहलाता नहीं। न वह धर्म है, न कर्म है। सतयुग में तो सबका कर्म अकर्म हो जाता है। यहाँ मनुष्य जो कर्म करते हैं, वह विकर्म बन जाता है। तमोप्रधान होने के कारण अपने को देवता कोई कहला नहीं सकते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार यह भी नूँध है, जब धर्म प्राय:लोप हो तब तो बाबा आकर सत धर्म की स्थापना करे और अनेक धर्मों का विनाश कराये। नई दुनिया में एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। अब शिवबाबा आकर फिर से ब्रह्मा द्वारा देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। तुम हो मुख वंशावली ब्राह्मण। क्राइस्ट द्वारा जो क्रिश्चियन बने, उन्हें भी मुख वंशावली कहेंगे। बच्चे तो नहीं थे ना। वैसे तुम भी ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बने हो। असुल में तुम हो शिवबाबा के बच्चे। इस समय तुम ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बने हो। शिवबाबा खुद इन द्वारा देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं क्योंकि उनको ही सारी पुरानी दुनिया का विनाश भी कराना है। वह विनाश का कार्य और कोई करते नहीं। वह तो आकर अपना-अपना धर्म स्थापन करते हैं फिर वह धर्म वृद्धि को पाता है। अभी है ही तमोप्रधान दुनिया, कलियुग का अन्त। शास्त्रों में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष लिख दी है। तुम जानते हो यह शास्त्र आदि सब भक्तिमार्ग की सामग्री है, जो वहाँ सतयुग में नहीं होगी। वहाँ यह अनेक धर्म नहीं होंगे। यह इस्लामी, क्रिश्चियन आदि सब धर्म द्वापर में स्थापन होते हैं। फिर हर एक ने अपना-अपना शास्त्र बैठ बनाया है। अभी सारी सृष्टि है पतित, इसलिए पतित-पावन बाप को सब बुलाते हैं कि आकर हमारा दु:ख हरो और सुख दो। वह भी कहते हैं हमारा गाइड बन हमको घर ले चलो। गाइड तो सबका होता है ना। तुम अभी कान्ट्रास्ट को समझ गये हो। वह पण्डे तीर्थ यात्रा पर धक्के खिलाते हैं। तुम हो रूहानी पण्डे। पाण्डव सम्प्रदाय, शिवबाबा के बच्चे भी पण्डे। बाप रूहानी यात्रा सिखलाते हैं। हे आत्मा तुम अपने बाप को याद करो और घर को याद करो। बाबा को याद करने से घर पहुँच जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो पाप कटेंगे नहीं। भल ले तो सबको जायेंगे परन्तु सजा खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करेंगे अथवा योगबल से, चुक्तू तो जरूर करना है।

तुम जानते हो अभी हम जमा कर रहे हैं। जितना पवित्र बन जास्ती कमाई करेंगे उतना जमा होता है। पुरूषार्थ नहीं करेंगे तो कुछ भी जमा नहीं होगा। घाटा पड़ जायेगा। तुम जानते हो आधाकल्प हम घाटा पाते ही आये हैं। अभी बिल्कुल देवाला हो गया है। हर बात में देवाला। अभी बच्चों को 21 जन्मों के लिए जमा करना है, उसके लिए मुख्य है याद की यात्रा। यह तो सदैव स्मृति में रखो। जब भी फुर्सत मिले तो इस स्मृति में रहो। बाबा ज्ञान का सागर है तो तुमको भी रचना के आदि मध्य अन्त का नॉलेज है। आप समान बनाते हैं। जैसे बैरिस्टर, इंजीनियर आदि पढ़ाकर आप समान बनाते हैं ना। ऐसे बाप भी बच्चों को आप समान देही-अभिमानी बनाते हैं। बाप देह-अभिमान नहीं रखते, यह तो पढ़ाई है ना। जो ज्ञान बाप में है वह तुमको देते हैं। बाप पवित्रता का सागर है तो तुमको भी आप समान पवित्र बनाते हैं। जो नहीं बनेंगे वह सजायें खायेंगे, फिर पद भी कम हो जायेगा। इस समय ऐसे नहीं कि धन से तुमको साहूकार बनना है। नहीं, बाबा ने समझाया है गरीब की एक पाई, साहूकार का एक रूपया समान। दोनों को वर्सा इतना ही मिलता है। बाप है ही गरीब निवाज़ इसलिए गायन भी है अजामिल जैसे पापी, अहिल्या.. साहूकार का नाम नहीं गाया जाता है। यह भी समझने की बात है। तुम कहेंगे हम पहले-पहले सबसे साहूकार थे। फिर यहाँ ज्ञान भी नम्बरवार उठायेंगे, तो वहाँ पद भी नम्बरवार पायेंगे। माँ-बाप को पूरा फालो करना है। जैसे बाबा पुरुषार्थ कर ऊंच पद पाते हैं। मम्मा बाबा भी सर्विस करते हैं ना। तुम्हारी यह है रूहानी सेवा। घर-घर में सन्देश पहुँचाना है। जो कोई ऐसा न कहे कि हमको तो बाप के आने का सन्देश ही नहीं मिला तो याद कैसे करें। ऐसे कुछ कहानियां भी शास्त्रों में हैं कि भगवान को भी उल्हना दिया इसलिए सबको मालूम पड़ना चाहिए। टाइम थोड़ा है। दिन-प्रतिदिन प्रदर्शनी, मेले आदि की धूम मचती जाती है। अब विलायत के अखबारों में पड़ता है। शुरू में जब भट्ठी बनी थी तो विलायत तक अखबार में नाम गया। अब फिर यह भी पड़ेगा कि खुद गॉड फादर आकर सबको लिबरेट कर रहे हैं। कहते हैं और सब तरफ से बुद्धियोग तोड़ो। मुझ एक बाप को याद करो तो तुम पावन बन मुक्तिधाम में चले जायेंगे। कोई तो अच्छी रीति समझ कर याद करने लग पड़ेंगे। धर्म के बड़े जो होंगे वह फिर नम्बरवार आते हैं। सभी धर्मों का झाड़ निराकारी दुनिया से यहाँ आकर वृद्धि को पाता है। फिर पतित दुनिया से चले जायेंगे निराकारी पावन दुनिया में। फिर हर एक अपने-अपने समय पर धर्म स्थापन करने आयेंगे। यह बुद्धि में रहना चाहिए। सतयुग में एक ही धर्म था। फिर वृद्धि होते-होते अनेक धर्म अनेक मत हो जाती हैं। तुम जानते हो यह भारत अविनाशी खण्ड है, इसमें प्रलय कब होगा नहीं। इन बातों को सिमरण करते रहो।

यह तुम्हारी ईश्वरीय मिशन है। सेन्टर्स खुलते जाते हैं। अब विनाश भी सामने खड़ा है। इन आंखों से जो कुछ देखते हो वह सतयुग में कुछ भी नहीं रहेगा, जंगल हो जायेगा। आबू थोड़ेही सतयुग में होगा, दरकार ही नहीं। यह मन्दिर आदि सब बाद में भक्ति मार्ग में बनेंगे। कितनी ऊंची पहाड़ी पर मन्दिर बनाते हैं। फिर ठण्डी में बन्द कर नीचे उतर आते हैं। तुम तो पहाड़ी पर बैठे हो। अन्त में सब पहाड़ी पर ही साक्षात्कार होंगे। बाबा बतलाते हैं - मुझे भी जब साक्षात्कार हुआ था तो मैं पहाड़ी पर था। अब भी पहाड़ी पर आकर अनायास ही बैठे हैं। यहाँ बैठे-बैठे तुम सब कुछ सुनेंगे और देखेंगे। यहाँ बैठे साक्षात्कार हो सकता है कि कैसे आग लगती है। क्या-क्या होता है। रेडियो से, अखबारों से सब कुछ तुम सुनेंगे। टी.वी. में भी तुम देख सकते हो। आगे चलकर ऐसी-ऐसी चीजें निकलेंगी जो घर बैठे सब दिखाई पड़ेगा। रेडियो में कहाँ-कहाँ का आवाज सुनाई पड़ता है। यह सब है माया का पाम्प, तब मनुष्य समझते हैं यह तो स्वर्ग है। स्वर्ग तो तब हो सकता है जब विनाश हो। वहाँ मीठे पानी पर महल होंगे। कहाँ पहाड़ियों पर जाने की दरकार नहीं। वहाँ सदैव बहारी मौसम रहती है। आज गर्मी है, ठण्डी है.. सबमें दु:ख है। स्वर्ग में दु:ख का नाम नहीं होगा। तुम ऐसी जगह चलते हो। यह बुद्धि में है कि हमको यह शरीर छोड़ जाना है बाबा के पास। अब हम बाबा द्वारा राजयोग सीख रहे हैं। 5 हजार वर्ष पहले भी सीखा था। कहते हैं बाबा आप तो वही हो। बाबा जानते हैं जिन्होंने कल्प पहले राज्य भाग्य पाया होगा, वह अब भी लेंगे। यह चक्र बुद्धि में होना चाहिए। बरोबर 5 हजार वर्ष पहले भारत में देवी-देवताओं का राज्य था फिर आधा समय के बाद माया की प्रवेशता हुई फिर और धर्म आये फिर भक्ति-मार्ग शुरू हुआ अर्थात् रावण राज्य शुरू हुआ। यह चित्रों पर साफ समझा सकते हो। यह भारत की ही कहानी है कि सतोप्रधान से तमोप्रधान कैसे बनते हैं। फिर जब विनाश का समय होता है तो सब विनाशकाले विप्रीत बुद्धि हो जाते हैं। मेले, प्रदर्शनी में बड़ी युक्ति से चित्र रखने चाहिए। तुम्हारा यह ज्ञान है गुप्त, यहाँ हथियार आदि की कोई बात नहीं। तुम बहुत साधारण हो। तुम चलते फिरते घूमते बाप की याद में रहते हो। कोई तुम्हारे से पूछे तुम वेदों शास्त्रों को मानते हो। बोलो हाँ जी, हम उन्हों को अच्छी रीति जानते हैं कि इनसे भगवान की प्राप्ति नहीं हो सकती है। यह सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। सतयुग में सब पावन आत्मायें थीं। गीत भी है ना - जाग सजनियां जाग। नई दुनिया में सब कुछ नया होगा। बाबा आकर नई दुनिया के लिए नई कहानियां सुनाते हैं। सीन सीनरियां सब नई होंगी। प्रदर्शनी में आते बहुत हैं, ओपीनियन भी लिखते हैं। बहुत अच्छा है यह सबको समझाना चाहिए परन्तु खुद कुछ भी समझते नहीं हैं। कोटों में कोई मुश्किल ही निकलते हैं। परन्तु सर्विस तो होनी है। ढेर प्रजा बनेगी। तुम बच्चे इस ज्ञान का सिमरण करते रहो तो बहुत खुशी रहेगी। यह दुनिया ही दु:ख की है। घाटा पड़ा, देवाला निकला, अर्थक्वेक हुई, सबके पैसे खत्म हो जायेंगे। तब कहते हैं किनकी दबी रही धूल में... सफल किसकी होगी? जो ईश्वरीय स्थापना के कार्य में लगा रहे हैं। यह है ईश्वरीय बैंक, जो इसमें जितना डाले उतना जमा होता है। जितना जिसने कल्प पहले डाला होगा वह इतना ही शिवबाबा की गोलक में डालेंगे। इसका रिटर्न फिर नई दुनिया में 21 जन्मों के लिए मिलेगा। भक्ति मार्ग में शिवबाबा की गोलक में डालते हैं तो अल्पकाल क्षणभंगुर सुख मिलता है। यहाँ तो डायरेक्ट शिवबाबा स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं, तो 21 जन्मों के लिए मिलेगा। भक्ति मार्ग में अल्पकाल का सुख नर्क में मिलता है। फिर मैनर्स भी अच्छे चाहिए, किसको भी दु:ख नहीं देना चाहिए। नहीं तो नाम बदनाम कर देंगे। कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। देह-अभिमान में आने से पाप तो होते हैं। बाबा के बने हो तो कहते हो बाबा यह सब कुछ आपका है। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी होगा। दिल में कोई खोट नहीं होना चाहिए। नहीं तो और ही गिरते रहेंगे। तुम हो पैगम्बर के बच्चे, तुम सबको पैगाम देते हो कि बाप आकर स्वर्ग की स्थापना करते हैं, उसका सन्देश सबको देना है। नई दुनिया स्थापन हो रही है। उसके लिए जिनको राजयोग सीखना हो वह आकर सीखे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अन्दर में कोई भी खोट (कमी) हो तो उसे निकाल देना है। सच्ची दिल रखनी है। देह-अभिमान में आकर कभी क्रोध नहीं करना है।

2) जब भी फुर्सत मिले तो याद की यात्रा में रह कमाई जमा करनी है।

वरदान:-
सम्पूर्ण समर्पण की विधि द्वारा अपने पन का अधिकार समाप्त करने वाले समान साथी भव

जो वायदा है कि साथ रहेंगे, साथ चलेंगे और साथ में राज्य करेंगे - इस वायदे को तभी निभा सकेंगे जब साथी के समान बनेंगे। समानता आयेगी समर्पणता से। जब सब कुछ समर्पण कर दिया तो अपना वा अन्य का अधिकार समाप्त हो जाता है। जब तक किसी का भी अधिकार है तो सर्व समर्पण में कमी है इसलिए समान नहीं बन सकते। तो साथ रहने, साथ उड़ने के लिए जल्दी-जल्दी समान बनो।

स्लोगन:-
अपने समय, श्वांस और संकल्प को सफल करना ही सफलता का आधार है।

08-12-2021

08-12-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - संगम की इन अमूल्य घड़ियों में श्वाँसों श्वॉस बाप को याद करो, तुम्हारी एक भी श्वाँस व्यर्थ न जाये''

प्रश्नः-
इस समय तुम्हारा मनुष्य जीवन बहुत-बहुत वैल्युबुल है - कैसे?

उत्तर:-
इस जीवन में तुम बाप के बच्चे बन बाप से पूरा वर्सा लेते हो। इसी मनुष्य तन में पुरुषार्थ कर तुम कौड़ी से हीरे जैसा बनते हो। बेगर से प्रिन्स, इनसालवेन्ट से 100 परसेन्ट सालवेन्ट बनते हो इसलिए तुम्हें इस समय को व्यर्थ नहीं गँवाना है। हर श्वाँस बाप की याद में रहकर सफल करना है। कर्म करते भी याद में रहना है।

गीत:-
यह वक्त जा रहा है....

ओम् शान्ति। यह जो इस समय मनुष्य का जीवन है इनको अमूल्य कहा जाता है। बच्चे भी समझते हैं और बाप भी समझाते हैं कि यह तुम्हारा अन्तिम मनुष्य का जन्म है, यह बहुत वैल्युबुल है। इनका मूल्य कोई कर नहीं सकता। वैसे यह टाइम भी बहुत वैल्युबुल है। तुम बच्चे जानते हो अब कौड़ी से हीरे जैसा वा बेगर से प्रिन्स, इनसालवेन्ट से 100 प्रतिशत सालवेन्ट बन रहे हैं। यह तुम्हारा मनुष्य तन बहुत वैल्युबुल है जबकि बाप के बच्चे बने हो। और मनुष्यों का वैल्युबुल नहीं है। तुम बच्चों को इस समय अपना श्वाँस व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। कैसे सफल करना चाहिए सो तो बाप समझाते हैं। श्वाँसों श्वाँस याद करो बाप को। मनुष्य भक्ति मार्ग में तो अनेक प्रकार के सिमरण करते हैं। वह है अनेकों की व्यभिचारी याद। तुम बच्चे एक के सिवाए और किसी को याद नहीं करते हो। समझते हो हमारा श्वाँस व्यर्थ न जाये। श्वाँसों श्वाँस कोशिश कर बाबा को याद करना है। ऐसे डायरेक्शन मिलते हैं। इसमें कोई जाप आदि नहीं करना है। हमारा स्वधर्म ही है आवाज से परे रहना। इस शरीर द्वारा हम पार्ट बजाते हैं। आत्मा असुल शान्तिधाम की रहने वाली है। यह भी हमारे सिवाए कोई कह न सके कि हम असुल शान्तिधाम के रहने वाले हैं। कोई पूछे तुम कहाँ के रहने वाले हो तो तुम कहेंगे हम आत्मा तो शान्तिधाम की रहने वाली हैं। बाकी यहाँ के लिए पूछते हो तो यहाँ हम फलानी जगह रहने वाले हैं। शान्तिधाम से यहाँ आकर शरीर लेकर पार्ट बजाना ही है। अभी यह है इस मृत्युलोक का अन्तिम जन्म, इसमें श्वाँस व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। वो लोग बहुत फास्ट (व्रत) रखते हैं। उनको कहना है क्यों तुम टाइम वेस्ट करते हो, इससे ऊंचे ते ऊंचे बाप को याद करो। यह भी तुम जैसे जीवघात करते हो। आत्म-घात नहीं कहेंगे क्योंकि आत्मा का घात कभी नहीं होता। कहा जाता है जीवघाती, महापापी। इस समय अपने शरीर को तकलीफ देना - यह भी तो महापाप है। तुम कह सकते हो कि इस समय तुम महान पुण्य आत्मा बन सकते हो, इस पुरूषार्थ से। उन्हों को तो यह पता नहीं है कि बाप यहाँ आया हुआ है। यह बापदादा है ना। शिवबाबा ब्रह्मा दादा। प्रजापिता ब्रह्मा तो मशहूर है। वह तो कह सकते हैं ना कि क्यों ऐसे वैल्युबुल शरीर का घात करते हो। इससे तो मनमनाभव, बाप को याद करो तो जीवनमुक्ति मिलेगी अथवा कोई द्वारा मैसेज भी भेज सकते हो। देहली वाले बच्चे भी भेज सकते हैं कि इस समय यह दुनिया बदल रही है। इस पुरुषार्थ से तुमको जीवनमुक्ति मिल सकती है। देखते हो; सामने महाभारत लड़ाई भी है इसलिए बच्चों को एक भी श्वाँस वेस्ट नहीं करना चाहिए। सारा कल्प सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते एकदम तमोप्रधान बन गये हैं। अब फिर सतोप्रधान बनना है, इसमें मेहनत लगती है। मासी का घर नहीं है। जनक को एक सेकेण्ड में जीवनमुक्ति कैसे मिली? वह भी तुम जानते हो और लिख सकते हो। जीवनमुक्ति एक सेकेण्ड में बिना कौड़ी खर्चा मिल सकती है।

यह मृत्युलोक का लास्ट जन्म है। अमरलोक में है जीवनमुक्ति, मृत्युलोक में है जीवन बन्ध। यह भागवत में भी गाया हुआ है। यह भी एक कहानी बना दी है कि जनक को ज्ञान देने वाला कोई मिल न सका। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा ज्ञान देते हैं, इसको ही ब्रह्मा ज्ञान कहा जाता है। ब्रह्मा को भी जरूर किसी ने दिया होगा ना। ज्ञान सागर तो परमपिता परमात्मा है, वह ब्रह्मा द्वारा आकर देते हैं। त्रिमूर्ति चित्र द्वारा तुम अच्छी तरह समझा सकते हो। कोई भी अन्दर आते हैं तो उनसे पूछो बोर्ड पढ़ा, क्या लिखा हुआ है। बी.के. प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे ठहरे। प्रजापिता को सिर्फ कुमारियां ही होंगी क्या? जरूर कुमार भी होंगे। तो हमारी यह फैमली हो गई। ब्रह्मा बाप है, ब्रह्मा किसका बच्चा? शिवबाबा का। इन द्वारा स्थापना कर रहे हैं। यह फैमली की फैमली भी है, पाठशाला की पाठशाला भी है। सर्व का सद्गति दाता तो एक ही बाप है। वही यह दुनिया स्थापन कर रहे हैं। तो जरूर डेविल वर्ल्ड खत्म होगा। राईज़ और फाल भारत का होता है। भारत ही हेविन से हेल एकदम ऊंच से नीच बनता है। हेविन माना नई दुनिया। बुद्धिवान जो होंगे, वह समझेंगे बरोबर आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। तुम लिखते भी हो कि डिटीज्म कैसे स्थापन हो रहा है, एक सेकेण्ड में जीवन-मुक्ति कैसे मिलती है..., आकर समझो। अभी यह पुरानी दुनिया है, वह बदलकर नई दुनिया बन रही है इसलिए यह अन्तिम जन्म बहुत वैल्युबुल है, इनका बहुत महत्व है। जबकि हम बाबा से वर्सा लेते हैं और आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले ही आकर वर्सा लेंगे। अगर नहीं लेते हैं तो समझना चाहिए यह 84 जन्म लेने वाला, सूर्यवंशी में आने वाला नहीं है। पिछाड़ी में आयेंगे। जिनकी फुल ज्योत जगती है वह सतयुग में आयेंगे। पीछे दिन-प्रतिदिन कम ताकत वाले होंगे। महान सौभाग्यशाली ही एक्यूरेट नई दुनिया में आयेंगे। रहना तो नये मकान में चाहिए। 10-12 वर्ष के बाद जाकर रहे, ऐसा कच्चा पुरूषार्थ क्यों करना चाहिए। मम्मा बाबा नई दुनिया में महाराजा महारानी बनते हैं तो हम भी क्यों न बनें। सर्विस को बढ़ायें। बच्चों का यह ख्याल चलना चाहिए।

बाप कहते हैं - मैं तुमको आज बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। बाप को जान लिया तो जीवनमुक्ति का हकदार तो बन ही जायेंगे। ज्ञान का विनाश तो होता नहीं। कई मनुष्य तो अच्छी रीति समझते भी हैं। कोई तो कुछ नहीं समझते, ऐसे ही देखकर चले जाते हैं। कोई कहकर भी जाते हैं हम जरूर आयेंगे। परन्तु माया फिर भुला देती है। माया बिल्ली कम नहीं है। गुल बकावली का एक खेल भी दिखाते हैं। यह भी मिसाल तुम्हारे लिए है। बाप ही समझाते हैं। यहाँ तुम आये हो माया पर जीत पहन जगतजीत बनने। इस पर कहानी बनी हुई है। तुम योगबल में रहते हो, माया पर जीत पाने लिए। परन्तु माया बिल्ली पासा फिरा देती है। गुलबकावली, अल्लाह अवलदीन यह इस समय की बातें हैं। अल्लाह ही अवलदीन, देवता धर्म की स्थापना करते हैं। हातमताई का खेल भी इस समय का है। बाप को न याद करने से माया आ जाती है। जो कुछ हो चुका है, उनकी बैठ बाद में कहानियां बनाते हैं। जो होने वाला है, वह तो कुछ बता नहीं सकते। पास्ट में जो कुछ हुआ है उसका ड्रामा बनाते हैं। कंस वध, अमृत मंथन, किसम-किसम के खेल बनाते हैं। वह बिचारे यह नहीं जानते कि यह बेहद का ड्रामा है। तुम जानते हो यह अनादि अविनाशी ड्रामा है। मनुष्य तो कुछ भी नहीं जानते कि यह ड्रामा कितने वर्ष का है। भल कहते हैं हिस्ट्री रिपीट होती है। परन्तु समझते नहीं हैं। बाप किसम-किसम के राज़ समझाते हैं कि बुद्धि में यह बैठे कि हमारा यह अन्तिम जन्म बड़ा वैल्युबुल है। इसमें टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए। हथ कार डे दिल यार डे...दिल तो आत्मा में है ना। आत्मा ही कहती है - मुझे तंग नहीं करो। मेरी दिल को दु:खी नहीं करो। बुद्धि समझती है, जज करती है - यह हमको सुख देते हैं, यह दु:ख देते हैं। आत्मा शरीर के बिना तो कह न सके। आत्मा ही सब कुछ सीखती है। संस्कार आत्मा में भरते हैं। अभी तुमको परमपिता परमात्मा सिखला रहे हैं। तुम जानते हो बाप ज्ञान का सागर है, पतित-पावन है। वह भारत के लिए सौगात ले आते हैं वैकुण्ठ की इसलिए गाया हुआ है, सर्व के सद्गति दाता। उनका बर्थ प्लेस भारत है। सोमनाथ का मन्दिर भी यहाँ ही है। शिवबाबा आया था तब तो उनका यादगार मन्दिर बनाया है। वह कब आये, क्या करके गये, यह नहीं जानते। लक्ष्मी-नारायण थे फिर कहाँ गये वह थोड़ेही समझते हैं कि वह इस पतित दुनिया में हैं। सतोप्रधान थे फिर चक्र लगाकर तमोप्रधान बने हैं। नाम रूप तो बदल जाता है ना। हर जन्म में फीचर्स बदल जाते हैं। यह बना बनाया ड्रामा है, इसमें जरा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता। फीचर्स एक न मिलें दूसरे से। बाबा को बच्चों पर रहम पड़ता है कि बच्चे अपने बाप को जान लेवें। मालूम तो पड़ता है ना। बी.के. वृद्धि को पाते रहेंगे एक दिन यह भी आयेगा, जो फेरा पहनते रहेंगे। तुम्हारी प्रदर्शनी में सब आयेंगे। दिन-प्रतिदिन नाम बाला होता जाता है। बाबा ओपीनियन की भी किताब छपाते हैं। वह भी काम में आयेगी। बहुतों को भेज देनी पड़ेगी। बच्चे जो सर्विसएबुल हैं, उनको सारा दिन ख्यालात रखने पड़ते हैं। वह झट कहेंगे भल बी.के. आकर मिल सकती हैं। भूख हड़ताल रखते हैं तो 10-12 दिन के बाद कमजोर हो जाते हैं। फिर इतनी बात नहीं कर सकते। तुम्हारी बात को समझेंगे और कहेंगे कि बरोबर जीवनमुक्ति पाने का यही ठीक रास्ता है। सर्व का सद्गति दाता तो एक ही बाप है। बाकी सब हैं भक्ति मार्ग के गुरू। गुरू तो बहुत हो गये हैं ना। स्त्री का पति भी गुरू है। कथा सुनाने वाले को भी गुरू कहते हैं। यह सब समझने की बातें हैं। बच्चों का माथा बहुत विशाल होना चाहिए सर्विस के लिए। बाप को याद कर रावण पर विजय पानी है। श्वाँस व्यर्थ नहीं गँवाना है। जो समय बरबाद करते रहते हैं उनको बेसमझ कहा जाता है। बाप कहेंगे - किसका जीवन हीरे जैसा बनाने तुम सर्विस नहीं करते हो! कितना वेस्ट ऑफ टाइम, वेस्ट ऑफ एनर्जी करते हो। कुछ भी समझते नहीं, इसलिए पत्थरबुद्धि कहा जाता है। इसमें सारी योग की बात है। बाप को याद करो और वर्सा ले लो। यह अर्थ कभी कोई समझ न सके। वह तो ब्रह्म को याद करते हैं। बाप कहते हैं - मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। ब्रह्म कोई पतित-पावन है क्या? पतित-पावन तो परमपिता परमात्मा है। ब्रह्म कैसे हो सकता। बिचारे बहुत भूले हुए हैं। बाप बच्चों को फिर भी कहते हैं बच्चे टाइम वेस्ट नहीं करो। बाबा को याद करो। बाबा जानते हैं कई बच्चे दिन-रात बहुत टाइम वेस्ट करते हैं। सारा दिन कुछ भी पुरुषार्थ नहीं करते हैं। बाबा अपना मिसाल भी बताते हैं। भोजन पर बैठते हैं तो भी बाबा को याद करते हैं। हम दोनों इकट्ठे खाते हैं। शरीर में दो आत्मायें हैं ना। याद करते-करते फिर भूल जाता हूँ, और-और ख्यालात आ जाते हैं। इनके ऊपर जवाबदारी बहुत है। बहुत ही ख्यालात आते हैं इसलिए बाबा कहते हैं तुम जास्ती याद में रह सकते हो, इनको तो मेहनत करनी पड़ती है। हमेशा समझो शिवबाबा समझाते हैं। उनको याद करो, ब्रह्मा को याद करने से शिवबाबा भूल जायेगा। बच्चों को पहले तो अपना ही कल्याण करना है, फिर दूसरे का। कई तो ऐसे हैं दूसरों का कल्याण करते रहते हैं, अपना करते नहीं हैं। औरों को आप समान बनाते खुद फिर गुम हो जाते हैं। वन्डर है ना। यह भी तुम समझते हो। तुम अनुभव भी सुनाते हो और कोई सतसंग आदि में थोड़ेही समझाते हैं। यहाँ भी नम्बरवार धारणा होती है। यह नॉलेज बुद्धि में धारण की जाती है। गाते हैं भर दो झोली। यह नॉलेज तो बुद्धि में भरी जायेगी वा झोली में? पारसबुद्धि और पत्थरबुद्धि गाया जाता है। तुम्हारा यह जीवन बहुत अमूल्य है। इसमें पुरूषार्थ की बहुत जरूरत है। गृहस्थ व्यवहार में रहकर सब कुछ करना है। सरकमस्टांश देखे जाते हैं। भल कुमार है, देखा जाता है सर्विस अच्छी कर सकते हैं तो छुड़ा भी लेते हैं। हर एक का सरकमस्टांश देखकर फिर राय दी जाती है। सर्जन नब्ज देखने बिना राय दे न सकें। यह है अविनाशी सर्जन। आत्मा को मनमनाभव का इन्जेक्शन लगाते हैं। इनका यह एक ही इन्जेक्शन है जो 21 जन्म के लिए एवरहेल्दी बना देते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के कितने ढेर बच्चे हैं, कितना बड़ा गृहस्थी है। यह है बेहद का गृहस्थ व्यवहार। यह शिवबाबा का रथ है ना, तो कितनी आमदनी होती है। बाप कहते हैं - मैं इस रथ में बैठ नॉलेज देता हूँ, नहीं तो कैसे दूँगा। कृष्ण तो होता ही है सतयुग आदि में। वही आत्मा सांवरी बनी है, तो इनके बहुत जन्मों के अन्त में प्रवेश करता हूँ इसलिए भाग्यशाली रथ गाया हुआ है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपना तथा दूसरों का जीवन हीरे जैसा बनाने की सेवा करते रहना है। टाइम, मनी, एनर्जी बरबाद नहीं करना है।

2) दूसरों का कल्याण करने के साथ-साथ अपना भी कल्याण करना है। बुद्धि रूपी झोली में ज्ञान रत्न धारण कर दान भी करना है।

वरदान:-
प्रालब्ध की इच्छा को त्याग अच्छा पुरुषार्थ करने वाले श्रेष्ठ पुरूषार्थी भव

श्रेष्ठ पुरुषार्थी उन्हें कहा जाता है जो पुरुषार्थ की प्रालब्ध को भोगने की इच्छा नहीं रखते। जहाँ इच्छा है वहाँ स्वच्छता खत्म हो जाती है और सोचता (सोचने वाले) बन जाते हैं। जो यहाँ ही प्रालब्ध भोगने की इच्छा रखते हैं वह अपनी भविष्य कमाई जमा होने में कमी कर देते हैं इसलिए इच्छा के बजाए अच्छा शब्द याद रखो। श्रेष्ठ पुरुषार्थी सदा फ्लोलेस बनने का पुरुषार्थ करते हैं, किसी भी बात में फेल नहीं होते।

स्लोगन:-
साधन कमल पुष्प बनकर यूज़ करो क्योंकि ये आपके कर्मयोग का फल हैं।

 

09-12-2021

09-12-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप आये हैं तुम्हें राजयोग सिखलाने, बाप के सिवाए कोई भी देहधारी तुम्हें राजयोग सिखला नहीं सकता''

प्रश्नः-
तीव्र भक्ति करने से कौन सी प्राप्ति होती है, कौन सी नहीं?

उत्तर:-
कोई तीव्र भक्ति करते हैं तो दीदार हो जाता है। बाकी सद्गति तो किसी की होती नहीं। वापस कोई भी जाता नहीं। बाप के बिना वापिस कोई भी ले नहीं जा सकता। तुम इस बने बनाये ड्रामा को जानते हो। तुम्हें आत्मा का यथार्थ ज्ञान है। आत्मा ही स्वर्गवासी और नर्कवासी बनती है।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप ने ओम् शान्ति का अर्थ भी समझाया है। ओम् को अहम् अर्थात् मैं भी कहा जाता है। मैं आत्मा, मेरा शरीर दो चीज़ें हैं। यह आत्मा ने कहा ओम् शान्ति अर्थात् शान्ति मेरा स्वधर्म है। आत्मा का निवास स्थान है शान्तिधाम अथवा परमधाम। वह है निराकारी दुनिया। यह है साकारी मनुष्यों की दुनिया। मनुष्य में आत्मा है और यह शरीर 5 तत्वों का बना हुआ है। आत्मा अविनाशी है, वह कब मरती नहीं। अब आत्मा का बाप कौन? शरीर का बाप तो हर एक का अलग-अलग है। बाकी सभी आत्माओं का बाप एक ही है परमपिता परमात्मा, उनका असली नाम है शिव। पहले-पहले कहते हैं; शिव परमात्माए नम: फिर कहेंगे ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:। उन्हों को भगवान नहीं कह सकते। सबसे ऊंच हैं निराकार परमात्मा। फिर हैं सूक्ष्म देवतायें, यहाँ सभी मनुष्य हैं। अब प्रश्न उठता है कि आत्मा का रूप क्या है? भारत में शिव की पूजा करते हैं, शिवकाशी, शिवकाशी कहते हैं। वे लोग लिंग बनाते हैं, कोई बड़ा बनाते, कोई छोटा लेकिन जैसे आत्मा का रूप है वैसे परमात्मा का रूप है। परम आत्मा उसको मिलाकर परमात्मा कहते हैं। परमात्मा के लिए कोई कहते वह अखण्ड ज्योति स्वरूप है, कोई कहते ब्रह्म है। अब बाप समझाते हैं जैसे तुम आत्मा बिन्दी हो वैसे मेरा रूप भी बिन्दी है। जब रूद्र पूजा करते हैं तो उसमें लिंग ही बनाते हैं। शिव का बड़ा लिंग बाकी सालिग्राम छोटे-छोटे बनाते हैं। मनुष्यों को न यथार्थ आत्मा का ज्ञान है, न परमात्मा का। तो वह मनुष्य बाकी क्या रहा। सबमें 5 विकार प्रवेश हैं। देह-अभिमान में आकर एक दो को काटते रहते हैं। यह विकार हैं ही दु:ख देने वाले। कोई मर गया तो दु:ख हुआ। यह भी कांटा लगा। कोई भी मनुष्य को न आत्मा का, न परमात्मा का रियलाइजेशन है। सूरत मनुष्य की सीरत विकारी है इसलिए कहा जाता है रावण सम्प्रदाय क्योंकि है ही रावण राज्य। सब कहते भी हैं हमको रामराज्य चाहिए। गीता में भी अक्षर है कौरव सम्प्रदाय, पाण्डव सम्प्रदाय और यादव सम्प्रदाय। अभी तुम बच्चे राजयोग सीख रहे हो। राजयोग श्रीकृष्ण सिखला न सके। वह है सतयुग का प्रिन्स। उनकी महिमा है सर्वगुण सम्पन्न... हर एक का कर्तव्य, महिमा अलग-अलग है। प्रेजीडेण्ट का कर्तव्य अलग, प्राइम मिनिस्टर का कर्तव्य अलग। अभी यह तो ऊंचे ते ऊंचा बेहद का बाप है। इनके कर्तव्य को भी मनुष्य ही जानेंगे, जानवर थोड़ेही जानेंगे। मनुष्य जब तमोप्रधान बन जाते हैं तो एक दो को गाली देते हैं। यह है ही पुरानी दुनिया कलियुग, इसको नर्क कहा जाता है। विशस वर्ल्ड कहा जाता है। सतयुग को वाइसलेस वर्ल्ड कहा जाता है। आत्मा इन आरगन्स द्वारा कहती है हमको रामराज्य चाहिए। हे पतित-पावन आप आकर पावन बनाओ, शान्तिधाम, सुखधाम में ले जाओ। बाप समझाते हैं दु:ख सुख का खेल बना हुआ है। माया ते हारे हार, माया ते जीते जीत। जिसकी पूजा करते हैं उनके आक्यूपेशन को बिल्कुल ही नहीं जानते हैं। इसको कहा जाता है अन्धश्रद्धा अथवा गुड़ियों की पूजा। जैसे बच्चे गुड़िया बनाकर खेलपाल कर फिर तोड़ देते हैं। शिव परमात्माए नम: कहते हैं, परन्तु अर्थ नहीं जानते। शिव तो है ऊंचे ते ऊंचा बाप। ब्रह्मा को भी प्रजापिता कहते हैं। प्रजा माना ही मनुष्य सृष्टि। शिव है आत्माओं का बाप। सभी को दो बाप हैं। परन्तु सभी आत्माओं का बाप शिव है, उनको दु:ख हर्ता सुख कर्ता कहा जाता है, कल्याणकारी भी कहते हैं। देवताओं की फिर महिमा गाते हैं आप सर्वगुण सम्पन्न... हम नींच पापी... हमारे में कोई गुण नाही। बिल्कुल तुच्छ बुद्धि हैं। देवतायें स्वच्छ बुद्धि थे। यहाँ हैं सब विकारी पतित, इसलिए गुरू करते हैं। गुरू वह जो सद्गति करे। गुरू किया ही जाता है वानप्रस्थ में। कहते हैं हम भगवान के पास जाने चाहते हैं। सतयुग में वानप्रस्थ अवस्था कहते नहीं हैं। वहाँ यह मालूम रहता है कि हमको एक शरीर छोड़ दूसरा लेना है। यहाँ मनुष्य गुरू करते हैं मुक्ति में जाने के लिए। परन्तु जाता कोई भी नहीं है। यह गुरू लोग सब भक्ति मार्ग के हैं। शास्त्र भी सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह बाप समझाते हैं। बाप एक ही है, वही भगवान है। मनुष्य को भगवान कैसे कह सकते। यहाँ तो सभी को भगवान कहते रहते हैं। सांई बाबा भी भगवान, हम भी भगवान, तुम भी भगवान। पत्थर भित्तर सबमें भगवान, तो पत्थरबुद्धि ठहरे ना। तुम भी पहले पत्थरबुद्धि, नर्कवासी थे। अभी तुम हो संगमयुगी। महिमा सारी संगमयुग की है। पुरूषोत्तम मास मनाते हैं ना। परन्तु उसमें कोई उत्तम पुरूष बनते नहीं। तुम अभी मनुष्य से देवता कितने उत्तम पुरूष बनते हो। बाप कहते हैं - मैं कल्प के संगमयुगे भारत को पुरूषोत्तम बनाने आता हूँ। तो यह भी बच्चों को समझाया है जैसे आत्मा बिन्दी है वैसे परमपिता परमात्मा भी बिन्दी है। कहते हैं भ्रकुटी के बीच में चमकता है - अज़ब सितारा। आत्मा सूक्ष्म है। उनको बुद्धि से जाना जाता है। इन आंखों से देखा नहीं जा सकता। दिव्य दृष्टि से देख सकते हैं। समझो कोई तीव्र भक्ति करते हैं, उससे दीदार होता है। परन्तु उनसे मिला क्या? कुछ नहीं। दीदार से सद्गति तो हो न सके। सद्गति दाता, दु:ख हर्ता सुख कर्ता तो एक ही बाप है। यह दुनिया ही विकारी है। साक्षात्कार से कोई स्वर्ग में नहीं जाते। शिव की भक्ति की, दीदार हुआ फिर क्या हुआ? वापिस तो बाप बिगर कोई ले नहीं जा सकते। यह है बना बनाया ड्रामा। कहते हैं बनी बनाई बन रही... परन्तु अर्थ जरा भी नहीं जानते। आत्मा का भी ज्ञान नहीं है। वह तो कहते हैं हर एक आत्मा 84 लाख जन्म लेती है। उसमें एक मनुष्य जन्म दुर्लभ होता है। परन्तु ऐसी कोई बात है नहीं। मनुष्य का तो बड़ा पार्ट चलता है। मनुष्य ही स्वर्गवासी और मनुष्य ही नर्कवासी बनते हैं। भारत ही सबसे ऊंच खण्ड था, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वहाँ तो बहुत थोड़े मनुष्य थे। एक धर्म एक मत थी। भारत सारे विश्व का मालिक था और कोई धर्म नहीं था। यह है पढ़ाई। यह कौन पढ़ाता है? भगवानुवाच कि मैं तुमको इस राजयोग द्वारा राजाओं का भी राजा बनाता हूँ। भगवान ने किसको गीता सुनाई। गीता से फिर क्या हुआ? यह किसको मालूम नहीं है। गीता के बाद है महाभारत। गीता में राजयोग है। भगवानुवाच मामेकम् याद करो तो तुम्हारे पाप भस्म होंगे। मनमनाभव का अर्थ ही यह है कि बाप कहते हैं तुम जो सूर्यवंशी पूज्य थे, वह फिर पुजारी शूद्रवंशी बन गये हो। विराट रूप का अर्थ भी तुम बच्चे ही जानते हो। विराट रूप में जो दिखाते हैं उसमें ब्राह्मणों को गुम कर दिया है। ब्राह्मण तो बहुत गाये जाते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान हैं ना। बाप ब्रह्मा द्वारा ही रचना रचते हैं। एडाप्ट करते हैं। अब तुम हो ऊंच ब्राह्मण। तुमको रचने वाला है ऊंचे ते ऊंचा भगवान, जो सबका बाप है। ब्रह्मा का भी वह बाप है। सारी रचना का वह बाप है। रचना हो गई सब ब्रदर्स। वर्सा बाप से मिलता है, न कि भाई से। शिव जयन्ती भी मनाई जाती है। आज से 5 हजार वर्ष पहले ब्रह्मा तन में शिवबाबा आया था। देवी-देवता धर्म स्थापन किया था। ब्राह्मण ही राजयोग सीखे थे। वह तुम अब सीख रहे हो। भारत पहले शिवालय था। शिवबाबा ने शिवालय (स्वर्ग) रचा और भारतवासी ही स्वर्ग में राज्य करते थे। अब कहाँ राज्य करते हैं? अब पतित दुनिया नर्क है। यह कोई समझते नहीं तो हम नर्कवासी हैं। कहते हैं फलाना मरा स्वर्गवासी हुआ तो अपने को नर्कवासी समझना चाहिए।

बाप कहते हैं - मैंने तुम बच्चों को स्वर्गवासी बनाया था जिसको 5 हजार वर्ष हुए। पहले तुम बहुत साहूकार थे, सारे विश्व के मालिक थे तो ऐसा जरूर गॉड ने ही बनाया होगा। भगवानुवाच, मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ तो जरूर राजा भी बनेंगे तो प्रजा भी बनेंगे। आधाकल्प है दिन, स्वर्ग, आधाकल्प है रात, नर्क। अब ब्रह्मा तो एक बार आयेगा ना। बाप है सबका रूहानी पण्डा। वह सभी को वापिस ले जाते हैं। वहाँ से फिर मृत्युलोक में नहीं आयेंगे। अन्धों की लाठी एक ही बाप है। बाप समझाते हैं बच्चे इस रावण राज्य का विनाश होना है। यह वही महाभारत लड़ाई है। मनुष्य तो कुछ भी नहीं समझते। भारतवासी आपेही पूज्य आपेही पुजारी बनते हैं। सीढ़ी उतरते-उतरते वाम मार्ग में चले जाते हैं तो पुजारी बन जाते हैं। पहले हम सब पूज्य सूर्यवंशी थे फिर दो कला कम चन्द्रवंशी हुए फिर उतरते-उतरते पुजारी बने हैं। पहले-पहले पूजा होती है शिव की, उसको अव्यभिचारी पूजा कहा जाता है। अब बाप कहते हैं - एक निराकार बाप को याद करो और कोई भी देहधारी को याद नहीं करना है। बुलाते ही हैं कि हे पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ तो मेरे बिगर और कोई कैसे पावन बना सकते हैं। सीढ़ी में दिखाया है कि कलियुग के अन्त में क्या है। 5 तत्वों की भक्ति करते हैं। साधू-संन्यासी, ब्रह्म की साधना करते हैं। स्वर्ग में यह कोई भी होते नहीं। यह सारा ड्रामा भारत पर ही बना हुआ है। 84 जन्म लेंगे। यहाँ भक्ति मार्ग की कोई दन्त कथायें नहीं हैं। यह तो पढ़ाई है। यहाँ तो यह शिक्षा मिलती है कि एक बाप को याद करो। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी याद नहीं करना है। कोई भी देहधारी को याद नहीं करना है। तुम बच्चे भी कहते हो हमारा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। बाप भी कहते हैं बच्चे गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनो। पतित-पावन मुझ एक बाप को ही कहते हैं। फिर मनुष्य गुरू कैसे बन सकते हैं। खुद ही वापिस नहीं जा सकते तो औरों को कैसे ले जा सकते हैं। न कोई ज्योति ज्योत में समाते हैं। सब पार्ट बजाने वाले यहाँ पुनर्जन्म में हैं। तुम सब हो सजनियां, एक साज़न को याद करते हो। वह है रहमदिल, लिबरेटर। यहाँ दु:ख है तभी तो उनको याद करते हैं। सतयुग में तो कोई भी याद नहीं करते। बाप कहते हैं हमारा पार्ट ही संगमयुग पर है। बाकी युगे-युगे अक्षर रांग लिख दिया है। इस कल्याणकारी पुरुषोत्तम युग का किसको भी पता नहीं है। पहली मुख्य बात है बाप को जानना। नहीं तो बाप से वर्सा कैसे लेंगे? रचना से वर्सा मिल नहीं सकता। बाप ने ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट किया है। मनुष्य यह नहीं जानते कि इतनी बड़ी प्रजा कैसे पैदा की होगी? प्रजापिता है ना। सरस्वती माँ है या बेटी है? यह भी किसको पता नहीं है। माँ तो तुम्हारी गुप्त है। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा तुमको एडाप्ट करते हैं। अब तुम हो राजऋषि। ऋषि अक्षर पवित्रता की निशानी है। संन्यासी हैं हठयोगी, वह राजयोग सिखला न सकें। गीता भी जो सुनाते हैं वह भक्ति मार्ग की है। कितनी गीतायें बना दी हैं। बाप कहते हैं - बच्चे मैं संस्कृत में तो नहीं पढ़ाता हूँ, न श्लोक आदि की बात है। तुमको राजयोग आकर सिखलाता हूँ, जिस राजयोग से तुम पावन बन पावन दुनिया के मालिक बन जाते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कभी किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है। मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई, यह पाठ पक्का करना है।

2) बाप समान रूहानी पण्डा बनकर सबको घर का रास्ता बताना है। अन्धों की लाठी बनना है।

वरदान:-
सदा बिज़ी रहने की विधि द्वारा व्यर्थ संकल्पों की कम्पलेन को समाप्त करने वाले सम्पूर्ण कर्मातीत भव

सम्पूर्ण कर्मातीत बनने में व्यर्थ संकल्पों के तूफान ही विघ्न डालते हैं। इस व्यर्थ संकल्पों की कम्पलेन को समाप्त करने के लिए अपने मन को हर समय बिज़ी रखो, समय की बुकिंग करने का तरीका सीखो। सारे दिन में मन को कहाँ-कहाँ बिजी रखना है - यह प्रोग्राम बनाओ। रोज़ अपने मन को 4 बातों में बिज़ी कर दो: 1-मिलन (रूहरिहान) 2-वर्णन (सर्विस) 3-मगन और 4-लगन। इससे समय सफल हो जायेगा और व्यर्थ की कम्पलेन खत्म हो जायेगी।

स्लोगन:-
सफलता को परमात्म बर्थराइट समझने वाले ही सदा प्रसन्न-चित रह सकते हैं।

 

07-12-2021

07-12-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - दिलवाला बाप आया है तुम बच्चों की दिल लेने, इसलिए साफ दिल बनो''

प्रश्नः-
सतयुगी पद का मदार मुख्य किस बात पर है?

उत्तर:-
पवित्रता पर। मुख्य है ही पवित्रता। सेन्टर पर जो आते हैं उनको समझाना है, अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो नॉलेज बुद्धि में ठहर नहीं सकती। योग सीखते-सीखते अगर पतित बन गये तो सब कुछ मिट्टी में मिल जायेगा। अगर कोई पवित्र नहीं रह सकते तो भले क्लास में न आयें, परवाह नहीं करनी है। जो जितना पढ़ेंगे, पवित्र बनेंगे उतना धनवान बनेंगे।

गीत:-
आखिर वह दिन आया आज...

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे जानते हैं कि अभी वह दिन फिर आया है। कौन सा? यह तो सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो कि भारत में फिर से स्वर्ग के आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन हो रहा है। तो बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। जिस पतित-पावन बाप को हम पुकारते हैं वह आया हुआ है। वही लिबरेटर, गाइड है अथवा दु:ख हर्ता सुख कर्ता है। एक बार लिबरेट किया फिर फँसे कैसे! यह किसको भी पता नहीं। ऐसे पत्थरबुद्धि मनुष्यों को समझाने में कितनी मेहनत लगती है। ड्युटी भी देखो कैसी रखी है? मूत पलीती कपड़ों को आकर साफ करो। आत्मा और शरीर दोनों पवित्र तो देवताओं के ही हैं। रावणराज्य में शरीर तो किसका पवित्र हो न सकें। शरीर तो पतित है ही। इन सब बातों को कोई जानते ही नहीं। करके आत्मा कुछ पवित्र है तो प्रभाव निकलता है परन्तु फिर भी पतित तो बनना ही है ना। बेहद का बाप पतित-पावन आकर कहते हैं यह 5 विकार शैतान हैं, इनको छोड़ो। अगर मेरी नहीं मानेंगे तो तुमको धर्मराज तंग करेंगे। तुम आलमाइटी अथॉरिटी का कहना नहीं मानते हो तो धर्मराज बहुत कड़ी सज़ा देंगे। बाप आया है पावन बनाने। तुम जानते हो हम ही पावन देवी-देवता थे, अब हम पतित बने हैं। तो अब फट से वह छोड़ देना चाहिए। देह-अभिमान भी शैतान की मत है, वह भी छोड़ना पड़े। पहले नम्बर का जो विकार है, वह भी छोड़ना पड़े। वह दिन भी आयेगा जो बाप के साथ इस सभा में कोई पतित बैठ नहीं सकता, किसको भी एलाउ नहीं करेंगे। मूत पलीती को निकालो बाहर। इन्द्र सभा में आने नहीं देंगे। फिर भल कोई कितना भी करोड़पति हो वा क्या हो, सभा में आ न सकें। बाहर में भल उनको समझाया जाता है। परन्तु बाप की सभा में एलाउ नहीं किया जाता है। अभी एलाउ किया जाता है - भीती के लिए। फिर नहीं। अभी भी बाबा सुनते हैं कोई पतित आकर बैठे हैं तो बाबा को अच्छा नहीं लगता है। ऐसे बहुत हैं जो छिपकर आकर बैठते हैं। ऐसे-ऐसे को बहुत सजा खानी पड़ेगी। मन्दिरों, टिकाणों में स्नान करके जाते हैं। बिगर स्नान कोई जाते नहीं होंगे। वह है स्थूल स्नान। यह है ज्ञान स्नान। इससे भी शुद्ध होना पड़े। कोई मांसाहारी भी आ नहीं सकते। जब समय आयेगा तो बाबा स्ट्रिक्ट हो जायेगा। दुनिया में देखो भक्ति का कितना जोर है। जो अधिक शास्त्र पढ़ते हैं वह शास्त्री का लकब लेते हैं। तुम अब संस्कृत आदि सीखकर क्या करेंगे? अब बाप तो कहते हैं कि सब कुछ भूल जाओ। सिर्फ एक बाप को याद करो तो तुम पवित्र बन विष्णुपुरी के मालिक बन जायेंगे। जब इस बात को अच्छी रीति समझ जायेंगे तो यह शास्त्र आदि सब भूल जायेंगे। यह जो पढ़ाई पढ़कर बैरिस्टर आदि बनते हैं, उन सबसे ऊंच पढ़ाई यह है, जो परमात्मा नॉलेजफुल आकर पढ़ाते हैं। उनको कहते भी हैं पतित-पावन आओ। परन्तु यह नहीं जानते कि हम पतित हैं। बाबा तो यह समझाते रहते हैं - सतयुग को कहते हैं रामराज्य, कलियुग को कहते हैं रावण राज्य। इस समय सब पतित हैं, पावन देवी देवतायें तो मन्दिरों में पूजे जाते हैं और उनके आगे पतित जाकर माथा टेकते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि वह पवित्रता में सबसे ऊंचे हैं। संन्यासियों से भी ऊंचे हैं। संन्यासियों का मन्दिर थोड़ेही बनता है। अब जब तमोप्रधान भक्ति में चले गये हैं तब फिर उनका चित्र रखते हैं। उसको कहा जाता है तमोप्रधान भक्ति। मनुष्यों की पूजा, 5 तत्वों की पूजा। जब सतोप्रधान भक्ति थी तो एक की पूजा होती थी। उसको कहा जाता है अव्यभिचारी भक्ति। देवताओं को भी ऐसा उसने ही बनाया है। तो पूजा भी होनी चाहिए एक की। परन्तु यह भी ड्रामा बना हुआ है। सतोप्रधान सतो रजो तमो में आना ही है। यहाँ भी ऐसे है। कोई सतोप्रधान बन जाते हैं, कोई सतो, कोई रजो, कोई तमो।

सतयुग में फर्स्टक्लास सफाई रहती है। वहाँ शरीर का तो कोई मूल्य रहता नहीं। बिजली पर रखा और खलास। ऐसे नहीं हड्डियां कोई नदी आदि में डालेंगे। ऐसे भी नहीं शरीर को कहाँ उठाकर ले जायेंगे। यह तकलीफ की बात होती नहीं। बिजली में डाला, खलास। यहाँ शरीर के पिछाड़ी कितना मनुष्य रोते हैं। याद करते हैं। ब्राह्मण खिलाते हैं। वहाँ यह कोई भी बात नहीं होगी। बुद्धि से काम लेना होता है। वहाँ क्या-क्या होगा। स्वर्ग तो फिर क्या! यह है ही नर्क, झूठ खण्ड। तब गाया हुआ है झूठी काया, झूठी माया... गवर्मेन्ट कहती है गऊ कोस बन्द करो। उन्हों को लिखना चाहिए - पहला यह कोस है बड़ा भारी। एक दो पर काम कटारी चलाना, यह कोस बन्द करो। यह काम महाशत्रु है। आदि मध्य अन्त दु:ख देते हैं, उस पर जीत पहनो। तुम पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। वहाँ देवताओं का न्यु ब्लड है। वह कहते हैं - बच्चों का न्यु ब्लड है। परन्तु यहाँ नया ब्लड कहाँ से आया! यहाँ पुराना ब्लड है। सतयुग में जब नया शरीर मिलेगा तब नया ब्लड भी होगा। यह शरीर भी पुराना तो ब्लड भी पुराना। अब इनको छोड़ना है और पावन बनना है। सो तो बाप के सिवाए कोई बना न सके। सबका धर्म अलग-अलग है। और हर एक को अपने धर्म का शास्त्र पढ़ना है। संस्कृत में मुख्य है गीता। बाबा कहते हैं मैं संस्कृत थोड़ेही सिखाता हूँ। जो भाषा यह ब्रह्मा जानता है, मैं उसमें ही समझाऊंगा। मैं अगर संस्कृत में सुनाऊं तो यह बच्चे कैसे समझें। यह कोई देवताओं की भाषा नहीं है। कभी-कभी बच्चियां आकर वहाँ की भाषा बतलाती हैं। यह भाषायें सीखने से शरीर निर्वाह अर्थ कोई लाख, कोई करोड़ कमाते हैं। यहाँ तुम कितनी कमाई कर रहे हो। तुम जानते हो सतयुग में हम महाराजा महारानी बनेंगे। जितना जास्ती पढ़ेंगे उतना जास्ती धनवान बनेंगे। गरीब और साहूकार में फ़र्क तो रहता है ना। सारा मदार है पवित्रता पर। सेन्टर पर जो आते हैं उनको समझाना है अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो नॉलेज बुद्धि में ठहरेगी नहीं। 5-7 रोज़ आकर फिर पतित बने तो नॉलेज खत्म। योग सीखते-सीखते अगर पतित बने तो सब कुछ मिट्टी में मिल जायेगा। अगर कोई पवित्र नहीं बन सकता है तो भले न आओ। परवाह थोड़ेही रखनी चाहिए। जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा सिर पर है। सो बिगर याद के कैसे उतरेगा! गाया भी हुआ है - सेकेण्ड में जीवन मुक्ति। जो बाप कहे सो करना है। सारी दुनिया बुलाती तो है हे पतित-पावन आओ, हम पतित हैं परन्तु पावन कोई बनते ही नहीं हैं। तो वापिस भी कोई जा नहीं सकते। वे लोग ब्रह्म को परमात्मा समझ याद करते हैं। यह ज्ञान ही किसको नहीं तो परमात्मा क्या है? ब्रह्म कोई परमात्मा नहीं है। न ब्रह्म में कोई लीन हो सकता है। फिर भी पुनर्जन्म में तो सबको आना ही है क्योंकि आत्मा अविनाशी है। वह समझते हैं बुद्ध वापिस चला गया। परन्तु उसने जो स्थापना की तो जरूर पालना भी करेंगे। नहीं तो पालना तब कौन करेंगे। वह वापिस कैसे जा सकते हैं। तुम ऐसे थोड़ेही कहते हो कि हम मुक्ति में जाकर बैठ जायें। तुम जानते हो हम अपना धर्म स्थापन कर रहे हैं फिर पालना भी करेंगे। वह पावन धर्म था, अब पतित बन पड़े हैं। आयेंगे भी वही जो इस धर्म के होंगे। यह कलम लग रहा है। सबसे मीठे ते मीठा झाड़ है यह देवी-देवता धर्म का। इसकी स्थापना का कार्य हो रहा है। शास्त्र आदि जो भी बनाये हैं, सब हैं भक्ति मार्ग के लिए। एक बाबा का ही गायन है जो आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। तो ऐसे बनाने वाले बाप को कितना अच्छी रीति याद करना चाहिए। यह भी जानते हैं ड्रामा अनुसार भक्ति मार्ग को भी चलना ही है। वास्तव में सर्व का सद्गति-दाता एक है, तो पूजा भी एक की करनी चाहिए। देवी-देवता जो सतोप्रधान थे वह 84 जन्म भोगकर तमोप्रधान बने हैं। अब फिर सतोप्रधान बनना है। सो सिवाए बाबा की याद के बन न सकें। न किसी में बनाने की ताकत है सिवाए बाप के। याद भी एक को ही करना है। यह है अव्यभिचारी याद। अनेकों को याद करना - यह है व्यभिचारीपना। सबकी आत्मा जानती है कि शिव हमारा बाबा है इसलिए सब तरफ जहाँ भी देखो शिव को पूजते हैं। देवी-देवताओं के आगे भी शिव को रखा है। वास्तव में देवतायें तो पूजा करते नहीं हैं। गायन भी है - दु:ख में सिमरण सब करें, सुख में करे न कोई। फिर देवतायें पूजा कैसे करेंगे! वह है रांग। झूठी महिमा थोड़ेही दिखानी चाहिए। शिवबाबा को जानते ही कहाँ हैं जो याद करें। तो वह चित्र उठा देना चाहिए। बाकी पूजा करने वाले सिंगल ताज वाले दिखाने चाहिए। साधू-सन्त किसको भी लाइट का ताज नहीं है इसलिए ब्राह्मणों को भी लाइट का ताज नहीं दिखा सकते हैं। जिनका ज्ञान तरफ पूरा ध्यान होगा वह करेक्शन भी करते रहेंगे। अभुल तो कोई बना नहीं है। भूलें होती ही रहती हैं। त्रिमूर्ति का चित्र कितना अच्छा है। यह बाप यह दादा। बाबा कहते हैं - तुम मुझे याद करो तो यह बन जायेंगे। देही-अभिमानी बनना है। आत्मा कहती है मेरा सिवाए एक बाप के और किसी में ममत्व नहीं है। हम यहाँ रहते भी शान्तिधाम और सुखधाम को याद करते हैं। अभी दु:खधाम को छोड़ना है। परन्तु जब तक हमारा नया घर तैयार हो जाए तब तक पुराने घर में रहना है। नये घर में जाने लायक बनना है। आत्मा पवित्र बन जायेगी तो फिर घर चली जायेगी। कितना सहज है। मूल बात है ही यह समझने की कि परमात्मा कौन है और यह दादा कौन है? बाप इन द्वारा वर्सा देते हैं। बाबा कहते हैं बच्चे मनमनाभव। मुझे याद करो तो तुम पावन देवता बन जायेंगे सतयुग में। बाकी सब उस समय मुक्तिधाम में रहते हैं। सभी आत्माओं को शान्तिधाम में ले जाने वाला बाप ही है। है कितना सहज। बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए। दिल बड़ी साफ होनी चाहिए। कहा जाता - दिल साफ तो मुराद हॉसिल। दिल आत्मा में है। सच्चा दिलवर आत्माओं का बाप है। दिल लेने वाला दिलवाला बाप को कहा जाता है। वह आते ही हैं सबकी दिल लेने के लिए। सभी की संगम पर आकर दिल लेते हैं। आत्माओं की दिल लेने वाला परमात्मा। मनुष्यों की दिल लेने वाले मनुष्य। रावण राज्य में सब एक दो की दिल को खराब करने वाले हैं।

तुम बच्चों को कल्प पहले भी इस त्रिमूर्ति के चित्र पर समझाया है तब तो अभी भी निकला है ना। तो जरूर समझाना पड़ेगा। अभी कितने चित्र निकले हैं समझाने के लिए। सीढ़ी कितनी अच्छी है। फिर भी समझते नहीं। अरे भारतवासी तुमने ही 84 जन्म लिये हैं। यह अभी अन्तिम जन्म है। हम तो शुभ बोलते हैं। तुम ऐसे क्यों कहते हो कि हमने 84 जन्म नहीं लिये हैं। तो तुम स्वर्ग में आयेंगे नहीं। फिर भी नर्क में आयेंगे। स्वर्ग में आने चाहते ही नहीं हैं। भारत ही स्वर्ग बनना है। यह तो हिसाब है समझने का। महारथी अच्छी तरह समझा सकते हैं। सर्विस करने का हुल्लास रखना चाहिए। हम जाकर किसको दान दें। धन होगा ही नहीं तो दान देने का ख्याल भी नहीं आयेगा। पहले पूछना चाहिए कि क्या आश रखकर आये हो? दर्शन की यहाँ बात नहीं। बेहद बाप से बेहद का सुख लेना है। दो बाप हैं ना। बेहद के बाप को सब याद करते हैं। बेहद के बाप से बेहद का वर्सा कैसे मिलता है सो आकर समझो। यह भी समझने वाले ही समझेंगे। राजाई लेने वाला होगा तो फट समझ जायेगा। यह तो बाप कहते हैं घर बैठे, काम काज करते सिर्फ बाबा को याद करो तो याद करने से ही पाप मिट जायेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कभी भी एक दो की दिल खराब नहीं करनी है। सर्विस करने का हुल्लास रखना है। ज्ञान धन है तो दान जरूर करना है।

2) नये घर में चलने के लिए स्वयं को लायक बनाना है। आत्मा को याद के बल से पावन बनाना है।

वरदान:-
स्व-स्थिति द्वारा सर्व परिस्थितियों को पार करने वाले निराकारी, अलंकारी भव

जो अलंकारी हैं वे कभी देह-अहंकारी नहीं बन सकते। निराकारी और अलंकारी रहना - यही है मन्मनाभव, मध्याजीभव। जब ऐसी स्व-स्थिति में सदा स्थित रहते तो सर्व परिस्थितियों को सहज ही पार कर लेते, इससे अनेक पुराने स्वभाव समाप्त हो जाते हैं। स्व में आत्मा का भाव देखने से भाव-स्वभाव की बातें समाप्त हो जाती हैं और सामना करने की सर्व शक्तियां स्वयं में आ जाती हैं।

स्लोगन:-
संकल्प का एक कदम आपका तो सहयोग के हज़ार कदम बाप के।

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