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22 March विश्व जल दिवस World Water Day

22 मार्च 2013 विश्वभरमेंविश्वजलदिवस (World Water Day)

कोमनायागया

 

22 मार्च: विश्व जल दिवस

विश्व भर में विश्व जल दिवस 22 मार्च 2013 को मनाया गया. विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1992 के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को की थी. विश्व जल दिवस की अंतरराष्ट्रीय पहल रियो डि जेनेरियो में वर्ष 1992 में आयोजित पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में की गई थी, जिस पर सर्वप्रथम वर्ष 1993 में 22 मार्च के दिन पूरे विश्व में जल दिवस के मौके पर जल के संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता फैलाने का कार्य किया गया.

वर्ष 2013 केविश्वजलदिवसकाथीम

प्रत्येक वर्ष विश्व जल दिवस मनाने के लिए एक अलग थीम होता है. वर्ष 2013 का थीम जल सहयोग है.

जलसेजुड़ेमुख्यतथ्य

• धरती पर एक अरब 40 घन किलो लीटर पानी है.
• 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है.
• 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में है.
• केवल 1 प्रतिशत ताजा पानी नदी, तालाब, झरनों और झीलों में है जो पीने लायक है.
• इस 1 प्रतिशत पानी का 60 वां हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है.
• 40 वां हिस्सा पीने, भोजन, नहाने और साफ-सफाई में खर्च होता है.
• जल जनित बीमारियों के कारण प्रतिवर्ष 22 लाख मौतें विश्व में होती हैं.
• विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 लोगों को साफ पानी नहीं मिल पाता है.
• चार करोड़ भारतीय जलजनित बीमारियों से ग्रस्त होते हैं.

 

 

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विश्वजलदिवस प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को मनाया जाता है। आज विश्व में जल का संकट कोने-कोने में व्याप्त है। लगभग हर क्षेत्र में विकास हो रहा है। दुनिया औद्योगीकरण की राह पर चल रही है, किंतु स्वच्छ और रोग रहित जल मिल पाना कठिन हो रहा है। विश्व भर में साफ़ जल की अनुपलब्धता के चलते ही जल जनित रोग महामारी का रूप ले रहे हैं। कहीं-कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि अगला विश्व युद्ध जल को लेकर होगा। इंसान जल की महत्ता को लगातार भूलता गया और उसे बर्बाद करता रहा, जिसके फलस्वरूप आज जल संकट सबके सामने है। विश्व के हर नागरिक को पानी की महत्ता से अवगत कराने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र ने "विश्व जल दिवस" मनाने की शुरुआत की थी।

जल दिवस का प्रारम्भ

'विश्व जल दिवस' मनाने की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1992 के अपने अधिवेशन में 22 मार्च को की थी। 'विश्व जल दिवस' की अंतरराष्ट्रीय पहल 'रियो डि जेनेरियो' में 1992 में आयोजित 'पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' (यूएनसीईडी) में की गई थी, जिस पर सर्वप्रथम 1993 को पहली बार 22 मार्च के दिन पूरे विश्व में 'जल दिवस' के मौके पर जल के संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुकता फैलाने का कार्य किया गया।

संकल्पकादिन

'22 मार्च' यानी कि 'विश्व जल दिवस', पानी बचाने के संकल्प का दिन है। यह दिन जल के महत्व को जानने का और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन है। आँकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.5 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। प्रकृति इंसान को जीवनदायी संपदा जल एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, इंसान भी इस चक्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना प्रत्येक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी है। इस चक्र के थमने का अर्थ है, जीवन का थम जाना। प्रकृति के ख़ज़ाने से जितना पानी हम लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते। अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित नहीं होने देना चाहिए और पानी को व्यर्थ होने से भी बचाना चाहिए। 22 मार्चकादिनयहप्रणलेनेकादिनहैकिहरव्यक्तिकोपानीबचानाहै।

जल ही जीवन

जल ही जीवन है, जल के बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। सब लोग इस तथ्य को भली-भाँति जानते हैं कि जल कितना महत्त्वपूर्ण है। लेकिन यह सब बातें हम तब भूल जाते हैं, जब अपनी पानी से भरी टंकी के सामने मुँह धोते हुए पानी को बर्बाद करते रहते हैं। हम कई लीटर मूल्यवान पानी अपनी कीमती कार को नहलाने में या फिर स्वयं भी काफ़ी देर तक नहाने में बर्बाद कर देते हैं। किताबी दुनिया और किताबी ज्ञान को हममें से बहुत कम ही असल जिंदगी में उतार पाते हैं और इसी का नतीजा है कि आज भारत और विश्व के सामने पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है। धरातल पर तीन चौथाई पानी होने के बाद भी पीने योग्य पानी एक सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। उस सीमित मात्रा के पानी का इंसान ने अंधाधुध दोहन किया है। नदी, तालाबों और झरनों को पहले ही हम कैमिकल की भेंट चढ़ा चुके हैं, जो बचा हुआ है, उसे अब हम अपनी अमानत समझ कर अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं। लोगों को पानी खर्च करने में कोई हर्ज भी नहीं, क्यूंकि अगर घर के नल में पानी नहीं आता तो वह पानी का टैंकर आदि मंगवा लेते हैं। किंतु हालात हर जगह एक जैसे नहीं होते हैं।

 

 

पानी लेकर आती महिलाएँ

भारत में जल संकट

यदि हम भारत की बात करें तो देखेंगे कि एक तरफ दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर हैं, जहाँ पानी की किल्लत तो है, किंतु फिर भी यहाँ पानी की समस्या विकराल रूप में नहीं है। लेकिन देश के कुछ ऐसे राज्य भी हैं, जहाँ आज भी कितने ही लोग साफ़ पानी के अभाव में या फिर रोग जनित गन्दे पानी से दम तोड़ रहे हैं। राजस्थान, जैसलमेर और अन्य रेगिस्तानी इलाकों में पानी आदमी की जान से भी ज़्यादा कीमती है। पीने का पानी इन इलाकों में बड़ी कठिनाई से मिलता है। कई-कई किलोमीटर चल कर इन प्रदेशों की महिलाएँ पीने का पानी लाती हैं। इनकी जिंदगी का एक अहम समय पानी की जद्दोजहद में ही बीत जाता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

जल के विषय में एक नहीं बल्कि कई चौंका देने वाले तथ्य सामने आये हैं। विश्व में और विशेष रूप से भारत में पानी किस प्रकार नष्ट होता है, इस विषय में जो तथ्य सामने आए हैं, उस पर जागरूकता से ध्यान देकर हम पानी के अपव्यय को रोक सकते हैं। अनेक तथ्य ऐसे हैं, जो हमें आने वाले ख़तरे से तो सावधान करते ही हैं, दूसरों से प्रेरणा लेने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। पानी के महत्व व इसके अनजाने स्रोतों की जानकारी भी इनसे मिलती है। निम्नलिखित कुछ तथ्य ध्यान देने योग्य हैं-

 

 

नल से आता पानी

(लगभग 6.4 कि.मी.) सफ़र पैदल ही तय करती है।

 

 

जल प्रदूषण

बारिश के पानी का महत्त्व

 

 

बारिश के जल का संचयन

विश्व की बढ़ती हुई जनसंख्या तथा औद्योगिक विकास ने भी प्रदूषण में बढ़ोतरी की है, जिससे अब स्वच्छ जल की मांग और भी बढ़ गई है। मानव तथा पर्यावरण दशा, पेय जल तथा कृषि जल की वर्तमान और भविष्य की उपलब्धता खतरे में है। इसके बावजूद जल प्रदूषण एक प्रभावशाली मुद्दा नहीं बन पा रहा है। आज का समय बहुत महत्त्वपूर्ण है, जब प्रत्येक व्यक्ति को वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करनी चाहिए। बारिश की एक-एक बूँद कीमती है। इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है। यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है कि पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा। पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है, जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थीं, किंतु आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। वे सब नदियाँ कहाँ गई, कोई नहीं बता सकता। नदियों की बात छोड़ दी जाये तो हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं। इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है।

जागरुकताकीआवश्यकता

पानी का महत्व भारत के लिए कितना है, यह हम इसी बात से जान सकते हैं कि हमारी भाषा में पानी पर आधारित कई मुहावरे और लोकोक्तियाँ हैं। विज्ञान और पर्यावरण के ज्ञान से मानव ने जो प्रगति की है, उसे प्रकृति संरक्षण में लगाना भी ज़रूरी है। पिछले सालों में तमिलनाडु ने वर्षा जल का संरक्षण करके जो मिसाल क़ायम की है, उसे सारे देश में विकसित करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं है कि पानी की समस्या से हम जीत नहीं सकते। अगर सही ढ़ंग से पानी का सरंक्षण किया जाए और जितना हो सके पानी को बर्बाद करने से रोका जाए तो इस समस्या का समाधान बेहद आसान हो जाएगा। लेकिन इसके लिए जरुरत है- जागरुकता की। एक ऐसी जागरुकता की, जिसमें छोटे से छोटे बच्चे से लेकर बड़े-बूढ़े भी पानी को बचाना अपना धर्म समझें।