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Biodata

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09-04-2020

09-04-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हारा यह मोस्ट वैल्युबुल समय है, इसमें तुम बाप के पूरे - पूरे मददगार बनो, मददगार बच्चे ही ऊंच पद पाते हैं"

प्रश्नः-

सर्विसएबुल बच्चे कौन सी बहाने बाजी नहीं कर सकते हैं?

उत्तर:-

सर्विसएबुल बच्चे यह बहाना नहीं करेंगे कि बाबा यहाँ गर्मी है, यहाँ ठण्डी है इसलिए हम सर्विस नहीं कर सकते हैं। थोड़ी गर्मी हुई या ठण्डी पड़ी तो नाज़ुक नहीं बनना है। ऐसे नहीं, हम तो सहन ही नहीं कर सकते हैं। इस दु:खधाम में दु:ख-सुख, गर्मी-सर्दी, निंदा-स्तुति सब सहन करना है। बहाने बाजी नहीं करनी है।

गीत:-

धीरज धर मनुवा.....

ओम् शान्ति। बच्चे ही जानते हैं कि सुख और दु:ख किसको कहा जाता है। इस जीवन में सुख कब मिलता है और दु:ख कब मिलता है सो सिर्फ तुम ब्राह्मण ही नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हो। यह है ही दु:ख की दुनिया। इनमें थोड़े टाइम के लिए दु:ख-सुख, स्तुति-निंदा सब कुछ सहन करना पड़ता है। इन सबसे पार होना है। कोई को थोड़ी गर्मी लगती तो कहते हम ठण्डी में रहें। अब बच्चों को तो गर्मी में अथवा ठण्डी में सर्विस करनी है ना। इस समय यह थोड़ा बहुत दु:ख भी हो तो नई बात नहीं। यह है ही दु:खधाम। अब तुम बच्चों को सुखधाम में जाने लिए पूरा पुरूषार्थ करना है। यह तो तुम्हारा मोस्ट वैल्युबुल समय है। इसमें बहाना चल न सके। बाबा सर्विसएबुल बच्चों के लिए कहते हैं, जो सर्विस जानते ही नहीं, वह तो कोई काम के नहीं। यहाँ बाप आये हैं भारत को तो क्या विश्व को सुखधाम बनाने। तो ब्राह्मण बच्चों को ही बाप का मददगार बनना है। बाप आया हुआ है तो उनकी मत पर चलना चाहिए। भारत जो स्वर्ग था सो अब नर्क है, उनको फिर स्वर्ग बनाना है। यह भी अब मालूम पड़ा है। सतयुग में इन पवित्र राजाओं का राज्य था, बहुत सुखी थे फिर अपवित्र राजायें भी बनते हैं, ईश्वर अर्थ दान-पुण्य करने से, तो उनको भी ताकत मिलती है। अभी तो है ही प्रजा का राज्य। लेकिन यह कोई भारत की सेवा नहीं कर सकते। भारत की अथवा दुनिया की सेवा तो एक बेहद का बाप ही करते हैं। अब बाप बच्चों को कहते हैं - मीठे बच्चे, अब हमारे साथ मददगार बनो। कितना प्यार से समझाते हैं, देही-अभिमानी बच्चे समझते हैं। देह-अभिमानी क्या मदद कर सकेंगे क्योंकि माया की जंजीरों में फॅसे हुए हैं। अब बाप ने डायरेक्शन दिया है कि सबको माया की जंजीरों से, गुरुओं की जंजीरों से छुड़ाओ। तुम्हारा धन्धा ही यह है। बाप कहते हैं मेरे जो अच्छे मददगार बनेंगे, पद भी वह पायेंगे। बाप खुद सम्मुख कहते हैं - मैं जो हूँ, जैसा हूँ, साधारण होने के कारण मुझे पूरा नहीं जानते हैं। बाप हमको विश्व का मालिक बनाते हैं - यह नहीं जानते। यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक थे, यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुम समझते हो कि कैसे इन्होंने राज्य पाया फिर कैसे गँवाया। मनुष्यों की तो बिल्कुल ही तुच्छ बुद्धि है। अब बाप आये हैं सबकी बुद्धि का ताला खोलने, पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाने। बाबा कहते हैं अब मददगार बनो। लोग खुदाई खिदमतगार कहते हैं परन्तु मददगार तो बनते ही नहीं। खुदा आकर जिनको पावन बनाते हैं उनको ही कहते कि अब औरों को आप समान बनाओ। श्रीमत पर चलो। बाप आये ही हैं पावन स्वर्गवासी बनाने।

तुम ब्राह्मण बच्चे जानते हो यह है मृत्युलोक। बैठे-बैठे अचानक मृत्यु होती रहती है तो क्यों न हम पहले से ही मेहनत कर बाप से पूरा वर्सा ले अपना भविष्य जीवन बना लेवें। मनुष्यों की जब वानप्रस्थ अवस्था होती है तो समझते हैं अब भक्ति में लग जायें। जब तक वानप्रस्थ अवस्था नहीं है तब तक खूब धन आदि कमाते हैं। अभी तुम सबकी तो है ही वानप्रस्थ अवस्था। तो क्यों न बाप का मददगार बन जाना चाहिए। दिल से पूछना चाहिए हम बाप के मददगार बनते हैं। सर्विसएबुल बच्चे तो नामीग्रामी हैं। अच्छी मेहनत करते हैं। योग में रहने से सर्विस कर सकेंगे। याद की ताकत से ही सारी दुनिया को पवित्र बनाना है। सारे विश्व को तुम पावन बनाने के निमित्त बने हुए हो। तुम्हारे लिए फिर पवित्र दुनिया भी जरूर चाहिए, इसलिए पतित दुनिया का विनाश होना है। अभी सबको यही बताते रहो कि देह-अभिमान छोड़ो। एक बाप को ही याद करो। वही पतित-पावन है। सभी याद भी उनको करते हैं। साधू-सन्त आदि सब अंगुली से ऐसे इशारा करते हैं कि परमात्मा एक है, वही सबको सुख देने वाला है। ईश्वर अथवा परमात्मा कह देते हैं परन्तु उनको जानते कोई भी नहीं। कोई गणेश को, कोई हनूमान को, कोई अपने गुरू को याद करते रहते हैं। अब तुम जानते हो वह सब हैं भक्ति मार्ग के। भक्ति मार्ग भी आधाकल्प चलना है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि सब नेती-नेती करते आये हैं। रचता और रचना को हम नहीं जानते। बाप कहते हैं वह त्रिकालदर्शी तो हैं नहीं। बीजरूप, ज्ञान का सागर तो एक ही है। वह आते भी हैं भारत में। शिवजयन्ती भी मनाते हैं और गीता जयन्ती भी मनाते हैं। तो कृष्ण को याद करते हैं। शिव को तो जानते नहीं। शिवबाबा कहते हैं पतित-पावन ज्ञान का सागर तो मैं हूँ। कृष्ण के लिए तो कह न सकें। गीता का भगवान कौन? यह बहुत अच्छा चित्र है। बाप यह चित्र आदि सब बनवाते हैं, बच्चों के ही कल्याण लिए। शिवबाबा की महिमा तो कम्पलीट लिखनी है। सारा मदार इन पर है। ऊपर से जो भी आते हैं वह पवित्र ही हैं। पवित्र बनने बिगर कोई जा न सकें। मुख्य बात है पवित्र बनने की। वह है ही पवित्र धाम, जहाँ सभी आत्मायें रहती हैं। यहाँ तुम पार्ट बजाते-बजाते पतित बने हो। जो सबसे जास्ती पावन वही फिर पतित बने हैं। देवी-देवता धर्म का नाम-निशान ही गुम हो गया है। देवता धर्म बदल हिन्दू धर्म नाम रख दिया है। तुम ही स्वर्ग का राज्य लेते हो और फिर गँवाते हो। हार और जीत का खेल है। माया ते हारे हार है, माया ते जीते जीत है। मनुष्य तो रावण का इतना बड़ा चित्र कितना खर्चा कर बनाते हैं फिर एक ही दिन में खलास कर देते हैं। दुश्मन है ना। लेकिन यह तो गुड़ियों का खेल हो गया। शिवबाबा का भी चित्र बनाए पूजा कर फिर तोड़ डालते हैं। देवियों के चित्र भी ऐसे बनाए फिर जाकर डुबोते हैं। कुछ भी समझते नहीं। अब तुम बच्चे बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानते हो कि यह दुनिया का चक्र कैसे फिरता है। सतयुग-त्रेता का किसको भी पता नहीं। देवताओं के चित्र भी ग्लानि के बना दिये हैं।

बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, विश्व का मालिक बनने के लिए बाप ने तुम्हें जो परहेज बताई है वह परहेज करो, याद में रहकर भोजन बनाओ, योग में रहकर खाओ। बाप खुद कहते हैं मुझे याद करो तो तुम विश्व के मालिक फिर से बन जायेंगे। बाप भी फिर से आया हुआ है। अब विश्व का मालिक पूरा बनना है। फालो फादर-मदर। सिर्फ फादर तो हो नहीं सकता। संन्यासी लोग कहते हैं हम सब फादर हैं। आत्मा सो परमात्मा है, वह तो रांग हो जाता है। यहाँ मदर फादर दोनों पुरूषार्थ करते हैं। फालो मदर फादर, यह अक्षर भी यहाँ के हैं। अभी तुम जानते हो जो विश्व के मालिक थे, पवित्र थे, अब वह अपवित्र हैं। फिर से पवित्र बन रहे हैं। हम भी उनकी श्रीमत पर चल यह पद प्राप्त करते हैं। वह इन द्वारा डायरेक्शन देते हैं उस पर चलना है, फालो नहीं करते तो सिर्फ बाबा-बाबा कह मुख मीठा करते हैं। फालो करने वाले को ही सपूत बच्चे कहेंगे ना। जानते हो मम्मा-बाबा को फालो करने से हम राजाई में जायेंगे। यह समझ की बात है। बाप सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों। बस और कोई को भी यह समझाओ - तुम कैसे 84 जन्म लेते-लेते अपवित्र बने हो। अब फिर पवित्र बनना है। जितना याद करेंगे तो पवित्र होते जायेंगे। बहुत याद करने वाले ही नई दुनिया में पहले-पहले आयेंगे। फिर औरों को भी आपसमान बनाना है। प्रदर्शनी में बाबा-मम्मा समझाने लिए जा नहीं सकते। बाहर से कोई बड़ा आदमी आता है तो कितने ढेर मनुष्य जाते हैं, उनको देखने के लिए कि यह कौन आया है। यह तो कितना गुप्त है। बाप कहते हैं मैं इस ब्रह्मा तन से बोलता हूँ, मैं ही इस बच्चे का रेसपॉन्सिबुल हूँ। तुम हमेशा समझो शिवबाबा बोलते हैं, वह पढ़ाते हैं। तुमको शिवबाबा को ही देखना है, इनको नहीं देखना है। अपने को आत्मा समझो और परमात्मा बाप को याद करो। हम आत्मा हैं। आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है। यह नॉलेज बुद्धि में चक्र लगानी चाहिए। सिर्फ दुनियावी बातें ही बुद्धि में होंगी तो गोया कुछ नहीं जानते। बिल्कुल ही बदतर हैं। परन्तु ऐसे-ऐसे का भी कल्याण तो करना ही है। स्वर्ग में तो जायेंगे परन्तु ऊंच पद नहीं। सजायें खाकर जायेंगे। ऊंच पद कैसे पायेंगे, वह तो बाप ने समझाया है। एक तो स्वदर्शन चक्रधारी बनो और बनाओ। योगी भी पक्के बनो और बनाओ। बाप कहते हैं मुझे याद करो। तुम फिर कहते बाबा हम भूल जाते हैं। लज्जा नहीं आती! बहुत हैं जो सच बताते नहीं हैं, भूलते बहुत हैं। बाप ने समझाया है कोई भी आये तो उनको बाप का परिचय दो। अब 84 का चक्र पूरा होता है, वापिस जाना है। राम गयो रावण गयो........ इसका भी अर्थ कितना सहज है। जरूर संगमयुग होगा जबकि राम का और रावण का परिवार है। यह भी जानते हो सब विनाश हो जायेंगे, बाकी थोड़े रहेंगे। कैसे तुमको राज्य मिलता है, वह भी थोड़ा आगे चल सब मालूम पड़ जायेगा। पहले से ही तो सब नहीं बतायेंगे ना। फिर वह तो खेल हो न सके। तुमको साक्षी हो देखना है। साक्षात्कार होते जायेंगे। इस 84 के चक्र को दुनिया में कोई नहीं जानते।

अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है हम वापिस जाते हैं। रावण राज्य से अभी छुट्टी मिलती है। फिर अपनी राजधानी में आयेंगे। बाकी थोड़े रोज़ हैं। यह चक्र फिरता रहता है ना। अनेक बार यह चक्र लगाया है, अब बाप कहते हैं जिस कर्मबन्धन में फँसे हो उनको भूलो। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए भूलते जाओ। अब नाटक पूरा होता है, अपने घर जाना है, इस महाभारत लड़ाई बाद ही स्वर्ग के गेट्स खुलते हैं इसलिए बाबा ने कहा है यह नाम बहुत अच्छा है, गेट वे टू हेविन। कोई कहते हैं लड़ाईयाँ तो चलती आई हैं। बोलो, मूसलों की लड़ाई कब लगी है, यह मूसलों की अन्तिम लड़ाई है। 5000 वर्ष पहले भी जब लड़ाई लगी थी तो यह यज्ञ भी रचा था। इस पुरानी दुनिया का अब विनाश होना है। नई राजधानी की स्थापना हो रही है।

तुम यह रूहानी पढ़ाई पढ़ते हो राजाई लेने के लिए। तुम्हारा धन्धा है रूहानी। जिस्मानी विद्या तो काम आनी नहीं है, शास्त्र भी काम नहीं आयेंगे तो क्यों न इस धन्धे में लग जाना चाहिए। बाप तो विश्व का मालिक बनाते हैं। विचार करना चाहिए - कौन-सी पढ़ाई में लगें। वह तो थोड़े डिग्रियों के लिए पढ़ते हैं। तुम तो पढ़ते हो राजाई के लिए। कितना रात-दिन का फ़र्क है। वह पढ़ाई पढ़ने से भूगरे (चने) भी मिलेंगे या नहीं, पता थोड़ेही है। किसका शरीर छूट जाए तो भूगरे भी गये। यह कमाई तो साथ चलने की है। मौत तो सिर पर खड़ा है। पहले हम अपनी पूरी कमाई कर लेवें। यह कमाई करते-करते दुनिया ही विनाश हो जानी है। तुम्हारी पढ़ाई पूरी होगी तब ही विनाश होगा। तुम जानते हो जो भी मनुष्य-मात्र हैं, उनकी मुट्ठी में हैं भूगरे। उसको ही बन्दर मिसल पकड़ बैठे हैं। अब तुम रत्न ले रहे हो। इन भूगरों (चनों) से ममत्व छोड़ो। जब अच्छी रीति समझते हैं तब भूगरों की मुट्ठी को छोड़ते हैं। यह तो सब खाक हो जाना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) रूहानी पढ़ाई पढ़नी और पढ़ानी है। अविनाशी ज्ञान रत्नों से अपनी मुट्ठी भरनी है। चनों के पीछे समय नहीं गँवाना है।

2) अब नाटक पूरा होता है, इसलिए स्वयं को कर्मबन्धनों से मुक्त करना है। स्वदर्शन चक्रधारी बनना और बनाना है। मदर फादर को फालो कर राजाई पद का अधिकारी बनना है।

वरदान:-

हद की सर्व इच्छाओं का त्याग करने वाले सच्चे तपस्वी मूर्त भव

हद की इच्छाओं का त्याग कर सच्चे-सच्चे तपस्वी मूर्त बनो। तपस्वी मूर्त अर्थात हद के इच्छा मात्रम् अविद्या रूप। जो लेने का संकल्प करता है वह अल्पकाल के लिए लेता है लेकिन सदा-काल के लिए गंवाता है। तपस्वी बनने में विशेष विघ्न रूप यही अल्पकाल की इच्छायें हैं इसलिए अब तपस्वी मूर्त बनने का सबूत दो अर्थात हद के मान शान के लेवता पन का त्याग कर विधाता बनो। जब विधाता पन के संस्कार इमर्ज होंगे तब अन्य सब संस्कार स्वत:दब जायेंगे।

स्लोगन:-

कर्म के फल की सूक्ष्म कामना रखना भी फल को पकने से पहले ही खा लेना है।

08-04-2020

08-04-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - बाप आया है तुम्हें करेन्ट देने, तुम देही - अभिमानी होंगे, बुद्धियोग एक बाप से होगा तो करेन्ट मिलती रहेगी"

प्रश्नः-

सबसे बड़ा आसुरी स्वभाव कौन-सा है, जो तुम बच्चों में नहीं होना चाहिए?

उत्तर:-

अशान्ति फैलाना, यह है सबसे बड़ा आसुरी स्वभाव। अशान्ति फैलाने वाले से मनुष्य तंग हो जाते हैं। वह जहाँ जायेंगे वहाँ अशान्ति फैला देंगे इसलिए भगवान से सभी शान्ति का वर मांगते हैं।

गीत:-

यह कहानी है दीवे और तूफान की .........

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों ने गीत की लाइन सुनी। गीत तो यह भक्ति मार्ग का है फिर उनको ज्ञान में ट्रांसफर किया जाता है और कोई ट्रांसफर कर न सके। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जान सकते हैं, दीवा क्या है, तूफान क्या है! बच्चे जानते हैं आत्मा की ज्योत उझाई हुई है। अब बाप आये हैं ज्योत जगाने लिए। कोई मरते हैं तो भी दीवा जलाते हैं। उसकी बड़ी खबरदारी रखते हैं। समझते हैं दीवा अगर बुझ गया तो आत्मा को अन्धियारे से जाना पड़ेगा इसलिए दीवा जलाते हैं। अब सतयुग में तो यह बातें होती नहीं। वहाँ तो सोझरे में होंगे। भूख आदि की बात ही नहीं, वहाँ तो बड़े माल मिलते हैं। यहाँ है घोर अन्धियारा। छी-छी दुनिया है ना। सब आत्माओं की ज्योत उझाई हुई है। सबसे जास्ती ज्योत तुम्हारी उझाई हुई है। खास तुम्हारे लिए ही बाप आते हैं। तुम्हारी ज्योत उझा गई हैं, अब करेन्ट कहाँ से मिले? बच्चे जानते हैं करेन्ट तो बाप से ही मिलेगी। करेन्ट जोर होती है तो बल्ब में रोशनी तेज़ हो जाती है। तो अभी तुम करेन्ट ले रहे हो, बड़ी मशीन से। देखो, बाम्बे जैसे शहर में कितने ढेर आदमी रहते हैं, कितनी जास्ती करेन्ट चाहिए। जरूर इतनी बड़ी मशीन होगी। यह है बेहद की बात। सारे दुनिया की आत्माओं की ज्योत बुझी हुई है। उनको करेन्ट देना है। मूल बात बाप समझाते हैं, बुद्धियोग बाप से लगाओ। देही-अभिमानी बनो। कितना बड़ा बाप है, सारी दुनिया के पतित मनुष्यों को पावन करने वाला सुप्रीम बाप आया है सबकी ज्योत जगाने। सारी दुनिया के मनुष्य-मात्र की ज्योत जगाते हैं। बाप कौन है, कैसे ज्योत जगाते हैं? यह तो कोई नहीं जानते। उनको ज्योति स्वरूप भी कहते हैं फिर सर्वव्यापी भी कह देते हैं। ज्योति स्वरूप को बुलाते हैं क्योंकि ज्योति बुझ गई है। साक्षात्कार भी होता है, अखण्ड ज्योति का। दिखलाते हैं अर्जुन ने कहा मैं तेज सहन नहीं कर सकता हूँ। बहुत करेन्ट है। तो अब इन बातों को तुम बच्चे अभी समझते हो। सबको समझाना भी यह है कि तुम आत्मा हो। आत्मायें ऊपर से यहाँ आती हैं। पहले आत्मा पवित्र है, उनमें करेन्ट है। सतोप्रधान है। गोल्डन एज में पवित्र आत्मायें हैं फिर उनको अपवित्र भी बनना है। जब अपवित्र बनते हैं तब गॉड फादर को बुलाते हैं कि आकर लिबरेट करो अर्थात् दु:ख से मुक्त करो। लिबरेट करना और पावन बनाना दोनों का अर्थ अलग-अलग है। जरूर कोई से पतित बने हैं तब कहते हैं बाबा आओ, आकर लिबरेट भी करो, पावन भी बनाओ। यहाँ से शान्तिधाम ले चलो। शान्ति का वर दो। अब बाप ने समझाया है - यहाँ शान्त में तो रह नहीं सकते। शान्ति तो है ही शान्तिधाम में। सतयुग में एक धर्म, एक राज्य है तो शान्ति रहती है। कोई हंगामा नहीं। यहाँ मनुष्य तंग होते हैं अशान्ति से। एक ही घर में कितना झगड़ा हो पड़ता है। समझो स्त्री-पुरूष का झगड़ा है तो माँ, बाप, बच्चे, भाई-बहन आदि सब तंग हो पड़ते हैं। अशान्ति वाला मनुष्य जहाँ जायेगा अशान्ति ही फैलायेगा क्योंकि आसुरी स्वभाव है ना। अभी तुम जानते हो सतयुग है सुखधाम। वहाँ सुख और शान्ति दोनों हैं। और वहाँ (परमधाम में) तो सिर्फ शान्ति है, उनको कहा जाता है स्वीट साइलेन्स होम। मुक्तिधाम वालों को सिर्फ इतना ही समझाना होता है तुमको मुक्ति चाहिए ना तो बाप को याद करो।

मुक्ति के बाद जीवनमुक्ति जरूर है। पहले जीवनमुक्त होते हैं फिर जीवनबंध में आते हैं। आधा-आधा है ना। सतोप्रधान से फिर सतो, रजो, तमो में जरूर आना है। पिछाड़ी में जो एक आधा जन्म लिए आते होंगे, वह क्या सुख-दु:ख का अनुभव करते होंगे। तुम तो सारा अनुभव करते हो। तुम जानते हो इतने जन्म हम सुख में रहते हैं फिर इतने जन्म दु:ख में होते हैं। फलाने-फलाने धर्म नई दुनिया में आ नहीं सकते। उनका पार्ट ही बाद में है, भल नया खण्ड है, उनके लिए जैसे कि वह नई दुनिया है। जैसे बौद्धी खण्ड, क्रिश्चियन खण्ड नया हुआ ना। उनको भी सतो, रजो, तमो से पास करना है। झाड़ में भी ऐसे होता है ना। आहिस्ते-आहिस्ते वृद्धि होती जाती है। पहले जो निकले वह नीचे ही रहते हैं। देखा है ना - नये-नये पत्ते कैसे निकलते हैं। छोटे-छोटे हरे पत्ते निकलते रहते हैं फिर बौर (फूल) निकलता है, नया झाड़ बहुत छोटा है। नया बीज डाला जाता है, उनकी पूरी परवरिश नहीं होती तो सड़ जाता है। तुम भी पूरी परवरिश नहीं करते हो तो सड़ जाते हैं। बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं फिर उसमें नम्बरवार बनते हैं। राजधानी स्थापन होती है ना। बहुत फेल हो पड़ते हैं।

बच्चों की जैसी अवस्था है, ऐसा प्यार बाप से मिलता है। कई बच्चों को बाहर से भी प्यार करना होता है। कोई-कोई लिखते हैं बाबा हम फेल हो गये। पतित बन गये। अब उनको कौन हाथ लगायेगा! वह बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकते। पवित्र को ही बाबा वर्सा दे सकते हैं। पहले एक-एक से पूरा समाचार पूछ पोतामेल लेते हैं। जैसी अवस्था वैसा प्यार। बाहर से भल प्यार करेंगे, अन्दर जानते हैं यह बिल्कुल ही बुद्धू है, सर्विस कर नहीं सकते। ख्याल तो रहता है ना। अज्ञान काल में बच्चा अच्छा कमाने वाला होता है तो बाप भी बहुत प्रेम से मिलेगा। कोई इतना कमाने वाला नहीं होगा तो बाप का भी इतना प्यार नहीं रहता। तो यहाँ भी ऐसे है। बच्चे बाहर में भी सर्विस करते हैं ना। भल कोई भी धर्म वाला हो, उनको समझाना चाहिए। बाप को लिबरेटर कहा जाता है ना। लिबरेटर और गाइड कौन है, उनका परिचय देना है। सुप्रीम गॉड फादर आते हैं, सबको लिबरेट करते हैं। बाप कहते हैं तुम कितने पतित बन गये हो। प्योरिटी है नहीं। अब मुझे याद करो। बाप तो एवर प्योर है। बाकी सब पवित्र से अपवित्र जरूर बनते हैं। पुनर्जन्म लेते-लेते उतरते आते हैं। इस समय सब पतित हैं इसलिए बाप राय देते हैं - बच्चे, तुम मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे। अब मौत तो सामने खड़ा है। पुरानी दुनिया का अब अन्त है। माया का पॉम्प कितना है इसलिए मनुष्य समझते हैं यह तो स्वर्ग है। एरोप्लेन, बिजलियाँ आदि क्या-क्या हैं, यह है सब माया का पॉम्प। यह अब खत्म होना है। फिर स्वर्ग की स्थापना हो जायेगी। यह बिजलियाँ आदि सब स्वर्ग में तो होते हैं। अब यह सब स्वर्ग में कैसे आयेंगे। जरूर जानकारी वाला चाहिए ना। तुम्हारे पास बहुत अच्छे-अच्छे कारीगर लोग भी आयेंगे। वह राजाई में तो आयेंगे नहीं फिर भी तुम्हारी प्रजा में आ जायेंगे। इन्जीनियर आदि सीखे हुए अच्छे-अच्छे कारीगर आयेंगे। यह फैशन सारा बाहर विलायत से आता जाता है। तो बाहर वालों को भी तुम्हें शिवबाबा का परिचय देना है। बाप को याद करो। तुमको भी योग में रहने का ही पुरूषार्थ बहुत करना है, इसमें ही माया के तूफान बहुत आते हैं। बाप सिर्फ कहते हैं मामेकम् याद करो। यह तो अच्छी बात है ना। क्राइस्ट भी उनकी रचना है, रचयिता सुप्रीम सोल तो एक है। बाकी सब है रचना। वर्सा रचता से ही मिलता है। ऐसे-ऐसे अच्छी प्वाइंट जो हैं वह नोट करनी चाहिए।

बाप का मुख्य कर्तव्य है सबको दु:ख से लिबरेट करना। वह सुखधाम और शान्तिधाम का गेट खोलते हैं। उन्हें कहते हैं - हे लिबरेटर दु:ख से लिबरेट कर हमें शान्तिधाम-सुखधाम ले चलो। जब यहाँ सुखधाम है तो बाकी आत्मायें शान्तिधाम में रहती हैं। हेविन का गेट बाप ही खोलते हैं। एक गेट खुलता है नई दुनिया का, दूसरा शान्तिधाम का। अब जो आत्मायें अपवित्र हो गई हैं उनको बाप श्रीमत देते हैं अपने को आत्मा समझो, मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जाएं। अब जो-जो पुरूषार्थ करेंगे तो फिर अपने धर्म में ऊंच पद पायेंगे। पुरूषार्थ नहीं करेंगे तो कम पद पायेंगे। अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स नोट करो तो समय पर काम आ सकती हैं। बोलो, शिवबाबा का आक्यूपेशन हम बतायेंगे तो मनुष्य कहेंगे यह फिर कौन हैं जो गॉड फादर शिव का आक्यूपेशन बताते हैं। बोलो, तुम आत्मा के रूप में तो सब ब्रदर्स हो। फिर प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा रचना रचते हैं तो भाई-बहन होते हैं। गॉड फादर जिसको लिबरेटर, गाइड कहते हैं, उनका आक्यूपेशन हम आपको बतलाते हैं। जरूर हमको गॉड फादर ने बताया है तब आपको बताते हैं। सन शोज़ फादर। यह भी समझाना चाहिए। आत्मा बिल्कुल छोटा स्टॉर है, इन आंखों से उनको देखा नहीं जाता है। दिव्य दृष्टि से साक्षात्कार हो सकता है। बिन्दी है, देखने से फायदा थोड़ेही हो सकता है। बाप भी ऐसी ही बिन्दी है, उनको सुप्रीम सोल कहते हैं। सोल एक जैसा ही है परन्तु वह सुप्रीम है, नॉलेजफुल है, ब्लिसफुल है, लिबरेटर और गाइड है। उनकी बहुत महिमा करनी पड़े। जरूर बाप आयेंगे तब तो साथ ले जायेंगे ना। आकर नॉलेज देंगे। बाप ही बतलाते हैं आत्मा इतनी छोटी है, मैं भी इतना हूँ। नॉलेज भी जरूर कोई शरीर में प्रवेश कर देंगे। आत्मा के बाजू में आकर बैठूँगा। मेरे में पॉवर है, आरगन्स मिल गये तो मैं धनी हो गया। इन आरगन्स द्वारा बैठ समझाता हूँ, इनको एडम भी कहा जाता है। एडम है पहला-पहला आदमी। मनुष्यों का सिजरा है ना। यह माता-पिता भी बनते हैं, इनसे फिर रचना होती है, है पुराना परन्तु एडाप्ट किया है, नहीं तो ब्रह्मा कहाँ से आया। ब्रह्मा के बाप का नाम कोई बताये। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर यह किसकी रचना तो होगी ना! रचयिता तो एक ही है, बाप ने तो इनको एडाप्ट किया है, यह इतने छोटे बच्चे बैठ सुनायें तो कहेंगे यह तो बहुत बड़ी नॉलेज है।

जिन बच्चों को अच्छी धारणा होती है उन्हें बहुत खुशी रहेगी, कभी उबासी नहीं आयेगी। कोई समझने वाला नहीं होगा तो उबासी देता रहेगा। यहाँ तो तुमको कभी उबासी नहीं आनी चाहिए। कमाई के समय कभी उबासी नहीं आती है। ग्राहक नहीं होंगे, धंधा ठण्डा होगा तो उबासी आती रहेगी। यहाँ भी धारणा नहीं होती है। कोई तो बिल्कुल समझते नहीं हैं क्योंकि देह-अभिमान है। देही-अभिमानी हो बैठ नहीं सकेंगे। कोई न कोई बाहर की बातें याद आ जायेंगी। प्वाइंट्स आदि भी नोट नहीं कर सकेंगे। शुरूड बुद्धि झट नोट करेंगे - यह प्वाइंट्स बहुत अच्छी हैं। स्टूडेन्ट्स की चलन भी टीचर को देखने में आती है ना। सेन्सीबुल टीचर की नज़र सब तरफ फिरती रहती है तब तो सर्टीफिकेट देते हैं पढ़ाई का। मैनर्स का सर्टीफिकेट निकालते हैं। कितना अबसेन्ट रहा, वह भी निकालते हैं। यहाँ तो भल प्रेजन्ट होते हैं परन्तु समझते कुछ नहीं, धारणा होती नहीं। कोई कहते हैं बुद्धि डल है, धारणा नहीं होती, बाबा क्या करेंगे! यह तुम्हारे कर्मों का हिसाब-किताब है। बाप तो तदबीर एक ही कराते हैं। तुम्हारी तकदीर में नहीं है तो क्या करेंगे। स्कूल में भी कोई पास, कोई फेल होते हैं। यह है बेहद की पढ़ाई, जो बेहद का बाप पढ़ाते हैं। और धर्म वाले गीता की बात नहीं समझेंगे। नेशन देख समझाना पड़ता है। पहले-पहले ऊंच ते ऊंच बाप का परिचय देना पड़ता है। वह कैसे लिबरेटर, गाइड है! हेविन में यह विकार होते नहीं। इस समय इनको कहा जाता है शैतानी राज्य। पुरानी दुनिया है ना, इनको गोल्डन एजड नहीं कहेंगे। नई दुनिया थी, अब पुरानी हुई है। बच्चों में, जिनको सर्विस का शौक है तो प्वाइंट्स नोट करना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1 पढ़ाई में बहुत-बहुत कमाई है इसलिए कमाई खुशी-खुशी से करनी है। पढ़ते समय कभी उबासी आदि न आये, बुद्धियोग इधर-उधर न भटके। प्वाइंट्स नोट कर धारणा करते रहो।

2. पवित्र बन बाप के दिल का प्यार पाने का अधिकारी बनना है। सर्विस में होशियार बनना है, अच्छी कमाई करनी और करानी है।

वरदान:-

स्व - कल्याण के साथ - साथ पर - उपकारी बनने वाले मायाजीत, विजयी भव

अभी तक स्व कल्याण में बहुत समय जा रहा है। अब पर उपकारी बनो। मायाजीत विजयी बनने के साथ साथ सर्व खजानों के विधाता बनो अर्थात् हर खजाने को कार्य में लगाओ। खुशी का खजाना, शान्ति का खजाना, शक्तियों का खजाना, ज्ञान का खजाना, गुणों का खजाना, सहयोग देने का खजाना बांटो और बढ़ाओ। जब अभी विधाता पन की स्थिति का अनुभव करेंगे अर्थात् पर उपकारी बनेंगे तब अनेक जन्म विश्व राज्य अधिकारी बनेंगे।

स्लोगन:-

विश्व कल्याणकारी बनना है तो अपनी सर्व कमजोरियों को सदाकाल के लिए विदाई दो।

06-04-2020

06-04-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अपने ऊपर रहम करो, बाप जो मत देते हैं उस पर चलो तो अपार खुशी रहेगी, माया के श्राप से बचे रहेंगे"

प्रश्नः-

माया का श्राप क्यों लगता है? श्रापित आत्मा की गति क्या होगी?

उत्तर:-

1. बाप और पढ़ाई का (ज्ञान रत्नों का) निरादर करने से, अपनी मत पर चलने से माया का श्राप लग जाता है, 2. आसुरी चलन है, दैवीगुण धारण नहीं करते तो अपने पर बेरहमी करते हैं। बुद्धि को ताला लग जाता है। वह बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकते।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों को यह तो अब निश्चय है कि हमको आत्म-अभिमानी बनना है और बाप को याद करना है। माया रूपी रावण जो है वह श्रापित, दु:खी बना देता है। श्राप अक्षर ही दु:ख का है, वर्सा अक्षर सुख का है। जो बच्चे व़फादार, फरमानबरदार हैं, वह अच्छी रीति जानते हैं। जो नाफरमानबरदार है, वह बच्चा है नहीं। भल अपने को कुछ भी समझें परन्तु बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकते, वर्सा पा नहीं सकते। जो माया के कहने पर चलते और बाप को याद भी नहीं करते, किसको समझा नहीं सकते। गोया अपने को आपेही श्रापित करते हैं। बच्चे जानते हैं माया बड़ी जबरदस्त है। अगर बेहद के बाप की भी नहीं मानते हैं तो गोया माया की मानते हैं। माया के वश हो जाते हैं। कहावत है ना - प्रभू की आज्ञा सिर माथे। तो बाप कहते हैं बच्चे, पुरुषार्थ कर बाप को याद करो तो माया की गोद से निकल प्रभू की गोद में आ जायेंगे। बाप तो बुद्धिवानों का बुद्धिवान है। बाप की नहीं मानेंगे तो बुद्धि को ताला लग जायेगा। ताला खोलने वाला एक ही बाप है। श्रीमत पर नहीं चलते तो उनका क्या हाल होगा। माया की मत पर कुछ भी पद पा नहीं सकेंगे। भल सुनते हैं परन्तु धारणा नहीं कर सकते हैं, न करा सकते तो उसका क्या हाल होगा! बाप तो गरीब निवाज़ हैं। मनुष्य गरीबों को दान करते हैं तो बाप भी आकर कितना बेहद का दान करते हैं। अगर श्रीमत पर नहीं चलते तो एकदम बुद्धि को ताला लग जाता है। फिर क्या प्राप्ति करेंगे! श्रीमत पर चलने वाले ही बाप के बच्चे ठहरे। बाप तो रहमदिल है। समझते हैं बाहर जाते ही माया एकदम खत्म कर देगी। कोई आपघात करते हैं तो भी अपनी सत्यानाश करते हैं। बाप तो समझाते रहते हैं - अपने पर रहम करो, श्रीमत पर चलो, अपनी मत पर नहीं चलो। श्रीमत पर चलने से खुशी का पारा चढ़ेगा। लक्ष्मी-नारायण की शक्ल देखो कैसी खुशनुम: है। तो पुरुषार्थ कर ऐसा ऊंच पद पाना चाहिए ना। बाप अविनाशी ज्ञान रत्न देते हैं तो उनका निरादर क्यों करना चाहिए! रत्नों से झोली भरनी चाहिए। सुनते तो हैं परन्तु झोली नहीं भरते क्योंकि बाप को याद नहीं करते। आसुरी चलन चलते हैं। बाप बार-बार समझाते रहते हैं - अपने पर रहम करो, दैवीगुण धारण करो। वह है ही आसुरी सम्प्रदाय। उनको बाप आकर परिस्तानी बनाते हैं। परिस्तान स्वर्ग को कहा जाता है। मनुष्य कितना धक्का खाते रहते हैं। संन्यासियों आदि के पास जाते हैं, समझते हैं मन को शान्ति मिलेगी। वास्तव में यह अक्षर ही रांग है, इनका कोई अर्थ नहीं। शान्ति तो आत्मा को चाहिए ना। आत्मा स्वयं शान्त स्वरूप है। ऐसे भी नहीं कहते कि आत्मा को कैसे शान्ति मिले? कहते हैं मन को शान्ति कैसे मिले? अब मन क्या है, बुद्धि क्या है, आत्मा क्या है, कुछ भी जानते नहीं। जो कुछ कहते अथवा करते हैं वह सब है भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग वाले सीढ़ी नीचे उतरते-उतरते तमोप्रधान बनते जाते हैं। भल किसको बहुत धन, प्रापर्टी आदि है परन्तु हैं तो फिर भी रावण राज्य में ना।

तुम बच्चों को चित्रों पर समझाने की भी बहुत अच्छी प्रैक्टिस करनी है। बाप सब सेन्टर्स के बच्चों को समझाते रहते हैं, नम्बरवार तो हैं ना। कई बच्चे राजाई पद पाने का पुरुषार्थ नहीं करते तो प्रजा में क्या जाकर बनेंगे! सर्विस नहीं करते, अपने पर तरस नहीं आता है कि हम क्या बनेंगे फिर समझा जाता है ड्रामा में इनका पार्ट इतना है। अपना कल्याण करने के लिए ज्ञान के साथ-साथ योग भी हो। योग में नहीं रहते तो कुछ भी कल्याण नहीं होता। योग बिगर पावन बन नहीं सकते। ज्ञान तो बहुत सहज है परन्तु अपना कल्याण भी करना है। योग में न रहने से कुछ भी कल्याण होता नहीं। योग बिगर पावन कैसे बनेंगे? ज्ञान अलग चीज़ है, योग अलग चीज़ है। योग में बहुत कच्चे हैं। याद करने का अक्ल ही नहीं आता। तो याद बिगर विकर्म कैसे विनाश हों। फिर सजा बहुत खानी पड़ती है, बहुत पछताना पड़ता है। वह स्थूल कमाई नहीं करते तो कोई सजा नहीं खाते हैं, इसमें तो पापों का बोझा सिर पर है, उसकी बहुत सजा खानी पड़े। बच्चे बनकर और बेअदब होते हैं तो बहुत सजा मिल जाती है। बाप तो कहते हैं - अपने पर रहम करो, योग में रहो। नहीं तो मुफ्त अपना घात करते हैं। जैसे कोई ऊपर से गिरता है, मरा नहीं तो हॉस्पिटल में पड़ा रहेगा, चिल्लाता रहेगा। नाहेक अपने को धक्का दिया, मरा नहीं, बाकी क्या काम का रहा। यहाँ भी ऐसे है। चढ़ना है बहुत ऊंचा। श्रीमत पर नहीं चलते हैं तो गिर पड़ते हैं। आगे चल हर एक अपने पद को देख लेंगे कि हम क्या बनते हैं? जो सर्विसएबुल, आज्ञाकारी होंगे, वही ऊंच पद पायेंगे। नहीं तो दास-दासी आदि जाकर बनेंगे। फिर सजा भी बहुत कड़ी मिलेगी। उस समय दोनों जैसे धर्मराज का रूप बन जाते हैं। परन्तु बच्चे समझते नहीं हैं, भूलें करते रहते हैं। सजा तो यहाँ खानी पड़ेगी ना। जितना जो सर्विस करेंगे, शोभेंगे। नहीं तो कोई काम के नहीं रहेंगे। बाप कहते हैं दूसरों का कल्याण नहीं कर सकते हो तो अपना कल्याण तो करो। बांधेलियाँ भी अपना कल्याण करती रहती हैं। बाप फिर भी बच्चों को कहते हैं खबरदार रहो। नाम-रूप में फँसने से माया बहुत धोखा देती है। कहते हैं बाबा फलानी को देखने से हमको खराब संकल्प चलते हैं। बाप समझाते हैं - कर्मेन्द्रियों से कभी भी खराब काम नहीं करना है। कोई भी गंदा आदमी जिसकी चलन ठीक न हो तो सेन्टर पर उनको आने नहीं देना है। स्कूल में कोई बदचलन चलते हैं तो बहुत मार खाते हैं। टीचर सबके आगे बतलाते हैं, इसने ऐसे बदचलन की है, इसलिए इनको स्कूल से निकाला जाता है। तुम्हारे सेन्टर्स पर भी ऐसी गन्दी दृष्टि वाले आते हैं, तो उनको भगा देना चाहिए। बाप कहते हैं कभी कुदृष्टि नहीं रहनी चाहिए। सर्विस नही करते, बाप को याद नहीं करते तो जरूर कुछ न कुछ गन्दगी है। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनका नाम भी बाला होता है। थोड़ा भी संकल्प आये, कुदृष्टि जाये तो समझना चाहिए माया का वार होता है। एकदम छोड़ देना चाहिए। नहीं तो वृद्धि को पाए नुकसान कर देंगे। बाप को याद करेंगे तो बचते रहेंगे। बाबा सब बच्चों को सावधान करते हैं - खबरदार रहो, कहाँ अपने कुल का नाम बदनाम नहीं करो। कोई गन्धर्वी विवाह कर इकट्ठे रहते हैं तो कितना नाम बाला करते हैं, कोई फिर गन्दे बन पड़ते हैं। यहाँ तुम आये हो अपनी सद्गति करने, न कि बुरी गति करने। बुरे ते बुरा है काम, फिर क्रोध। आते हैं बाप से वर्सा लेने लिए परन्तु माया वार कर श्राप दे देती है तो एकदम गिर पड़ते हैं। गोया अपने को श्राप दे देते हैं। तो बाप समझाते हैं बड़ी सम्भाल रखनी है, कोई ऐसा आये तो उनको एकदम रवाना कर देना चाहिए। दिखाते भी हैं ना - अमृत पीने आये फिर बाहर जाकर असुर बन गन्द किया। वह फिर यह ज्ञान सुना न सकें। ताला बंद हो जाता है। बाप कहते हैं अपनी सर्विस पर ही तत्पर रहना चाहिए। बाप की याद में रहते-रहते पिछाड़ी को चले जाना है घर। गीत भी है ना - रात के राही थक मत जाना....... आत्मा को घर जाना है। आत्मा ही राही है। आत्मा को रोज़ समझाया जाता है अब तुम शान्तिधाम जाने के राही हो। तो अब बाप को, घर को और वर्से को याद करते रहो। अपने को देखना है माया कहाँ धोखा तो नहीं देती है? मैं अपने बाप को याद करता हूँ?

ऊंच ते ऊंच बाप की तरफ ही दृष्टि रहे - यह है बहुत ऊंच पुरुषार्थ। बाप कहते हैं - बच्चे, कुदृष्टि छोड़ दो। देह-अभिमान माना कुदृष्टि, देही-अभिमानी माना शुद्ध दृष्टि। तो बच्चों की दृष्टि बाप की तरफ रहनी चाहिए। वर्सा बहुत ऊंच है - विश्व की बादशाही, कम बात है! स्वप्न में भी किसको नहीं होगा कि पढ़ाई से, योग से विश्व की बादशाही मिल सकती है। पढ़कर ऊंच पद पायेंगे तो बाप भी खुश होगा, टीचर भी खुश होगा, सतगुरू भी खुश होगा। याद करते रहेंगे तो बाप भी पुचकार देते रहेंगे। बाप कहते हैं - बच्चे, यह खामियां निकाल दो। नहीं तो मुफ्त नाम बदनाम करेंगे। बाप तो विश्व का मालिक बनाते, सौभाग्य खोलते हैं। भारतवासी ही 100 प्रतिशत सौभाग्यशाली थे सो फिर 100 प्रतिशत दुर्भाग्यशाली बने हैं फिर तुमको सौभाग्यशाली बनाने के लिए पढ़ाया जाता है।

बाबा ने समझाया है धर्म के जो बड़े-बड़े हैं, वह भी तुम्हारे पास आयेंगे। योग सीखकर जायेंगे। म्युज़ियम में जो टूरिस्ट आते हैं, उनको भी तुम समझा सकते हो - अब स्वर्ग के गेट्स खुलने हैं। झाड़ पर समझाओ, देखो तुम फलाने समय पर आते हो। भारतवासियों का पार्ट फलाने समय पर है। तुम यह नॉलेज सुनते हो फिर अपने देश में जाकर बताओ कि बाप को याद करो तो तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। योग के लिए तो वह चाहना रखते हैं। हठयोगी, संन्यासी तो उन्हों को योग सिखला न सकें। तुम्हारी मिशन भी बाहर जायेगी। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। धर्म के जो बड़े-बड़े हैं उन्हों को आना तो है। तुमसे कोई एक भी अच्छी रीति यह नॉलेज ले जाये तो एक से कितने ढेर समझ जायेंगे। एक की बुद्धि में आ गया तो फिर अखबारों आदि में भी डालेंगे। यह भी ड्रामा में नूँध है। नहीं तो बाप को याद करना कैसे सीखे। बाप का परिचय तो सबको मिलना है। कोई न कोई निकलेंगे। म्युज़ियम में बहुत पुरानी चीजें देखने जाते हैं। यहाँ फिर तुम्हारी पुरानी नॉलेज सुनेंगे। ढेर आयेंगे। उनसे कोई अच्छी रीति समझेंगे। यहाँ से ही दृष्टि मिलेगी या तो मिशन बाहर जायेगी। तुम कहेंगे बाप को याद करो तो अपने धर्म में ऊंच पद पायेंगे। पुनर्जन्म लेते-लेते सब नीचे आ गये हैं। नीचे उतरना माना तमोप्रधान बनना। पोप आदि ऐसे कह न सके कि बाप को याद करो। बाप को जानते ही नहीं। तुम्हारे पास बहुत अच्छी नॉलेज है। चित्र भी सुन्दर बनते रहते हैं। सुन्दर चीज़ होगी तो म्युजियम और ही सुन्दर होगा। बहुत आयेंगे देखने के लिए। जितने बड़े चित्र होंगे उतना अच्छी रीति समझा सकेंगे। शौक रहना चाहिए हम ऐसे समझायें। सदा तुम्हारी बुद्धि में रहे कि हम ब्राह्मण बने हैं तो जितनी सर्विस करेंगे उतना बहुत मान होगा। यहाँ भी मान तो वहाँ भी मान होगा। तुम पूज्य बनेंगे। यह ईश्वरीय नॉलेज धारण करनी है। बाप तो कहते हैं सर्विस पर दौड़ते रहो। बाप कहाँ भी सर्विस पर भेजे, इसमें कल्याण है। सारा दिन बुद्धि में सर्विस के ख्याल चलने चाहिए। फॉरेनर्स को भी बाप का परिचय देना है। मोस्ट बिलवेड बाप को याद करो, कोई भी देहधारी को गुरू नहीं बनाओ। सबका सद्गति दाता वह एक बाप है। अभी होलसेल मौत सामने खड़ा है, होलसेल और रीटेल व्यापार होता है ना। बाप है होलसेल, वर्सा भी होलसेल देते हैं। 21 जन्म के लिए विश्व की राजाई लो। मुख्य चित्र हैं ही त्रिमूर्ति, गोला, झाड़, सीढ़ी, विराट रूप का चित्र और गीता का भगवान कौन?..... यह चित्र तो फर्स्ट क्लास है, इसमें बाप की महिमा पूरी है। बाप ने ही कृष्ण को ऐसा बनाया है, यह वर्सा गॉड फादर ने दिया। कलियुग में इतने ढेर मनुष्य हैं, सतयुग में थोड़े हैं। यह फेरघेर (अदली-बदली) किसने की? ज़रा भी कोई नहीं जानते हैं। तो टूरिस्ट बहुत करके बड़े-बड़े शहरों में जाते हैं। वह भी आकर बाप का परिचय पायेंगे। प्वाइंट्स तो सर्विस की बहुत मिलती रहती हैं। विलायत में भी जाना है। एक तरफ तुम बाप का परिचय देते रहेंगे, दूसरे तरफ मारामारी चलती रहेगी। सतयुग में थोड़े मनुष्य होंगे तो जरूर बाकी का विनाश होगा ना। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। जो हो गया वो फिर रिपीट होगा। परन्तु किसको समझाने का भी अक्ल चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा एक बाप की तरफ ही दृष्टि रखनी है। देही-अभिमानी बनने का पुरुषार्थ कर माया के धोखे से बचना है। कभी कुदृष्टि रख अपने कुल का नाम बदनाम नहीं करना है।

2) सर्विस के लिए भाग दौड़ करते रहना है। सर्विसएबुल और आज्ञाकारी बनना है। अपना और दूसरों का कल्याण करना है। कोई भी बदचलन नहीं चलनी है।

वरदान:-

एकता और सन्तुष्टता के सर्टीफिकेट द्वारा सेवाओं में सदा सफलतामूर्त भव

सेवाओं में सफलतामूर्त बनने के लिए दो बातें ध्यान में रखनी है एक - संस्कारों को मिलाने की युनिटी और दूसरा स्वयं भी सदा सन्तुष्ट रहो तथा दूसरों को भी सन्तुष्ट करो। सदा एक दो में स्नेह की भावना से, श्रेष्ठता की भावना से सम्पर्क में आओ तो यह दोनों सर्टीफिकेट मिल जायेंगे। फिर आपकी प्रैक्टिकल जीवन बाप के सूरत का दर्पण बन जायेगी और उस दर्पण में बाप जो है जैसा है वैसा दिखाई देगा।

स्लोगन:-

आत्म स्थिति में स्थित होकर अनेक आत्माओं को जीयदान दो तो दुआयें मिलेंगी।

07-04-2020

07-04-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - बेहद बाप के साथ व़फादार रहो तो पूरी माइट मिलेगी, माया पर जीत होती जायेगी"

प्रश्नः-

बाप के पास मुख्य अथॉरिटी कौन-सी है? उसकी निशानी क्या है?

उत्तर:-

बाप के पास मुख्य है ज्ञान की अथॉरिटी। ज्ञान सागर है इसलिए तुम बच्चों को पढ़ाई पढ़ाते हैं। आप समान नॉलेजफुल बनाते हैं। तुम्हारे पास पढ़ाई की एम ऑब्जेक्ट है। पढ़ाई से ही तुम ऊंच पद पाते हो।

गीत:-

बदल जाए दुनिया.........

ओम् शान्ति। भक्त भगवान की महिमा करते हैं। अब तुम तो भक्त नहीं हो। तुम तो उस भगवान के बच्चे बन गये हो। वह भी व़फादार बच्चे चाहिए। हर बात में व़फादार रहना है। स्त्री की सिवाए पति के अथवा पति की सिवाए स्त्री के और तरफ दृष्टि जाए तो उनको भी बेव़फा कहेंगे। अब यहाँ भी है बेहद का बाप। उनके साथ बेव़फादार और व़फादार दोनों रहते हैं। व़फादार बनकर फिर बेव़फादार बन जाते हैं। बाप तो है हाइएस्ट अथॉरिटी। ऑलमाइटी है ना। तो उनके बच्चे भी ऐसे होने चाहिए। बाप में ताकत है, बच्चों को रावण पर जीत पाने की युक्ति बतलाते हैं इसलिए उनको कहा भी जाता है सर्वशक्तिमान्। तुम भी शक्ति सेना हो ना। तुम अपने को भी ऑलमाइटी कहेंगे। बाप में जो माइट है वह हमको देते हैं, बतलाते हैं कि तुम माया रावण पर जीत कैसे पा सकते हो, तो तुमको भी शक्तिवान बनना है। बाप है ज्ञान की अथॉरिटी। नॉलेजफुल है ना। जैसे वो लोग अथॉरिटी हैं, शास्त्रों की, भक्तिमार्ग की, ऐसे अब तुम ऑलमाइटी अथॉरिटी नॉलेजफुल बनते हो। तुमको भी नॉलेज मिलती है। यह पाठशाला है। इसमें जो नॉलेज तुम पढ़ते हो, इससे ऊंच पद पा सकते हो। यह एक ही पाठशाला है। तुमको तो यहाँ पढ़ना है और कोई प्रार्थना आदि नहीं करनी है। तुम्हें पढ़ाई से वर्सा मिलता है, एम ऑब्जेक्ट है। तुम बच्चे जानते हो बाप नॉलेजफुल है, उनकी पढ़ाई बिल्कुल डिफरेन्ट है। ज्ञान का सागर बाप है तो वही जाने। वही हमको सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज देते हैं। दूसरा कोई दे न सके। बाप सम्मुख आकर ज्ञान दे फिर चले जाते हैं। इस पढ़ाई की प्रालब्ध क्या मिलती है, वह भी तुम जानते हो। बाकी जो भी सतसंग आदि हैं वा गुरू गोसाई हैं वह सब हैं भक्ति मार्ग के। अब तुमको ज्ञान मिल रहा है। यह भी जानते हैं कि उनमें भी कोई यहाँ के होंगे तो निकल आयेंगे। तुम बच्चों को सर्विस की भिन्न-भिन्न युक्तियाँ निकालनी हैं। अपना अनुभव सुनाकर अनेकों का भाग्य बनाना है। तुम सर्विसएबुल बच्चों की अवस्था बड़ी निर्भय, अडोल और योगयुक्त चाहिए। योग में रहकर सर्विस करो तो सफलता मिल सकती है।

बच्चे, तुम्हें अपने को पूरा सम्भालना है। कभी आवेश आदि न आये, योगयुक्त पक्का चाहिए। बाप ने समझाया है वास्तव में तुम सब वानप्रस्थी हो, वाणी से परे अवस्था वाले। वानप्रस्थी अर्थात् वाणी से परे घर को और बाप को याद करने वाले। इसके सिवाए और कोई तमन्ना नहीं। हमको अच्छे कपड़े चाहिए, यह सब हैं छी-छी तमन्नायें। देह-अभिमान वाले सर्विस कर नहीं सकेंगे। देही-अभिमानी बनना पड़े। भगवान के बच्चों को तो माइट चाहिए। वह है योग की। बाबा तो सभी बच्चों को जान सकते हैं ना। बाबा झट बता देंगे, यह-यह खामियां निकालो। बाबा ने समझाया है शिव के मन्दिर में जाओ, वहाँ बहुत तुमको मिलेंगे। बहुत हैं जो काशी में जाकर वास करते हैं। समझते हैं काशीनाथ हमारा कल्याण करेगा। वहाँ तुमको बहुत ग्राहक मिलेंगे, परन्तु इसमें बड़ा शुरूड़ बुद्धि (होशियार बुद्धि) चाहिए। गंगा स्नान करने वालों को भी जाकर समझा सकते हैं। मन्दिरों में भी जाकर समझाओ। गुप्त वेष में जा सकते हो। हनूमान का मिसाल। हो तो वास्तव में तुम ना। जुत्तियों में बैठने की बात नहीं है। इसमें बड़ा समझू सयाना चाहिए। बाबा ने समझाया है अभी कोई भी कर्मातीत नहीं बना है। कुछ न कुछ खामियां जरूर हैं।

तुम बच्चों को नशा चाहिए कि यह एक ही हट्टी है, जहाँ सबको आना है। एक दिन यह संन्यासी आदि सब आयेंगे। एक ही हट्टी है तो जायेंगे कहाँ। जो बहुत भटका हुआ होगा, उनको ही रास्ता मिलेगा। और समझेंगे यह एक ही हट्टी है। सबका सद्गति दाता एक बाप है ना। ऐसा जब नशा चढ़े तब बात है। बाप को यही ओना है ना - मैं आया हूँ पतितों को पावन बनाए शान्तिधाम-सुखधाम का वर्सा देने। तुम्हारा भी यही धंधा है। सबका कल्याण करना है। यह है पुरानी दुनिया। इनकी आयु कितनी है? थोड़े टाइम में समझ जायेंगे, यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। सभी आत्माओं को यह बुद्धि में आयेगा, नई दुनिया की स्थापना हो तब तो पुरानी दुनिया का विनाश हो। आगे चल फिर कहेंगे बरोबर भगवान यहाँ है। रचयिता बाप को ही भूल गये हैं। त्रिमूर्ति में शिव का चित्र उड़ा दिया है, तो कोई काम का नहीं रहा। रचयिता तो वह है ना। शिव का चित्र आने से क्लीयर हो जाता है - ब्रह्मा द्वारा स्थापना। प्रजापिता ब्रह्मा होगा तो जरूर बी.के. भी होने चाहिए। ब्राह्मण कुल सबसे ऊंचा होता है। ब्रह्मा की औलाद हैं। ब्राह्मणों को रचते कैसे हैं, यह भी कोई नहीं जानते। बाप ही आकर तुमको शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। यह बड़ी पेचीली बातें हैं। बाप जब सम्मुख आकर समझाये तब समझें। जो देवतायें थे वह शूद्र बने हैं। अब उन्हों को कैसे ढूंढ़े उसके लिए युक्तियां निकालनी हैं। जो समझ जाएं यह बी.के. का तो भारी कार्य है। कितने पर्चे आदि बांटते हैं। बाबा ने एरोप्लेन से पर्चे गिराने लिए भी समझाया है। कम से कम अखबार जितना एक कागज हो, उसमें मुख्य प्वाइंट्स सीढ़ी आदि भी आ सकती है। मुख्य है अंग्रेजी और हिन्दी भाषा। तो बच्चों को सारा दिन ख्यालात रखनी चाहिए - सर्विस को कैसे बढ़ायें? यह भी जानते हैं ड्रामा अनुसार पुरूषार्थ होता रहता है। समझा जाता है यह सर्विस अच्छी करते हैं, इनका पद भी ऊंच होगा। हर एक एक्टर का अपना पार्ट है, यह भी लाइन जरूर लिखनी है। बाप भी इस ड्रामा में निराकारी दुनिया से आकर साकारी शरीर का आधार ले पार्ट बजाते हैं। अभी तुम्हारी बुद्धि में है, कौन-कौन कितना पार्ट बजाते हैं? तो यह लाइन भी मुख्य है। सिद्ध कर बतलाना है, यह सृष्टि चक्र को जानने से मनुष्य स्वदर्शन चक्रधारी बन चक्रवर्ती राजा विश्व का मालिक बन सकते हैं। तुम्हारे पास तो सारी नॉलेज है ना। बाप के पास नॉलेज है ही गीता की, जिससे मनुष्य नर से नारायण बनते हैं। फुल नॉलेज बुद्धि में आ गई तो फिर फुल बादशाही चाहिए। तो बच्चों को ऐसे-ऐसे ख्याल कर बाप की सर्विस में लग जाना चाहिए।

जयपुर में भी यह रूहानी म्युज़ियम स्थाई रहेगा। लिखा हुआ है - इनको समझने से मनुष्य विश्व का मालिक बन सकते हैं। जो देखेंगे एक-दो को सुनाते रहेंगे। बच्चों को सदा सर्विस पर रहना है। मम्मा भी सर्विस पर है, उनको मुकरर किया था। यह कोई शास्त्रों में है नहीं कि सरस्वती कौन है? प्रजापिता ब्रह्मा की सिर्फ एक बेटी होगी क्या? अनेक बेटियाँ अनेक नाम वाली होंगी ना। वह फिर भी एडाप्ट थी। जैसे तुम हो। एक हेड चला जाता है तो फिर दूसरा स्थापन किया जाता है। प्राइम मिनिस्टर भी दूसरा स्थापन कर लेते हैं। एबुल समझा जाता है, तब उनको पसन्द करते हैं फिर टाइम पूरा हो जाता है, तो फिर दूसरे को चुनना पड़ता है। बाप बच्चों को पहला मैनर्स यही सिखलाते हैं कि तुम किसका रिगार्ड कैसे रखो! अनपढ़े जो होते हैं उनको रिगार्ड रखना भी नहीं आता है। जो जास्ती तीखे हैं तो उनका सबको रिगार्ड रखना ही है। बड़ों का रिगार्ड रखने से वह भी सीख जायेंगे। अनपढ़े तो बुद्धू होते हैं। बाप ने भी अनपढ़ों को आकर उठाया है। आजकल फीमेल को आगे रखते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम आत्माओं की सगाई परमात्मा के साथ हुई है। तुम बड़े खुश होते हो - हम तो विष्णुपुरी के मालिक जाकर बनेंगे। कन्या का बिगर देखे भी बुद्धियोग लग जाता है ना। यह भी आत्मा जानती है - यह आत्मा और परमात्मा की सगाई वन्डरफुल है। एक बाप को ही याद करना पड़े। वह तो कहेंगे गुरू को याद करो, फलाना मंत्र याद करो। यह तो बाप ही सब कुछ है। इन द्वारा आकर सगाई कराते हैं। कहते हैं मैं तुम्हारा बाप भी हूँ, मेरे से वर्सा मिलता है। कन्या की सगाई होती है तो फिर भूलती नहीं है। तुम फिर भूल क्यों जाते हो? कर्मातीत अवस्था को पाने में टाइम लगता है। कर्मातीत अवस्था को पाकर वापिस तो कोई जा न सके। जब साजन पहले चले फिर बरात जाये। शंकर की बात नहीं, शिव की बरात है। एक है साजन बाकी सब हैं सजनियां। तो यह है शिवबाबा की बरात। नाम रख दिया है बच्चे का। दृष्टान्त दे समझाया जाता है। बाप आकर गुल-गुल बनाए सबको ले जाते हैं। बच्चे जो काम चिता पर बैठ पतित बन गये हैं उनको ज्ञान चिता पर बिठाए गुल-गुल बनाकर सभी को ले जाते हैं। यह तो पुरानी दुनिया है ना। कल्प-कल्प बाप आते हैं। हम छी-छी को आकर गुल-गुल बनाए ले जाते हैं। रावण छी-छी बनाते हैं और शिवबाबा गुल-गुल बनाते हैं। तो बाबा बहुत युक्तियां समझाते रहते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) खाने पीने की छी-छी तमन्नाओं को छोड़ देही-अभिमानी बन सर्विस करनी है। याद से माइट (शक्ति) ले निर्भय और अडोल अवस्था बनानी है।

2) जो पढ़ाई में तीखे होशियार हैं, उनका रिगार्ड रखना है। जो भटक रहे हैं, उनको रास्ता बताने की युक्ति रचनी है। सबका कल्याण करना है।

वरदान:-

अपने तपस्वी स्वरूप द्वारा सर्व को प्राप्तियों की अनुभूति कराने वाले मास्टर विधाता भव

जैसे सूर्य विश्व को रोशनी की और अनेक विनाशी प्राप्तियों की अनुभूति कराता है ऐसे आप तपस्वी आत्मायें अपने तपस्वी स्वरूप द्वारा सर्व को प्राप्ति के किरणों की अनुभूति कराओ। इसके लिए पहले जमा का खाता बढ़ाओ। फिर जमा किये हुए खजाने मास्टर विधाता बन देते जाओ। तपस्वीमूर्त का अर्थ है - तपस्या द्वारा शान्ति के शक्ति की किरणें चारों ओर फैलती हुई अनुभव में आयें।

स्लोगन:-

स्वयं निर्माण बनकर सर्व को मान देते चलो - यही सच्चा परोपकार है।

05-04-20

05-04-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 19-12-85 मधुबन


फॉलो फादर

आज सर्व स्नेही बच्चों के स्नेह का रेसपान्ड करने के लिए बापदादा मिलन मनाने के लिए आये हैं। विदेही बापदादा को देह का आधार लेना पड़ता है। किसलिए? बच्चों को भी विदेही बनाने के लिए। जैसे बाप विदेही, देह में आते हुए भी विदेही स्वरूप में, विदेहीपन का अनुभव कराते हैं। ऐसे आप सभी जीवन में रहते, देह में रहते विदेही आत्मा-स्थिति में स्थित हो इस देह द्वारा करावनहार बन करके कर्म कराओ। यह देह करनहार है। आप देही करावनहार हो। इसी स्थिति को "विदेही स्थिति'' कहते हैं। इसी को ही फॉलो फादर कहा जाता है। सदा फॉलो फादर करने के लिए अपनी बुद्धि को दो स्थितियों में स्थित रखो। बाप को फॉलो करने की स्थिति है सदा अशरीरी भव, विदेही भव, निराकारी भव! दादा अर्थात् ब्रह्मा बाप को फॉलो करने के लिए सदा अव्यक्त स्थिति भव, फरिश्ता स्वरूप भव, आकारी स्थिति भव। इन दोनों स्थिति में स्थित रहना फॉलो फादर करना है। इससे नीचे व्यक्त भाव, देह भान, व्यक्ति भाव, इसमें नीचे नहीं आओ। व्यक्ति भाव वा व्यक्त भाव नीचे ले आने का आधार है, इसलिए सबसे परे इन दो स्थितियों में सदा रहो। तीसरी के लिए ब्राह्मण जन्म होते ही बापदादा की शिक्षा मिली हुई है कि इस गिरावट की स्थिति में संकल्प से वा स्वप्न में भी नहीं जाना, यह पराई स्थिति है। जैसे अगर कोई बिना आज्ञा के परदेश चला जाए तो क्या होगा? बाप-दादा ने भी यह आज्ञा की लकीर खींच दी है, इससे बाहर नहीं जाना है। अगर अवज्ञा करते हैं तो परेशान भी होते हैं, पश्चाताप भी करते हैं, इसलिए सदा शान में रहने का, सदा प्राप्ति स्वरूप स्थिति में स्थित होने का सहज साधन है "फॉलो फादर''। फॉलो करना तो सहज होता है ना! जीवन में बचपन से फॉलो करने के अनुभवी हो। बचपन में भी बाप बच्चे को अंगुली पकड़ चलने में, उठने-बैठने में फॉलो कराते हैं। फिर जब गृहस्थी बनते हैं तो भी पति पत्नी को एक-दो के पीछे फॉलो कर चलना सिखलाते हैं। फिर आगे बढ़ गुरू करते हैं तो गुरू के फॉलोअर्स ही बनते हैं अर्थात् फॉलो करने वाले। लौकिक जीवन में भी आदि और अन्त में फॉलो करना होता है। अलौकिक, पारलौकिक बाप भी एक ही सहज बात का साधन बताते हैं - क्या करूँ, कैसे करूँ, ऐसे करूँ या वैसे करूँ इस विस्तार से छुड़ा देते हैं। सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही बात है। "फॉलो फादर''।

साकार रूप में भी निमित्त बन कर्म सिखलाने के लिए पूरे 84 जन्म लेने वाली ब्रह्मा की आत्मा निमित्त बनी। कर्म, में कर्म बन्धनों से मुक्त होने में, कर्म सम्बन्ध को निभाने में, देह में रहते विदेही स्थिति में स्थित रहने में, तन के बन्धनों को मुक्त करने में, मन की लगन में मगन रहने की स्थिति में, धन का एक-एक नया पैसा सफल करने में, साकार ब्रह्मा साकार जीवन में निमित्त बने। कर्मबन्धनी आत्मा, कर्मातीत बनने का एक्जैम्पुल बने। तो साकार जीवन को फॉलो करना सहज है ना। यही पाठ हुआ फॉलो फादर। प्रश्न भी चाहे तन के पूछते, सम्बन्ध के पूछते वा धन के पूछते हैं। सब प्रश्नों का जवाब ब्रह्मा बाप की जीवन है। जैसे आजकल के साइंस वाले हर एक प्रश्न का उत्तर कम्प्युटर से पूछते हैं क्योंकि समझते हैं मनुष्य की बुद्धि से यह कम्प्युटर एक्यूरेट है। बनाने वाले से भी बनी हुई चीज़ को एक्यूरेट समझ रहे हैं। लेकिन आप साइलेन्स वालों के लिए ब्रह्मा की जीवन ही एक्यूरेट कम्प्युटर है इसलिए क्या, कैसे के बजाए जीवन के कम्प्युटर से देखो। कैसा और क्या का क्वेश्चन ऐसे में बदल जायेगा। प्रश्नचित के बजाए प्रसन्नचित हो जायेंगे। प्रश्नचित हलचल बुद्धि है इसलिए प्रश्न का चिन्ह भी टेढ़ा है। क्वेश्चन लिखो तो टेढ़ा बांका हैं ना। और प्रसन्नचित है बिन्दी। तो बिन्दी में कोई टेढ़ापन है? चारों तरफ से एक ही है। बिन्दी को किसी भी तरफ से देखो तो सीधा ही देखेंगे। और एक जैसा ही देखेंगे। चाहे उल्टा चाहे सुल्टा देखो। प्रसन्नचित अर्थात् एकरस स्थिति में एक बाप को फॉलो करने वाले। फिर भी सार क्या निकला? फॉलो ब्रह्मा साकार रूप फादर वा फॉलो आकार रूप ब्रह्मा फादर। चाहे ब्रह्मा बाप को फॉलो करो चाहे शिव बाप को फॉलो करो। लेकिन शब्द वही है फॉलो फादर, इसलिए ब्रह्मा की महिमा "ब्रह्मा वन्दे जगतगुरू'' कहते हैं क्योंकि फॉलो करने के लिए साकार रूप में ब्रह्मा ही साकार जगत के लिए निमित्त बने। आप सभी भी अपने को शिवकुमार, शिवकुमारी नहीं कहलाते हो। ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी कहलाते हो। साकार रचना के निमित्त साकार श्रेष्ठ जीवन का सैम्पुल ब्रह्मा ही बनता है, इसलिए सतगुरू शिव बाप को कहते, गुरू सिखलाने वाले को भी कहते हैं। जगत के आगे सिखलाने वाले ब्रह्मा ही निमित्त बनते हैं। तो हर कर्म में फॉलो करना है। ब्रह्मा को इस हिसाब से जगतगुरू कहते हैं, इसलिए जगत ब्रह्मा की वन्दना करते हैं। जगतपिता का टाइटिल भी ब्रह्मा का है। विष्णु को वा शंकर को प्रजापिता नहीं कहते। वह मालिक के हिसाब से पति कह देते हैं लेकिन है पिता। जितना ही जगत का प्यारा उतना ही जगत से न्यारा बन अभी अव्यक्त रूप में फॉलो अव्यक्त स्थिति भव का पाठ पढ़ा रहे हैं। समझा, किसी भी आत्मा का ऐसा इतना न्यारापन नहीं होता। यह न्यारेपन की ब्रह्मा की कहानी फिर सुनायेंगे।

आज तो शरीर को भी संभालना है। जब लोन लेते हैं तो अच्छा मालिक वो ही होता है जो शरीर को, स्थान को शक्ति प्रमाण कार्य में लगावे। फिर भी बापदादा दोनों के शक्तिशाली पार्ट को रथ चलाने के निमित्त बना है। यह भी ड्रामा में विशेष वरदान का आधार है। कई बच्चों को क्वेश्चन भी उठता है कि यही रथ निमित्त क्यों बना। दूसरे तो क्या इनको (गुल्जार दादी को) भी उठता है। लेकिन जैसे ब्रह्मा भी अपने जन्मों को नहीं जानते थे ना, यह भी अपने वरदान को भूल गई है। यह विशेष साकार ब्रह्मा का आदि साक्षात्कार के पार्ट समय का बच्ची को वरदान मिला हुआ है। ब्रह्मा बाप के साथ आदि समय एकान्त के तपस्वी स्थान पर इस आत्मा के विशेष साक्षात्कार के पार्ट को देख ब्रह्मा बाप ने बच्ची के सरल स्वभाव, इनोसेन्ट जीवन की विशेषता को देख यह वरदान दिया था कि जैसे अभी इस पार्ट में आदि में ब्रह्मा बाप की साथी भी बनी और साथ भी रही, ऐसे आगे चल बाप के साथी बनने की, समान बनने की ड्यूटी भी सम्भालेगी। ब्रह्मा बाप के समान सेवा में पार्ट बजायेंगी। तो वो ही वरदान तकदीर की लकीर बन गये। और ब्रह्मा बाप समान रथ बनने का पार्ट बजाना यह नूँध नूँधी गई। फिर भी बापदादा इस पार्ट बजाने के लिए बच्ची को भी मुबारक देते हैं। इतना समय इतनी शक्ति को एडजेस्ट करना, यह एडजेस्ट करने की विशेषता की लिफ्ट कारण एक्स्ट्रा गिफ्ट है। फिर भी बापदादा को शरीर का सब देखना पड़ता है। बाजा पुराना है और चलाने वाले शक्तिशाली हैं। फिर भी हाँ जी, हाँ जी के पाठ के कारण अच्छा चल रहा है। लेकिन बापदादा भी विधि और युक्ति पूर्वक ही काम चला रहे हैं। मिलने का वायदा तो है लेकिन विधि, समय प्रमाण परिवर्तन होती रहेगी। अभी तो अठारहवें वर्ष में सब सुनायेंगे। 17 तो पूरा करना ही है। अच्छा!

सब फॉलो फादर करने वाले सहज पुरुषार्थी बच्चों को सदा प्रसन्न-चित्त विशेष आत्माओं को, सदा करावनहार बन देह से कर्म कराने वाले मास्टर रचयिता बच्चों को, ऐसे बापदादा के स्नेह का, जीवन द्वारा रेसपान्ड देने वाले बच्चों को स्नेह सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।

टीचर्स बहिनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1) टीचर्स सदा स्वस्थिति से स्वयं भी आगे बढ़ने वाली और दूसरों को भी आगे बढ़ाने वाली, बढ़ना है और बढ़ाना है, यही टीचर्स का विशेष लक्ष्य है और लक्षण भी है। सदा बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान आत्मा बन आगे बढ़ते और बढ़ाते चलो। त्याग से भाग्य प्राप्त करने वाली श्रेष्ठ आत्मा हो, सदा त्याग ही भाग्य है। श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ फल.. सदा इस प्रत्यक्ष फल से स्वयं और दूसरों को उड़ाते चलो। अपने को हर कर्म में निमित्त समझना यही श्रेष्ठ बनने का सहज साधन है। सेवाधारी बनना यह भी संगमयुग पर विशेष भाग्य की निशानी है। सेवा करना अर्थात् जन्म-जन्म के लिए सम्पन्न बनना क्योंकि सेवा से जमा होता है और जमा हुआ अनेक जन्म खाते रहेंगे। अगर सेवा में जमा हो रहा है, यह स्मृति रहे तो सदा खुशी में रहेंगे। और खुशी के कारण कभी थकेंगे नहीं। सेवा अथक बनाने वाली है। खुशी का अनुभव कराने वाली है।

सेवाधारी अर्थात् बाप समान। तो समानता को चेक करते बाप समान बन औरों को भी बाप समान बनाते चलो। सेन्टर के वायुमण्डल को शक्तिशाली बनाने के लिए एक दो चक्र लगाते हुए शक्तिशाली याद की अनुभूतियों का प्रोग्राम बनाओ। शक्तिशाली वातावरण कई बातों से स्वत: दूर कर देता है। अभी स्वयं क्वालिटी वाले बन क्वालिटी वाले बनाते चलो। अच्छा।

2- सभी स्वयं को कौन-सी मणी समझते हो? (सन्तुष्टमणी) आज के समय में विशेष सन्तुष्टता की ही आवश्यकता है। पूजा भी ज्यादा किस देवी की होती है? सन्तोषी की। और सन्तोषी को राज़ी करना भी सहज होता है। संतोषी सन्तुष्ट जल्दी हो जाती है। संतोषी की पूजा क्यों होती है? क्योंकि आज के समय में टेन्शन बहुत है, परेशानियाँ बहुत हैं इस कारण असन्तुष्टता बढ़ती जा रही है, इसलिए सन्तुष्ट रहने का साधन सभी सोचते हैं। लेकिन कर नहीं सकते। तो ऐसे समय पर आप सभी सन्तुष्ट मणियाँ बन सन्तुष्टता की रोशनी दो। अपने सन्तुष्टता की रोशनी से औरों को भी सन्तुष्ट बनाओ। पहले स्वयं से स्वयं सन्तुष्ट रहो फिर सेवा में सन्तुष्ट रहो, फिर सम्बन्ध में सन्तुष्ट रहो तब ही सन्तुष्ट मणि कहलायेंगे। सन्तुष्टता के भी तीन सर्टीफिकेट चाहिए। अपने आप से, सेवा से, फिर साथियों से। यह तीनों सर्टीफिकेट लिए हैं ना। अच्छा है फिर भी दुनिया की हलचल से निकल अचल घर में पहुँच गई। यह बाप के स्थान अचल घर हैं। तो अचल घर में पहुँचना यह भी बड़े भाग्य की निशानी है। त्याग किया तो अचलघर पहुँची। भाग्यवान बन गई लेकिन भाग्य की लकीर और भी जितनी लम्बी खींचने चाहो उतनी खींच सकते हो। लिस्ट में तो आ गई भाग्यवान की क्योंकि भगवान की बन गई तो भाग्यवान हो गई। और सबसे किनारा कर एक को अपना बनाया - तो भाग्यवान हो गई। बापदादा बच्चों की इस हिम्मत को देख खुश हैं। कुछ भी हो फिर भी त्याग और सेवा की हिम्मत में श्रेष्ठ हो। छोटे हो या नये हो लेकिन बापदादा त्याग और हिम्मत की मुबारक देते हैं। उसी रिगार्ड से बापदादा देखते हैं। निमित्त बनने का भी महत्व है। इसी महत्व से सदा आगे बढ़ते हुए विश्व में महान आत्मायें बन प्रसिद्ध हो जायेंगे। तो अपनी महानता को तो जानते हो ना! जितने महान उतने निर्माण। जैसे फलदायक वृक्ष की निशानी है - झुकना। ऐसे जो निर्माण हैं वही प्रत्यक्ष फल खाने वाले हैं। संगमयुग की विशेषता ही यह है। अच्छा!

कुमारों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

कुमार अर्थात् कमजोरी को सदा के लिए तलाक देने वाले। आधाकल्प के लिए कमजोरी को तलाक दे दिया ना। या अभी नहीं दिया है? जो सदा समर्थ आत्मायें हैं उनके आगे कमजोरी आ नहीं सकती। सदा समर्थ रहना अर्थात् कमजोरी को समाप्त करना। ऐसी समर्थ आत्मायें बाप को भी प्रिय हैं। परिवार को भी प्रिय हैं। कुमार अर्थात् अपने हर कर्म द्वारा अनेकों के श्रेष्ठ कर्मों की रेखा खींचने वाले। स्वयं के कर्म औरों के कर्म की रेखा बनाने के निमित्त बन जायें। ऐसे सेवाधारी हो। तो हर कर्म में यह चेक करो कि हर कर्म ऐसा स्पष्ट है जो औरों को भी कर्म की रेखा स्पष्ट दिखाई दे। ऐसे श्रेष्ठ कर्मों के श्रेष्ठ खाते को सदा जमा करने वाली विशेष आत्मायें - इसको कहा जाता है सच्चे सेवाधारी। याद और सेवा यही सदा आगे बढ़ने का साधन है। याद शक्तिशाली बनाती है और सेवा खजानों से सम्पन्न बनाती है। याद और सेवा से आगे बढ़ते रहो और बढ़ाते चलो। अच्छा।

वरदान:-

वरदान :- ब्रह्मा बाप समान श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ तस्वीर बनाने वाले परोपकारी भव

श्रेष्ठ स्मृति और श्रेष्ठ कर्म द्वारा तकदीर की तस्वीर तो सभी बच्चों ने बनाई है अभी सिर्फ लास्ट टचिंग है सम्पूर्णता की वा ब्रह्मा बाप समान श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बनने की, इसके लिए परोपकारी बनो अर्थात् स्वार्थ भाव से सदा मुक्त रहो। हर परिस्थिति में, हर कार्य में, हर सहयोगी संगठन में जितना नि:स्वार्थ पन होगा उतना ही पर-उपकारी बन सकेंगे। सदा स्वयं को भरपूर अनुभव करेंगे। सदा प्राप्ति स्वरूप की स्थिति में स्थित रहेंगे। स्व के प्रति कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे।

स्लोगन:-

सर्वस्व त्यागी बनने से ही सरलता व सहनशीलता का गुण आयेगा।

 

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