आज की मुरली की एमपी3 सुनिये / डाऊनलोड किजिए
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-लक्ष्य सोप से आत्मा रूपी मैले कपड़े को साफ करो, पवित्रता के मैनर्स धारण करो और दूसरों को कराओ''
प्रश्न:- कौन-सी जादूगरी बहुत फर्स्टक्लास जादूगरी है-कैसे?
उत्तर:- ईश्वरीय जादूगरी फर्स्टक्लास है क्योंकि इससे नर्कवासी से स्वर्गवासी बन जाते, पतित से पावन बन जाते। यह जादूगरी बाप ही सिखलाते हैं। बाबा कहते-बच्चे, सिर्फ फॉलो करो तो तुम राजाओं का राजा बन जायेंगे। आत्मा को पवित्र बनाओ तो शरीर भी पवित्र मिलेगा। पुराना तन-मन-धन इन्श्योर कर दो तो नया मिल जायेगा। ऐसा सौदा संगम पर बाप ही सिखलाते हैं।
गीत:- आज अन्धेरे में है इन्सान...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अन्त मती सो गति के लिए पुरानी दुनिया से दिल हटाकर, अपना मुख मोड़ लेना है। अपने स्वीट होम को याद करना है।
2) सौदागर बाप से सच्चा सौदा करना है। तन-मन-धन सब इन्श्योर कर फॉलो फादर करना है।
वरदान:- सच्ची दिल से साहेब को राज़ी करने वाले राज़युक्त, युक्तियुक्त, योगयुक्त भव
बापदादा का टाइटल दिलवाला, दिलाराम है। जो सच्ची दिल वाले बच्चे हैं उन पर साहेब राजी हो जाता है। दिल से बाप को याद करने वाले सहज ही बिन्दु रूप बन सकते हैं। वह बाप की विशेष दुआओं के पात्र बन जाते हैं। सच्चाई की शक्ति से समय प्रमाण उनका दिमाग युक्तियुक्त, यथार्थ कार्य स्वत: ही करता है। भगवान को राज़ी किया हुआ है इसलिए हर संकल्प, बोल और कर्म यथार्थ होता है। वह राजयुक्त, युक्तियुक्त, योगयुक्त बन जाते हैं।
स्लोगन:- बाप के लव में सदा लीन रहो तो अनेक प्रकार के दु:ख और धोखे से बच जायेंगे।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-ऊंची मत एक बाप की है, उसी पर सदा चलते रहो, मातेले बन बाप से पूरा-पूरा वर्सा लो''
प्रश्न:- सौतेले बच्चों को किस बात का निश्चय न होने के कारण बाप के पूरे मददगार नहीं बन सकते हैं?
उत्तर:- सौतेले बच्चों को यह निश्चय ही नहीं होता कि अभी पवित्र बनने से ही पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। बिना पवित्र बनें पवित्र दुनिया स्थापन नहीं हो सकती। यह निश्चय हो तो पूरे-पूरे मददगार बनें। मातेले बच्चे बाप को पूरा पहचान लायक बनने का पुरुषार्थ करते हैं। बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनते हैं।
गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) भ्रमरी की तरह भूँ-भूँ कर मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करनी है। बाप की श्रीमत पर सदा सुखी बनना और बनाना है।
2) ऊंच तकदीर बनाने के लिए पावन जरूर बनना है। सबको विषय सागर से क्षीरसागर में ले चलने के लिए बाप समान खिवैया बनना है।
वरदान:- ज्ञान अमृत की वर्षा द्वारा मुर्दे से महान बनने वाले मरजीवा भव
पहले चिंताओं की चिता पर जल रहे थे, अभी बाप ने ज्ञान अमृत की वर्षा कर जलती हुई चिता से मरजीवा बना दिया। जिंदा कर दिया। बाप ने अमृत पिलाया और अमर बना दिया। पहले मरे हुए मुर्दे के समान थे और अब मुर्दे से महान बन गये। पहले कहते थे भगवान मुर्दे को भी जिंदा करता है लेकिन कैसे करता है, वह नहीं जानते थे, अभी खुशी है कि बाप ने हमें अब जलती हुई चिता से उठाकर अमर बना दिया।
स्लोगन:- धर्म में स्थित हो कर्म करने वाले ही धर्मात्मा हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-पहले अपने ऊपर रहम करो, फिर आपका फ़र्ज है अपने परिवार को स्वर्ग में चलने का सही रास्ता बताना, इसलिए उन्हें भी लायक बनाने का पूरा पुरुषार्थ करो''
प्रश्न:- तुम किस रेस के आधार से शिवालय के मालिक बन जायेंगे?
उत्तर:- फालो फादर-मदर। सिर्फ एक जन्म पवित्रता की प्रतिज्ञा करो। नर्क से दिल हटा दो। शिवबाबा तुम्हारे लिए शिवालय स्थापन कर रहे हैं, जहाँ तुम चैतन्य में राज्य करेंगे। धन्धाधोरी करते बाप और स्वर्ग को याद करने से राजाई का तिलक मिल जायेगा अर्थात् शिवालय के मालिक बन जायेंगे।
गीत:- तुम्हीं हो माता पिता.....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह तथा देह के सर्व सम्बन्ध भूल अशरीरी आत्मा बनने का अभ्यास करना है। बाप से श्रीमत लेकर कदम-कदम उस पर चलना है।
2) पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है। दृढ़ संकल्प करना है कि ''रात-दिन एक बाबा की ही याद में रहूँगा और बाबा जो कहेंगे वह अवश्य करूंगा''। हियर नो ईविल, सी नो ईविल...
वरदान:- लगन की अग्नि में सब चिंताओं को समाप्त करने वाले निश्चयबुद्धि निश्चिंत भव
जो बच्चे निश्चयबुद्धि हैं वह सभी बातों में निश्चिंत रहते हैं। चिंतायें सारी मिट गई। बाप ने चिंताओं की चिता से उठाकर दिलतख्त पर बिठा दिया। बाप से लगन लगी और लगन के आधार पर, लगन की अग्नि में सब चिंतायें समाप्त हो गई, जैसे थी ही नहीं। न तन की चिंता, न मन में कोई व्यर्थ चिंता और न धन की चिंता। क्या होगा......ज्ञान की शक्ति से सब जान गये इसलिए सब चिंताओं से परे निश्चिंत जीवन हो गई।
स्लोगन:- ऐसे अचल अडोल बनो जो किसी भी प्रकार की समस्या बुद्धि रूपी पांव को हिला न सके।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-तुम रूहानी सोशल वर्कर हो, तुम्हें भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है, दु:खधाम को सुखधाम बनाना है''
प्रश्न:- संगम पर तुम ब्राह्मण बच्चे किस बात में बहुत एक्सपर्ट (तीखे) बन जाते हो?
उत्तर:- सभी मनुष्यात्माओं की मनोकामना पूर्ण करने में अभी तुम एक्सपर्ट बने हो। मनुष्यों की कामना मुक्ति और जीवन्मुक्ति पाने की है, वह तुम्हें पूर्ण करनी है। तुम सभी को शान्ति का रास्ता बताते हो। शान्ति कोई जंगल में नहीं मिलती, लेकिन आत्मा का स्वधर्म ही शान्ति है। शरीर से डिटैच हो बाप को याद करो तो सुख-शान्ति का वर्सा मिल जायेगा।
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस एक जन्म में पुरानी दुनिया से सन्यास कर बाप का मददगार बनना है। पवित्रता की अंगुली देनी है और मनमनाभव रहना है।
2) भारत को सुप्रीम शान्ति में ले जाने की सेवा करनी है। इस शरीर से डिटैच हो बाप की याद में रहकर शक्ति लेनी है। शान्ति का दान देना है।
वरदान:- खुशी की गोली वा इन्जेक्शन द्वारा स्वयं की दवाई स्वयं करने वाले नॉलेजफुल भव
ब्राह्मण बच्चे अपने बीमारी की दवाई स्वयं ही कर सकते हैं। खुशी की खुराक सेकण्ड में असर करने वाली दवाई है। जैसे डाक्टर्स पावरफुल इन्जेक्शन लगा देते हैं तो चेंज हो जाते। ऐसे ब्राह्मण स्वयं ही स्वयं को खुशी की गोली दे देते वा खुशी का इन्जेक्शन लगा देते तो बीमारी का रूप बदल जाता। नॉलेज की लाइट माइट शरीर को भी चलाने में बहुत मदद देती है। कोई भी बीमारी आती है तो यह भी बुद्धि को रेस्ट देने का साधन है।
स्लोगन:- जो मन की एकाग्रता द्वारा सर्व सिद्धियां प्राप्त कर लेते हैं वही सिद्धि स्वरूप बनते हैं।
19-05-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:06-02-76 मधुबन
बापदादा के सहयोगी-राईट हैण्ड और लेफ्ट हैण्ड
वरदान:- स्नेह के सागर में समाकर मेरे पन की मैल को समाप्त करने वाले पवित्र आत्मा भव
जो सदा स्नेह के सागर में समाये रहते हैं उनको दुनिया की किसी भी बात की सुधबुध नहीं रहती। स्नेह में समाये होने के कारण वे सब बातों से सहज ही परे हो जाते हैं। भक्तों के लिए कहते हैं यह तो खोये हुए रहते हैं लेकिन बच्चे सदा प्रेम में डूबे हुए रहते हैं। उन्हें दुनिया की स्मृति नहीं, मेरा-मेरा सब खत्म। अनेक मेरा मैला बना देता है, एक बाप मेरा तो मैलापन समाप्त हो जाता और आत्मा पवित्र बन जाती है।
स्लोगन:- बुद्धि में ज्ञान रत्नों को ग्रहण करना और कराना ही होलीहंस बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-तुम्हारे पर माया का पूरा पहरा है इसलिए जरा भी गफ़लत न करो, देही-अभिमानी रहने की मेहनत करते रहो।''
प्रश्न:- बाप के पास कौन-सा भण्डारा सदा भरपूर है? उस भण्डारे से स्वयं को भरपूर करने का साधन क्या है?
उत्तर:- बाप के पास पवित्रता-सुख-शान्ति का भण्डारा सदा ही भरपूर है। स्थाई सुख व शान्ति चाहिए तो जंगल में भटकने की जरूरत नहीं है। पवित्रता ही सुख और शान्ति का आधार है। पवित्र बनो तो तुम्हारे सब भण्डारे भरपूर हो जायेंगे। बाप आते ही हैं बच्चों को पवित्र बनाने। वह है एवर पवित्र।
गीत:- न वह हमसे जुदा होंगे....
धारणा के लिए मुख्य सार :
1) मैं इस रथ पर विराजमान रथी आत्मा हूँ, यह अभ्यास करते पूरा-पूरा देही-अभिमानी बनना है। बुद्धियोग की रेस करनी है।
2) पूरा नष्टोमोहा बनना है। इस अन्तिम जन्म में सितम सहन करते भी पावन जरूर बनना है।
वरदान:- सर्व प्राप्तियों की अनुभूति द्वारा माया को विदाई दे बधाई पाने वाले खुशनसीब आत्मा भव
जिनका साथी सर्वशक्तिमान बाप है, उनको सदा ही सर्व प्राप्तियां हैं। उनके सामने कभी किसी प्रकार की माया आ नहीं सकती। जो प्राप्तियों की अनुभूति में रह माया को विदाई देते हैं उन्हें बापदादा द्वारा हर कदम में बधाई मिलती है। तो सदा इसी स्मृति में रहो कि स्वयं भगवान हम आत्माओं को बधाई देते हैं, जो सोचा नहीं वह पा लिया, बाप को पाया सब कुछ पाया ऐसी खुशनसीब आत्मा हो।
स्लोगन:- स्वचिन्तन और प्रभुचिन्तन करो तो व्यर्थ चिंतन स्वत: समाप्त हो जायेगा।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-वारिस बनना है तो वारी जाओ अर्थात् सबसे नष्टोमोहा बनो। साकार बाप को पूरा-पूरा फालो करो।''
प्रश्न:- पापों से बचने तथा अनेक आत्माओं की आशीर्वाद प्राप्त करने का साधन क्या है?
उत्तर:- पापों से बचने के लिए तन-मन-धन सब कुछ बाप पर बलिहार कर दो, फिर ट्रस्टी होकर सम्भालो। कदम-कदम पर श्रीमत लेते रहो। श्रीमत कहती है-तुम बच्चे अपना पैसा पाप के काम में नहीं लगा सकते हो। पाप आत्मा को दान देना-यह भी पाप कराने के निमित्त बनना है इसलिए अगर धन है तो रूहानी हॉस्पिटल खोलो-इससे बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी।
गीत:- हमारे तीर्थ न्यारे हैं....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अन्दर कोई भी विकल्प आये तो भी कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना है। राजाई पाने के लिए पवित्रता की प्रतिज्ञा जरूर करनी है।
2) जीते जी मरकर अपने को छोटा बच्चा समझना है। एक बाप से ही सुनना और सीखना है बाकी सब कुछ भूल जाना है।
वरदान:- निश्चयबुद्धि बन लौकिक में अलौकिक भावना रखने वाले डबल सेवाधारी ट्रस्टी भव
कई बच्चे सेवा करते-करते थक जाते हैं, सोचते हैं यह तो कभी बदलना ही नहीं है। ऐसे दिलशिकस्त नहीं बनो। निश्चयबुद्धि बन, मेरेपन के संबंध से न्यारे हो चलते चलो। कोई कोई आत्माओं का भक्ति का हिसाब चुक्तू होने में थोड़ा समय लगता है इसलिए धीरज धर, साक्षीपन की स्थिति में स्थित हो, शान्त और शक्ति का सहयोग आत्माओं को देते रहो। लौकिक में अलौकिक भावना रखो। डबल सेवाधारी, ट्रस्टी बनो।
स्लोगन:- अपनी श्रेष्ठ वृत्ति से वायुमण्डल को श्रेष्ठ बनाना यही सच्ची सेवा है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-20 नाखूनों का जोर दे पुरुषार्थ करो और बाप से पूरा वर्सा लो, धारणा कर दूसरों को कराओ''
प्रश्न:- तुम बच्चों को किस बात का कदर हो तो बहुतों के कल्याण के निमित्त बन सकते हो?
उत्तर:- बाप ने जो इतने सुन्दर-सुन्दर मैडल्स (बैज) बनवाये हैं... इनका तुम बच्चों को बहुत कदर होना चाहिए। यह बैज ही तुम्हारी सच्ची गीता है, इस पर तुम सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ किसी को भी समझा सकते हो। तुम्हारे पास यह निशानी सदैव होनी चाहिए। बाबा ने बहुत ख्यालात से यह चीजें बनवाई हैं, इनकी बहुत महिमा निकलेगी।
गीत:- माता ओ माता...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाबा हमको वर्सा देने आये हैं तो 20 नाखूनों का जोर देकर भी बाप से पूरा वर्सा जरूर लेना है।
2) शिवबाबा की याद से खुशबूदार फूल बनना और बनाना है। विशालबुद्धि और दूरादेशी बन लॉकेट पर अच्छी रीति सर्विस करनी है।
वरदान:- सर्व प्रति शुभ कल्याण की भावना रख परिवर्तन करने वाले बेहद सेवाधारी भव
मैजारिटी बच्चे बापदादा के आगे अपनी यह आश रखते हैं कि हमारा फलाना संबंधी बदल जाए। घर वाले साथी बन जाएं लेकिन सिर्फ उन आत्माओं को अपना समझ यह आश रखते हो तो हद की दीवार के कारण आपकी शुभ कल्याण की भावना उन आत्माओं तक पहुंचती नहीं। बेहद के सेवाधारी सर्व प्रति आत्मिक भाव वा बेहद की आत्मिक दृष्टि, भाई-भाई के संबंध की वृत्ति से शुभ भावना रखते हैं तो उसका फल अवश्य प्राप्त होता है - यही मन्सा सेवा की यथार्थ विधि है।
स्लोगन:- ज्ञान रूपी बाणों को बुद्धि रूपी तरकश में भरकर माया को ललकारने वाले ही महावीर योद्धे हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-बाप की मदद या पूरा वर्सा लेने के लिए सगे बच्चे बनो। सगे अर्थात् पूरा सन्यास कर पवित्रता की प्रतिज्ञा करने वाले''
प्रश्न:- बाप फुल रहमदिल है-कैसे? कौन-सा रहम बच्चों पर सदा ही करते हैं?
उत्तर:- कोई बच्चा कितना भी विघ्न डालता, माया के वश हो उल्टा कर्म कर लेता, लेकिन फिर भी अगर कोई भूल महसूस करता है तो बाप उसे शरण ले कहते हैं-अच्छा, फिर से ट्रायल करो। अवगुणों को निकाल गुणवान बनो। बाप फुल रहमदिल है, क्योंकि जानते हैं बच्चे और कहाँ जायेंगे। सदा सुखी रहें-यही बाप की आश रहती है।
गीत:- तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप पर पूरा बलि चढ़, बाप का सगा बच्चा बन बाप से पूरा वर्सा लेना है। पूरा पवित्र बनना है।
2) अपने को दर्पण में देख भूतों को निकाल गुणवान बनना है। बाप की मुरली सुन धारण कर औरों को करानी है।
वरदान:- कर्मयोग की स्टेज द्वारा कर्मभोग पर विजय प्राप्त करने वाले विजयी रत्न भव
कर्मयोगी बनने से शरीर का कोई भी कर्मभोग भोगना का अनुभव नहीं कराता है। मन में कोई रोग होगा तो रोगी कहा जायेगा, अगर मन निरोगी है तो सदा तन्दुरूस्त हैं। सिर्फ शेश शैया पर विष्णु के समान ज्ञान का सिमरण कर हर्षित होते, मनन शक्ति द्वारा और ही सागर के तले में जाने का चांस मिलता है। ऐसे कर्मयोगी ही कर्मभोग पर विजय प्राप्त कर विजयी रत्न बनते हैं।
स्लोगन:- साहस को साथी बना लो तो हर कर्म में सफलता मिलती रहेगी।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-आधाकल्प से माया ने तुम्हें श्रापित किया है, अब बाप तुम्हारे सब श्राप मिटाकर वर्सा देने आये हैं, तुम श्रीमत पर चलो तो वर्से के लायक बन जायेंगे।''
प्रश्न:- देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य तुम बच्चों ने क्या समझा है?
उत्तर:- पुरानी दुनिया से मरकर बाप का बनना अर्थात् मरजीवा बनना ही देही-अभिमानी बनना है। इस पुरानी जुत्ती को भूल बाप समान अशरीरी बन बाप को याद करो-यही है देही-अभिमानी बनने का यथार्थ रहस्य।
गीत:- ओम् नमो शिवाए....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप को याद कर, बाबा की श्रीमत पर चल पूरा माया के श्राप से मुक्त होना है।
2) देह का भान छोड़ अशरीरी बनना है, पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना है।
वरदान:- समानता की भावना होते भी हर कदम में विशेषता का अनुभव कराने वाले विशेष आत्मा भव
हर बच्चे में अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। विशेष आत्माओं का कर्म साधारण आत्माओं से भिन्न है। हर एक में भावना तो समानता की रखनी है लेकिन दिखाई दे कि यह विशेष आत्मायें हैं। विशेष आत्मायें अर्थात् विशेष करने वाली, सिर्फ कहने वाली नहीं। उनसे सबको फीलिंग आयेगी कि यह स्नेह के भण्डार हैं, हर कदम में, हर नज़र में स्नेह अनुभव हो - यही तो विशेषता है।
स्लोगन:- सृष्टि की कयामत के पहले अपनी कमियों और कमजोरियों की कयामत करो।
मुरली सार:- ''हे मीठे लाल-रात को जागकर मोस्ट बिलवेड बाप को याद करो, देही-अभिमानी बनो। श्रीमत कहती है बाप समान निरहंकारी बनो''
प्रश्न:- शिवबाबा के साथ ब्रह्मा की मत बहुत नामीग्रामी है-क्यों?
उत्तर:- क्योंकि ब्रह्मा बाबा शिवबाबा का एक ही मुरब्बी बच्चा है। इसे अपनी मत का अहंकार नहीं है। सदैव कहते हैं-तुम हमेशा बाप की ही श्रीमत समझो। इसमें ही तुम्हारा कल्याण है। बाबा देखो कितना निरहंकारी है, माताओं को कहते हैं वन्दे मातरम्। मातायें ज्ञान गंगा हैं, शक्ति सेना हैं, इन्हें आगे रखना है, रिगार्ड देना है। इसमें देह-अभिमान नहीं आना चाहिए।
गीत:- जो पिया के साथ है...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देही-अभिमानी बन माया पर जीत अवश्य पानी है। रात को जागकर भी मोस्ट बिलवेड बाप को याद करना है।
2) बाप समान निराकारी, निरहंकारी बनना है। शिवबाबा को देते हैं-यह तो संकल्प में भी नहीं लाना है।
वरदान:- हदों से पार रह सबको अपने पन की महूसता कराने वाले अनुभवी मूर्त भव
जैसे हर एक के मन से निकलता है मेरा बाबा। ऐसे सभी के मन से निकले कि यह मेरा है, बेहद का भाई है या बहन है, दीदी है, दादी है। कहाँ भी रहते हो लेकिन बेहद सेवा के निमित्त हो। हदों से पार रहकर बेहद की भावना, बेहद की श्रेष्ठ कामना रखना - यही है फालो फादर करना। अभी इसका प्रैक्टिकल अनुभव करो और कराओ। वैसे भी अनुभवी बुजुर्ग को पिता जी, काका जी कहते हैं, ऐसे बेहद के अनुभवी अर्थात् सबको अपनापन महसूस हो।
स्लोगन:- उपराम स्थिति द्वारा उड़ती कला में उड़ते रहो तो कर्म रूपी डाली के बंधन में फँसेंगे नहीं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-देह सहित तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह सब बलि चढ़ा दो फिर ट्रस्टी बन सम्भालो तो ममत्व निकल जायेगा''
प्रश्न:- हरेक ब्राह्मण बच्चे को कौन-सी युक्ति जरूर सीखनी चाहिए?
उत्तर:- सर्विस करने की युक्ति जरूर सीखो। शौक होना चाहिए कि कैसे सिद्ध कर बतायें-परमात्मा कौन है। तुम्हें बाप की श्रीमत मिली हुई है - सेन्सीबुल बन सबको बाप का पैगाम सुनाओ। ऐसे अच्छे-अच्छे पर्चे, कार्ड छपाओ जो मनुष्यों को पता पड़े कि परमात्मा को सर्वव्यापी कहना उनकी इन्सल्ट करना है। तुम बच्चे तीर्थ यात्रियों की बहुत सर्विस कर सकते हो।
गीत:- जिसका साथी है भगवान.....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक शिवबाबा का नाम-रूप बुद्धि में रखना है और किसी के भी नाम-रूप में फँसना नहीं है।
2) माया के तूफ़ानों की परवाह नहीं करनी है। मेरा तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई.... इस विधि से तूफ़ान हटा देने हैं।
वरदान:- विशेषताओं को सामने रख सदा खुशी-खुशी से आगे बढ़ने वाले निश्चयबुद्धि विजयी रत्न भव
अपनी जो भी विशेषतायें हैं, उनको सामने रखो, कमजोरियों को नहीं तो अपने आपमें फेथ रहेगा। कमजोरी की बात को ज्यादा नहीं सोचो तो फिर खुशी में आगे बढ़ते जायेंगे। यह निश्चय रखो कि बाप सर्वशक्तिमान है तो उसका हाथ पकड़ने वाले पार पहुंचे कि पहुंचे। ऐसे सदा निश्चयबुद्धि विजयी रत्न बनते हैं। अपने आपमें निश्चय, बाप में निश्चय और ड्रामा की हर सीन को देखते हुए उसमें भी पूरा निश्चय हो तब विजयी बनेंगे।
स्लोगन:- प्युरिटी की रायॅल्टी में रहो तो हद की आकर्षणों से न्यारे हो जायेंगे।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-शिवबाबा निष्काम नम्बरवन ट्रस्टी है, उसे तुम अपना पुराना बैग-बैगेज ट्रान्सफर कर दो तो सतयुग में तुम्हें सब नया मिल जायेगा''
प्रश्न:- बाप को किन बच्चों की हर प्रकार से सम्भाल करनी पड़ती है?
उत्तर:- जो निश्चयबुद्धि बन अपना पूरा-पूरा समाचार बाप को देते हैं, बाप से हर कदम पर डायरेक्शन लेते हैं-ऐसे बच्चों का बाप को बहुत ख्याल रहता है। बाबा कहते-मीठे बच्चे, कभी भी श्रीमत में संशय नहीं आना चाहिए। संशय में आया तो माया बहुत नुकसान कर देगी। तुम्हें लायक बनने नहीं देगी।
गीत:- दर पर आये हैं....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) किसी का भी अवगुण नहीं देखना है। एक शिवबाबा से कनेक्शन रख उनकी जो श्रीमत मिलती है उसे राइट समझ चलते रहना है। श्रीमत में कभी संशय नहीं उठाना है।
2) अपने तन-मन-धन को पूरा इन्श्योर करना है। कदम-कदम पर श्रीमत लेनी है। पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देना है।
वरदान:- सेवा को बाप के आगे बुद्धि से अर्पण कर स्वयं निश्चिंत रहने वाले सफलता स्वरूप भव
कोई कैसी भी मुश्किल सेवा हो लेकिन उस सेवा को बाप के आगे बुद्धि से अर्पण कर दो। मैंने किया, सफलता नहीं हुई, यह मैं-पन नहीं लाओ। बाप की सेवा है, बाप अवश्य करेगा, बाप को आगे रखो तो सदा निश्चिंत रहेंगे और सफलता भी मिलेगी। कभी कमजोर संकल्प का बीज नहीं डालो, यह नहीं सोचो कि सेवा तो कर रहे हैं लेकिन बाप की मदद तो मिलती नहीं, शायद मैं योग्य नहीं हूँ, यह भी व्यर्थ संकल्प हैं जो सफलता को दूर कर देते हैं।
स्लोगन:- ब्राह्मण कुल के दीपक वही बन सकते जिनके स्मृति की ज्योति सदा जगी हुई है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-ज्ञान के ठण्डे छींटे डाल तुम्हें हरेक को शीतल बनाना है, तुम हो ज्ञान बरसात करने वाली शीतल देवियाँ''
प्रश्न:- बाप ने तुम्हें ज्ञान का कलष क्यों दिया है?
उत्तर:- ज्ञान का कलष मिला है पहले स्वयं को शीतल बनाकर फिर सर्व को शीतल बनाने के लिए। इस समय हरेक काम अग्नि में जल रहा है। उन्हें काम चिता से उतार ज्ञान चिता पर बिठाना है। आत्मा जब पवित्र शीतल बने तब देवता बन सके, इसलिए तुम्हें हर रूह को ज्ञान इन्जेक्शन लगाकर पवित्र बनाना है। तुम्हारी यह रूहानी सेवा है।
गीत:- जो पिया के साथ है....
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) बुद्धियोग सदा एक बाप में लगा रहे। पुराने घर, पुरानी दुनिया में बुद्धि न जाए। ऐसी एकाग्रचित अवस्था बनानी है।
2) बाप की सर्व शिफ्तें (गुण) स्वयं में धारण करना है। हर आत्मा पर ज्ञान के छींटे डाल उनकी तपत बुझाए शीतल बनाना है।
वरदान:- सदा सेफ्टी की लकीर के अन्दर परमात्म छत्रछाया का अनुभव करने वाले मायाजीत भव
''बाप और आप'' यही सेफ्टी की लकीर है, यह लकीर ही परमात्म छत्रछाया है। जो इस छत्रछाया की लकीर के अन्दर है उसके पास माया आने की हिम्मत भी नहीं रख सकती। फिर मेहनत क्या होती, रूकावट क्या होती, विघ्न क्या होता - इन शब्दों से अविद्या हो जायेगी। सदा सेफ रहेंगे, बाप की दिल में समाये रहेंगे - यही सबसे सहज और तीव्रगति में जाने का वा मायाजीत बनने का पुरुषार्थ है।
स्लोगन:- दिव्य गुणों के सर्व अलंकारों से सज़े सजाये रहो तो अहंकार आ नहीं सकता।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-आत्म-अभिमानी भव, एक बाप की श्रीमत पर चलते रहो, तुम्हारा ऊंच कुल है, तुम स्वदर्शन चक्रधारी बनो''
प्रश्न:- शिव शक्ति पाण्डव सेना प्रति बाप का डायरेक्शन कौन-सा है?
उत्तर:- बाप का डायरेक्शन है-श्रीमत पर चल तुम इस भारत का बेड़ा पार करो। सर्व धर्मान् परित्यज... मामेकम् याद करो। पावन बनकर औरों को पावन बनाओ। तुम शिव शक्ति, पाण्डव सेना पवित्र बन अपने तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करो। तुम श्रीमत पर नानवायोलेन्स (अहिंसा) के बल से भारत की सच्ची सेवा करो।
गीत:- ओम् नमो शिवाए....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सबको सुख दे दैवी सम्प्रदाय का बनना है। आसुरी सम्प्रदाय वाला कोई भी कर्तव्य नहीं करना है। शिवालय की स्थापना में मददगार बनना है।
2) आत्म-अभिमानी होकर रहना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते एक बाप को ही याद करना है। योग अग्नि से अपने विकर्म दग्ध करने हैं।
वरदान:- हर बात में कल्याण समझकर अचल, अडोल महावीर बनने वाले त्रिकालदर्शी भव
कोई भी बात एक काल की दृष्टि से नहीं देखो, त्रिकालदर्शी होकर देखो। क्यों, क्या के बजाए सदा यही संकल्प रहे कि जो रहा है उसमें कल्याण है। जो बाबा कहे वह करते चलो, फिर बाबा जाने बाबा का काम जाने। जैसे बाबा चलाये वैसे चलो तो उसमें कल्याण भरा हुआ है। इस निश्चय से कभी डगमग नहीं होंगे। संकल्प और स्वप्न में भी व्यर्थ संकल्प न आयें तब कहेंगे अचल, अडोल महावीर।
स्लोगन:- तपस्वी वह है जो श्रीमत के इशारे प्रमाण सेकण्ड में न्यारा और प्यारा बन जाये।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-प्योरिटी बिगर मनुष्य कोई काम का नहीं इसलिए तुम्हें पवित्र बन दूसरों को पवित्र बनाने में मदद करना है''
प्रश्न:- किस निश्चय के बिगर खाना आबाद होने के बजाए बरबाद हो जाता है?
उत्तर:- अगर निश्चय नहीं कि मोस्ट बिलवेड बाप हमें पढ़ा रहे हैं, हम आये हैं ज्ञान और योग सीखकर वर्सा लेने तो खाना बरबाद हो जाता है। संशय उठा माना तकदीर को लकीर लगी, इसलिए निश्चय में ही विजय है। बाप माताओं को आगे रखते हैं इसमें ईष्या करने की बात नहीं, इसमें भी बच्चों को संशय वा देह-अभिमान नहीं आना चाहिए।
गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर चल बाप के साथ मददगार बन सारे विश्व पर प्योरिटी, पीस स्थापन कर पीस-प्राइज़ लेनी है।
2) माताओं-बहनों को सितम से बचाना है। माताओं का मर्तबा बढ़ाना है। रिगॉर्ड रखना है।
वरदान:- अपसेट होने के बजाए हिसाब-किताब को खुशी-खुशी से चुक्तू करने वाले निश्चिंत आत्मा भव
यदि कभी कोई बात कहता है तो उसमें फौरन अपसेट नहीं हो जाओ, पहले स्पष्ट करो या वेरीफाय कराओ कि किस भाव से कहा है, अगर आपकी गलती नहीं है तो निश्चिंत हो जाओ। यह बात स्मृति में रहे कि ब्राह्मण आत्माओं द्वारा यहाँ ही सब हिसाब-किताब चुक्तू होने हैं। धर्मराजपुरी से बचने के लिए ब्राह्मण कहाँ न कहाँ निमित्त बन जाते हैं इसलिए घबराओ नहीं, खुशी-खुशी से चुक्तू करो। इसमें तरक्की (उन्नति) ही होनी है।
स्लोगन:- ''बाप ही संसार है'' सदा इस स्मृति में रहना - यही सहजयोग है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-कभी जिस्म (साकार शरीर) को याद नहीं करना है, ऑखों से भल इन्हें देखते हो परन्तु याद सुप्रीम टीचर शिवबाबा को करना है''
प्रश्न:- तुम बच्चे किस एक कायदे को जानने के कारण हार-फूल अभी स्वीकार नहीं कर सकते?
उत्तर:- हम जानते हैं कि जिनकी आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं, वही हार-फूल के हकदार हैं। इस कायदे अनुसार हम फूल-हार स्वीकार नहीं कर सकते। बाबा कहते हैं मैं भी तुम्हारे फूल-हार स्वीकार नहीं करता क्योंकि मैं न पूज्य बनता हूँ, न पुजारी। मैं तो तुम्हारा ओबीडियन्ट फादर और टीचर हूँ।
गीत:- छोड़ भी दे आकाश सिंहासन...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं, भगवान टीचर बन पढ़ाते हैं-इसी स्मृति में रहना है। घर गृहस्थ में रहते पूरा ट्रस्टी बनना है।
2) अभी हार-फूल स्वीकार नहीं करने हैं। विष्णु के गले का हार बनने के लिए माया को जीतने का पुरुषार्थ करना है।
वरदान:- बाप को सामने रख ईष्या रूपी माया से बचने वाले विशेष आत्मा भव
ब्राह्मण आत्माओं में हमशरीक होने के कारण ईष्या उत्पन्न होती है, ईष्या के कारण संस्कारों का टक्कर होता है लेकिन इसमें विशेष सोचो कि यदि हमशरीक किसी विशेष कार्य के निमित्त बना है तो उनको निमित्त बनाने वाला कौन! बाप को सामने लाओ तो ईष्या रूपी माया भाग जायेगी। अगर किसी की बात आपको अच्छी नहीं लगती है तो शुभ भावना से ऊपर दो, ईष्या वश नहीं। आपस में रेस करो, रीस नहीं तो विशेष आत्मा बन जायेंगे।
स्लोगन:- बाप को अपना साथी बनाकर माया के खेल को साक्षी होकर देखो।
05-05-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज:28-01-76 मधुबन
रूहानी सितारों की महफिल
दूसरी मुरली - 01-02-76
रूहानी शमा और तीन प्रकार के रूहानी परवाने
वरदान:- ज्ञान स्वरूप बन कर्म फिलासॉफी को पहचान कर चलने वाले कर्मबन्धन मुक्त भव
कई बच्चे जोश में आकर सब कुछ छोड़ किनारा कर तन से अलग हो जाते लेकिन मन का हिसाब-किताब होने के कारण खींचता रहता है। बुद्धि जाती रहती है, यह भी एक बड़ा विघ्न बन जाता है इसलिए कोई से किनारा भी करना है तो पहले निमित्त आत्माओं से वेरीफाय कराओ क्योंकि यह कर्मो की फिलॉसाफी है। जबरदस्ती तोड़ने से मन बार-बार जाता रहता है। तो ज्ञान स्वरूप होकर कर्म फिलॉसाफी को पहचानो और वेरीफाय कराओ तो सहज कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेंगे।
स्लोगन:- अपने स्वमान की सीट पर सेट रहो तो माया आपके आगे सरेन्डर हो जायेगी।
[04-05-2013]
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-तुम रूप बसन्त हो, तुम्हें बाप की याद में भी रहना है तो ज्ञान-रत्नों का बीज भी बोना है, भारत का श्रृंगार भी करना है''
प्रश्न:- तुम बच्चे कलियुगी गोवर्धन पर्वत को उठाने के लिए कौन-सी अंगुली देते हो?
उत्तर:- पवित्रता की। पवित्रता की प्रतिज्ञा करना ही जैसे अंगुली देना है। पवित्रता नहीं है तो भारत का हाल देखो क्या हो चुका है। पवित्रता है तो पीस-प्रासपर्टी सब है इसलिए श्रीमत पर आग और कपूस इकट्ठे रहते भी पवित्र बनना है (प्रवृत्ति में रहते पवित्र बनना है)। घरबार का सन्यास नहीं करना है।
गीत:- आने वाले कल की तुम तकदीर हो.....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सदा हर्षित, खुशमिज़ाज़ रहना है। कभी भी रोना नहीं है। जीते जी सबसे छुट्टी ले लेनी है। किसी का भी चिन्तन नहीं करना है।
2) अपने शान्ति स्वधर्म में स्थित रहना है। ज्ञान और योग से तीखा जाना है। ध्यान की आश नहीं रखनी है।
वरदान:- किनारा करने के बजाए स्वयं को एडजेस्ट करने वाले सहनशीलता के अवतार भव
कई बच्चों में सहनशक्ति की कमी होती है इसलिए कोई छोटी सी बात भी होती है तो चेहरा बहुत जल्दी बदल जाता है, फिर घबराकर या तो स्थान को बदलने की सोचेंगे या जिनसे तंग होंगे उनको बदल देंगे, अपने को नहीं बदलेंगे, लेकिन दूसरों से किनारा कर लेंगे इसलिए स्थान अथवा दूसरे को बदलने के बजाए स्वयं को बदल लो, सहनशीलता का अवतार बन जाओ। सबके साथ स्वयं को एडजेस्ट करना सीखो।
स्लोगन:- परमार्थ के आधार से व्यवहार को सिद्ध करना - यही योगी का लक्षण है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-अपनी उन्नति के लिए अमृतवेले उठ बाप को याद करो, सवेरे का समय कमाई के लिए बहुत-बहुत अच्छा है''
प्रश्न:- सदा सलामत रहने का आधार क्या है? सदा सलामत किसे कहेंगे?
उत्तर:- बाप की श्रीमत ही सदा सलामत बनाती है। कभी भी कोई दु:ख और तकलीफ़ नहीं होगी। तुम बच्चे इतने तकदीरवान बनते हो जो कभी किसी प्रकार की चोट नहीं लग सकती। निरोगी काया बन जायेगी। तुम अपनी तकदीर की महिमा गाते रहो। जो उठते-बैठते बाप की याद में रहते हैं-वह हैं तकदीरवान बच्चे। उन्हें ही सदा सलामत कहेंगे।
गीत:- रात के राही...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बुद्धियोग से सच्ची यात्रा करनी है। विनाशी धन के पीछे अपनी तकदीर नहीं गंवानी है। सच्ची कमाई करनी है।
2) तन-मन-धन से पूरा फ्लैन्थ्रोफिस्ट (महादानी) बनना है। अपना सब कुछ 21 जन्मों के लिए इन्श्योर कर देना है।
वरदान:- वैरायटी अनुभूतियों द्वारा सदा उमंग-उत्साह से भरपूर रहने वाले विघ्न जीत भव
रोज़ अमृतवेले सारे दिन के लिए वैरायटी उमंग-उत्साह की प्वाइंट्स बुद्धि में इमर्ज करो। हर दिन की मुरली से उमंग-उत्साह की प्वाइंट्स नोट करो, वह वैरायटी प्वाइंटस उमंग-उत्साह बढ़ायेंगी। मनुष्य आत्मा का नेचर है कि वैरायटी पसन्द आती है इसलिए चाहे ज्ञान की प्वाइंट मनन करो या रूहरिहान करो, वैरायटी रूप से जीरो बन अपने हीरो पार्ट की स्मृति में रहो, तो उमंग-उत्साह से भरपूर रहेंगे और सब विघ्न सहज समाप्त हो जायेंगे।
स्लोगन:- अपनी अवस्था को ऐसा शान्त-चित बना लो जो क्रोध का भूत दूर से ही भाग जाए।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-सपूत बन श्रीमत पर चल मात-पिता की आशीर्वाद ले आगे बढ़ते रहो, आशीर्वाद लेने में कभी भूल नहीं करना''
प्रश्न:- बाप बच्चों को कौन सा शुभ मार्ग बतलाते हैं, जो कोई भी मनुष्य नहीं बतला सकते?
उत्तर:- पतित से पावन बनने का। मुक्ति-जीवनमुक्ति प्राप्त करने का शुभ मार्ग एक बाप ही बतलाते हैं। यह मार्ग किसी को भी पता नहीं है। अगर किसी भी आत्मा को पता होता तो दु:ख आते ही आत्मा फौरन वहाँ भाग जाती। बाप ने तुम्हें मार्ग बताया-बच्चे, देह सहित सब कुछ भूल अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो, इससे ही पावन बनेंगे।
गीत:- ले लो दुआयें माँ बाप की....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप की श्रीमत पर पूरा चल बाप का राइट हैण्ड बन पूरा राइटियस बनना है। बाप का पूरा मददगार बनना है।
2) मात-पिता की आशीर्वाद आगे बढ़ाती है इसलिए आज्ञाकारी बन आशीर्वाद लेनी है। बाप समान निरहंकारी बनना है।
वरदान:- सदा उमंग-उत्साह के पंखों द्वारा उड़ती कला में उड़ने वाली श्रेष्ठ आत्मा भव
ज्ञान-योग के साथ-साथ हर समय, हर कर्म में, हर दिन नया उमंग-उत्साह बना रहे, यही उड़ती कला का आधार है। कैसा भी कार्य हो, चाहे सफाई का हो, बर्तन मांजने का हो, साधारण कर्म हो, उसमें भी उमंग-उत्साह नैचुरल और निरन्तर हो। उड़ती कला वाली श्रेष्ठ आत्मा उमंग-उत्साह के पंखों से सदा उड़ती रहेगी, वह कभी कनफ्युज़ नहीं होगी, छोटी-छोटी बातों में थककर रुकेगी नहीं।
स्लोगन:- जो निमार्णचित, अथक और सदा जागती ज्योत हैं - वही विश्व कल्याणकारी हैं।
मीठे बच्चे - यह संगमयुग सर्वोत्तम बनने का शुभ समय है, क्योंकि इसी समय बाप तुम्हें नर से नारायण बनने की पढ़ाई पढ़ाते हैं''
प्रश्न:- तुम बच्चों के पास ऐसी कौन-सी नॉलेज है जिसके कारण तुम किसी भी हालत में रो नहीं सकते?
उत्तरः- तुम्हारे पास इस बने-बनाये ड्रामा की नॉलेज है, तुम जानते हो इसमें हर आत्मा का अपना पार्ट है, बाप हमें सुख का वर्सा दे रहे हैं फिर हम रो कैसे सकते। परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले की, वह मिल गया बाकी क्या चाहिए। बख्तावर बच्चे कभी रोते नहीं।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान तलवार से विकारों को जीतना है। ज्ञान के संस्कार भरने हैं। पुरानी दुनिया और पुराने शरीर का सन्यास करना है।
2) भाग्यवान बनने की खुशी में रहना है, किसी भी बात की चिन्ता नहीं करनी है। कोई शरीर छोड़ देता है तो भी दुःख के आंसू नहीं बहाने हैं।
वरदानः- हर शक्ति को आर्डर प्रमाण चलाने वाले मास्टर रचयिता भव
कर्म शुरू करने के पहले जैसा कर्म वैसी शक्ति का आह्वान करो। मालिक बनकर आर्डर करो क्योंकि यह सर्वशक्तियाँ आपकी भुजा समान हैं, आपकी भुजायें आपके आर्डर के बिना कुछ नहीं कर सकती। आर्डर करो सहन शक्ति कार्य सफल करो तो देखो सफलता हुई पड़ी है। लेकिन आर्डर करने के बजाए डरते हो- कर सकेंगे वा नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार का डर है तो आर्डर चल नहीं सकता। इसलिए मास्टर रचयिता बन हर शक्ति को आर्डर प्रमाण चलाने के लिए निर्भय बनो।
स्लोगनः- सहारेदाता बाप को प्रत्यक्ष कर सबको किनारे लगाओ।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-मम्मा बाबा समान सर्विस करने के लिए बुद्धि को सतोप्रधान बनाओ। सतोप्रधान बुद्धि वाले ही धारणा कर दूसरों को करा सकते हैं''।
प्रश्न:- ऊंचे ते ऊंचा पुरुषार्थ कौन-सा है जो अभी तुम बच्चे कर रहे हो?
उत्तर:- मात-पिता के तख्त को जीतना, यह है ऊंचे ते ऊंचा पुरुषार्थ। मम्मा बाबा आकर तुम्हारे वारिस बनें, ऐसा नम्बरवन बनने का लक्ष्य रखो। इसके लिए ऊंचे से ऊंची सेवा करनी है। बहुतों को आपसमान बनाना है। दु:खी मनुष्यों को सुखी बनाना है। अविनाशी ज्ञान रत्नों को बुद्धि रूपी बर्तन में धारण कर दूसरों को दान देना है।
गीत:- भोलेनाथ से निराला...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) पढ़ाई को धारण कर दूसरों को पढ़ाने लायक बनना है। मम्मा-बाबा समान सर्विस करनी है।
2) अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान कर दु:खी मनुष्यों को सुखी बनाना है। पढ़ाई अच्छी तरह पढ़नी है।
वरदान:- सबको अमर ज्ञान दे अकाले मृत्यु के भय से छुड़ाने वाले शक्तिशाली सेवाधारी भव
दुनिया में आजकल अकाले मृत्यु का ही डर है। डर से खा भी रहे हैं, चल भी रहे हैं, सो भी रहे हैं। ऐसी आत्माओं को खुशी की बात सुनाकर भय से छुड़ाओ। उन्हें खुशखबरी सुनाओ कि हम आपको 21 जन्मों के लिए अकाले मृत्यु से बचा सकते हैं। हर आत्मा को अमर ज्ञान दे अमर बनाओ जिससे वे जन्म-जन्म के लिए अकाले मृत्यु से बच जाएं। ऐसे अपने शान्ति और सुख के वायब्रेशन से लोगों को सुख-चैन की अनुभूति कराने वाले शक्तिशाली सेवाधारी बनो।
स्लोगन:- याद और सेवा का बैलेन्स रखने से ही सर्व की दुआयें मिलती हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-आपस में अविनाशी ज्ञान रत्नों की लेन-देन करके एक दो की पालना करो, ज्ञान रत्नों का दान करते रहो''
प्रश्न:- अपने आपको अपार खुशी में रखने का पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर:- खुशी में रहने के लिए विचार सागर मंथन करो। अपने आपसे बातें करना सीखो। अगर कर्मभोग आता है तो खुशी में रहने के लिए विचार करो-यह तो पुरानी जुत्ती है, हम तो 21 जन्मों के लिए निरोगी काया वाले बन रहे हैं, जन्म-जन्मान्तर के लिए यह कर्मभोग समाप्त हो रहा है। कोई भी बीमारी छूटती है, आफ़त हट जाती है तो खुशी होती है ना। ऐसे विचार कर खुशी में रहो।
गीत:- माता ओ माता....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कछुए मिसल सब कर्मेन्द्रियों को समेट बाप और वर्से को याद करना है। कर्मयोगी बनना है। अपने आपसे बातें करनी है।
2) आपस में ज्ञान रत्नों की लेन-देन कर एक दो की पालना करनी है। सबसे रूहानी प्यार रखना है।
वरदान:- ज्ञान और योग की शक्ति से हर परिस्थिति को सेकण्ड में पास करने वाले महावीर भव
महावीर अर्थात् सदा लाइट और माइट हाउस। ज्ञान है लाइट और योग है माइट। जो इन दोनों शक्तियों से सम्पन्न हैं वह हर परिस्थिति को सेकण्ड में पास कर लेते हैं। अगर समय पर पास न होने के संस्कार पड़ जाते हैं तो फाइनल में भी वह संस्कार फुल पास होने नहीं देते। जो समय पर फुल पास होता है उसको कहते हैं पास विद ऑनर। धर्मराज भी उसको ऑनर देता है।
स्लोगन:- योग अग्नि से विकारों के बीज को भस्म कर दो तो समय पर धोखा मिल नहीं सकता।
28-04-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:27-01-76 मधुबन
तीन श्रेष्ठ ईश्वरीय वरदान
वरदान:- श्रीमत प्रमाण जी हजूर कर, हजूर को हाज़िर अनुभव करने वाले सर्व प्रापित सम्पन्न भव
जो हर बात में बाप की श्रीमत प्रमाण ''जी हजूर-जी हजूर'' करते हैं, तो बच्चों का जी हजूर करना और बाप का बच्चों के आगे हाजिर हजूर होना। जब हजूर हाजिर हो गया तो किसी भी बात की कमी नहीं रहेगी, सदा सम्पन्न हो जायेंगे। दाता और भाग्य-विधाता-दोनों की प्राप्तियों के भाग्य का सितारा मस्तक पर चमकने लगेगा।
स्लोगन:- परमात्म वर्से के अधिकारी बनकर रहो तो अधीनता आ नहीं सकती।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-जीते जी मरजीवा बनो, हम अशरीरी आत्मा हैं, यही पहला पाठ अच्छी तरह से रोज़ पक्का करते रहो''
प्रश्न:- सम्पूर्ण सरेन्डर किसको कहा जायेगा?
उत्तर:- जो सम्पूर्ण सरेन्डर हैं वह देही-अभिमानी होंगे। यह देह भी हमारी नहीं, अभी हम नंगे बनते हैं अर्थात् तन-मन-धन जो कुछ है, वह बाबा को अर्पण करते हैं। सब मेरा मेरा समाप्त कर पूरे ट्रस्टी होकर रहना ही सम्पूर्ण सरेन्डर होना है। बाबा कहते-बच्चे, मेरा बनकर सबसे ममत्व मिटा दो। धन्धा धोरी करो, सम्भालो, माँ बाप की पालना का कर्जा उतारो परन्तु बाप की श्रीमत पर ट्रस्टी होकर।
गीत:- दर पे आये हैं कसम ले.....
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) माया के विघ्नों से डरना नहीं है। बाप की याद से सब विघ्नों को हटा देना है।
2) बुद्धि से सब कुछ सरेन्डर कर अशरीरी बन बाप को याद करना है। ज्ञानी तू आत्मा के साथ-साथ योगी भी जरूर बनना है।
वरदान:- हर आत्मा के संबंध-सम्पर्क में आते सब प्रश्नों से पार रहने वाले सदा प्रसन्नचित भव
हर आत्मा के संबंध-सम्पर्क में आते कभी चित के अन्दर यह प्रश्न उत्पन्न न हो कि यह ऐसा क्यों करता वा क्यों कहता, यह बात ऐसे नहीं, ऐसे होनी चाहिए। जो इन प्रश्नों से पार रहते हैं वही सदा प्रसन्नचित रहते हैं। लेकिन जो इन प्रश्नों की क्यू में चले जाते, रचना रच लेते तो उन्हें पालना भी करनी पड़ती। समय और एनर्जी भी देनी पड़ती, इसलिए इस व्यर्थ रचना का बर्थ कन्ट्रोल करो।
स्लोगन:- अपने नयनों में बिन्दुरूप बाप को समा लो तो और कोई समा नहीं सकता।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-ज्ञान अमृत है और योग अग्नि है, ज्ञान और योग से तुम्हारे सब दु:ख-दर्द दूर हो जायेंगे''
प्रश्न:- कौन सा रस ज्ञान से प्राप्त होता है, भक्ति से नहीं?
उत्तर:- जीवनमुक्ति का रस। भक्ति से किसी को भी जीवनमुक्ति का रस नहीं मिल सकता। बाप जब आते हैं तो बच्चों को जो डायरेक्शन देते, वही ज्ञान है उसी पर चलने से स्वर्ग की राजाई मिल जाती है।
गीत:- भोलेनाथ से निराला...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) हम राजॠषि हैं। स्वयं भगवान हमें राजयोग सिखाकर राजाई का वर्सा देते हैं, इस नशे में रहना है।
2) योग अग्नि से विकर्मों को दग्ध कर सब बीमारियों से सदा के लिए मुक्त होना है। इस जन्म के कर्मभोग को याद में रह चुक्तू करना है।
वरदान:- कर्मभोग को कर्मयोग में परिवर्तन कर सेवा के निमित्त बनने वाले भाग्यवान भव
तन का हिसाब-किताब कभी प्राप्ति में विघ्न अनुभव न हो। तन कभी भी सेवा से वंचित होने नहीं दे। भाग्यवान आत्मा कर्मभोग के समय भी किसी न किसी प्रकार से सेवा के निमित्त बन जाती है। कर्मभोग चाहे छोटा हो या बड़ा, उसकी कहानी का विस्तार नहीं करो, उसे वर्णन करना माना समय और शक्ति व्यर्थ गंवाना। योगी जीवन माना कर्मभोग को कर्मयोग में परिवर्तन कर देना-यही है भाग्यवान की निशानी।
स्लोगन:- दृष्टि में रहम और शुभ भावना हो तो अभिमान व अपमान की दृष्टि समाप्त हो जायेगी।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-श्रेष्ठ बनने के लिए सदा श्रीमत पर चलते रहो, लक्ष्मी-नारायण भी श्रीमत से इतने श्रेष्ठ बने हैं''
प्रश्न:- भक्ति में गऊमुख का यादगार क्यों बनाया है? गऊमुख का गायन क्यों है?
उत्तर:- क्योंकि संगम पर बाप ने ज्ञान का कलष माताओं के ऊपर रखा है। तुम्हारे मुख से ज्ञान अमृत निकलता है जिससे सब पावन बन जाते हैं। तुम भारत माताओं को ही शक्ति अवतार कहा जाता है। तुम सबकी मनोकामनायें पूर्ण करती हो इसलिए यादगार बना हुआ है।
गीत:- नयन हीन को राह बताओ...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) पवित्रता के बल से, श्रीमत पर चल भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है। सबको एक बाप का आर्डीनेंस सुनाना है कि पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे।
2) हर एक को तीन बाप का परिचय दे, दु:खधाम से शान्तिधाम और सुखधाम में चलने की राह दिखानी है। भटकने से छुड़ाना है।
वरदान:- वरदानों की दिव्य पालना द्वारा सहज और श्रेष्ठ जीवन का अनुभव करने वाले सदा खुशनसीब भव
बापदादा संगमयुग पर सभी बच्चों की तीन संबंधों से पालना करते हैं। बाप के संबंध से वर्से की स्मृति द्वारा पालना, शिक्षक के संबंध से पढ़ाई की पालना और सतगुरू के संबंध से वरदानों के अनुभूति की पालना.. एक ही समय पर सबको मिल रही है, इसी दिव्य पालना द्वारा सहज और श्रेष्ठ जीवन का अनुभव करते रहो। मेहनत और मुश्किल शब्द भी समाप्त हो जाए तब कहेंगे खुशनसीब।
स्लोगन:- बाप के साथ-साथ सर्व आत्माओं के स्नेही बनना ही सच्ची सद््भावना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-इस कलियुगी दुनिया का सुख काग विष्टा के समान है, यह दुनिया अब गई कि गई इसलिए इससे लगाव नहीं रखना है, आसक्ति निकाल देनी है''
प्रश्न:- किन बच्चों की दिल इस पुरानी दुनिया से नहीं लग सकती है?
उत्तर:- जो आज्ञाकारी, वफादार, निश्चयबुद्धि बच्चे हैं उनकी दिल इस पुरानी दुनिया से लग नहीं सकती क्योंकि उनकी बुद्धि में रहता यह तो विनाश हुई कि हुई। यह तिलसम (जादू) का खेल है, माया का भभका है। इसका अब विनाश होना ही है। डैम फटेंगे, अर्थक्वेक होगी, सागर धरनी को हप करेगा.... यह सब होना है, नथिंगन्यु। स्वीट होम, स्वीट राजधानी याद है तो इस दुनिया से दिल नहीं लग सकती।
गीत:- जिसका साथी है भगवान...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस दुनिया में स्वयं को मेहमान समझना है। देही-अभिमानी बन पुरानी दुनिया और पुरानी देह से उपराम रहना है।
2) योग से आत्मा और शरीर रूपी बर्तन साफ करना है। यह शरीर काम का नहीं है इसलिए इसमें ममत्व नहीं रखना है।
वरदान:- सन्तुष्टता के सर्टीफिकेट द्वारा भविष्य राज्य-भाग्य का तख्त प्राप्त करने वाले सन्तुष्ट मूर्ति भव
सन्तुष्ट रहना है और सर्व को सन्तुष्ट करना है -यह स्लोगन सदा आपके मस्तक रूपी बोर्ड पर लिखा हुआ हो क्योंकि इसी सर्टीफिकेट वाले भविष्य में राज्य-भाग्य का सर्टीफिकेट लेंगे। तो रोज़ अमृतवेले इस स्लोगन को स्मृति में लाओ। जैसे बोर्ड पर स्लोगन लिखते हो ऐसे सदा अपने मस्तक के बोर्ड पर यह स्लोगन दौड़ाओ तो सभी सन्तुष्ट मूर्तियां हो जायेंगे। जो सन्तुष्ट हैं वह सदा प्रसन्न हैं।
स्लोगन:- आपस में स्नेह और सन्तुष्टता सम्पन्न व्यवहार करने वाले ही सफलता मूर्त बनते हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - लक्ष्य सोप से आत्मा रूपी वस्त्र को साफ करो, अन्दर में कोई भी मैल नहीं रहनी चाहिए''
प्रश्न:- पुरुषार्थी बच्चे कर्मों की किस गुह्य गति को जानते हुए पुरुषार्थ में सदा तत्पर रहते हैं?
उत्तर:- आत्मा पर अनेक जन्मों के पाप कर्मो का बोझ है, अनेक कड़े संस्कार हैं, उन संस्कारों को बिगर योग के परिवर्तन नहीं किया जा सकता। आत्मा पाप कर्म करते-करते बिल्कुल मैली हो चुकी है इसलिए इसको साफ करने की मेहनत करनी है। वह याद के सिवाए साफ नहीं होगी। याद में तूफान भी आयेंगे लेकिन कितने भी तूफान आयें वह पुरुषार्थ में सदा लगे रहेंगे।
गीत:- मैं एक नन्हा सा बच्चा हूँ...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर पूरा नष्टोमोहा बनना है। परहेज और युक्ति से चलना है। रजिस्टर खराब होने नहीं देना है।
2) नींद को जीतने वाला बन अमृतवेले विशेष आत्मा को साफ बनाने के लिए बाप की याद में रहना है। ज्ञान-योग से आत्मा को पावन बनाना है।
वरदान:- अपने शक्ति स्वरूप द्वारा अलौकिकता का अनुभव कराने वाले ज्वाला रूप भव
अभी तक बाप शमा की आकर्षण है, बाप का कर्तव्य चल रहा है, बच्चों का कर्तव्य गुप्त है। लेकिन जब आप अपने शक्ति स्वरूप में स्थित होंगे तो सम्पर्क में आने वाली आत्मायें अलौकिकता का अनुभव करेंगी। अच्छा-अच्छा कहने वालों को अच्छा बनने की प्रेरणा तब मिलेगी जब संगठित रूप में आप ज्वाला स्वरूप, लाइट हाउस बनेंगे। मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्टेज, स्टेज पर आ जाए तो सभी आपके आगे परवाने समान चक्र लगाने लग जायें।
स्लोगन:- अपनी कर्मेन्द्रियों को योग अग्नि में तपाने वाले ही सम्पूर्ण पावन बनते हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - तुम घर बैठे वन्डरफुल रूहानी यात्रा पर हो, तुम्हारी है बुद्धि की यात्रा, कर्म करते इस यात्रा में कदम आगे बढ़ाते चलो तो पावन बन जायेंगे''
प्रश्न:- इस ज्ञान मार्ग में पेचदार तथा महीन बातें कौन सी हैं जो तुम बच्चे अभी ही सुनते हो?
उत्तर:- तुम जानते हो हम सभी मेल अथवा फीमेल एक शिव परमात्मा की सजनियां आत्मायें हैं। साजन है एक परमात्मा। फिर जिस्म के हिसाब से हम शिवबाबा के पोत्रे और पोत्रियां हैं। हमारा उनकी प्रापर्टी पर पूरा हक लगता है। हम 21 जन्म के लिए सदा सुख की प्रापर्टी दादे से लेते हैं - यह हैं पेचदार बातें।
गीत:- हमारे तीर्थ न्यारे हैं..
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप समान शीतल बन ज्ञान छींटा डाल मनुष्य आत्माओं को भी शीतल बनाने की सेवा करनी है।
2) दादे की मिलकियत को याद कर अपार खुशी में रहना है। रूहानी धन्धा कर विश्व की बादशाही लेनी है।
वरदान:- अपने हर कर्म और बोल द्वारा चलते फिरते हर आत्मा को शिक्षा देने वाले मास्टर शिक्षक भव
जैसे आजकल चलती-फिरती लाइब्रेरी होती है, ऐसे आप भी चलते-फिरते मास्टर शिक्षक हो। सदा अपने सामने स्टूडेन्ट देखो, अकेले नहीं हो, सदा स्टूडेन्ट के सामने हो। सदा स्टडी कर भी रहे हो और करा भी रहे हो। योग्य शिक्षक कभी स्टूडेन्ट के आगे अलबेले नहीं होंगे, अटेन्शन रखेंगे। आप सोते हो, उठते हो, चलते हो, खाते हो, हर समय समझो हम बड़े कालेज में बैठे हैं, स्टूडेन्ट देख रहे हैं।
स्लोगन:- आत्म निश्चय से अपने संस्कारों को सम्पूर्ण पावन बनाना ही श्रेष्ठ योग है।
21-04-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:23-01-76 मधुबन
संकल्प, वाणी और स्वरूप के हाईएस्ट और होलीएस्ट होने से बाप की प्रत्यक्षता
वरदान:- अपनी सूक्ष्म शक्तियों को स्थापना के कार्य में लगाने वाले मास्टर रचयिता भव
जैसे आपकी रचना साइंस वाले विस्तार को सार में समा रहे हैं। अति सूक्ष्म और शक्तिशाली विनाश के साधन बना रहे हैं। ऐसे आप मास्टर रचयिता बन अपनी सूक्ष्म शक्तियाँ स्थापना के कार्य में लगाओ। आपके पास सबसे महान शक्ति है - श्रेष्ठ संकल्प की शक्ति, शुभ वृत्ति की शक्ति, स्नेह और सहयोग की दृष्टि। तो इस सूक्ष्म शक्तियों द्वारा अपनी वंशावली की आशाओं के दीपक जलाए उन्हें यथार्थ मंजिल पर पहुँचाओ।
स्लोगन:- जहाँ स्वच्छता और मधुरता है वहाँ सेवा में सफलता है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-तुम्हारा कर्तव्य है अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई करना और कराना, दान पूछकर नहीं किया जाता, करके दिखाना है''
प्रश्न:- बाप की दिल में कौन सी शुभ आश सदा रहती है? किस बात में बाप आप समान बनाने चाहते हैं?
उत्तर:- बाप की दिल में सदा ही बच्चों को सुख देने की आश रहती है। बेहद के बाप को कभी भी विकल्प वा बुरा कर्म करने का संकल्प, दु:ख देने का संकल्प नहीं आ सकता क्योंकि वह है सुखदाता। इसी बात में बाप अपने बच्चों को आप समान बनाना चाहते हैं। बाबा कहते-मीठे बच्चे, जांच करो मेरे अन्दर सदा शुद्ध संकल्प रहते हैं? विकल्प तो नहीं आते हैं?
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी..
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) रूप-बसन्त बन मुख से ज्ञान रत्न निकालने हैं। योग से अपनी बुद्धि को सालिम बनाना है।
2) बाप समान सबको सुख दे सुखदाता बनना है। कभी भी दु:ख देने का बुरा संकल्प वा विकल्प नहीं उठाना है।
वरदान:- बेहद के स्मृति स्वरूप द्वारा हद की बातों को समाप्त करने वाले अनुभवी मूर्त भव
आप श्रेष्ठ आत्मायें डायरेक्ट बीज और मुख्य दो पत्ते, त्रिमूर्ति के साथ समीप संबंध वाले तना हो। इसी ऊंची स्टेज पर स्थित रहो, बेहद के स्मृति स्वरूप बनो तो हद की व्यर्थ बातें समाप्त हो जायेंगी। अपने बेहद के बुजुर्गपन में आओ तो सदा सर्व अनुभवीमूर्त हो जायेंगे। जो बेहद के पूर्वजपन का आक्यूपेशन है, उसको सदा स्मृति में रखो। आप पूर्वजों का काम है अमर ज्योति बन अंधकार में भटकती हुई आत्माओं को ठिकाने पर लगाना।
स्लोगन:- किसी भी बात में मूंझने के बजाए मौज का अनुभव करना ही मस्त योगी बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-योग से ही ताकत आयेगी, अनेक जन्मों की पुरानी आदतें मिटेंगी, सर्वगुण धारण होंगे इसलिए जितना हो सके बाप को याद करो''
प्रश्न:- तुम बच्चे अभी कौन सी रेस कर रहे हो? उस रेस में थकावट कब आती है?
उत्तर:- तुम बच्चे अभी विजय माला का दाना बनने की रेस कर रहे हो। इस रेस में कोई कोई बहुत अच्छा दौड़ते हैं, कोई कोई थक जाते हैं। थकने का कारण है पढ़ाई पर पूरा ध्यान नहीं। मैनर्स सुधरते नहीं। ऐसे बच्चों पर शक पड़ता कि यह कल नहीं रह सकेंगे। काम या क्रोध के वशीभूत होने के कारण ही थकावट आती है फिर कहते अब चढ़ नहीं सकेंगे, जो होना होगा वो देखा जायेगा। यह भी तो वन्डर है ना।
गीत:- किसी ने अपना बनाके मुझको.....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) गॉडली बुलबुल बन बाप का नाम बाला करना है। ज्ञान की धारणा कर अपने मैनर्स बहुत अच्छे बनाने हैं।
2) विजय माला में पिरोने की रेस करनी है। कभी भी तंग हो ब्राह्मण जीवन से थकना नहीं है। श्रीमत पर सदा चलना है।
वरदान:- सहयोग की शुभ भावना द्वारा रूहानी वायुमण्डल बनाने वाले मास्टर दाता भव
जैसे प्रकृति अपने वायुमण्डल के प्रभाव का अनुभव कराती है, कभी गर्मी, कभी सर्दी..ऐसे आप प्रकृतिजीत सदा सहयोगी, सहजयोगी आत्मायें अपनी शुभ भावनाओं द्वारा रूहानी वायुमण्डल बनाने में सहयोगी बनो। वह ऐसा है वा ऐसा करता है, यह नहीं सोचो। कैसा भी वायुमण्डल है, व्यक्ति है, मुझे सहयोग देना है। दाता के बच्चे सदा देते हैं। तो चाहे मन्सा से सहयोगी बनो, चाहे वाचा से, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क के द्वारा। लेकिन लक्ष्य हो सहयोगी जरूर बनना है।
स्लोगन:- इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति द्वारा सर्व की इच्छाओं को पूर्ण करना ही कामधेनु बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-श्रीमत ही श्रेष्ठ बनायेगी, परमत वा मनमत श्रापित कर देगी, इसलिए श्रीमत को कभी भी भूलो मत''
प्रश्न:- सतोप्रधान पुरुषार्थी कौन और तमोप्रधान पुरुषार्थी कौन? दोनों का अन्तर क्या होगा?
उत्तर:- सतोप्रधान पुरुषार्थी बाप से पूरा वर्सा लेने का पुरुषार्थ वा प्रतिज्ञा करते हैं, वह याद में रहने की रेस करते हैं और नम्बरवन जाने का लक्ष्य रखते हैं। तमोप्रधान पुरुषार्थी कहते-जो तकदीर में होगा, अच्छा, प्रजा बनेंगे तो प्रजा ही सही। उनके आगे माया का ऐसा विघ्न आता जो रेस से ही बाहर निकल जाते।
गीत:- मुझको सहारा देने वाले..
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सवेरे अमृतवेले उठ अशरीरी बन बाप को याद करने का अभ्यास करना है। पूरा वर्सा लेने के लिए याद की रेस करनी है। कम से कम 8 घण्टा याद जरूर करना है।
2) एक बाप पर पूरा बलिहार जाना है। परमत व मनमत पर न चल एक बाप की श्रेष्ठ मत पर चलना है।
वरदान:- सेवाओं में सदा सहयोगी बन सहजयोग का वरदान प्राप्त करने वाले विशेषता सम्पन्न भव
ब्राह्मण जीवन विशेषता सम्पन्न जीवन है, ब्राह्मण बनना अर्थात् सहजयोगी भव का वरदान प्राप्त करना। यही सबसे पहला जन्म का वरदान है। इस वरदान को बुद्धि में सदा याद रखना-यह है वरदान को जीवन में लाना। वरदान को कायम रखने की सहज विधि है-सर्व आत्माओं के प्रति वरदान को सेवा में लगाना। सेवा में सहयोगी बनना ही सहजयोगी बनना है। तो इस वरदान को स्मृति में रख विशेषता सम्पन्न बनो।
स्लोगन:- अपने मस्तक की मणी द्वारा स्वयं का स्वरूप और श्रेष्ठ मंजिल का साक्षात्कार कराना ही लाइट हाउस बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - अपना स्वभाव बहुत ही मीठा और शान्त बनाओ, बोल चाल ऐसा हो जो सब कहें यह तो जैसे देवता है''
प्रश्न:- तुम बच्चों को कौन सा सर्टीफिकेट संगम पर बाप से लेना है?
उत्तर:- अपने दैवी मैनर्स का सर्टीफिकेट। बाप जो श्रृंगार कर रहे हैं, बच्चों की इतनी सेवा कर रहे हैं तो जरूर उसका रिटर्न देना है। बाप का मददगार बनना है। मददगार बच्चे वह जिनका स्वभाव देवताई हो। ईश्वरीय सर्विस में कभी थके नहीं। यज्ञ सेवा से स्नेह हो। ऐसे बच्चों को बाप भी इजाफ़ा देते हैं, खातिरी करते हैं। ऐसे सर्विसएबुल स्नेही बच्चों को देख-देख बाप हर्षित होते हैं।
गीत:- तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) अपना बोल-चाल बहुत मीठा रखना है। कोई आसुरी कर्तव्य नहीं करना है। दैवी मैनर्स धारण करने हैं।
2) बाप की सर्विस में बिगर कहे मददगार बनना है। बाप की मेहनत का रिटर्न अवश्य देना है। गफ़लत नहीं करनी है।
वरदान:- अपनी जिम्मेवारियों के सब बोझ बाप को दे सदा निश्चिंत रहने वाले सफलता सम्पन्न सेवाधारी भव
जो बच्चे जितना स्वयं हल्के रहते हैं, उतना सेवा और स्वयं सदा ऊपर चढ़ते रहते अर्थात् उन्नति को पाते रहते इसलिए सब जिम्मेवारियों के बोझ बाप को देकर स्वयं निष्फुरने रहो। किसी भी प्रकार के मैं पन का बोझ न हो। सिर्फ याद के नशे में रहो। बाप के साथ कम्बाइन्ड रहो तो जहाँ बाप है वहाँ सेवा तो स्वत: हुई पड़ी है। करावनहार करा रहा है तो हल्के भी रहेंगे और सफलता सम्पन्न भी बन जायेंगे।
स्लोगन:- बेहद ड्रामा के हर दृश्य को निश्चित जानकर सदा निश्चिंत रहो।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-हरेक के सिर पर अनेक जन्मों के विकर्मों का बोझ है, हिसाब-किताब की भोगना है, जिसे योगबल से ही चुक्तू करना है''
प्रश्न:- बाप समान किस बात में साक्षी बनना है?
उत्तर:- जैसे बाप को किसी भी बात का अफ़सोस नहीं होता। भल कोई बच्चा बीमार भी पड़ता, कुछ भी होता, बाप साक्षी होकर देखते हैं। ऐसे तुम बच्चे भी साक्षी बनो। इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा दो। हरेक का कर्मभोग अपना-अपना है। आत्मा ने जो उल्टे कर्म किये हैं, उसकी भोगना उसे भोगनी ही है इसलिए साक्षी होकर देखते रहो।
गीत:- यह वक्त जा रहा है....
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) सिर से अनेक जन्मों के विकर्मों का बोझ उतारने के लिए सर्वशक्तिमान बाप की याद में रह बल लेना है।
2) सर्व को सुख दे आशीर्वाद लेनी है। श्री श्री की श्रेष्ठ मत पर चल पूरा सन्यास करना है। इस कयामत के समय में सबसे बुद्धि योग तोड़ देना है।
वरदान:- सेवा द्वारा प्राप्त मान, मर्तबे का त्याग कर अविनाशी भाग्य बनाने वाले महात्यागी भव
आप बच्चे जो श्रेष्ठ कर्म करते हो-इस श्रेष्ठ कर्म अथवा सेवा का प्रत्यक्षफल है-सर्व द्वारा महिमा होना। सेवाधारी को श्रेष्ठ गायन की सीट मिलती है। मान, मर्तबे की सीट मिलती है, यह सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। लेकिन यह सिद्धियां रास्ते की चट्टियाँ हैं, यह कोई फाइनल मंजिल नहीं है इसलिए इसके त्यागवान, भाग्यवान बनो, इसको ही कहा जाता है महात्यागी बनना। गुप्त महादानी की विशेषता ही है त्याग के भी त्यागी।
स्लोगन:- फरिश्ता बनना है तो साक्षी हो हर आत्मा का पार्ट देखो और सकाश दो।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-बाप तुम्हें यह पढ़ाई जो पढ़ा रहे हैं, यही उनकी कृपा है, तुम तकदीर जगाकर आये हो भविष्य नई दुनिया में देवी-देवता बनने''
प्रश्न:- बच्चों ने बाप के सम्मुख कौन-सी प्रतिज्ञा की है?
उत्तर:- तुमने प्रतिज्ञा की है-बाबा आप आये हो भारत को स्वर्ग बनाने, हम आपकी श्रीमत पर चल भारत को स्वर्ग बनाने में आपके मददगार बनेंगे। पवित्र बन भारत को पवित्र बनायेंगे।
गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) अपने तन-मन-धन से रूहानी सोशल सेवा करनी है। रावण पर जीत पाकर भारत को स्वर्ग बनाना है।
2) अपार सुख पाने के लिए पवित्रता की प्रतिज्ञा कर और सब संग तोड़ एक बाप की याद में रहना है।
वरदान:- अनासक्त बन लौकिक को सन्तुष्ट करते भी ईश्वरीय कमाई जमा करने वाले राज़युक्त भव
कई बच्चे लौकिक कार्य, लौकिक प्रवृत्ति, लौकिक सम्बन्ध-सम्पर्क निभाते हुए अपनी विशाल बुद्धि से सबको सन्तुष्ट भी करते और ईश्वरीय कमाई का राज़ जानते हुए विशेष हिस्सा भी निकाल लेते। ऐसे एकनामी और एकानामी वाले अनासक्त बच्चे हैं जो सर्व खजानें, समय, शक्तियां और स्थूल धन को लौकिक से एकानामी कर अलौकिक कार्य में फ्राकदिली से लगाते हैं। ऐसे युक्तियुक्त, राज़युक्त बच्चे ही महिमा योग्य हैं।
स्लोगन:- स्मृति स्वरूप बनकर हर कर्म करने वाले ही प्रकाश स्तम्भ (लाइट हाउस) बनते हैं।
14-04-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज:22-01-76 मधुबन
वर्तमान लास्ट समय का फास्ट पुरुषार्थ
वरदान:- ब्राह्मण जीवन में खुशी के वरदान को सदा कायम रखने वाले महान आत्मा भव
ब्राह्मण जीवन में खुशी ही जन्म सिद्ध अधिकार है, सदा खुश रहना ही महानता है। जो इस खुशी के वरदान को कायम रखते हैं वही महान हैं। तो खुशी को कभी खोना नहीं। समस्या तो आयेगी और जायेगी लेकिन खुशी नहीं जाये क्योंकि समस्या, पर-स्थिति है, दूसरे के तरफ से आई है, वह तो आयेगी, जायेगी। खुशी अपनी चीज़ है, अपनी चीज़ को सदा साथ रखते हैं इसलिए चाहे शरीर भी चला जाए लेकिन खुशी नहीं जाए। खुशी से शरीर भी जायेगा तो बढ़िया और नया मिलेगा।
स्लोगन:- बापदादा के दिल की मुबारक लेनी है तो अनेक बातों को न देख अथक सेवा पर उपस्थित रहो।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-देह सहित देह के सब सम्बन्धों के ट्रस्टी बनो, सबकी सम्भाल करते हुए किसी में भी ममत्व नहीं रखो''
प्रश्न:- इस ड्रामा में माया कौन सी भूलें जब करा देती है तब बाप अभुल बनाने आते हैं?
उत्तर:- पहली भूल यह की जो ब्रह्म तत्व को ही परमात्मा समझ लिया। तत्व से योग लगाना यह तो मिथ्या है, इससे विकर्म विनाश हो नहीं सकते। 2- हिन्दुस्तान में रहने के कारण देवी-देवता धर्म के बदले अपना हिन्दू धर्म कह देना यह भी बड़ी भूल है। इस भूल के कारण धर्म की ताकत नहीं रही है। अब बाप आये हैं तुम्हें अभुल बनाने।
गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एम आब्जेक्ट को बुद्धि में रख पवित्र बनने के लिए पूरा नष्टोमोहा बनना है। पुराने शरीरों से ममत्व निकाल देना है।
2) उठते-बैठते बाप की याद में रहना है। किसी भी बात का अफ़सोस नहीं करना है। कभी भी बाप की निंदा कराने वाला कोई कर्म नहीं करना है।
वरदान:- साइलेन्स की शक्ति द्वारा जमा के खाते को बढ़ाने वाले श्रेष्ठ पद के अधिकारी भव
जैसे वर्तमान समय साइन्स की शक्ति का बहुत प्रभाव है, अल्पकाल के लिए प्राप्ति करा रही है। ऐसे साइलेन्स की शक्ति द्वारा जमा का खाता बढ़ाओ। बाप की दिव्य दृष्टि से स्वयं में शक्ति जमा करो तब जमा किया हुआ समय पर दूसरों को दे सकेंगे। जो दृष्टि के महत्व को जानकर साइलेन्स की शक्ति जमा कर लेते हैं वही श्रेष्ठ पद के अधिकारी बनते हैं। उनके चेहरे से खुशी की रूहानी झलक दिखाई देती है।
स्लोगन:- अपने आप नेचुरल अटेन्शन हो तो किसी भी प्रकार का टेन्शन आ नहीं सकता।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-बाप आये हैं तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र देने, जिससे तुम सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जान बुद्धिवान बने हो''
प्रश्न:- आत्मा और शरीर दोनों को पवित्र बनाने तथा राजाई पद का अधिकार लेने की सहज विधि क्या है?
उत्तर:- तुम्हारे पास देह सहित जो भी पुराना कखपन है उसे एक्सचेन्ज करो। बाप के हवाले कर दो। पूरा बलि चढ़ो, बाप को ट्रस्टी बनाओ। श्रीमत पर चलते रहो तो आत्मा और शरीर दोनों पवित्र बन जायेंगे। राजाई पद प्राप्त हो जायेगा। जनक भी बलि चढ़ा तो उनको जीवनमुक्ति मिली, तुम बच्चे भी बाप को वारिस बनाओ तो 21 जन्मों का अधिकार मिल जायेगा।
गीत:- नयनहीन को राह दिखाओ प्रभु...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) मात-पिता के गद्दी नशीन बनने के लिए पवित्रता की धारणा करनी है। दोनों तरफ़ निभाते हुए पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है।
2) कोई भी विकर्म नहीं करना है। बहुत खबरदार हो श्रीमत पर चलते रहना है। ट्रस्टी जरूर बनना है।
वरदान:- दृष्टि द्वारा शक्ति लेने और शक्ति देने वाले महादानी, वरदानी मूर्त भव
आगे चलकर जब वाणी द्वारा सेवा करने का समय वा सरकमस्टांश नहीं होगा तब वरदानी, महादानी दृष्टि द्वारा ही शान्ति की शक्ति, प्रेम, सुख वा आनंद की शक्ति का अनुभव करा सकेंगे। जैसे जड़ मूर्तियों के सामने जाते हैं तो फेस (चेहरे) द्वारा वायब्रेशन मिलते हैं, नयनों से दिव्यता की अनुभूति होती है। तो आपने जब चैतन्य में यह सेवा की है तब जड़ मूर्तियां बनी हैं इसलिए दृष्टि द्वारा शक्ति लेने और देने का अभ्यास करो तब महादानी, वरदानी मूर्त बनेंगे।
स्लोगन:- फीचर्स में सुख-शान्ति और खुशी की झलक हो तो अनेक आत्माओं का फ्यूचर श्रेष्ठ बना सकते हो।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - ऐसी कोई गफ़लत मत करो जिससे माया को थप्पड़ लगाने का चान्स मिले, अगर श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो माया थप्पड़ मार मुँह फेर देगी।
प्रश्न:- सूर्यवंशी राजधानी में एयरकंडीशन टिकेट लेने का आधार क्या है, वह किन्हें प्राप्त होती है?
उत्तर:- सूर्यवंशी राजधानी में एयरकन्डीशन टिकेट लेने के लिए हर कदम श्रीमत पर चलना पड़े। अपना सब कुछ बाप पर अर्पण करना पड़े। जो पूरे अर्पण होते हैं वही साहूकार बनते हैं। सूर्यवंशी राजधानी है ही एयरकन्डीशन। तुम्हारी एम आबजेक्ट ही है सूर्यवंशी पद प्राप्त करना। बाकी नम्बरवार पद तो हैं ही।
गीत:- वह बड़ा खुशनसीब है.....
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) हर एक इस ड्रामा के वश है, इस ड्रामा की किसी भी सीन को देखते संशय नहीं उठाना है। ड्रामा के हर राज़ को अच्छी रीति समझकर अडोल रहना है।
2) अपने को अविनाशी आत्मा समझ इस शरीर से डिटैच हो अशरीरी बनने का अभ्यास करना है।
वरदान:- सर्व खजानों की सम्पन्नता द्वारा सम्पूर्णता का अनुभव करने वाले प्राप्ति स्वरूप भव
जैसे चन्द्रमा जब सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता उसके सम्पूर्णता की निशानी होती है, इससे और आगे नहीं बढ़ेगा, बस इतनी ही सम्पूर्णता है, जरा भी किनारी कम नहीं होती है। ऐसे आप बच्चे जब ज्ञान, योग, धारणा और सेवा अर्थात् सभी खजानों से सम्पन्न होते हो, तो इस सम्पन्नता को ही सम्पूर्णता कहा जाता है। ऐसी सम्पन्न आत्मायें प्राप्ति स्वरूप होने के कारण स्थिति में भी सदा समीप रहती हैं।
स्लोगन:- दिव्य बुद्धि द्वारा सर्व सिद्धियों को प्राप्त करना ही सिद्धि स्वरूप बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे - औरों को समझाने की सर्विस करते रहो, ज्ञान धन का दान करो तो अपार खुशी रहेगी, सर्व की आशीर्वाद मिलेगी, बाप की याद भूलेगी नहीं।''
प्रश्न:- बाप तुम बच्चों को रूहानी ड्रिल क्यों सिखलाते हैं?
उत्तर:- पहलवान बनाने के लिए। जितना तुम बाप की याद में रहते हो, पढ़ाई पर ध्यान देते हो उतना तुम्हारे में ताकत आती जाती है। इसी बल से तुम माया पर विजय प्राप्त कर लेते हो। तुम कोई स्थूल हथियार आदि नहीं चलाते, स्वदर्शन चक्र से माया का गला काटते हो-यह है अहिंसक युद्ध।
गीत:- बचपन के दिन भुला न देना...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) जीवन की लम्बी मुसाफिरी में थकना नहीं है। मात-पिता से कभी भी मुँह नहीं मोड़ना है। और संग तोड़ एक बाप पर पूरा बलिहार जाना है।
2) स्वीट होम में जाने के पहले विकर्माजीत जरूर बनना है। श्रीमत पर बुद्धि की यात्रा करते रहना है।
वरदान:- सरल संस्कारों द्वारा अच्छे, बुरे की आकर्षण से परे रहने वाले सदा हर्षितमूर्त भव
अपने संस्कारों को ऐसा इज़ी (सरल) बनाओ तो हर कार्य करते भी इज़ी रहेंगे। यदि संस्कार टाइट हैं तो सरकमस्टांश भी टाइट हो जाते हैं, सम्बन्ध सम्पर्क वाले भी टाइट व्यवहार करते हैं। टाइट अर्थात् खींचातान में रहने वाले इसलिए सरल संस्कारों द्वारा ड्रामा के हर दृश्य को देखते हुए अच्छे और बुरे की आकर्षण से परे रहो, न अच्छाई आकर्षित करे और न बुराई - तब हर्षित रह सकेंगे।
स्लोगन:- जो सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न है वही इच्छा मात्रम् अविद्या है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-अपनी दिल से पूछो हम ज्ञान की खुशबू फैलाने वाले खुशबूदार फूल बने हैं, सदा अच्छी खुशबू फैलाते रहो''
प्रश्न:- किन बच्चों की अवस्था बहुत मस्त रहती है? गैलप करने का आधार क्या है?
उत्तर:- जो अच्छे-अच्छे फूल हैं, जिनकी बुद्धि में ज्ञान का मंथन चलता रहता है उनकी अवस्था बहुत मस्त रहती है। ज्ञान और योग की शिक्षा दे खुशबू फैलाने वाले बच्चे बहुत प्रफुल्लित रहते हैं। गैलप करने का आधार है सच्चे परवाने बनना। माया के तूफानों से सदा बचकर रहना। श्रीमत पर चलते रहना है।
गीत:- महफिल में जल उठी शमा....
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है, हम आत्मा, आत्मा (भाई) से बात करता हूँ, आत्मा बोलती है, आत्मा इन आरगन्स से सुनती है... यह अभ्यास करना है।
2) ऊंच गति के लिए पावन निर्विकारी बनना है। जीते जी मरकर पूरा परवाना बनना है।
वरदान:- अपने हर कर्म द्वारा दिव्यता की अनुभूति कराने वाले दिव्य जीवनधारी भव
बापदादा ने हर एक बच्चे को दिव्य जीवन अर्थात् दिव्य संकल्प, दिव्य बोल, दिव्य कर्म करने वाली दिव्य मूर्तियां बनाया है। दिव्यता संगमयुगी ब्राह्मणों का श्रेष्ठ श्रृंगार है। दिव्य-जीवनधारी आत्मा किसी भी आत्मा को अपने हर कर्म द्वारा साधारणता से परे दिव्यता की अनुभूतियां करायेगी। दिव्य जन्मधारी ब्राह्मण तन से साधारण कर्म और मन से साधारण संकल्प कर नहीं सकते। वे धन को भी साधारण रीति से कार्य में नहीं लगा सकते।
स्लोगन:- दिल से सदा यही गाते रहो कि पाना था सो पा लिया...तो चेहरा खुशनुम: रहेगा।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-तुम्हें डबल अहिंसक बनना है, मन्सा-वाचा-कर्मणा तुम कभी किसी को दु:ख नहीं दे सकते हो।''
प्रश्न:- कल्प-कल्प जिन बच्चों ने बाप से पूरा वर्सा लिया है, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:- वे पतितों का संग छोड़ बाप से वर्सा लेने के लिए श्रीमत पर चलने लग पड़ेंगे। बाप का जो पहला फरमान है कि गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनो, इस फरमान पर पूरा-पूरा चलेंगे। कभी प्रश्न नहीं उठेगा कि आखिर भी दुनिया कैसे चलेगी। उनकी आपस में कभी क्रिमिनल एसाल्ट हो नहीं सकती। वे अपने को शिवबाबा के पोत्रे, ब्रह्मा के बच्चे भाई-बहिन समझकर चलते हैं।
गीत:- माता ओ माता...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) डबल अहिंसक बन मन वचन कर्म से किसी को भी दु:ख नहीं देना है। पवित्रता की सच्ची राखी बाँधनी है।
2) पतितों का संग छोड़ एक बाप के फरमान पर ही चलना है। स्वर्ग का मालिक बनने के लिए भूतों पर विजय प्राप्त करनी है।
वरदान:- न्यारेपन के अभ्यास द्वारा पास विद आनर होने वाले ब्रह्मा बाप समान भव
जैसे ब्रह्मा बाप ने साकार जीवन में कर्मातीत होने के पहले न्यारे और प्यारे रहने के अभ्यास का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। सेवा वा कोई कर्म छोड़ा नहीं लेकिन न्यारे होकर सेवा की। यह न्यारा पन हर कर्म में सफलता सहज अनुभव कराता है। तो सेवा का विस्तार भल कितना भी बढ़ाओ लेकिन विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो तब ही डबल लाइट बन कर्मातीत स्थिति को प्राप्त कर डबल ताजधारी, ब्रह्मा बाप समान पास विद आनर बनेंगे।
स्लोगन:- स्वयं को ऐसा शक्ति स्तम्भ बनाओ जो अनेको को नई जीवन बनाने की शक्ति प्राप्त हो।
07-04-13 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त बापदादा'' रिवाइज: 22-03-96 मधुबन
''ब्राह्मण जीवन की पर्सनैलिटी - सब प्रश्नों से पार सदा प्रसन्नचित्त रहना''
वरदान:- सम्बन्ध में सन्तुष्टता रूपी स्वच्छता को धारण कर सदा हल्के और खुश रहने वाले सच्चे पुरुषार्थी भव
सारे दिन में वैरायटी आत्माओं से सम्बन्ध होता है। उसमें चेक करो कि सारे दिन में स्वयं की सन्तुष्टता और सम्बन्ध में आने वाली दूसरी आत्माओं की सन्तुष्टता की परसेन्टेज कितनी रही? सन्तुष्टता की निशानी स्वयं भी मन से हल्के और खुश रहेंगे और दूसरे भी खुश रहेंगे। सम्बन्ध की स्वच्छता अर्थात् सन्तुष्टता यही सम्बन्ध की सच्चाई और सफाई है, इसलिए कहते हैं सच तो बिठो नच। सच्चा पुरुषार्थी खुशी में सदा नाचता रहेगा।
स्लोगन:- जिन्हें किसी भी बात का गम नहीं, वही बेगमपुर के बेफिक्र बादशाह हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-किसी भी कारण से कुल कलंकित नहीं बनना है, धरत परिये धर्म न छोड़िये, बाप से किया हुआ वचन सदा याद रहे''
प्रश्न:- बच्चों को कौन-सी खबरदारी हर क़दम पर रखना बहुत जरूरी है?
उत्तर:- ईश्वर के सामने जो वचन लिया है, वायदा व प्रतिज्ञा की है वह किसी भी हालत में निभाना है। यह खबरदारी रखना बहुत जरूरी है। कभी भी बाप का बनने के बाद कीचक बन उल्टे कर्म नहीं करना। अगर उल्टा कर्म किया तो धर्मराज पूरा-पूरा हिसाब लेंगे। मनमत वा परमत पर नहीं चलना, हर कदम पर श्रीमत याद रहे।
गीत:- तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) बाप से जो प्रतिज्ञा की है उस पर कायम रहना है। कभी भी जबान दे बदलना नहीं है। बहुत-बहुत खबरदार रहना है।
2) अपना और दूसरों का ज्ञान श्रृंगार करना है। कभी भी देह-अभिमानी बन साकार शरीर में न फँसना है, न किसी को फँसाना है।
वरदान:- रूहानी आकर्षण द्वारा सेवा और सेवाकेन्द्र को चढ़ती कला में ले जाने वाले योगी तू आत्मा भव
जो योगी तू आत्मायें रूहानियत में रहती हैं, उनकी रूहानी आकर्षण सेवा और सेवाकेन्द्र को स्वत: चढ़ती कला में ले जाती है। योगयुक्त हो रूहानियत से आत्माओं का आह्वान करने से जिज्ञासु स्वत: बढ़ते हैं। इसके लिए मन सदा हल्का रखो, किसी भी प्रकार का बोझ नहीं रहे। दिल साफ मुराद हांसिल करते रहो, तो प्राप्तियां आपके सामने स्वत: आयेंगी। अधिकार ही आप लोगों का है।
स्लोगन:- परमात्म ज्ञानी वह है जो सर्व बन्धनों एवं आकर्षणों से मुक्त है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-जैसे बाप गुप्त है ऐसे बाप का ज्ञान भी गुप्त है, तुम्हें दान वा सेवा भी गुप्त करना है, अहंकार आने से ताकत कम हो जाती है।''
प्रश्न:- ड्रामा की किस सीन को देखते हुए तुम्हें दु:ख नहीं हो सकता है-क्यों?
उत्तर:- ड्रामा में जो महाभारी महाभारत की सीन है इसे देख तुम्हें दु:ख नहीं हो सकता। तुम जानते हो यह बाम्ब्स आदि बनने ही हैं। नैचुरल कैलेमिटीज़ भी आनी ही है। यह ड्रामा बना हुआ है। सब आत्मायें पुराने शरीर छोड़ शान्तिधाम जायें-यह तो अच्छा है ना। इसमें दु:ख की बात ही नहीं। जब विनाश हो तब तो मुक्ति-जीवनमुक्ति का गेट खुले, दु:खधाम बदल सुखधाम बने इसलिए तुम इससे डरते नहीं हो।
गीत:- तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) बेहद ड्रामा के हर राज़ को बुद्धि में स्पष्ट रखना है। अपना रजिस्टर खराब होने नहीं देना है।
2) हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं, हमारा यह जीवन हीरे तुल्य है, अतीन्द्रिय सुख का गायन हमारा है-इस स्मृति में रहना है। कभी भी अहंकार में नहीं आना है।
वरदान:- आने और जाने के अभ्यास द्वारा बन्धनमुक्त बनने वाले न्यारे, निर्लिपत भव
सारे पढ़ाई अथवा ज्ञान का सार है - आना और जाना। बुद्धि में घर जाने और राज्य में आने की खुशी है। लेकिन खुशी से वही जायेगा जिसका सदा आने और जाने का अभ्यास होगा। जब चाहो तब अशरीरी स्थिति में स्थित हो जाओ और जब चाहो तब कर्मातीत बन जाओ - यह अभ्यास बहुत पक्का चाहिए। इसके लिए कोई भी बंधन अपनी तरफ आकर्षित न करे। बंधन ही आत्मा को टाइट कर देता है और टाइट वस्त्र को उतारने में खिंचावट होती है इसलिए सदा न्यारे, निर्लिप्त रहने का पाठ पक्का करो।
स्लोगन:- सुख के खाते से सम्पन्न रहो तो आपके हर कदम से सबको सुख की अनुभूति होती रहेगी।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-अब स्वीट होम चलना है इसलिए पुरानी दुनिया के कर्मों की लेन-देन वा हिसाब-किताब चुक्तू करो, योगबल से विकर्माजीत बनो।''
प्रश्न:- तुम बच्चे लाइट हाउस बनकर बाप से योग क्यों लगाते हो?
उत्तर:- क्योंकि तुम्हें सबको इस नर्क रूपी खारी चैनल से पार ले जाना है। तुम मुक्तिधाम और जीवन मुक्तिधाम में जाने के लिए योग में बैठ हरेक को सर्चलाइट देते हो। तुम रूहानी पण्डे भी हो, तुम्हें सबको स्वीट होम का रास्ता बताना है। सबको ज्ञान और योग के पंख देने हैं।
गीत:- प्रीतम आन मिलो....
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) कुसंग में आकर कभी भी पढ़ाई नहीं छोड़नी है। किसी भी देहधारी से दिल नहीं लगानी है।
2) पापों से मुक्त होने की विधि 'याद' है, इसलिए याद का चार्ट जरूर रखना है। याद में रहने की अपने आप से प्रतिज्ञा करनी है।
वरदान:- तन को आत्मा का मन्दिर समझ उसे स्वच्छ बनाने वाले नम्बरवन श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा भव
हम ब्राह्मण आत्मायें सारे कल्प में नम्बरवन श्रेष्ठ आत्मायें हैं, हीरे तुल्य हैं, इस स्मृति से तन को आत्मा का मन्दिर समझकर स्वच्छ रखना है। जितनी मूर्ति श्रेष्ठ होती है उतना ही मन्दिर भी श्रेष्ठ होता है। तो इस शरीर रूपी मन्दिर के हम ट्रस्टी हैं, यह ट्रस्टीपन आपेही स्वच्छता वा पवित्रता लाता है। इस विधि से तन की पवित्रता सदा रूहानी खुशबू का अनुभव कराती रहेगी।
स्लोगन:- रूहानियत में रहने का व्रत लेना ही ज्ञानी तू आत्मा बनना है।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-आधाकल्प माया ने तुम्हें बहुत हैरान किया है, अब तुम बाप की शरण में आये हो, तुम्हें बाप से सच्ची प्रीत रख माया-जीत, जगत-जीत बनना है।''
प्रश्न:- संगमयुग पर भगवान को भी कौन सी मेहनत करनी पड़ती है?
उत्तर:- आत्मा रूपी मैले कपड़ों को साफ करने की। तुम बच्चे बाप के पास आये हो अपने पापों का खाता साफ करने। जितना देही-अभिमानी बन बाप को याद करेंगे उतना विकर्माजीत बनते जायेंगे। अगर बुद्धि का योग बाप के सिवाए और किसी के संग जोड़ा तो भस्मासुर बन जायेंगे इसलिए श्रीमत पर चलते चलो।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) तन-मन-धन से भारत की सेवा कर इसे स्वर्ग बनाना है। माया दुश्मन से लिबरेट करना है।
2) देही-अभिमानी बनने के लिए देह सहित सब कुछ भूलना है। जो भी पुराने कर्मों का खाता है उसे योगबल से साफ करना है। विकर्माजीत बनना है।
वरदान:- तन मन और दिल की स्वच्छता द्वारा साहेब को राज़ी करने वाले सच्चे होलीहंस भव
स्वच्छता अर्थात् मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध सबमें पवित्रता। पवित्रता की निशानी सफेद रंग दिखाते हैं। आप होलीहंस भी सफेद वस्त्रधारी, साफ दिल अर्थात् स्वच्छता स्वरूप हो। तन, मन और दिल से सदा बेदाग अर्थात् स्वच्छ हो। साफ मन वा साफ दिल पर साहेब राज़ी होता है। उनकी सर्व मुरादें अर्थात् कामनायें पूरी होती हैं। हंस की विशेषता स्वच्छता है इसलिए ब्राह्मण आत्माओं को होलीहंस कहा जाता है।
स्लोगन:- जो इस समय सब कुछ सहन करते हैं वही शहनशाह बनते हैं।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-माया के वश हो ईश्वरीय मत के विरूद्ध कोई कार्य नहीं करना, कभी भी बाप की निंदा नहीं कराना''
प्रश्न:- माया भी बाप की मददगार है-कैसे?
उत्तर:- जब देखती है कोई श्रीमत की अवज्ञा करते हैं, बाप का कहना नहीं मानते हैं, श्रीमत पर नहीं चलते हैं तो वह कच्चा खा लेती है, थप्पड़ मार देती है। सयाना वह जो बाप की याद से माया को परख उसके वशीभूत न हो।
गीत:- मुझको सहारा देने वाले...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप का आज्ञाकारी, वफ़ादार बनकर आशीर्वाद लेने के पात्र बनना है। कोई भी अवज्ञा नहीं करनी है।
2) कभी कोई उल्टी चलन चलकर अपनी तकदीर को लकीर नहीं लगानी है। भस्मासुर नहीं बनना है। धर्मराज की सजाओं का डर रखना है।
वरदान:- शुद्ध मन और दिव्य बुद्धि के विमान द्वारा सेकण्ड में स्वीट होम की यात्रा करने वाले मा. सर्वशक्तिवान भव
साइन्स वाले फास्ट गति के यन्त्र निकालने का प्रयत्न करते हैं, उसके लिए कितना खर्चा करते हैं, कितना समय और एनर्जी लगाते हैं, लेकिन आपके पास इतनी तीव्रगति का यन्त्र है जो बिना खर्च के सोचा और पहुंचा, आपको शुभ संकल्प का यन्त्र मिला है, दिव्य बुद्धि मिली है। इस शुद्ध मन और दिव्य बुद्धि के विमान द्वारा जब चाहे तब चले जाओ और जब चाहे तब लौट आओ। मास्टर सर्वशक्तिवान को कोई रोक नहीं सकता।
स्लोगन:- दिल सदा सच्ची हो तो दिलाराम बाप की आशीर्वाद मिलती रहेगी।
मुरली सार:- ''मीठे बच्चे-जब स्वच्छ पौधों पर 5 विकारों की मैल चढ़ती है तब भ्रष्टाचार बढ़ता है, अब तुम्हें श्रेष्ठाचारी बनना और बनाना है''
प्रश्न:- श्रेष्ठ बनने के लिए श्री श्री शिवबाबा की श्रेष्ठ मत कौन सी मिलती है?
उत्तर:- श्रेष्ठ बनने के लिए बाप की श्रीमत मिलती है-बच्चे, कम से कम 8 घण्टे मेरी सर्विस पर रहो, 8 घण्टा भल उस गवर्मेन्ट की सर्विस करो लेकिन 8 घण्टा मुझे याद करो वा स्वदर्शन चक्र फिराओ। साथ-साथ शंख ध्वनि करो सबको कहो कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहकर बाप से वर्सा लो।
गीत:- किसने यह सब खेल रचाया...
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप की याद और ज्ञान सागर के ज्ञान से सुन्दर ज्ञान परी बनना है। कदम-कदम पर शिवबाबा की मत जरूर लेनी है।
2) श्रेष्ठाचारी बनने के लिए अन्दर से भूतों को निकाल देना है। कोई भी भ्रष्ट बनाने वाला काम नहीं करना है।
वरदान:- भ्रकुटी की कुटिया में बैठ अन्तर्मुखता का रस लेने वाले सच्चे तपस्वीमूर्त भव
जो बच्चे अपने बोल पर कन्ट्रोल कर एनर्जी और समय जमा कर लेते हैं, उन्हें स्वत: अन्तर्मुखता के रस का अनुभव होता है। अन्तर्मुखता का रस और बोलचाल का रस - इसमें रात दिन का अन्तर है। अन्तर्मुखी सदा भ्रकुटी की कुटिया में तपस्वीमूर्त का अनुभव करता है। वो व्यर्थ संकल्पों से मन का मौन और व्यर्थ बोल से मुख का मौन रखता है इसलिए अन्तर्मुखता के रस की अलौकिक अनुभूति होती है।
स्लोगन:- राज़युक्त बन हर परिस्थिति में राज़ी रहने वाले ही ज्ञानी तू आत्मा हैं।