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नया मलयालम टीवी चैनल

कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी ज़रूरत की हर चीज़ वितरित करता है। भारतीय दर्शन विज्ञान और अध्यात्म का सामंजस्य है। यह चैनल ब्रह्म कुमारियों की मानवता की समग्र दृष्टि का प्रमाण है। मंत्री ने अपने…

आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर   ग्वालियर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज़ ईश्वरीय विश्व विद्यालय की सहयोगी संस्था राजयोग एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के मेडिकल विंग के स्थानीय सेवाकेंद्र “प्रभु उपहार भवन, माधवगंज लश्कर ग्वालियर” द्वारा निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर का आयोजन किया गया।शिविर में परामर्श देनें के लिए डॉ. निर्मला कंचन (स्त्री रोग विशेषज्ञ), एवं…

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  • सेवा समाचार - मॉरीशस में जीएचआरसी, माउंट आबू के डॉ। प्रताप मिधा का दौरा - 
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  • भारत के भाई बीके चार्ली की सेवा रिपोर्ट (ऑस्ट्रेलिया) की यात्रा
  • बैंगलोर - ब्रह्मा कुमारियों ने पृथ्वी माता महोत्सव में "प्रकृति मित्र पुरस्कार" से सम्मानित किया

 

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नया मलयालम टीवी चैनल

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कोच्चि: केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री, माननीय। मुरलीधरन ने ब्रह्म कुमारियों का नया मलयालम चैनल लॉन्च किया - मलयाली को समर्पित राजयोग टीवी मलयालम। यह एक पूर्ण चैनल है जो हमारी…Read more...
आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन. केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र. संस्था के 80 वर्ष कार्यक्रम में वक्तव्य.Read more...

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निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

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आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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त्रिनिदाद) युवा शिविर का सफल आयोजन. टोका त्रिनिदाद मेंे हासन्ना बीच रिसोर्ट पर युवा शिविर का आयोजन किया गया. Read more...

 

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18-01-2020        प्रात:मुरली        ओम् शान्ति       "बापदादा"      मधुबन


“मीठे बच्चे तुम्हारी चलन बहुत रॉयल होनी चाहिए, तुम देवता बन रहे हो तो लक्ष्य और लक्षण, कथनी और करनी समान बनाओ''

गीत:- 
तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है.... 

ओम् शान्ति। 
मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। अभी तो थोड़े बच्चे हैं फिर अनेकानेक बच्चे हो जायेंगे। प्रजापिता ब्रह्मा को जानना तो सभी को है ना। सभी धर्म वाले मानेंगे। बाबा ने समझाया है वह लौकिक बाप भी हद के ब्रह्मा हैं। उन्हों का सरनेम से सिजरा बनता है। यह फिर है बेहद का। नाम ही है प्रजापिता ब्रह्मा। वह हद के ब्रह्मा प्रजा रचते हैं, लिमिटेड। कोई दो चार रचेंगे, कोई नहीं भी रचते। इनके लिए तो यह कह नहीं सकेंगे कि सन्तान नहीं हैं। इनकी सन्तान तो सारी दुनिया है। बेहद के बापदादा दोनों का मीठे-मीठे बच्चों में बहुत रूहानी लव है। बच्चों को कितना लव से पढ़ाते हैं और क्या से क्या बनाते हैं! तो बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। खुशी का पारा तब चढ़ेगा जब बाप को निरन्तर याद करते रहेंगे। बाप कल्प-कल्प बहुत प्यार से बच्चों को पावन बनाने की सेवा करते हैं। 5 तत्वों सहित सबको पावन बनाते हैं। कौड़ी से हीरे जैसा बनाते हैं। कितनी बड़ी बेहद की सेवा है। बाप बच्चों को बहुत प्यार से शिक्षा भी देते रहते हैं क्योंकि बच्चों को सुधारना बाप वा टीचर का ही काम है। बाप की श्रीमत से ही तुम श्रेष्ठ बनते हो। यह भी बच्चों को चार्ट में देखना चाहिए कि हम श्रीमत पर चलते हैं वा अपनी मनमत पर? श्रीमत से ही तुम एक्यूरेट बनेंगे। जितनी बाप से प्रीत बुद्धि होगी उतनी गुप्त खुशी से भरपूर रहेंगे। अपनी दिल से पूछना है हमको इतनी कापारी खुशी है? अव्यभिचारी याद है? कोई तमन्ना तो नहीं है? एक बाप की याद है? स्वदर्शन चक्र फिरता रहे तब प्राण तन से निकलें। एक शिवबाबा दूसरा न कोई। यही अन्तिम मंत्र है।

बाप रूहानी बच्चों से पूछते हैं मीठे बच्चे, जब बापदादा को सामने देखते हो तो बुद्धि में आता है कि हमारा बाबा, बाप भी है, शिक्षक भी है, सतगुरू भी है। बाप हमको इस पुरानी दुनिया से ले जाते हैं नई दुनिया में। यह पुरानी दुनिया तो अब खलास हुई कि हुई। यह तो अब कोई काम की नहीं है। बाप कल्प-कल्प नई दुनिया बनाते हैं। हम कल्प-कल्प नर से नारायण बनते हैं। बच्चों को यह सिमरण कर कितना हुल्लास में रहना चाहिए। बच्चे, टाइम बहुत थोड़ा है। आज क्या है कल क्या होगा। आज और कल का खेल है इसलिए बच्चों को ग़फलत नहीं करनी है। तुम बच्चों की चलन बड़ी रॉयल होनी चाहिए। अपने आपको देखना है देवताओं मिसल हमारी चलन है? देवताई दिमाग रहता है? जो लक्ष्य है वह बन भी रहे हैं या सिर्फ कथनी ही है? जो नॉलेज मिली है उसमें मस्त रहना चाहिए। जितना अन्तर्मुख हो इन बातों पर विचार करते रहेंगे तो बहुत खुशी रहेगी। यह भी तुम बच्चे जानते हो कि इस दुनिया से उस दुनिया में जाने का बाकी थोड़ा समय है। जब उस दुनिया को छोड़ दिया फिर पिछाड़ी में क्यों देखें! बुद्धियोग उस तरफ क्यों जाता? यह भी बुद्धि से काम लेना है। जब पार निकल गये फिर बुद्धि क्यों जाती? बीती हुई बातों का चिन्तन मत करो। इस पुरानी दुनिया की कोई भी आश न रहे। अब तो एक ही श्रेष्ठ आश रखनी है - हम तो चले सुखधाम। कहाँ भी ठहरना नहीं है। देखना नहीं है। आगे बढ़ते जाना है। एक तरफ ही देखते रहो तब ही अचल-अडोल स्थिर अवस्था रहेगी। समय बहुत नाज़ुक होता जाता है, इस पुरानी दुनिया की हालतें बिगड़ती ही जाती हैं। तुम्हारा इससे कोई कनेक्शन नहीं। तुम्हारा कनेक्शन है नई दुनिया से, जो अब स्थापन हो रही है। बाप ने समझाया है, अभी 84 का चक्र पूरा हुआ। अब यह दुनिया खत्म होनी ही है, इसकी बहुत सीरियस हालत है। इस समय सबसे अधिक गुस्सा प्रकृति को आता है इसलिए सब खलास कर देती है। अभी तुम जानते हो यह प्रकृति अपना गुस्सा जोर से दिखायेगी - सारी पुरानी दुनिया को डुबो देगी। फ्लड्स होंगे। आग लगेगी। मनुष्य भूखों मरेंगे। अर्थक्वेक में मकान आदि सब गिर पड़ेंगे। यह सब हालतें सारी दुनिया के लिए आनी हैं। अनेक प्रकार से मौत होगी। गैस के ऐसे-ऐसे बाम्ब्स छोड़ेंगे - जिसकी बाँस (बदबू) से ही मनुष्य मर जाएं। यह सब ड्रामा प्लैन बना हुआ है। इसमें दोष किसी का भी नहीं है। विनाश तो होने का ही है इसलिए तुम्हें इस पुरानी दुनिया से बुद्धि का योग हटा देना है। अब तुम कहेंगे वाह सतगुरू... जिसने हमको यह रास्ता बताया है। हमारा सच्चा-सच्चा गुरू बाबा एक ही है। जिसका नाम भक्ति में भी चला आता है। जिसकी ही वाह-वाह गाई जाती है। तुम बच्चे कहेंगे - वाह सतगुरू वाह! वाह तकदीर वाह! वाह ड्रामा वाह! बाप के ज्ञान से हमको सद्गति मिल रही है।

तुम बच्चे निमित्त बने हो विश्व में शान्ति स्थापन करने के। तो सबको यह खुशखबरी सुनाओ कि अब नया भारत, नई दुनिया जिसमें लक्ष्मी-नारायण का राज्य था वह फिर से स्थापन हो रहा है। यह दु:खधाम बदल सुखधाम बनना है। अन्दर में खुशी रहनी चाहिए कि हम सुखधाम के मालिक बन रहे हैं। वहाँ ऐसे कोई नहीं पूछेगा कि तुम राज़ी-खुशी हो? तबियत ठीक है? यह इस दुनिया में पूछा जाता है क्योंकि यह है ही दु:ख की दुनिया। तुम बच्चों से भी यह कोई पूछ नहीं सकता। तुम कहेंगे हम ईश्वर के बच्चे, तुम हमसे क्या खुश खैराफत पूछते हो! हम तो सदैव राज़ी खुशी हैं। स्वर्ग से भी यहाँ जास्ती खुशी है क्योंकि स्वर्ग स्थापन करने वाला बाप मिला तो सब कुछ मिला। परवाह थी पार ब्रह्म में रहने वाले बाप की वह मिल गया, बाकी किसकी परवाह! यह सदैव नशा रहना चाहिए। बहुत रॉयल, मीठा बनना है। अपनी तकदीर को ऊंच बनाने का अभी ही समय है। पदमापदमपति बनने का मुख्य साधन है - कदम-कदम पर खबरदारी से चलना। अन्तर्मुखी बनना। यह सदैव ध्यान रहे - “जैसा कर्म हम करेंगे हमको देख और करेंगे।'' देह अहंकार आदि विकारों का बीज तो आधाकल्प से बोया हुआ है। सारे दुनिया में यह बीज है। अब उसको मर्ज करना है। देह-अभिमान का बीज नहीं बोना है। अभी देही-अभिमानी का बीज बोना है। तुम्हारी अब है वानप्रस्थ अवस्था। मोस्ट बिलवेड बाप मिला है उनको ही याद करना है। बाप के बदले देह को वा देहधारियों को याद करना - यह भी भूल है। तुम्हें आत्म-अभिमानी बनने की, शीतल बनने की बहुत मेहनत करनी है।

मीठे बच्चे, इस अपनी लाइफ से तुम्हें कभी भी तंग नहीं होना चाहिए। यह जीवन अमूल्य गाई हुई है, इनकी सम्भाल भी करनी है। साथ-साथ कमाई भी करनी है। यहाँ जितने दिन रहेंगे, बाप को याद कर अथाह कमाई जमा करते रहेंगे। हिसाब-किताब चुक्तू होता रहेगा इसलिए कभी भी तंग नहीं होना है। बच्चे कहते हैं बाबा। सतयुग कब आयेगा? बाबा कहते बच्चे पहले तुम कर्मातीत अवस्था तो बनाओ। जितना समय मिले पुरुषार्थ करो कर्मातीत बनने का। बच्चों में नष्टोमोहा बनने की भी बड़ी हिम्मत चाहिए। बेहद के बाप से पूरा वर्सा लेना है तो नष्टोमोहा बनना पड़े। अपनी अवस्था को बहुत ऊंच बनाना है। बाप के बने हो तो बाप की ही अलौकिक सेवा में लग जाना है। स्वभाव बहुत मीठा चाहिए। मनुष्य को स्वभाव ही बहुत तंग करता है। ज्ञान का जो तीसरा नेत्र मिला है, उससे अपनी जांच करते रहो। जो भी डिफेक्ट हो उनको निकाल प्युअर डाइमन्ड बनना है। थोड़ा भी डिफेक्ट होगा तो वैल्यु कम हो जायेगी इसलिए मेहनत कर अपने को वैल्युबुल हीरा बनाना है।

तुम बच्चों से बाप अब नई दुनिया के सम्बन्ध का पुरुषार्थ कराते हैं। मीठे बच्चे, अब बेहद के बाप और बेहद सुख के वर्से से सम्बन्ध रखो। एक ही बेहद का बाप है जो बन्धन से छुड़ाकर तुम्हें अलौकिक सम्बन्ध में ले जाते हैं। सदैव यह स्मृति रहे कि हम ईश्वरीय सम्बन्ध के हैं। यह ईश्वरीय सम्बन्ध ही सदा सुखदाई है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे, अति स्नेही बच्चों को मात-पिता बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।


वरदान:- 
सेवा करते हुए याद के अनुभवों की रेस करने वाले सदा लवलीन आत्मा भव

याद में रहते हो लेकिन याद द्वारा जो प्राप्तियां होती हैं, उस प्राप्ति की अनुभूति को आगे बढ़ाते जाओ, इसके लिए अभी विशेष समय और अटेन्शन दो जिससे मालूम पड़े कि यह अनुभवों के सागर में खोई हुई लवलीन आत्मा है। जैसे पवित्रता, शान्ति के वातावरण की भासना आती है वैसे श्रेष्ठ योगी, लगन में मगन रहने वाले हैं - यह अनुभव हो। नॉलेज का प्रभाव है लेकिन योग के सिद्धि स्वरूप का प्रभाव हो। सेवा करते हुए याद के अनुभवों में डूबे हुए रहो, याद की यात्रा के अनुभवों की रेस करो।

स्लोगन:- 
सिद्धि को स्वीकार कर लेना अर्थात् भविष्य प्रालब्ध को यहाँ ही समाप्त कर देना।
 


अव्यक्त बापदादा के मधुर महावाक्य (रिवाइज)


सफलता-मूर्त बनने के लिये मुख्य दो ही विशेषतायें चाहिये - एक प्योरिटी, दूसरी यूनिटी। अगर प्योरिटी की कमी है तो यूनिटी में भी कमी है। प्योरिटी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत को नहीं कहा जाता, संकल्प, स्वभाव, संस्कार में भी प्योरिटी। मानों एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या या घृणा का संकल्प है तो प्योरिटी नहीं, इमप्योरिटी कहेंगे। प्योरिटी की परिभाषा में सर्व विकारों का अंश-मात्र तक न होना है। संकल्प में भी किसी प्रकार की इमप्योरिटी न हो। आप बच्चे निमित्त बने हुए हो - बहुत ऊंचे कार्य को सम्पन्न करने के लिये। निमित्त तो महारथी रूप से बने हुए हो ना? अगर लिस्ट निकालते हैं तो लिस्ट में भी तो सर्विसएबुल तथा सर्विस के निमित्त बनें ब्रह्मा वत्स ही महारथी की लिस्ट में गिने जाते हैं। महारथी की विशेषता कहाँ तक आयी है? सो तो हर-एक स्वयं जाने। महारथी जो लिस्ट में गिना जाता है वो आगे चलकर महारथी होगा अथवा वर्तमान की लिस्ट में महारथी है। तो इन दोनों बातों के ऊपर अटेन्शन चाहिए।

यूनिटी अर्थात् संस्कार-स्वभाव के मिलन की यूनिटी। कोई का संस्कार और स्वभाव न भी मिले तो भी कोशिश करके मिलाओ, यह है यूनिटी। सिर्फ संगठन को यूनिटी नहीं कहेंगे। सर्विसएबुल निमित्त बनी आत्मायें इन दो बातों के सिवाय बेहद की सर्विस के निमित्त नहीं बन सकती हैं। हद के हो सकते हैं, बेहद की सर्विस के लिये ये दोनों बातें चाहियें। सुनाया था ना - रास में ताल मिलाने पर ही वाह-वाह होती है। तो यहाँ भी ताल मिलाना अर्थात् रास मिलाना है। इतनी आत्मायें जो नॉलेज वर्णन करती हैं तो सबके मुख से यह निकलता है कि ये एक ही बात कहते हैं, इन सबका एक ही टॉपिक है, एक ही शब्द है, यह सब कहते है ना? इसी प्रकार सबके स्वभाव और संस्कार एक-दो में मिलें तब कहेंगे रास मिलाना। इसका भी प्लैन बनाओ।

कोई भी कमज़ोरी को मिटाने के लिये विशेष महाकाली स्वरूप शक्तियों का संगठन चाहिये जो अपने योग-अग्नि के प्रभाव से कमजोर वातावरण को परिवर्तन करें। अभी तो ड्रामा अनुसार हर-एक चलन रूपी दर्पण में अन्तिम रिजल्ट स्पष्ट होने वाली है। आगे चल कर महारथी बच्चे अपने नॉलेज की शक्ति द्वारा हर-एक के चेहरे से उन्हों की कर्म-कहानी को स्पष्ट देख सकेंगे। जैसे मलेच्छ भोजन की बदबू समझ में आ जाती है, वैसे मलेच्छ संकल्प रूपी आहार स्वीकार करने वाली आत्माओं के वायब्रेशन से बुद्धि में स्पष्ट टचिंग होगी, इसका यंत्र है बुद्धि की लाइन क्लियर। जिसका यह यंत्र पॉवरफुल होगा वह सहज जान सकेंगे।

शक्तियों व देवताओं के जड़ चित्रों में भी यह विशेषता है, जो कोई भी पाप-आत्मा अपना पाप उन्हों के आगे जाकर छिपा नहीं सकती। आप ही यह वर्णन करते रहते हैं कि हम ऐसे हैं। तो जड़ यादगार में भी अब अन्तकाल तक यह विशेषता दिखाई देती है। चैतन्य रूप में शक्तियों की यह विशेषता प्रसिद्ध हुई है तब तो यादगार में भी है। यह है मास्टर जानी जाननहार की स्टेज अर्थात् नॉलेजफुल की स्टेज। यह स्टेज भी प्रैक्टिकल में अनुभव होगी, होती जा रही है और होगी भी। ऐसा संगठन बनाया है? बनना तो है ही। ऐसे शमा-स्वरूप संगठन चाहिए, जिन्हों के हर कदम से बाप की प्रत्यक्षता हो। अच्छा।

 

 

 


     

   बीकेवार्ता वेबपोर्टल : उदघाटन के ऐतिहासिक क्षण प्रकाशन शुभारम्भ दि 28 नवम्बर, 2009


  

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 विश्व पर्यावरण दिवस

संयुक्त राष्ट्र द्वारा सकारात्मक पर्यावरण कार्य हेतु दुनियाभर में मनाया जाने वाला 'विश्व पर्यावरण दिवस' सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण और जीवन का अन्योन्याश्रित संबंध है तथापि हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता पड़ रही है। यह चिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों कोप्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनता को प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 'पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव' विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक क़दम था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।

 


 

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संस्कार धन - बोध कथा  : मन का राजा 

राजा भोज वन में शिकार करने गए लेकिन घूमते हुए अपने सैनिकों से बिछुड़ गए और अकेले पड़ गए। वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर सुस्ताने लगे। तभी उनके सामने से एक लकड़हारा सिर पर बोझा उठाए गुजरा। वह अपनी धुन में मस्त था। उसने राजा भोज को देखा पर प्रणाम करना तो दूर, तुरंत मुंह फेरकर जाने लगा।
भोज को उसके व्यवहार पर आश्चर्य हुआ। उन्होंने लकड़हारे को रोककर पूछा, ‘तुम कौन हो?’ लकड़हारे ने कहा, ‘मैं अपने मन का राजा हूं।’ भोज ने पूछा, ‘अगर तुम राजा हो तो तुम्हारी आमदनी भी बहुत होगी। कितना कमाते हो?’ लकड़हारा बोला, ‘मैं छह स्वर्ण मुद्राएं रोज कमाता हूं और आनंद से रहता हूं।’ भोज ने पूछा, ‘तुम इन मुद्राओं को खर्च कैसे करते हो?’ लकड़हारे ने उत्तर दिया, ‘मैं प्रतिदिन एक मुद्रा अपने ऋणदाता को देता हूं। वह हैं मेरे माता पिता। उन्होंने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया, मेरे लिए हर कष्ट सहा। दूसरी मुद्रा मैं अपने ग्राहक असामी को देता हूं ,वह हैं मेरे बालक। मैं उन्हें यह ऋण इसलिए देता हूं ताकि मेरे बूढ़े हो जाने पर वह मुझे इसे लौटाएं।

तीसरी मुद्रा मैं अपने मंत्री को देता हूं। भला पत्नी से अच्छा मंत्री कौन हो सकता है, जो राजा को उचित सलाह देता है ,सुख दुख का साथी होता है। चौथी मुद्रा मैं खजाने में देता हूं। पांचवीं मुद्रा का उपयोग स्वयं के खाने पीने पर खर्च करता हूं क्योंकि मैं अथक परिश्रम करता हूं। छठी मुद्रा मैं अतिथि सत्कार के लिए सुरक्षित रखता हूं क्योंकि अतिथि कभी भी किसी भी समय आ सकता है। उसका सत्कार करना हमारा परम धर्म है।’ राजा भोज सोचने लगे, ‘मेरे पास तो लाखों मुद्राएं है पर जीवन के आनंद से वंचित हूं।’ लकड़हारा जाने लगा तो बोला, ‘राजन् मैं पहचान गया था कि तुम राजा भोज हो पर मुझे तुमसे क्या सरोकार।’ भोज दंग रह गए।

 


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बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

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8 मई 2012 कोविश्वभरमेंथैलेसीमियादिवसमनायागया

 

 

थैलेसीमिया दिवस: 8 मई


विश्वभर में 8 मई 2012 को थैलेसीमिया दिवस मनाया गया. थैलेसीमिया दिवस का मकसद लोगों को थैलेसीमिया के प्रति जागरूक कराना है. ज्ञातव्य हो कि थैलेसीमिया से ग्रस्त मरीज के खून में लाल रक्त कोशिकाएं नहीं बनतीं. जो बनती भी हैं, वे जल्दी ही खत्म हो जाती हैं. इसके अलावा मरीज का हिमोग्लोबिन स्तर भी कम हो जाता है. यह बीमारी बच्चों में पाई जाती है. सही समय पर उपचार में कमी होने से 15-16 साल की उम्र में मरीज की मौत भी हो सकती है.

 

nt-fam� '"i�G �%oman"; color:black'>अवसर पर हमारे देश ने उन्हें पुनः पुर्नजीवित करने का प्रयास किया जब इस अवसर पर उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया।

 

 

e�Dn-�%�*pt; font-family:"Georgia","serif";mso-bidi-font-family:Georgia;color:black'> प्रभावित होता है. 

इस बीमारी की चपेट में आने के बालिकाओं के मुकाबले बालकों की ज्‍यादा संभावना है. इस बीमारी को पहचानने का कोई निश्चित तरीका ज्ञात नहीं है, लेकिन जल्‍दी निदान हो जाने की स्थिति में सुधार लाने के लिए कुछ किया जा सकता है. दुनियाभर में यह बीमारी पाई जाती है और इसका असर बच्‍चों, परिवारों, समुदाय और समाज पर पड़ता है.

 

 

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