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13-11-2019

13-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप की श्रीमत पर चलना ही बाप का रिगार्ड रखना है, मनमत पर चलने वाले डिसरिगार्ड करते हैं”

प्रश्न:

गृहस्थ व्यवहार में रहने वालों को किस एक बात के लिए बाबा मना नहीं करते लेकिन एक डायरेक्शन देते हैं - वह कौन सा?

उत्तर:

बाबा कहते - बच्चे, तुम भल सभी के कनेक्शन में आओ, कोई भी नौकरी आदि करो, सम्पर्क में आना पड़ता है, रंगीन कपड़े पहनने पड़ते हैं तो पहनो, बाबा की मना नहीं है। बाप तो सिर्फ डायरेक्शन देते हैं - बच्चे, देह सहित देह के सब सम्बन्धों से ममत्व निकाल मुझे याद करो।

ओम् शान्ति।

शिवबाबा बैठ बच्चों को समझाते हैं अर्थात् आपसमान बनाने का पुरूषार्थ कराते हैं। जैसे मैं ज्ञान का सागर हूँ वैसे बच्चे भी बनें। यह तो मीठे बच्चे जानते हैं सब एक समान नहीं बनेंगे। पुरूषार्थ तो हरेक को अपना-अपना करना होता है। स्कूल में स्टूडेन्ट तो बहुत पढ़ते हैं परन्तु सब एक समान पास विद् ऑनर्स नहीं होते हैं। फिर भी टीचर पुरूषार्थ कराते हैं। तुम बच्चे भी पुरूषार्थ करते हो। बाप पूछते हैं तुम क्या बनेंगे? सब कहेंगे हम आये ही हैं नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनने। यह तो ठीक है परन्तु अपनी एक्टिविटीज़ भी देखो ना। बाप भी ऊंच ते ऊंच है। टीचर भी है, गुरू भी है। इस बाप को कोई जानते नहीं। तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा हमारा बाबा भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। परन्तु वह जैसा है वैसा उनको जानना भी मुश्किल है। बाप को जानेंगे तो टीचरपना भूल जायेगा, फिर गुरूपना भूल जायेगा। रिगार्ड भी बाप का बच्चों को रखना होता है। रिगार्ड किसको कहा जाता है? बाप जो पढ़ाते हैं वह अच्छी रीति पढ़ते हैं गोया रिगार्ड रखते हैं। बाप तो बहुत मीठा है। अन्दर में बहुत खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। कापारी खुशी रहनी चाहिए। हरेक अपने से पूछे-हमको ऐसी खुशी है? एक समान सब तो रह नहीं सकते। पढ़ाई में भी वास्ट डिफरेन्ट है। उन स्कूलों में भी कितना फ़र्क रहता है। वह तो कॉमन टीचर पढ़ाते हैं, यह तो है अनकॉमन। ऐसा टीचर कोई होता ही नहीं। किसको यह पता ही नहीं है कि निराकार फादर टीचर भी बनते हैं। भल श्रीकृष्ण का नाम दिया है परन्तु उनको पता ही नहीं कि वह फादर कैसे हो सकता। कृष्ण तो देवता है ना। यूँ तो कृष्ण नाम भी बहुतों का है। परन्तु कृष्ण कहने से ही श्रीकृष्ण सामने आ जायेगा। वह तो देहधारी है ना। तुम जानते हो यह शरीर उनका नहीं है। खुद कहते हैं - मैंने लोन लिया है। यह पहले भी मनुष्य था, अब भी मनुष्य है। यह भगवान नहीं है। वह तो एक ही निराकार है। अब तुम बच्चों को कितने राज़ समझाते हैं। परन्तु फिर भी फाइनल ही बाप समझना, टीचर समझना यह अभी हो नहीं सकता, घड़ी-घड़ी भूल जायेंगे। देहधारी तरफ बुद्धि चली जाती है। फाइनल बाप, बाप, टीचर, सतगुरू है-यह निश्चय, बुद्धि में अभी नहीं है। अभी तो भूल जाते हैं। स्टूडेन्ट्स कभी टीचर को भूलेंगे क्या! हॉस्टिल में जो रहते हैं वह तो कभी नहीं भूलेंगे। जो स्टूडेण्ट हॉस्टिल में रहते हैं उन्हें तो पक्का होगा ना। यहाँ तो वह भी पक्का निश्चय नहीं है। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार हॉस्टिल में बैठे हैं तो जरूर स्टूडेण्ट्स हैं परन्तु यह पक्का निश्चय नहीं है, जानते हैं सब अपने-अपने पुरूषार्थ अनुसार पद ले रहे हैं। उस पढ़ाई में तो फिर भी कोई बैरिस्टर बनते हैं, इन्जीनियर बनते हैं, डॉक्टर बनते हैं। यहाँ तो तुम विश्व के मालिक बन रहे हो। तो ऐसे स्टूडेण्ट की बुद्धि कैसी होनी चाहिए। चलन, वार्तालाप कैसा अच्छा होना चाहिए।
बाप समझाते हैं-बच्चे, तुमको कभी रोना नहीं है। तुम विश्व के मालिक बनते हो, याहुसेन नहीं मचानी चाहिए। याहुसेन मचाना-यह है हाइएस्ट रोना। बाप तो कहते हैं जिन रोया तिन खोया...... विश्व की ऊंच ते ऊंच बादशाही गँवा बैठते हैं। कहते तो हैं हम नर से नारायण बनने आये हैं परन्तु चलन कहाँ! नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार सब पुरूषार्थ कर रहे हैं। कोई तो अच्छी रीति पास हो स्कॉलरशिप ले लेते हैं, कोई नापास हो जाते हैं। नम्बरवार तो होते ही हैं। तुम्हारे में भी कोई तो पढ़ते हैं, कोई पढ़ते भी नहीं हैं। जैसे गाँव वालों को पढ़ना अच्छा नहीं लगता है। घास काटने लिए बोलो तो खुशी से जायेंगे। उसमें स्वतंत्र लाइफ समझते हैं। पढ़ना बन्धन समझते हैं, ऐसे भी बहुत होते हैं। साहूकारों में जमींदार लोग भी कम नहीं होते हैं। अपने को इन्डिपेन्डेंट बड़ा खुशी में समझते हैं। नौकरी नाम तो नहीं है ना। आफीसरी आदि में तो मनुष्य नौकरी करते हैं ना। अभी तुम बच्चों को बाप पढ़ाते हैं विश्व का मालिक बनाने। नौकरी के लिए नहीं पढ़ाते। तुम तो इस पढ़ाई से विश्व का मालिक बनने वाले हो ना। बड़ी ऊंची पढ़ाई ठहरी। तुम तो विश्व के मालिक बिल्कुल इन्डिपेन्डेंट बन जाते हो। बात कितनी सिम्पल है। एक ही पढ़ाई है जिससे तुम इतने ऊंच महाराजा-महारानी बनते हो सो भी पवित्र। तुम तो कहते हो कोई भी धर्म वाला हो, आकर पढ़े। समझेंगे यह पढ़ाई तो बहुत ऊंची है। विश्व के मालिक बनते हो, यह तो बाप पढ़ाते हैं। तुम्हारी अब बुद्धि कितनी विशाल बनी है। हद की बुद्धि से बेहद की बुद्धि मंक आये हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। कितनी खुशी रहती है-हम सब औरों को विश्व का मालिक बनावे। वास्तव में नौकरी तो भल वहाँ भी होती है, दास-दासियां, नौकर आदि तो चाहिए ना। पढ़े के आगे अनपढ़े भरी ढोयेंगे इसलिए बाप कहते हैं अच्छी रीति पढ़ो तो तुम यह बन सकते हो। कहते भी हैं हम यह बनेंगे। परन्तु पढ़ेंगे नहीं तो क्या बनेंगे। नहीं पढ़ते हैं तो फिर बाप को इतना रिगॉर्ड से याद नहीं करते हैं। बाप कहते हैं जितना तुम याद करेंगे तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बच्चे कहते हैं बाबा जैसे आप चलाओ, बाप भी मत इन द्वारा ही देंगे ना। परन्तु इनकी मत भी लेते नहीं, फिर भी पुरानी सड़ी हुई मनुष्य मत पर ही चलते हैं। देखते भी हैं शिवबाबा इस रथ द्वारा मत देते हैं फिर भी अपनी मत पर चलते हैं। जिसको पाई-पैसे की कौड़ी जैसी मत कहें, उस पर चलते हैं। रावण की मत पर चलते-चलते इस समय कौड़ी मिसल बन गये हैं। अब राम शिवबाबा मत देते हैं। निश्चय में ही विजय है, इसमें कभी नुकसान नहीं होगा। नुकसान को भी बाप फायदे में बदल देंगे। परन्तु निश्चय-बुद्धि वालों को। संशय-बुद्धि वाले अन्दर घुटका खाते रहेंगे। निश्चयबुद्धि वालों को कभी घुटका, कभी घाटा पड़ नहीं सकता। बाबा खुद गैरन्टी करते हैं - श्रीमत पर चलने से कभी अकल्याण हो नहीं सकता। मनुष्य मत को देहधारी की मत कहा जाता है। यहाँ तो है ही मनुष्य मत। गाया भी जाता है - मनुष्य मत, ईश्वरीय मत और दैवी मत। अब तुम्हें ईश्वरीय मत मिली है, जिससे तुम मनुष्य से देवता बनते हो। फिर वहाँ तो स्वर्ग में तुम सुख ही पाते हो। कोई दु:ख की बात नहीं। वह भी स्थाई सुख हो जाता है। इस समय तुमको फीलिंग में लाना होता है, भविष्य की फीलिंग आती है।
अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग, जबकि श्रीमत मिलती है। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर आता हूँ, उसको तुम जानते हो। उनकी मत पर तुम चलते हो। बाप कहते हैं - बच्चे, गृहस्थ व्यवहार में भल रहो, कौन कहता है तुम कपड़े आदि बदली करो। भल कुछ भी पहनो। बहुतों से कनेक्शन में आना पड़ता है। रंगीन कपड़ों के लिए कोई मना नहीं करते हैं। कोई भी कपड़ा पहनो, इनसे कोई तैलुक नहीं। बाप कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्ध छोड़ो। बाकी पहनो सब कुछ। सिर्फ अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो, यह पक्का निश्चय करो। यह भी जानते हो आत्मा ही पतित और पावन बनती है, महात्मा को भी महान् आत्मा कहेंगे, महान् परमात्मा नहीं कहेंगे। कहना भी शोभता नहीं। कितनी अच्छी प्वाइंट्स हैं समझने की। सतगुरू सर्व को सद्गति देने वाला तो एक ही बाप है। वहाँ कभी अकाले मृत्यु होती नहीं। अभी तुम बच्चे समझते हो बाबा हमको फिर से ऐसा देवता बनाते हैं। आगे यह बुद्धि में नहीं था। कल्प की आयु कितनी है, यह भी नहीं जानते थे। अभी तो सारी स्मृति आई है। यह भी बच्चे समझते हैं आत्मा को ही पाप आत्मा, पुण्य आत्मा कहा जाता है। पाप परमात्मा कभी नहीं कहा जाता। फिर कोई कहे परमात्मा सर्वव्यापी है तो भी कितनी बेसमझी है। यह बाप ही बैठ समझाते हैं। अभी तुम जानते हो 5 हज़ार वर्ष के बाद पाप आत्माओं को पुण्य आत्मा बाप ही आकर बनाते हैं। एक को नहीं, सब बच्चों को बनाते हैं। बाप कहते हैं तुम बच्चों को बनाने वाला मैं ही बेहद का बाप हूँ। जरूर बच्चों को बेहद का सुख दूँगा। सतयुग में होती ही हैं पवित्र आत्मायें। रावण पर जीत पाने से ही तुम पुण्य आत्मा बन जाते हो। तुम फील करते हो, माया कितने विघ्न डालती है। एकदम नाक में दम कर देती है। तुम समझते हो माया से युद्ध कैसे चलती है। उन्होंने फिर कौरवों और पाण्डवों की युद्ध, लश्कर आदि क्या-क्या बैठ दिखाये हैं। इस युद्ध का किसको भी पता नहीं। यह है गुप्त। इनको तुम ही जानते हो। माया से हम आत्माओं को युद्ध करनी है। बाप कहते हैं सबसे बड़ा तुम्हारा दुश्मन है ही काम। योगबल से तुम इस पर विजय पाते हो। योगबल का अर्थ भी कोई नहीं समझते हैं। जो सतोप्रधान थे वही तमोप्रधान बने हैं। बाप खुद कहते हैं बहुत जन्मों के अन्त में मैं इनमें प्रवेश करता हूँ। वही तमोप्रधान बना है, ततत्वम्। बाबा एक को थोड़ेही कहेंगे। नम्बरवार सबको कहते हैं। नम्बरवार कौन-कौन हैं, यहाँ तुमको पता पड़ा है। आगे चल तुमको बहुत पता पड़ेगा। माला का तुमको साक्षात्कार करायेंगे। स्कूल में जब ट्रांसफर होते हैं तो सब मालूम पड़ जाता है ना। रिजल्ट सारी निकल आती है।
बाबा ने बच्ची से पूछा - तुम्हारे इम्तहान के पेपर कहाँ से आते हैं? बोली लन्दन से। अब तुम्हारे पेपर्स कहाँ से निकलेंगे? ऊपर से। तुम्हारा पेपर ऊपर से आयेगा। सब साक्षात्कार करेंगे। कैसी वन्डरफुल पढ़ाई है। कौन पढ़ाते हैं, किसको पता नहीं है। कृष्ण भगवानुवाच कह देते हैं। पढ़ाई में सब नम्बरवार हैं। तो खुशी भी नम्बरवार होगी। यह जो गायन है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो-यह पिछाड़ी की बात है। बाप ने समझाया है, भल बाबा जानते हैं-यह बच्चे कभी गिरने वाले नहीं हैं परन्तु फिर भी पता नहीं क्या होता है। पढ़ाई ही नहीं पढ़ते हैं, तकदीर में नहीं है। थोड़ा ही उनको कहा जाए कि जाकर अपना घर बसाओ उस दुनिया में, तो झट चले जायेंगे। कहाँ से निकल कहाँ चले जाते हैं। उनकी चलन, बोलना, करना ही ऐसा होता है। समझते हैं हमको अगर इतना मिले तो हम जाकर अलग रहें। चलन से समझा जाता है। इसका मतलब निश्चय नहीं, लाचारी बैठे हैं। बहुत हैं जो ज्ञान का “ग” भी नहीं जानते। कभी बैठते भी नहीं। माया पढ़ने नहीं देती। ऐसे सब सेन्टर्स पर हैं। कभी पढ़ने आते नहीं। वन्डर है ना। कितनी ऊंची नॉलेज है। भगवान पढ़ाते हैं। बाबा कहे यह काम न करो, मानेंगे नहीं। जरूर उल्टा काम करके दिखायेंगे। राजधानी स्थापन हो रही है, उसमें तो हर प्रकार के चाहिए ना। ऊपर से लेकर नीचे तक सब बनते हैं। मर्तबे में फ़र्क तो रहता है ना। यहाँ भी नम्बरवार मर्तबे हैं। सिर्फ फ़र्क क्या है? वहाँ आयु बड़ी और सुख रहता है। यहाँ आयु छोटी और दु:ख है। बच्चों की बुद्धि में यह वन्डरफुल बातें हैं। कैसा यह ड्रामा बना हुआ है। फिर कल्प-कल्प हम वही पार्ट बजायेंगे। कल्प-कल्प बजाते रहते हैं। इतनी छोटी-सी आत्मा में कितना पार्ट भरा हुआ है। वही फीचर्स, वही एक्टिविटी..... यह सृष्टि का चक्र फिरता ही रहता है। बनी बनाई बन रही...... यह चक्र फिर भी रिपीट होगा। सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो में आयेंगे। इसमें मूँझने की बात नहीं। अच्छा, अपने को आत्मा समझते हो? आत्मा का बाप शिवबाबा है यह तो समझते हो ना। जो सतोप्रधान बनते हैं वही फिर तमोप्रधान बनते हैं फिर बाप को याद करो तो सतोप्रधान बन जायेंगे। यह तो अच्छा है ना। बस यहाँ तक ही ठहरा देना चाहिए। बोलो, बेहद का बाप यह स्वर्ग का वर्सा देते हैं। वही पतित-पावन है। बाप नॉलेज देते हैं, इसमें शास्त्रों आदि की तो बात ही नहीं। शास्त्र शुरू में कहाँ से आयेंगे। यह तो जब बहुत हो जाते हैं तब बाद में बैठ शास्त्र बनाते हैं। सतयुग में शास्त्र होते नहीं। परम्परा तो कोई चीज़ होती नहीं। नाम रूप तो बदल जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) कभी भी याहुसैन नहीं मचाना है। बुद्धि में रहे हम विश्व का मालिक बनने वाले हैं, हमारी चलन, वार्तालाप बहुत अच्छा होना चाहिए। कभी भी रोना नहीं है।

2) निश्चयबुद्धि बन एक बाप की मत पर चलते रहना है, कभी मूँझना वा घुटका नहीं खाना है। निश्चय में ही विजय है, इसलिए अपनी पाई-पैसे की मत नहीं चलानी है।

वरदान:

अपने पुरुषार्थ की विधि में स्वयं की प्रगति का अनुभव करने वाले सफलता के सितारे भव

जो अपने पुरुषार्थ की विधि में स्वयं की प्रगति वा सफलता का अनुभव करते हैं, वही सफलता के सितारे हैं, उनके संकल्प में स्वयं के पुरुषार्थ प्रति भी कभी “पता नहीं होगा या नहीं होगा”, कर सकेंगे या नहीं कर सकेंगे - यह असफलता का अंश-मात्र भी नहीं होगा। स्वयं प्रति सफलता अधिकार के रूप में अनुभव करेंगे, उन्हें सहज और स्वत: सफलता मिलती रहती है।

स्लोगन:

सुख स्वरूप बनकर सुख दो तो पुरुषार्थ में दुआयें एड हो जायेंगी।

12-11-2019

12-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम्हें अब टीचर बन सबको मन वशीकरण मंत्र सुनाना है, यह तुम सब बच्चों की ड्युटी है”

प्रश्न:

बाबा किन बच्चों का कुछ भी स्वीकार नहीं करते हैं?

उत्तर:

जिन्हें अहंकार है मैं इतना देता हूँ, मैं इतनी मदद कर सकता हूँ, बाबा उनका कुछ भी स्वीकार नहीं करते। बाबा कहते मेरे हाथ में चाबी है। चाहे तो मैं किसी को गरीब बनाऊं, चाहे किसको साहूकार बनाऊं। यह भी ड्रामा में राज़ है। जिन्हें आज अपनी साहूकारी का घमण्ड है वह कल गरीब बन जाते और गरीब बच्चे बाप के कार्य में अपनी पाई-पाई सफल कर साहूकार बन जाते हैं।

ओम् शान्ति।

यह तो रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाप आये हैं हमको नई दुनिया का वर्सा देने। यह तो बच्चों को पक्का है ना कि जितना हम बाप को याद करेंगे उतना पवित्र बनेंगे। जितना हम अच्छा टीचर बनेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप तुम्हें टीचर के रूप में पढ़ाना सिखाते हैं। तुमको फिर औरों को सिखाना है। तुम पढ़ाने वाले टीचर जरूर बनते हो बाकी तुम कोई का गुरू नहीं बन सकते हो, सिर्फ टीचर बन सकते हो। गुरू तो एक सतगुरू ही है वह सिखलाते हैं। सर्व का सतगुरू एक ही है। वह टीचर बनाते हैं। तुम सबको टीच करके रास्ता बताते रहते हो मनमनाभव का। बाप ने तुम्हारे पर यह ड्यूटी रखी है कि मुझे याद करो और फिर टीचर भी बनो। तुम कोई को बाप का परिचय देते हो तो उनका भी फ़र्ज है बाप को याद करना। टीचर रूप में सृष्टि चक्र की नॉलेज देनी पड़ती है। बाप को जरूर याद करना पड़े। बाप की याद से ही पाप मिट जाने हैं। बच्चे जानते हैं हम पाप आत्मा हैं, इसलिए बाप सबको कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो तुम्हारे पाप मिट जायेंगे। बाप ही पतित-पावन है। युक्ति बताते हैं-मीठे बच्चे, तुम्हारी आत्मा पतित बनी है, जिस कारण शरीर भी पतित बना है। पहले तुम पवित्र थे, अभी तुम अपवित्र बने हो। अब पतित से पावन होने की युक्ति तो बहुत सहज समझाते हैं। बाप को याद करो तो तुम पवित्र बन जायेंगे। उठते, बैठते, चलते बाप को याद करो। वो लोग गंगा स्नान करते हैं तो गंगा को याद करते हैं। समझते हैं वह पतित-पावनी है। गंगा को याद करने से पावन बन जाना है। परन्तु बाप कहते हैं कोई भी पावन बन नहीं सकते हैं। पानी से कैसे पावन बनेंगे। बाप कहते हैं मैं पतित-पावन हूँ। हे बच्चों, देह सहित देह के सब धर्म छोड़ मुझे याद करने से तुम पावन बन फिर से अपने घर मुक्तिधाम पहुँच जायेंगे। सारा कल्प घर को भूले हो। बाप को सारा कल्प कोई जानता ही नहीं है। एक ही बार बाप खुद आकर अपना परिचय देते हैं-इस मुख द्वारा। इस मुख की कितनी महिमा है। गऊमुख कहते हैं ना। वह गऊ तो जानवर है, यह है मनुष्य की बात।
तुम जानते हो यह बड़ी माता है। जिस माता द्वारा शिवबाबा तुम सबको एडाप्ट करते हैं। तुम अभी बाबा-बाबा कहने लगे हो। बाप भी कहते हैं इस याद की यात्रा से ही तुम्हारे पाप कटने हैं। बच्चे को बाप याद पड़ जाता है ना। उसकी शक्ल आदि दिल में बैठ जाती है। तुम बच्चे जानते हो जैसे हम आत्मा हैं वैसे वह परम आत्मा है। शक्ल में और कोई फ़र्क नहीं है। शरीर के सम्बन्ध में तो फीचर्स आदि अलग हैं, बाकी आत्मा तो एक जैसी ही है। जैसे हमारी आत्मा वैसे बाप भी परम आत्मा है। तुम बच्चे जानते हो-बाप परमधाम में रहते हैं, हम भी परमधाम में रहते हैं। बाप की आत्मा और हमारी आत्मा में और कोई फ़र्क है नहीं। वह भी बिन्दी है, हम भी बिन्दी हैं। यह ज्ञान और कोई को है नहीं। तुमको ही बाप ने बताया है। बाप के लिए भी क्या-क्या कह देते हैं। सर्वव्यापी है, पत्थर ठिक्कर में है, जिसको जो आता है वह कह देते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार भक्ति मार्ग में बाप के नाम, रूप, देश, काल को भूल जाते हैं। तुम भी भूल जाते हो। आत्मा अपने बाप को भूल जाती है। बच्चा बाप को भूल जाता है तो बाकी क्या जानेंगे। गोया निधनके हो गये। धनी को याद ही नहीं करते हैं। धनी के पार्ट को ही नहीं जानते हैं। अपने को भी भूल जाते हैं। तुम अच्छी रीति जानते हो-बरोबर हम भूल गये थे। हम पहले ऐसे देवी-देवता थे, अब जानवर से भी बदतर हो गये हैं। मुख्य तो हम अपनी आत्मा को भी भूले हुए हैं। अब रियलाइज़ कौन करावे। कोई भी जीव आत्मा को यह पता नहीं होगा कि हम आत्मा क्या हैं, कैसे सारा पार्ट बजाते हैं? हम सब भाई-भाई हैं-यह ज्ञान और कोई में नहीं है। इस समय सारी सृष्टि ही तमोप्रधान बन चुकी है। ज्ञान नहीं है। तुम्हारे में अब ज्ञान है, बुद्धि में आया हम आत्मा इतना समय अपने बाप की ग्लानि करते आये हैं। ग्लानि करने से बाप से दूर होते जाते हैं। सीढ़ी नीचे उतरते गये हैं ड्रामा प्लैन अनुसार। मूल बात हो जाती है बाप को याद करने की। बाप और कोई तकलीफ नहीं देते हैं। बच्चों को सिर्फ बाप को याद करने की तकलीफ है। बाप कभी बच्चों को कोई तकलीफ दे सकते हैं क्या! लॉ नहीं कहता। बाप कहते हैं मैं कोई भी तकलीफ नहीं देता हूँ। कुछ भी प्रश्न आदि पूछते हैं, कहता हूँ इन बातों में टाइम वेस्ट क्यों करते हो? बाप को याद करो। मैं आया ही हूँ तुमको ले जाने, इसलिए तुम बच्चों को याद की यात्रा से पावन बनना है। बस मैं ही पतित-पावन बाप हूँ। बाप युक्ति बताते हैं-कहाँ भी जाओ बाप को याद करना है। 84 के चक्र का राज़ भी बाप ने समझा दिया है। अब अपनी जांच करनी है-कहाँ तक हम बाप को याद करते हैं। बस और कोई तरफ का विचार नहीं करना है। यह तो मोस्ट इज़ी है। बाप को याद करना है। बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो ऑटोमेटिकली माँ-बाप को याद करने लग पड़ता है। तुम भी समझो हम आत्मा बाप के बच्चे हैं, याद क्यों करना पड़ता है! क्योंकि हमारे ऊपर जो पाप चढ़े हुए हैं, वह इस याद से ही खत्म होंगे। इसलिए गायन भी है एक सेकण्ड में जीवनमुक्ति। जीवनमुक्ति का मदार पढ़ाई पर है और मुक्ति का मदार याद पर है। जितना तुम बाप को याद करेंगे और पढ़ाई पर ध्यान देंगे तो ऊंच नम्बर में मर्तबा पायेंगे। धन्धा आदि तो भल करते रहो, बाप कोई मना नहीं करते। धन्धा आदि जो तुम करते हो-वह भी दिन-रात याद रहता है ना। तो अब बाप यह रूहानी धन्धा देते हैं-अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो और 84 के चक्र को याद करो। मुझे याद करने से ही तुम सतोप्रधान बनेंगे। यह भी समझते हो, अभी पुराना चोला है फिर सतोप्रधान नया चोला मिलेगा। अपने पास बुद्धि में तन्त रखना है, जिससे बहुत फायदा होना है। जैसे स्कूल में सब्जेक्ट तो बहुत होते हैं फिर भी इंगलिस पर मार्क अच्छी होती हैं क्योंकि इंगलिश है मुख्य भाषा। उन्हों का पहले राज्य था इसलिए वह जास्ती चलती है। अभी भी भारतवासी कर्जदार है। भल कोई कितने भी धनवान हैं परन्तु बुद्धि में यह तो है ना कि हमारे राज्य के जो हेड्स हैं, वह कर्जदार हैं। गोया हम भारतवासी कर्ज़दार हैं। प्रजा जरूर कहेगी ना हम कर्जदार हैं। यह भी समझ चाहिए ना। जबकि तुम राजाई स्थापन कर रहे हो। तुम जानते हो हम सभी इन सब कर्जों से छूटकर सालवेन्ट बनते हैं फिर आधाकल्प हम कोई से भी कर्जा उठाने वाले नहीं हैं। कर्जदार पतित दुनिया के मालिक हैं। अभी हम कर्जदार भी हैं, पतित दुनिया के मालिक भी हैं। हमारा भारत ऐसा है-गाते हैं ना।
तुम बच्चे जानते हो हम बहुत साहूकार थे। परीजादे, परीजादियाँ थे। यह याद रहता है। हम ऐसे विश्व के मालिक थे। अभी बिल्कुल कर्जदार और पतित बन पड़े हैं। यह खेल की रिजल्ट बाप बतला रहे हैं। रिजल्ट क्या हुई है। तुम बच्चों को स्मृति आई है। सतयुग में हम कितने साहूकार थे, किसने तुमको साहूकार बनाया? बच्चे कहेंगे-बाबा, आपने हमको कितना साहूकार बनाया था। एक बाप ही साहूकार बनाने वाला है। दुनिया इन बातों को नहीं जानती। लाखों वर्ष कह देने से सब भूल गये हैं, कुछ नहीं जानते हैं। तुम अभी सब कुछ जान गये हो। हम पदमापदम साहूकार थे। बहुत पवित्र थे, बहुत सुखी थे। वहाँ झूठ पाप आदि कुछ होता नहीं। सारे विश्व पर तुम्हारी जीत थी। गायन भी है शिवबाबा आप जो देते हो वह और कोई दे नहीं सकता। कोई की ताकत नहीं जो आधाकल्प का सुख दे सके। बाप कहते हैं भक्ति मार्ग में भी तुमको बहुत सुख अथाह धन रहता है। कितने हीरे जवाहर थे जो फिर पिछाड़ी वालों के हाथ में आते हैं। अभी तो वह चीज़ ही देखने में नहीं आती है। तुम फ़र्क देखते हो ना। तुम ही पूज्य देवी-देवता थे फिर तुम ही पुजारी बने हो। आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। बाप कोई पुजारी नहीं बनते हैं परन्तु पुजारी दुनिया में तो आते हैं ना। बाप तो एवर पूज्य है। वह कभी पुजारी होते नहीं, उनका धन्धा है तुमको पुजारी से पूज्य बनाना। रावण का काम है तुमको पुजारी बनाना। यह दुनिया में किसको पता नहीं है। तुम भी भूल जाते हो। रोज़-रोज़ बाप समझाते रहते हैं। बाप के हाथ में है-किसको चाहे साहूकार बनाये, चाहे गरीब बनाये। बाप कहते हैं जो साहूकार हैं उन्हों को गरीब जरूर बनना है, बनेंगे ही। उन्हों का पार्ट ऐसा है। वह कभी ठहर न सकें। धनवान को अहंकार भी बहुत रहता है ना-मैं फलाना हूँ, यह-यह हमको है। घमण्ड तोड़ने लिए बाबा कहते हैं-यह जब आयेंगे देने के लिए तो बाबा कहेंगे दरकार नहीं है। यह अपने पास रखो। जब जरूरत होगी तो फिर ले लेंगे क्योंकि देखते हैं-काम का नहीं है, अपना घमण्ड है। तो यह सब बाबा के हाथ में है ना-लेना वा न लेना। बाबा पैसे क्या करेंगे, दरकार नहीं। यह तो तुम बच्चों के लिए मकान बन रहे हैं, आकरके बाबा से मिलकर ही जाना है। सदैव तो रहना नहीं है। पैसे की क्या दरकार रहेगी। कोई लश्कर वा तोपे आदि तो नहीं चाहिए। तुम विश्व के मालिक बनते हो। अभी युद्ध के मैदान में हो, तुम और कुछ भी नहीं करते हो सिवाए बाप को याद करने के। बाप ने फरमान किया है मुझे याद करो तो इतनी शक्ति मिलेगी। यह तुम्हारा धर्म बहुत सुख देने वाला है। बाप है सर्वशक्तिमान्। तुम उनके बनते हो, सारा मदार याद की यात्रा पर है। यहाँ तुम सुनते हो फिर उस पर मंथन चलता है। जैसे गाय खाना खाकर फिर उगारती है, मुख चलता ही रहता है। तुम बच्चों को भी कहते हैं ज्ञान की बातों पर खूब विचार करो। बाबा से हम क्या पूछें। बाप तो कहते हैं मनमनाभव, जिससे ही तुम सतोप्रधान बनते हो। यह एम ऑबजेक्ट सामने है।
तुम जानते हो - सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पन्न बनना है। यह ऑटोमेटिकली अन्दर में आना चाहिए। कोई की ग्लानि वा पाप कर्म आदि कुछ भी न हो। कोई भी तुमको उल्टा कर्म नहीं करना चाहिए। नम्बरवन हैं यह देवी-देवतायें। पुरूषार्थ से ऊंच पद पाया है ना। उन्हों के लिए गाया जाता है अहिंसा परमो देवी-देवता धर्म। किसको मारना यह हिंसा हुई ना। बाप समझाते हैं तो फिर बच्चों को अन्तर्मुख हो अपने को देखना है-हम कैसे बने हैं? बाबा को हम याद करते हैं? कितना समय हम याद करते हैं? इतनी दिल लग जाए जो यह याद कभी भूले ही नहीं। अब बेहद का बाप कहते हैं तुम आत्मायें मेरी सन्तान हो। सो भी तुम अनादि सन्तान हो। वह जो आशिक-माशूक होते हैं उन्हों की है जिस्मानी याद। जैसे साक्षात्कार होता है फिर गुम हो जाते हैं वैसे वह भी सामने आ जाते हैं। उस खुशी में ही खाते पीते याद करते रहते हैं। तुम्हारे इस याद में तो बहुत बल है। एक बाप को ही याद करते रहेंगे। और तुमको फिर अपना भविष्य याद आयेगा। विनाश का साक्षात्कार भी होगा। आगे चल जल्दी-जल्दी विनाश का साक्षात्कार होगा। फिर तुम कह सकेंगे कि अभी विनाश होना है। बाप को याद करो। बाबा ने यह सब कुछ छोड़ दिया ना। कुछ भी पिछाड़ी में याद न आये। अभी तो हम अपनी राजधानी में चलें। नई दुनिया में जरूर जाना है। योगबल से सब पापों को भस्म करना है, इसमें ही बड़ी मेहनत करनी है। घड़ी-घड़ी बाप को भूल जाते हैं क्योंकि यह बड़ी महीन चीज़ है। मिसाल जो देते हैं सर्प का, भ्रमरी का, वह सब इस समय के हैं। भ्रमरी कमाल करती है ना। उनसे तुम्हारी कमाल जास्ती है। बाबा लिखते हैं ना-ज्ञान की भूँ-भूँ करते रहो। आखरीन जाग पड़ेंगे। जायेंगे कहाँ। तुम्हारे पास ही आते जायेंगे। एड होते जायेंगे। तुम्हारा नामाचार होता जायेगा। अभी तो तुम थोड़े हो ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) ज्ञान का खूब विचार सागर मंथन करना है। जो सुना है उसे उगारना है। अन्तर्मुख हो देखना है कि बाप से ऐसी दिल लगी हुई है जो वह कभी भूले ही नहीं।

2) कोई भी प्रश्न आदि पूछने में अपना टाइम वेस्ट न कर याद की यात्रा से स्वयं को पावन बनाना है। अन्त समय में एक बाप की याद के सिवाए और कोई भी विचार न आये-यह अभ्यास अभी से करना है।

वरदान:

ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा के साथ साथी बन रात को दिन बनाने वाले रूहानी ज्ञान सितारे भव

जैसे वह सितारे रात में प्रगट होते हैं ऐसे आप रूहानी ज्ञान सितारे, चमकते हुए सितारे भी ब्रह्मा की रात में प्रगट होते हो। वह सितारे रात को दिन नहीं बनाते लेकिन आप ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा के साथ साथी बन रात को दिन बनाते हो। वह आकाश के सितारे हैं आप धरती के सितारे हो, वह प्रकृति की सत्ता है आप परमात्म सितारे हो। जैसे प्रकृति के तारामण्डल में अनेक प्रकार के सितारे चमकते हुए दिखाई देते हैं, ऐसे आप परमात्म तारामण्डल में चमकते हुए रूहानी सितारे हो।

स्लोगन:

सेवा का चांस मिलना अर्थात् दुआओं से झोली भरना।

10-11-19

10-11-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “अव्यक्त-बापदादा” रिवाइज: 06-03-85 मधुबन


“संगमयुग उत्सव का युग है, ब्राह्मण जीवन उत्साह की जीवन है”

आज होलीएस्ट, हाइएस्ट बाप अपने होली और हैपी हंसों से होली मनाने आये हैं। त्रिमूर्ति बाप तीन प्रकार की होली का दिव्य राज़ सुनाने आये हैं। वैसे संमगयुग होली युग है। संमगयुग उत्सव का युग है। आप श्रेष्ठ आत्माओं का हर दिन, हर समय उत्साह भरा उत्सव है। अज्ञानी आत्मायें स्वयं को उत्साह में लाने के लिए उत्सव मनाते हैं। लेकिन आप श्रेष्ठ आत्माओं के लिए यह ब्राह्मण जीवन उत्साह की जीवन है। उमंग, खुशी से भरी हुई जीवन है इसलिए संगमयुग ही उत्सव का युग है। ईश्वरीय जीवन सदा उमंग उत्साह वाली जीवन है। सदा ही खुशियों में नाचते, ज्ञान का शक्तिशाली अमृत पीते, सुख के गीत गाते, दिल के स्नेह के गीत गाते, अपनी श्रेष्ठ जीवन बिता रहे हैं। अज्ञानी आत्मायें एक दिन मनाती, अल्पकाल के उत्साह में आती फिर वैसे की वैसी हो जाती। आप उत्सव मनाते हुए होली बन जाते हो और दूसरों को भी होली बनाते हो। वह सिर्फ मनाते हैं, आप मनाते बन जाते हो। लोग तीन प्रकार की होली मनाते हैं-एक जलाने की होली। दूसरी रंग लगाने की होली। तीसरी मंगल मिलन मनाने की होली। यह तीनों होली हैं रूहानी रहस्य से। लेकिन वह स्थूल रूप में मनाते रहते हैं। इस संगमयुग पर आप महान आत्मायें जब बाप की बनती हो अर्थात् होली बनती हो तो पहले क्या करती हो? पहले सब पुराने स्वभाव संस्कार योग अग्नि से भस्म करते हो अर्थात् जलाते हो। उसके बाद ही याद द्वारा बाप के संग का रंग लगता है। आप भी पहले जलाने वाली होली मनाते हो फिर प्रभू संग के रंग में रंग जाते हो अर्थात् बाप समान बन जाते हो। बाप ज्ञान सागर तो बच्चे भी संग के रंग में ज्ञान स्वरूप बन जाते हैं। जो बाप के गुण वह आपके गुण हो जाते, जो बाप की शक्तियाँ वह आपका खजाना बन जाती। आपकी प्रापर्टी हो जाती। तो संग का रंग ऐसा अविनाशी लग जाता जो जन्म-जन्मान्तर के लिय यह रंग अविनाशी बन जाता है। और जब संग का रंग लग जाता, यह रूहानी रंग की होली मना लेते तो आत्मा और परमात्मा का, बाप और बच्चों का श्रेष्ठ मिलन का मेला सदा ही होता रहता। अज्ञानी आत्माओं ने आपके इस रूहानी होली को यादगार के रूप में मनाना शुरू किया है। आपकी प्रैक्टिकल उत्साह भरी जीवन का भिन्न-भिन्न रूप में यादगार मनाकर अल्पकाल के लिए खुश हो जाते। हर कदम में, आपके श्रेष्ठ जीवन में जो विशेषतायें प्राप्त हुई उनको याद कर थोड़े समय के लिए वह भी मौज मनाते रहते हैं। यह यादगार देख वा सुन हर्षित होते हो ना कि हमारी विशेषताओं का यादगार है! आपने माया को जलाया और वह होलिका बनाके जला देते हैं। इतनी रमणीक कहानियाँ बनाई हैं जो सुनकर आपको हंसी आयेगी कि हमारी बात को कैसे बना दिया है! होली का उत्सव आपके भिन्न-भिन्न प्राप्ति के याद रूप में मनाते हैं। अभी आप सदा खुश रहते हो। खुशी की प्राप्ति का यादगार बहुत खुश होकर होली मनाते हैं। उस समय सब दुख भूल जाते हैं। और आप सदा के लिए दुख भूल गये हो। आपकी खुशी की प्राप्ति का यादगार मनाते हैं।
और बात मनाने के समय छोटे बड़े बहुत ही हल्के बन, हल्के रूप में मनाते हैं। उस दिन के लिए सभी का मूड भी हल्का रहता है। तो यह आपके डबल लाइट बनने का यादगार है। जब प्रभू-संग के रंग में रंग जाते हो तो डबल लाइट बन जाते हो ना। तो इस विशेषता का यादगार है। और बात-इस दिन छोटे बड़े किसी भी सम्बन्ध वाले समान स्वभाव में रहते हैं। चाहे छोटा-सा पोत्रा भी हो वह भी दादा को रंग लेगा। सभी सम्बन्ध का, आयु का भान भूल जाते हैं। समान भाव में आ जाते हैं। यह भी आपके विशेष समान भाव अर्थात् भाई-भाई की स्थिति और कोई भी देह के सम्बन्ध की दृष्टि नहीं, यह भाई-भाई की समान स्थिति का यादगार है। और बात-इस दिन भिन्न-भिन्न रंगों से खूब पिचकारियाँ भर एक दो को रंगते हैं। यह भी इस समय की आपकी सेवा का यादगार है। कोई भी आत्मा को आप दृष्टि की पिचकारी द्वारा प्रेम स्वरूप बनाने का रंग, आनन्द स्वरूप बनाने का रंग, सुख का, शान्ति का, शक्तियों का कितने रंग लगाते हो? ऐसा रंग लगाते हो जो सदा लगा रहे। मिटाना नहीं पड़ता। मेहनत नहीं करनी पड़ती। और ही हर आत्मा यही चाहती कि सदा इन रंगों में रंगी रहूँ। तो सभी के पास रूहानी रंगों की रूहानी दृष्टि की पिचकारी है ना! होली खेलते हो ना! यह रूहानी होली आप सबके जीवन का यादगार है। ऐसा बापदादा से मंगल मिलन मनाया है, जो मिलन मनाते बाप समान बन गये। ऐसा मंगल मिलन मनाया है जो कम्बाइन्ड बन गये हो। कोई अलग कर नहीं सकता।
और बात-यह दिन सभी बीती हुई बातों को भुलाने का दिन है। 63 जन्म की बीती को भुला देते हो ना। बीती को बिन्दी लगा देते हो इसलिए होली को बीती सो बीती का अर्थ भी कहते हैं। कैसी भी कड़ी दुश्मनी को भूल मिलन मनाने का दिन माना जाता है। आपने भी आत्मा के दुश्मन आसुरी संस्कार, आसुरी स्वभाव भूल कर प्रभू मिलन मनाया ना! संकल्प मात्र भी पुराना संस्कार स्मृति में न आये। यह भी आपके इस भूलने की विशेषता का यादगार मना रहे हैं। तो सुना आपकी विशेषतायें कितनी हैं? आपके हर गुण का, हर विशेषता का, कर्म का अलग-अलग यादगार बना दिया है। जिसके हर कर्म का यादगार बन जाए, जो याद कर खुशी में आ जाएं वह स्वयं कितने महान हैं? समझा-अपने आपको कि आप कौन हो? होली तो हो लेकिन कितने विशेष हो!
डबल विदेशी भल यह अपनी श्रेष्ठता का यादगार न भी जानते हो लेकिन आपके याद का महत्व दुनिया वाले याद कर यादगार मना रहे हैं। समझा होली क्या होती है? आप सब तो रंग में रंगे हुए हो। ऐसे प्रेम के रंग में रंग गये हो जो सिवाए बाप के और कुछ दिखाई नहीं देता। स्नेह में ही खाते-पीते, चलते, गाते, नाचते रहते हो। पक्का रंग लग गया है ना कि कच्चा है? कौन सा रंग लगा है कच्चा वा पक्का? बीती सो बीती कर ली? गलती से भी पुरानी बात याद न आवे। कहते हो ना क्या करें आ गई। यह गलती से आ जाती है। नया जन्म, नई बातें, नये संस्कार, नई दुनिया, यह ब्राह्मणों का संसार भी नया संसार है। ब्राह्मणों की भाषा भी नई है! आत्मा की भाषा नई है ना! वह क्या कहते और आप क्या कहते! परमात्मा के प्रति भी नई बातें हैं। तो भाषा भी नई, रीति रसम भी नई, सम्बन्ध-सम्पर्क भी नया, सब नया हो गया। पुराना समाप्त हुआ। नया शरू हुआ, नये गीत गाते हो। पुराने नहीं। क्या, क्यों के हैं पुराने गीत। अहा, वाह, ओहो! यह हैं नये गीत। तो कौन से गीत गाते हो? हाय हाय के गीत तो नहीं गाते हो ना! हाय हाय करने वाले दुनिया में बहुत हैं आप नहीं हो। तो अविनाशी होली मना ली अर्थात् बीती सो बीती कर सम्पूर्ण पवित्र बन गये। बाप के संग के रंग में रंग गये हो। तो होली मना ली ना!
सदा बाप और मैं, साथ-साथ हैं। और संगम-युग सदा साथ रहेंगे। अलग हो ही नहीं सकते। ऐसा उमंग उत्साह दिल में है ना कि मैं और मेरा बाबा! कि पर्दे के पीछे तीसरा भी कोई है? कभी चूहा कभी बिल्ली निकल आती, ऐसे तो नहीं! सब समाप्त हो गये ना! जब बाप मिला तो सब कुछ मिला। और कुछ रहता नहीं। न सम्बन्धी रह जाता, न खजाना रह जाता, न शक्ति, न गुण रह जाता, न ज्ञान रह जाता, न कोई प्राप्ति रह जाती। तो बाकी और क्या चाहिए, इसको कहा जाता है होली मनाना। समझा!
आप लोग कितना मौज में रहते हो। बेफिकर बादशाह, बिन कौड़ी बादशाह, बेगमपुर के बादशाह। ऐसी मौज में कोई रह न सके। दुनिया के साहूकार से साहूकार हो वा दुनिया में नामीग्रामी कोई व्यक्ति हो, बहुत ही शास्त्रवादी हो, वेदों के पाठ पढ़ने वाले हो, नौंधा भक्त हो, नम्बरवन साइन्सदान हो, कोई भी आक्यूपेशन वाले हो लेकिन ऐसी मौज की जीवन नहीं हो सकती, जिसमें मेहनत नहीं, मुहब्बत ही मुहब्बत है। चिंता नहीं लेकिन शुभचिन्तक हैं, शुभचिन्तन है। ऐसी मौज की जीवन सारे विश्व में चक्कर लगाओ, अगर कोई मिले तो ले आओ। इसलिए गीत गाते हो ना - मधुबन में, बाप के संसार में मौजें ही मौजें हैं। खाओ तो भी मौज, सोओ तो भी मौज। गोली लेकर सोने की जरूरत नहीं। बाप के साथ सो जाओ तो गोली नहीं लेनी पड़ेगी। अकेले सोते हो तो कहते हाई ब्लडप्रेशर है, दर्द है, तब गोली लेनी पड़ती। बाप साथ हो, बस बाबा आपके साथ सो रहे हैं, यह है गोली। ऐसा भी फिर समय आयेगा जैसे आदि में दवाईयाँ नहीं चलती थी। याद है ना। शुरू में कितना समय दवाईयाँ नहीं थी। हाँ, थोड़ा मलाई मक्खन खा लिया। दवाई नहीं खाते थे। तो जैसे आदि में प्रैक्टिस कराई है ना। थे तो पुराने शरीर। अन्त में फिर वह आदि वाले दिन रिपीट होंगे। साक्षात्कार भी सब बहुत विचित्र करते रहेंगे। बहुतों की इच्छा है ना-एक बार साक्षात्कार हो जाए। लास्ट तक जो पक्के होंगे उन्हों को साक्षात्कार होंगे फिर वही संगठन की भट्ठी होगी। सेवा पूरी हो जायेगी। अभी सेवा के कारण जहाँ तहाँ बिखर गये हो! फिर नदियाँ सब सागर में समा जायेंगी। लेकिन समय नाजुक होगा। साधन होते हुए भी काम नहीं करेंगे इसलिए बुद्धि की लाइन बहुत क्लीयर चाहिए। जो टच हो जाए कि अभी क्या करना है। एक सेकण्ड भी देरी की तो गये। जैसे वह भी अगर बटन दबाने में एक सेकण्ड भी देरी की तो क्या रिजल्ट होगी? यह भी अगर एक सेकण्ड टचिंग होने में देरी हुई तो फिर पहुँचना मुश्किल होगा। वह लोग भी कितना अटेन्शन से बैठे रहते हैं। तो यह बुद्धि की टचिंग। जैसे शुरू में घर बैठे आवाज आया, बुलावा हुआ कि आओ, पहुँचो, अभी निकलो। और फौरन निकल पड़े। ऐसे ही अन्त में भी बाप का आवाज पहुँचेगा। जैसे साकार में सभी बच्चों को बुलाया। ऐसे आकार रूप में सभी बच्चों को आओ आओ का आह्वान करेंगे। बस आना और साथ जाना। ऐसे सदा अपनी बुद्धि क्लीयर हो और कहाँ अटेन्शन गया तो बाप का आवाज, बाप का आह्वान मिस हो जायेगा। यह सब होना ही है।
टीचर्स सोच रहीं हैं हम तो पहुँच जायेंगे। यह भी हो सकता है कि आपको वहाँ ही बाप डायरेक्शन दें। वहाँ कोई विशेष कार्य हो। वहाँ कोई औरों को शक्ति देनी हो। साथ ले जाना हो। यह भी होगा लेकिन बाप के डायरेक्शन प्रमाण रहे। मनमत से नहीं। लगाव से नहीं। हाय मेरा सेन्टर; यह याद न आये। फलाना जिज्ञासू भी साथ ले जाऊं, यह अनन्य है, मददगार है। ऐसा भी नहीं। किसी के लिए भी अगर रूके तो रह जायेंगे। ऐसे तैयार हो ना। इसको कहते हैं एवररेडी। सदा ही सब कुछ समेटा हुआ हो। उस समय समेटने का संकल्प नहीं आवे। यह कर लूँ, यह कर लूँ। साकार में याद है ना जो सर्विसएबुल बच्चे थे उन्हों की स्थूल बैग बैगेज सदा तैयार होती थी। ट्रेन पहुँचने में 5 मिनट हैं और डायरेक्शन मिलता था कि जाओ। तो बैग बैगेज तैयार रहते थे। एक स्टेशन पहले ट्रेन पहुँच गई है-और वह जा रहे हैं। ऐसे भी अनुभव किया ना। यह भी मन की स्थिति में बैग बैगेज तैयार हो। बाप ने बुलाया और बच्चे जी हाजिर हो जाएं। इसको कहते हैं एवररेडी। अच्छा।
ऐसे सदा संग के रंग में रंगे हुए, सदा बीती सो बीती कर वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बनाने वाले, सदा परमात्म मिलन मनाने वाले, सदा हर कर्म याद में रह करने वाले अर्थात् हर कर्म का यादगार बनाने वाले, सदा खुशी में नाचते गाते संगमयुग की मौज मनाने वाले, ऐसे बाप समान बाप के हर संकल्प को कैच करने वाले, सदा बुद्धि श्रेष्ठ और स्पष्ट रखने वाले, ऐसे होली हैपी हंसों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते!
बापदादा ने सभी बच्चों के पत्रों का उत्तर देते हुए होली की मुबारक दी
चारों ओर के देश विदेश के सभी बच्चों के स्नेह भरे, उमंग-उत्साह भरे और कहाँ-कहाँ अपने पुरुषार्थ के प्रतिज्ञा भरे सभी के पत्र और सन्देश बापदादा को प्राप्त हुए। बापदादा सभी होली हंसों को सदा “जैसा बाप वैसे मैं” यह स्मृति का विशेष स्लोगन वरदान के रूप में याद दिला रहे हैं। कोई भी कर्म करते संकल्प करते पहले चेक करो जो बाप का संकल्प वह यह संकल्प है। जो बाप का कर्म वही मेरा कर्म है। सेकण्ड में चेक करो और फिर साकार में लाओ। तो सदा ही बाप समान शक्तिशाली आत्मा बन सफलता का अनुभव करेंगे। सफलता जन्म-सिद्ध अधिकार है, ऐसा सहज प्राप्ति का अनुभव करेंगे। सफलता का सितारा मैं स्वयं हूँ तो सफलता मेरे से अलग हो नहीं सकती। सफलता की माला सदा गले में पिरोई हुई है अर्थात् हर कर्म में अनुभव करते रहेंगे। बापदादा आज के इस होली के संगठन में आप सभी होली हंसों को सम्मुख देख रहे हैं, मना रहे हैं। स्नेह से सभी को देख रहे हैं - सभी के विशेषता की वैराइटी खुशबू ले रहे हैं। कितनी मीठी खुशबू है हरेक के विशेषता की। बाप हर विशेष आत्मा को विशेषताओं से देखते हुए यही गीत गाते वाह मेरा सहज योगी बच्चा! वाह मेरा पदमापदम भाग्यशाली बच्चा! तो सभी अपनी-अपनी विशेषता और नाम सहित सम्मुख अपने को अनुभव करते हुए यादप्यार स्वीकार करना और सदा बाप की छत्रछाया में रह माया से घबराना नहीं। छोटी बात है, बड़ी बात नहीं है। छोटी को बड़ा नहीं करना। बड़ी को छोटा करना। ऊंचे रहेंगे तो बड़ा छोटा हो जायेगा। नीचे रहेंगे तो छोटा भी बड़ा हो जायेगा इसलिए बापदादा का साथ है, हाथ है तो घबराओ नहीं खूब उड़ो, उड़ती कला से सेकण्ड में सबको पार करो। बाप का साथ सदा ही सेफ रखता है। और रखेगा। अच्छा - सभी को सिकीलधा, लाडला कह बापदादा होली की मुबारक दे रहे हैं। (फिर तो बापदादा से सभी बच्चों ने होली मनाई तथा पिकनिक की)

वरदान:

ऊंचा बाप, ऊंचे हम और ऊंचा कार्य इस स्मृति से शक्तिशाली बनने वाले बाप समान भव

जैसे आजकल की दुनिया में कोई वी.आई.पी. का बच्चा होगा तो वह अपने को भी वी.आई.पी. समझेगा। लेकिन बाप से ऊंचा तो कोई नहीं है। हम ऐसे ऊंचे से ऊंचे बाप की सन्तान ऊंची आत्मायें हैं - यह स्मृति शक्तिशाली बनाती है। ऊंचा बाप, ऊंचे हम और ऊंचा कार्य - ऐसी स्मृति में रहने वाले सदा बाप समान बन जाते हैं। सारे विश्व के आगे श्रेष्ठ और ऊंची आत्मायें आपके सिवाए कोई नहीं हैं इसलिए आपका ही गायन और पूजन होता है।

स्लोगन:

सम्पूर्णता के दर्पण में सूक्ष्म लगावों को चेक करो और मुक्त बनो।

11-11-2019

11-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - मनमनाभव के वशीकरण मंत्र से ही तुम माया पर जीत पा सकते हो, यही मंत्र सबको याद दिलाओ”

प्रश्न:

इस बेहद के ड्रामा में सबसे जबरदस्त लेबर्स (नौकर) कौन-कौन हैं और कैसे?

उत्तर:

इस पुरानी दुनिया की सफाई करने वाले सबसे जबरदस्त लेबर्स हैं नैचुरल कैलेमिटीज। धरती हिलती है, बाढ़ आती है, सफाई हो जाती है। इसके लिए भगवान किसी को डायरेक्शन नहीं देते। बाप कैसे बच्चों को डिस्ट्राय करेंगे। यह तो ड्रामा में पार्ट है। रावण का राज्य है ना, इसे गॉडली कैलेमिटीज नहीं कहेंगे।

ओम् शान्ति।

बाप ही बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, मनमनाभव। ऐसे नहीं कि बच्चे बैठ बाप को समझा सकते। बच्चे नहीं कहेंगे शिवबाबा, मनमनाभव। नहीं। यूँ तो भल बच्चे आपस में बैठ चिटचैट करते हैं, राय निकालते हैं परन्तु जो मूल महामंत्र है, वह तो बाप ही देते हैं। गुरू लोग मंत्र देते हैं। यह रिवाज कहाँ से निकला? यह बाप जो नई सृष्टि रचने वाला है, वही पहले-पहले मंत्र देते हैं मनमनाभव। इसका नाम ही है वशीकरण मंत्र अर्थात् माया पर जीत पाने का मंत्र। यह कोई अन्दर में जपना नहीं है। यह तो समझाना होता है। बाप अर्थ सहित समझाते हैं। भल गीता में है परन्तु अर्थ कोई नहीं समझते हैं। यह गीता का एपीसोड भी है। परन्तु सिर्फ नाम बदली कर दिया है। कितनी बड़ी-बड़ी पुस्तक आदि भक्ति-मार्ग में बनती हैं। वास्तव में यह तो ओरली बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बाप की आत्मा में ज्ञान है। बच्चों की भी आत्मा ही ज्ञान धारण करती है। बाकी सिर्फ सहज कर समझाने के लिए यह चित्र आदि बनाये जाते हैं। तुम बच्चों की तो बुद्धि में यह सारा नॉलेज है। तुम जानते हो बरोबर आदि सनातन देवी-देवता धर्म था और कोई खण्ड नहीं था। फिर बाद में यह खण्ड एड हुए हैं। तो वह भी चित्र एक कोने में रख देना चाहिए। जहाँ तुम दिखलाते हो भारत में इनका राज्य था तो और कोई धर्म नहीं था। अभी तो कितने ढेर धर्म हैं फिर यह सब नहीं रहेंगे। यह है बाबा का प्लैन। उन बिचारों को कितनी चिंता लगी हुई है। तुम बच्चे समझते हो यह तो बिल्कुल ठीक है। लिखा हुआ भी है बाप आकर ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। किसकी? नई दुनिया की। जमुना का कण्ठा यह है कैपीटल। वहाँ एक ही धर्म होता है। झाड़ बिल्कुल छोटा है, इस झाड़ का ज्ञान भी बाप ही देते हैं। चक्र का ज्ञान देते हैं, सतयुग में एक ही भाषा होती है, और कोई भाषा नहीं होगी। तुम सिद्ध कर सकते हो एक ही भारत था, एक ही राज्य था, एक ही भाषा थी। पैराडाइज में सुख-शान्ति थी। दु:ख का नाम-निशान नहीं था। हेल्थ, वेल्थ, हैपीनेस सब था। भारत नया था तो आयु भी बहुत बड़ी थी क्योंकि पवित्रता थी। पवित्रता में मनुष्य तन्दरूस्त रहते हैं। अपवित्रता में देखो मनुष्यों का क्या हाल हो जाता है। बैठे-बैठे अकाले मृत्यु हो जाती है। जवान भी मर पड़ते हैं। दु:ख कितना होता है। वहाँ अकाले मृत्यु होती नहीं। फुल एज होती है। पीढ़ी तक अर्थात् बुढ़ापे तक कोई मरते नहीं हैं।
किसको भी समझाओ तो यह बुद्धि में बिठाना है-बेहद के बाप को याद करो, वही पतित-पावन है, वही सद्गति दाता है। तुम्हारे पास वह नक्शा भी होना चाहिए तो सिद्ध कर समझा सकेंगे। आज का नक्शा यह है, कल का नक्शा यह है। कोई तो अच्छी रीति से सुनते भी हैं। यह पूरा समझाना होता है। यह भारत अविनाशी खण्ड है। जब यह देवी-देवता धर्म था तो और कोई धर्म थे नहीं। अभी वह आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। यह लक्ष्मी-नारायण कहाँ गये, कोई बता नहीं सकेंगे। कोई में ताकत नहीं बताने की। तुम बच्चे अच्छी रीति रहस्ययुक्त समझा सकते हो। इसमें मूँझने की दरकार नहीं। तुम सब कुछ जानते हो और फिर रिपीट भी कर सकते हो। तुम कोई से भी पूछ सकते हो-यह कहाँ गये? तुम्हारा प्रश्न सुनकर चक्रित हो जायेंगे। तुम तो निश्चय से बताते हो, कैसे यह भी 84 जन्म लेते हैं। बुद्धि में तो है ना। तुम झट कहेंगे सतयुग नई दुनिया में हमारा राज्य था। एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। दूसरा कोई धर्म नहीं था। एवरीथिंग न्यु। हर एक चीज़ सतोप्रधान होती है। सोना भी कितना अथाह होता है। कितना सहज निकलता होगा, जो फिर ईटें मकान आदि बनते होंगे। वहाँ तो सब कुछ सोने का होता है। खानियां सब नई होंगी ना। इमीटेशन तो निकालेंगे नहीं जबकि रीयल बहुत है। यहाँ रीयल का नाम नहीं। इमीटेशन का कितना जोर है इसलिए कहा जाता है झूठी माया, झूठी काया......। सम्पत्ति भी झूठी है। हीरे मोती ऐसे-ऐसे किस्म के निकलते हैं जो पता भी नहीं पड़ सकता कि सच्चा है या झूठा है? शो इतना होता है जो परख नहीं सकते हैं-झूठा है वा सच्चा? वहाँ तो यह झूठी चीजें आदि होती नहीं। विनाश होता है तो सब धरती में चले जाते हैं। इतने बड़े-बड़े पत्थर, हीरे आदि मकानों में लगाते होंगे। वह सब कहाँ से आया होगा, कौन कट करते होंगे? इन्डिया में भी एक्सपर्ट बहुत हैं, होशियार होते जायेंगे। फिर वहाँ यह होशियारी लेकर आयेंगे ना। ताज आदि सिर्फ हीरों के थोड़ेही बनेंगे। वह तो बिल्कुल रिफाइन सच्चे हीरे होते हैं। यह बिजली, टेलीफोन, मोटर आदि पहले कुछ नहीं था। बाबा के इस लाइफ के अन्दर ही क्या-क्या निकला है! 100 वर्ष हुए हैं जो यह सब निकले हैं। वहाँ तो बड़े एक्सपर्ट होते हैं। अभी तक सीखते रहते हैं। होशियार होते रहते हैं। यह भी बच्चों को साक्षात्कार कराया जाता है। वहाँ हेलीकाप्टर्स भी फुल प्रूफ होते हैं। बच्चे भी बड़े सतोप्रधान शुरूड़ बुद्धि वाले होते हैं। आगे थोड़ा चलो, तुमको सब साक्षात्कार होते रहेंगे। जैसे अपने देश के नजदीक आते हैं तो झाड़ दिखाई पड़ते हैं ना। अन्दर में खुशी होती रहती है, अब घर आया कि आया। अभी आकर पहुँचे हैं। पिछाड़ी में तुमको भी ऐसे साक्षात्कार होते रहेंगे। बच्चे समझते हैं मोस्ट बिलवेड बाबा है। वह है ही सुप्रीम आत्मा। उनको सब याद भी करते हैं। भक्ति मार्ग में तुम भी याद करते थे ना परमात्मा को। परन्तु यह मालूम नहीं था कि वह छोटा है वा बड़ा है। गाते भी हैं चमकता है अजब सितारा भ्रकुटी के बीच में..... तो जरूर बिन्दी मिसल होगा ना। उनको ही कहा जाता है सुप्रीम आत्मा माना परमात्मा। उनमें खूबियां तो सब हैं ही। ज्ञान का सागर है, क्या ज्ञान सुनायेंगे। वह तो जब सुनावे तब तो मालूम पड़े ना। तुम भी पहले जानते थे क्या, सिर्फ भक्ति ही जानते थे। अभी तो समझते हो वन्डर है, आत्मा को भी इन आंखों से देख नहीं सकते हैं तो बाप को भी भूल जाते हैं। ड्रामा में पार्ट ही ऐसा है जिसको विश्व का मालिक बनाते हैं उनका नाम डाल देते हैं और बनाने वाले का नाम गुम कर देते हैं। कृष्ण को त्रिलोकीनाथ, वैकुण्ठ नाथ कह दिया है, अर्थ कुछ नहीं समझते हैं। सिर्फ बड़ाई दे देते हैं। भक्ति मार्ग में अनेक बातें बैठ बनाई हैं। कहते हैं भगवान में इतनी ताकत है, वह हज़ारों सूर्य से तेज है, सबको भस्म कर सकते हैं। ऐसी-ऐसी बातें बना दी हैं। बाप कहते हैं मैं बच्चों को जलाऊंगा कैसे! यह तो हो नहीं सकता। बच्चों को बाप डिस्ट्रॉय करेंगे क्या? नहीं। यह तो ड्रामा में पार्ट है। पुरानी दुनिया खत्म होनी है। पुरानी दुनिया के विनाश के लिए यह नैचुरल कैलेमिटीज सब लेबर्स हैं। कितने जबरदस्त लेबर्स हैं। ऐसे नहीं कि उन्हों को बाप का डायरेक्शन है कि विनाश करो। नहीं, तूफान लगते हैं, फेमन होता है। भगवान कहते हैं क्या, यह करो? कभी नहीं। यह तो ड्रामा में पार्ट है। बाप नहीं कहते हैं बॉम्बस बनाओ। यह सब रावण की मत कहेंगे। यह बना-बनाया ड्रामा है। रावण का राज्य है तो आसुरी बुद्धि बन जाते हैं। कितने मरते हैं। आखरीन में सब जला देंगे। यह बना-बनाया खेल है, जो रिपीट होता है। बाकी ऐसे नहीं कि शंकर के आंख खोलने से विनाश हो जाता है, इनको गॉडली कैलेमिटीज़ भी नहीं कहेंगे। यह नैचुरल ही है।
अब बाप तुम बच्चों को श्रीमत दे रहे हैं। कोई को दु:ख आदि देने की बात ही नहीं। बाप तो है ही सुख का रास्ता बताने वाला। ड्रामा प्लैन अनुसार मकान पुराना होता ही जायेगा। बाप भी कहते हैं यह सारी दुनिया पुरानी हो गई है। यह खलास होनी चाहिए। आपस में लड़ते देखो कैसे हैं! आसुरी बुद्धि हैं ना। जब ईश्वरीय बुद्धि हैं तो कोई भी मारने आदि की बात नहीं। बाप कहते हैं मैं तो सबका बाप हूँ। हमारा सब पर प्यार है। बाबा देखते यहाँ हैं फिर अनन्य बच्चों तरफ ही नज़र जाती है, जो बाप को बहुत प्रेम से याद करते हैं। सर्विस भी करते हैं। यहाँ बैठे बाप की नज़र सर्विसएबुल बच्चों तरफ चली जाती है। कभी देहरादून, कभी मेरठ, कभी देहली...... जो बच्चे मुझे याद करते हैं मैं भी उन्हों को याद करता हूँ। जो मुझे नहीं भी याद करते हैं तो भी मैं सबको याद करता हूँ क्योंकि मुझे तो सबको ले जाना है ना। हाँ, जो मेरे द्वारा सृष्टि चक्र की नॉलेज को समझते हैं नम्बरवार वह फिर ऊंच पद पायेंगे। यह बेहद की बातें हैं। वह टीचर आदि होते हैं हद के। यह है बेहद का। तो बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। बाप कहते हैं सबका पार्ट एक जैसा नहीं हो सकता है, इनका तो पार्ट था। परन्तु फालो करने वाले कोटो में कोई निकले। कहते हैं - बाबा, हम 7 दिन का बच्चा हूँ, एक दिन का बच्चा हूँ। तो पूँगरे ठहरे ना। तो बाप हर बात समझाते रहते हैं। नदी भी बरोबर पार कर आये थे। बाबा के आने से ही ज्ञान शुरू हुआ है। उनकी कितनी महिमा है। वह गीता के अध्याय तो तुमने जन्म-जन्मान्तर कितने बार पढ़े होंगे। फर्क देखो कितना है। कहाँ कृष्ण भगवानुवाच, कहाँ शिव परमात्मा वाच। रात-दिन का फर्क है। तुम्हारी बुद्धि में अब है हम सचखण्ड में थे, सुख भी बहुत देखा। 3/4 सुख देखते हो। बाप ने ड्रामा सुख के लिए बनाया है, न कि दु:ख के लिए। यह तो बाद में तुमको दु:ख मिला है। लड़ाई तो इतनी जल्दी लग नहीं सकती। तुमको बहुत सुख मिलता है। आधा-आधा हो तो भी इतना मजा न रहे। साढ़े तीन हज़ार वर्ष तो कोई लड़ाई नहीं। बीमारी आदि नहीं। यहाँ तो देखो बीमारी पिछाड़ी बीमारियाँ लगी हुई हैं। सतयुग में थोड़ेही ऐसे कीड़े आदि होंगे जो अनाज खा लेवें इसलिए उनका तो नाम ही है स्वर्ग। तो वर्ल्ड का नक्शा भी तुमको दिखाना चाहिए तब समझ सकेंगे। असुल में भारत यह था, और कोई धर्म था नहीं। फिर नम्बरवार धर्म स्थापन करने वाले आते हैं। अभी तुम बच्चों को वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी का मालूम है। तुम्हारे सिवाए बाकी सब तो कह देंगे नेती-नेती, हम बाप को नहीं जानते हैं। कह देते हैं उनका कोई नाम, रूप, देश, काल है नहीं। नाम रूप नहीं तो फिर कोई देश भी नहीं हो सकता है। कुछ भी समझते नहीं। अब बाप अपना यथार्थ परिचय तुम बच्चों को देते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) सदा अपार खुशी में रहने के लिए बेहद का बाप जो बेहद की बातें सुनाते हैं, उनका सिमरण करना है और बाप को फालो करते चलना है।

2) सदा तन्दरूस्त रहने के लिए ‘पवित्रता' को अपनाना है। पवित्रता के आधार से हेल्थ, वेल्थ और हैपीनेस का वर्सा बाप से लेना है।

वरदान:

शक्तिशाली याद द्वारा सेकण्ड में पदमों की कमाई जमा करने वाले पदमापदम भाग्यशाली भव

आपकी याद इतनी शक्तिशाली हो जो एक सेकण्ड की याद से पदमों की कमाई जमा हो जाए। जिनके हर कदम में पदम हों तो कितने पदम जमा हो जायेंगे इसीलिए कहा जाता है पदमापदम भाग्यशाली। जब किसी की अच्छी कमाई होती है तो उसके चेहरे की फलक ही और हो जाती है। तो आपकी शक्ल से भी पदमों की कमाई का नशा दिखाई दे। ऐसा रूहानी नशा, रूहानी खुशी हो जो अनुभव करें कि यह न्यारे लोग हैं।

स्लोगन:

ड्रामा में सब अच्छा ही होना है इस स्मृति से बेफिक्र बादशाह बनो।

09-11-2019

09-11-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम्हारी याद बहुत वन्डरफुल है क्योंकि तुम एक साथ ही बाप, टीचर और सतगुरू तीनों को याद करते हो”

प्रश्न:

किसी भी बच्चे को माया जब मगरूर बनाती है तो किस बात की डोंटकेयर करते हैं?

उत्तर:

मगरूर बच्चे देह-अभिमान में आकर मुरली को डोन्ट-केयर करते है, कहावत है ना-चूहे को हल्दी की गांठ मिली, समझा मै पंसारी हूँ...। बहुत हैं जो मुरली पढ़ते ही नहीं, कह देते हैं हमारा तो डायरेक्ट शिवबाबा से कनेक्शन हैं। बाबा कहते बच्चे मुरली में तो नई-नई बातें निकलती हैं इसलिए मुरली कभी मिस नहीं करना, इस पर बहुत अटेन्शन रहे।

ओम् शान्ति।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों से रूहानी बाप पूछते हैं यहाँ तुम बैठे हो, किसकी याद में बैठे हो? (बाप, शिक्षक, सतगुरू की) सभी इन तीनों की याद में बैठे हो? हर एक अपने से पूछे यह सिर्फ यहाँ बैठे याद है या चलते-फिरते याद रहती है? क्योंकि यह है वन्डरफुल बात। और कोई आत्मा को कभी ऐसे नहीं कहा जाता। भल यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक हैं परन्तु उनकी आत्मा को कभी ऐसे नहीं कहेंगे कि यह बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। बल्कि सारी दुनिया में जो भी जीव आत्मायें है, कोई भी आत्मा को ऐसे नहीं कहेंगे। तुम बच्चे ही ऐसे याद करते हो। अन्दर में आता है यह बाबा, बाबा भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। सो भी सुप्रीम। तीनों को याद करते हो या एक को? भल वह एक है परन्तु तीनों गुणों से याद करते हो। शिवबाबा हमारा बाप भी है, टीचर और सतगुरू भी है। यह एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कहा जाता है। जब बैठे हो अथवा चलते फिरते हो तो यह याद रहना चाहिए। बाबा पूछते हैं ऐसे याद करते हो कि यह हमारा बाप, टीचर, सतगुरू भी है। ऐसा कोई भी देहधारी हो नहीं सकता। देहधारी नम्बरवन है कृष्ण, उनको बाप, टीचर, सतगुरू कह नहीं सकते, यह बिल्कुल वन्डरफुल बात है। तो सच बताना चाहिए तीनों रूप में याद करते हो? भोजन पर बैठते हो तो सिर्फ शिवबाबा को याद करते हो या तीनों बुद्धि में आते हैं? और तो कोई भी आत्मा को ऐसे नहीं कह सकते। यह है वन्डरफुल बात। विचित्र महिमा है बाप की। तो बाप को याद भी ऐसे करना है। तो बुद्धि एकदम उस तरफ चली जायेगी जो ऐसा वन्डरफुल है। बाप ही बैठ अपना परिचय देते हैं फिर सारे चक्र का भी नॉलेज देते हैं। ऐसे यह युग हैं, इतने-इतने वर्ष के हैं जो फिरते रहते हैं। यह ज्ञान भी वह रचयिता बाप ही देते हैं। तो उनको याद करने में बहुत मदद मिलेगी। बाप, टीचर, गुरू वह एक ही है। इतनी ऊंच आत्मा और कोई हो नहीं सकती। परन्तु माया ऐसे बाप की याद भी भुला देती है तो टीचर और गुरू को भी भूल जाते हैं। यह हर एक को अपने-अपने दिल से लगाना चाहिए। बाबा हमको ऐसा विश्व का मालिक बनायेंगे। बेहद के बाप का वर्सा जरूर बेहद का ही है। साथ-साथ यह महिमा भी बुद्धि में आये, चलते-फिरते तीनों ही याद आयें। इस एक आत्मा की तीनों ही सर्विस इकट्ठी हैं इसलिए उनको सुप्रीम कहा जाता है।
अब कॉन्फ्रेन्स आदि बुलाते हैं, कहते हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? वह तो अब हो रही है, आकर समझो। कौन कर रहे हैं? तुमको बाप का आक्यूपेशन सिद्ध कर बताना है। बाप के आक्यूपेशन और कृष्ण के आक्यूपेशन में बहुत फ़र्क है। और तो सबका नाम शरीर का ही लिया जाता है। उनकी आत्मा का नाम गाया जाता है। वह आत्मा बाप भी है, टीचर, गुरू भी है। आत्मा में नॉलेज है परन्तु वह दे कैसे? शरीर द्वारा ही देंगे ना। जब देते हैं तब तो महिमा गाई जाती है। अब शिव जयन्ती पर बच्चे कॉन्फ्रेन्स करते हैं। सब धर्म के नेताओं को बुलाते हैं। तुमको समझाना है ईश्वर सर्वव्यापी तो है नहीं। अगर सबमें ईश्वर है तो क्या हर एक आत्मा भगवान बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है! बताओ सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का नॉलेज है? यह तो कोई भी सुना न सके।
तुम बच्चों के अन्दर में आना चाहिए ऊंच ते ऊंच बाप की कितनी महिमा है। वह सारे विश्व को पावन बनाने वाला है। प्रकृति भी पावन बन जाती है। कान्फ्रेन्स में पहले-पहले तो तुम यह पूछेंगे कि गीता का भगवान् कौन है? सतयुगी देवी-देवता धर्म की स्थापना करने वाला कौन? अगर कृष्ण के लिए कहेंगे तो बाप को गुम कर देंगे या तो फिर कह देते वह नाम-रूप से न्यारा है। जैसेकि है ही नहीं। तो बाप बिगर आरफन्स ठहरे ना। बेहद के बाप को ही नहीं जानते। एक दो पर काम कटारी चलाकर कितना तंग करते हैं। एक-दो को दु:ख देते हैं। तो यह सब बातें तुम्हारी बुद्धि में चलनी चाहिए। कॉन्ट्रास्ट करना है-यह लक्ष्मी-नारायण भगवान-भगवती हैं ना, इन्हों की भी वंशावली है ना। तो जरूर सब ऐसे गॉड-गॉडेज होने चाहिए। तो तुम सब धर्म वालों को बुलाते हो। जो अच्छी रीति पढ़े-लिखे हैं, बाप का परिचय दे सकते हैं, उनको ही बुलाना है। तुम लिख सकते हो जो आकर रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का परिचय देवे उनके लिए हम आने-जाने, रहने आदि का सब प्रबन्ध करेंगे-अगर रचता और रचना का परिचय दिया तो। यह तो जानते हैं कोई भी यह ज्ञान दे नहीं सकते। भल कोई विलायत से आवे, रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का परिचय दिया तो हम खर्चा दे देंगे। ऐसी एडवरटाइज़ और कोई कर न सके। तुम तो बहादुर हो ना। महावीर-महावीरनियाँ हो। तुम जानते हो इन्हों ने (लक्ष्मी-नारायण) विश्व की बादशाही कैसे ली? कौन-सी बहादुरी की? बुद्धि में यह सब बातें आनी चाहिए। कितना तुम ऊंच कार्य कर रहे हो। सारे विश्व को पावन बना रहे हो। तो बाप को याद करना है, वर्सा भी याद करना है। सिर्फ यह नहीं कि शिवबाबा याद है। परन्तु उनकी महिमा भी बतानी है। यह महिमा है ही निराकार की। परन्तु निराकार अपना परिचय कैसे दे? जरूर रचना के आदि, मध्य, अन्त का नॉलेज देने लिए मुख चाहिए ना। मुख की कितनी महिमा है। मनुष्य गऊमुख पर जाते हैं, कितना धक्का खाते हैं। क्या-क्या बातें बना दी हैं। तीर मारा गंगा निकल आई। गंगा को समझते हैं पतित-पावनी। अब पानी कैसे पतित से पावन बना सकता। पतित-पावन तो बाप ही है। तो बाप तुम बच्चों को कितना सिखलाते रहते हैं। बाप तो कहते हैं ऐसे ऐसे करो। कौन आकर बाप रचयिता और रचना का परिचय देंगे। साधू-सन्यासी आदि यह भी जानते हैं कि ऋषि-मुनि आदि सब कहते थे-नेती-नेती, हम नहीं जानते हैं, गोया नास्तिक थे। अब देखो कोई आस्तिक निकलता है? अभी तुम बच्चे नास्तिक से आस्तिक बन रहे हो। तुम बेहद के बाप को जानते हो जो तुमको इतना ऊंच बनाते हैं। पुकारते भी हैं-ओ गॉड फादर, लिबरेट करो। बाप समझाते हैं, इस समय रावण का सारे विश्व पर राज्य है। सब भ्रष्टाचारी हैं फिर श्रेष्ठाचारी भी होंगे ना। तुम बच्चों की बुद्धि में है - पहले-पहले पवित्र दुनिया थी। बाप अपवित्र दुनिया थोड़ेही बनायेंगे। बाप तो आकर पावन दुनिया स्थापन करते हैं, जिसको शिवालय कहा जाता है। शिवबाबा शिवालय बनायेंगे ना। वह कैसे बनाते हैं सो भी तुम जानते हो। महाप्रलय, जलमई आदि तो होती नहीं। शास्त्रों में तो क्या-क्या लिखा है। बाकी 5 पाण्डव बचे जो हिमालय पहाड़ पर गल गये, फिर रिजल्ट का कोई को पता नहीं। यह सब बातें बाप बैठ समझाते हैं। यह भी तुम ही जानते हो-वह बाप, बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। वहाँ तो यह मन्दिर होते नहीं। यह देवतायें होकर गये हैं, जिनके यादगार मन्दिर यहाँ हैं। यह सब ड्रामा में नूँध है। सेकण्ड बाई सेकण्ड नई बात होती रहती है, चक्र फिरता रहता है। अब बाप बच्चों को डायरेक्शन तो बहुत अच्छे देते हैं। बहुत देह-अभिमानी बच्चे हैं जो समझते हैं हम तो सब कुछ जान गये हैं। मुरली भी नहीं पढ़ते हैं। कदर ही नहीं है। बाबा ताकीद करते हैं, कोई-कोई समय मुरली बहुत अच्छी चलती है। मिस नहीं करना चाहिए। 10-15 दिन की मुरली जो मिस होती है वह बैठ पढ़नी चाहिए। यह भी बाप कहते हैं ऐसी-ऐसी चैलेन्ज दो-यह रचता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का नॉलेज कोई आकर दे तो हम उनको खर्चा आदि सब देंगे। ऐसी चैलेन्ज तो जो जानते हैं वह देंगे ना। टीचर खुद जानता है तब तो पूछते हैं ना। बिगर जाने पूछेंगे कैसे।
कोई-कोई बच्चे मुरली की भी डोन्टकेयर करते हैं। बस हमारा तो शिवबाबा से ही कनेक्शन है। परन्तु शिवबाबा जो सुनाते हैं वह भी सुनना है ना कि सिर्फ उनको याद करना है। बाप कैसे अच्छी-अच्छी मीठी-मीठी बातें सुनाते हैं। परन्तु माया बिल्कुल ही मगरूर कर देती है। कहावत है ना-चूहे को हल्दी की गांठ मिली, समझा मै पंसारी हूँ.......। बहुत हैं जो मुरली पढ़ते ही नहीं। मुरली में तो नई-नई बातें निकलती हैं ना। तो यह सब बातें समझने की हैं। जब बाप की याद में बैठते हो तो यह भी याद करना है कि वह बाप टीचर भी है और सतगुरू भी है। नहीं तो पढ़ेंगे कहाँ से। बाप ने तो बच्चों को सब समझा दिया है। बच्चे ही बाप का शो करेंगे। सन शोज़ फादर। सन का फिर फादर शो करते हैं। आत्मा का शो करते हैं। फिर बच्चों का काम है बाप का शो करना। बाप भी बच्चों को छोड़ते नहीं हैं, कहेंगे आज फलानी जगह जाओ, आज यहाँ जाओ। इनको थोड़ेही कोई ऑर्डर करने वाले होंगे। तो यह निमंत्रण आदि अखबारों में पड़ेंगे। इस समय सारी दुनिया है नास्तिक। बाप ही आकर आस्तिक बनाते हैं। इस समय सारी दुनिया है वर्थ नाट ए पेनी। अमेरिका के पास भल कितना भी धन दौलत है परन्तु वर्थ नाट ए पेनी है। यह तो सब खत्म हो जाना है ना। सारी दुनिया में तुम वर्थ पाउण्ड बन रहे हो। वहाँ कोई कंगाल होगा नहीं।
तुम बच्चों को सदैव ज्ञान का सिमरण कर हर्षित रहना चाहिए। उसके लिए ही गायन है-अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो। यह संगम की ही बातें हैं। संगमयुग को कोई भी जानते नहीं। विहंग मार्ग की सर्विस करने से शायद महिमा निकले। गायन भी है अहो प्रभू तेरी लीला। यह कोई भी नहीं जानते थे कि भगवान बाप, टीचर, सतगुरू भी है। अब फादर तो बच्चों को सिखलाते रहते हैं। बच्चों को यह नशा स्थाई रहना चाहिए। अन्त तक नशा रहना चाहिए। अभी तो नशा झट सोडावाटर हो जाता है। सोडा भी ऐसे होता है ना। थोड़ा टाइम रखने से जैसे खारापानी हो जाता है। ऐसा तो नहीं होना चाहिए। किसको ऐसा समझाओ जो वह भी वन्डर खाये। अच्छा-अच्छा कहते भी हैं परन्तु वह फिर टाइम निकाल समझें, जीवन बनावें वह बड़ा मुश्किल है। बाबा कोई मना नहीं करते हैं कि धन्धा आदि नहीं करो। पवित्र बनो और जो पढ़ाता हूँ वह याद करो। यह तो टीचर है ना। और यह है अनकॉमन पढ़ाई। कोई मनुष्य नहीं पढ़ा सकते। बाप ही भाग्यशाली रथ पर आकर पढ़ाते हैं। बाप ने समझाया है - यह तुम्हारा तख्त है जिस पर अकाल मूर्त आत्मा आकर बैठती है। उनको यह सारा पार्ट मिला हुआ है। अभी तुम समझते हो यह तो रीयल बात है। बाकी यह सब हैं आर्टीफिशल बातें। यह अच्छी रीति धारण कर गांठ बाँध लो। तो हाथ लगने से याद आयेगा। परन्तु गाँठ क्यों बाँधी है, वह भी भूल जाते हैं। तुमको तो यह पक्का याद करना है। बाप की याद के साथ नॉलेज भी चाहिए। मुक्ति भी हैं तो जीवनमुक्ति भी है। बहुत मीठे-मीठे बच्चे बनो। बाबा अन्दर में समझते हैं कल्प-कल्प यह बच्चे पढ़ते रहते हैं। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ही वर्सा लेंगे। फिर भी पढ़ाने का टीचर पुरूषार्थ तो करायेंगे ना। तुम घड़ी-घड़ी भूल जाते हो इसलिए याद कराया जाता है। शिवबाबा को याद करो। वह बाप, टीचर, सतगुरू भी है। छोटे बच्चे ऐसे याद नहीं करेंगे। कृष्ण के लिए थोड़ेही कहेंगे वह बाप, टीचर, सतगुरू है। सतयुग का प्रिन्स श्रीकृष्ण वह फिर गुरू कैसे बनेगा। गुरू चाहिए दुर्गति में। गायन भी है - बाप आकर सबकी सद्गति करते हैं। कृष्ण को तो सांवरा ऐसा बना देते जैसे काला कोयला। बाप कहते हैं इस समय सब काम चिता पर चढ़ काले कोयले बन पड़े हैं तब सांवरा कहा जाता है। कितनी गुह्य बातें समझने की हैं। गीता तो सब पढ़ते हैं। भारतवासी ही हैं जो सभी शास्त्रों को मानते हैं। सबके चित्र रखते रहेंगे। तो उनको क्या कहेंगे? व्यभिचारी भक्ति ठहरी ना। अव्यभिचारी भक्ति एक ही शिव की है। ज्ञान भी एक ही शिवबाबा से मिलता है। यह ज्ञान ही डिफरेन्ट है, इसको कहा जाता है स्प्रीचुअल नॉलेज। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुड मॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) विनाशी नशे को छोड़ अलौकिक नशा रहे कि हम अभी वर्थ नाट पेनी से वर्थ पाउण्ड बन रहे है। स्वयं भगवान् हमें पढ़ाते हैं, हमारी पढ़ाई अनकॉमन है।

2) आस्तिक बन बाप का शो करने वाली सर्विस करनी है। कभी भी मगरूर बन मुरली मिस नहीं करनी है।

वरदान:

हर कदम में वरदाता से वरदान प्राप्त कर मेहनत से मुक्त रहने वाले अधिकारी आत्मा भव

जो हैं ही वरदाता के बच्चे उन्हों को हर कदम में वरदाता से वरदान स्वत: ही मिलते हैं। वरदान ही उनकी पालना है। वरदानों की पालना से ही पलते हैं। बिना मेहनत के इतनी श्रेष्ठ प्राप्तियां होना इसे ही वरदान कहा जाता है। तो जन्म-जन्म प्राप्ति के अधिकारी बन गये। हर कदम में वरदाता का वरदान मिल रहा है और सदा ही मिलता रहेगा। अधिकारी आत्मा के लिए दृष्टि से, बोल से, संबंध से वरदान ही वरदान है।

स्लोगन:

समय की रफ्तार के प्रमाण पुरुषार्थ की रफ्तार तीव्र करो।

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