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25-06-2019

25-06-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम साहेबजादे सो शहजादे बनने वाले हो, तुम्हें किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखनी है, किसी से कुछ भी मांगना नहीं है''

प्रश्नः-

तबियत को ठीक रखने के लिए कौन-सा आधार नहीं चाहिए?

उत्तर:-

कई बच्चे समझते हैं वैभवों के आधार पर तबियत ठीक रहेगी। परन्तु बाबा कहते हैं बच्चे यहाँ तुम्हें वैभवों की इच्छा नहीं रखनी चाहिए। वैभवों से तबियत ठीक नहीं होगी। तबियत ठीक रखने के लिए तो याद की यात्रा चाहिए। कहा जाता है खुशी जैसी खुराक नहीं। तुम खुश रहो, नशे में रहो। यज्ञ में दधीचि ऋषि के मिसल हड्डियां दो तो तबियत ठीक हो जायेगी।

ओम् शान्ति।

बाप को कहा जाता है करनकरावनहार। तुम साहेबजादे हो। तुम्हारा इस सृष्टि में ऊंचे ते ऊंचा पोजीशन है। तुम बच्चों को नशा रहना चाहिए कि हम साहेबजादे, साहेब की मत पर अब फिर से अपना राज्य-भाग्य स्थापन कर रहे हैं। यह भी किसकी बुद्धि में याद नहीं रहता है। बाबा सभी सेन्टर्स के बच्चों के लिए कहते हैं। अनेक सेन्टर्स हैं, अनेक बच्चे आते हैं। हर एक की बुद्धि में सदैव याद रहे कि हम बाबा की श्रीमत पर फिर से विश्व में शान्ति-सुख का राज्य स्थापन कर रहे हैं। सुख और शान्ति यह दो अक्षर ही याद करने हैं। तुम बच्चों को कितना ज्ञान मिलता है, तुम्हारी बुद्धि कितनी विशाल होनी चाहिए, इसमें जामड़ी बुद्धि नही चल सकती। अपने को साहेबजादे समझो तो पाप खत्म हो जाएं। बहुत हैं जिनको सारा दिन बाप की याद नहीं रहती है। बाबा कहते तुम्हारी बुद्धि डल क्यों हो जाती है? सेन्टर्स पर ऐसे-ऐसे बच्चे आते हैं, जिनकी बुद्धि में है ही नहीं कि हम श्रीमत पर विश्व में अपना दैवी राज्य स्थापन कर रहे हैं। अन्दर में वह नशा, फलक होनी चाहिए। मुरली सुनने से रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। यहाँ तो बाबा देखते हैं बच्चों के और ही रोमांच डेड रहते हैं, ढेर बच्चे हैं जिनकी बुद्धि में यह याद नहीं रहता है कि हम श्रीमत पर बाबा की याद से विकर्म विनाश कर अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। रोज़ बाबा समझाते हैं - बच्चे, तुम वारियर्स हो, रावण पर जीत पाने वाले हो। बाप तुम्हें मन्दिर लायक बनाते हैं परन्तु इतना नशा वा खुशी बच्चों को रहती थोड़ेही है, कोई चीज़ नहीं मिली तो बस रूठ पड़ेंगे। बाबा को तो वन्डर लगता है बच्चों की अवस्था पर। माया की जंजीरों में फंस पड़ते हैं। तुम्हारा मान, तुम्हारी कारोबार, तुम्हारी खुशी तो वन्डरफुल होनी चाहिए। जो मित्र सम्बन्धियों को नहीं भूलते हैं वह कभी बाप को याद कर नहीं सकेंगे। फिर क्या पद पायेंगे! वन्डर लगता है।

तुम बच्चों में तो बड़ा नशा चाहिए। अपने को साहेबजादे समझो तो कुछ भी मांगने की परवाह न रहे। बाबा तो हमको इतना अथाह खजाना देते हैं जो 21 जन्म तक कुछ भी मांगने का ही नहीं है, इतना नशा रहना चाहिए। परन्तु बिल्कुल ही डल, जामड़ी बुद्धि है। तुम बच्चों की बुद्धि तो 7 फुट लम्बी होनी चाहिए। मनुष्य की लम्बाई अधिक से अधिक 6-7 फुट होती है। बाबा बच्चों को कितना हुल्लास में लाते हैं - तुम साहेबज़ादे हो, दुनिया के लोग तो कुछ भी समझते नहीं। उनको तुम समझाते हो कि सिर्फ तुम यह समझो हम बाप के सामने बैठे हैं, बाप को याद करते रहेंगे तो विकर्म विनाश होंगे। बाप समझाते हैं बच्चे, माया तुम्हारा बहुत कड़ा दुश्मन है, दूसरों का इतना दुश्मन नहीं है, जितना तुम्हारा है। मनुष्य तो जानते ही नहीं, तुच्छ बुद्धि हैं। बाबा रोज़-रोज़ तुम बच्चों को कहते हैं तुम साहेबजादे हो, बाप को याद करो और दूसरों को आप-समान बनाते रहो। तुम सबको यह भी समझा सकते हो कि भगवान् तो सच्चा साहेब है ना। तो हम उनके बच्चे साहेबजादे ठहरे, तुम बच्चों को चलते-फिरते बुद्धि में यही याद रखना है। सर्विस में दधीचि ऋषि मिसल हड्डियाँ भी दे देनी चाहिए। यहाँ हड्डी देना तो क्या और ही अथाह सुख वैभव चाहिए। तबियत कोई इन चीजों से थोड़ेही अच्छी होती है। तबियत के लिए चाहिए याद की यात्रा। वह खुशी रहनी चाहिए। अरे, हम तो कल्प-कल्प माया से हारते आये, अभी माया पर जीत पाते हैं। बाप आकर जीत पहनाते हैं। अभी भारत में कितना दु:ख है, अथाह दु:ख देने वाला है रावण। वो लोग समझते हैं एरोप्लेन हैं, मोटरें महल हैं, बस, यही स्वर्ग है। यह नहीं समझते कि यह तो दुनिया ही खलास होनी है। लाखों, करोड़ों खर्चा करते, डैम आदि बनाते, लड़ाई का सामान भी कितना ले रहे हैं। यह एक-दो का खात्मा करने वाले हैं, निधनके हैं ना। कितना लड़ाई झगड़ा करते हैं, बात मत पूछो। कितना किचड़ा लगा पड़ा है। इसको कहा जाता है नर्क। स्वर्ग की तो बड़ी महिमा है। बड़ौदा की महारानी से पूछो महाराजा कहाँ गया? तो कहेंगे स्वर्गवासी हुआ। स्वर्ग किसको कहा जाता है - यह कोई जानते नहीं, कितना घोर अन्धियारा हैं। तुम भी घोर अन्धियारे में थे। अब बाप कहते हैं तुमको ईश्वरीय बुद्धि देता हूँ। अपने को ईश्वरीय सन्तान साहेबजादे समझो। साहेब पढ़ाते हैं शहज़ादा बनाने के लिए। बाबा कहावत सुनाते हैं ना रिढ़ छा जाने.... (भेड़ क्या समझे) अभी तुम समझते हो - मनुष्य भी सब भेड़ बकरियों की तरह हैं, कुछ भी नहीं जानते हैं। क्या-क्या बैठ उपमा करते हैं। तुम्हारी बुद्धि में आदि-मध्य-अन्त का राज़ है। अच्छी रीति याद करो कि हम विश्व में सुख-शान्ति स्थापन कर रहे हैं। जो मददगार बनेंगे वही ऊंच पद पायेंगे। वह भी तुम देखते हो कि कौन-कौन मददगार बनते हैं। अपनी दिल से हर एक पूछे कि हम क्या कर रहे हैं? हम भेड़-बकरी तो नही हैं? मनुष्यों में अहंकार देखो कितना है, गुर्र-गुर्र करने लग पड़ते हैं। तुमको तो बाप की याद रहनी चाहिए। सर्विस में हडिड्याँ देनी है, किसी को नाराज़ नहीं करना है, न होना है। अहंकार भी नहीं आना चाहिए। हम यह करते, हम इतने होशियार हैं, यह ख्याल आना भी देह-अभिमान है। उसकी चलन ही ऐसी हो जाती, जो शर्म आ जायेगी। नहीं तो तुम्हारे जैसा सुख और कोई को हो न सके। यह बुद्धि में याद रहे तो तुम चमकते रहो। सेन्टर में कोई तो अच्छे महारथी हैं, कोई घोड़ेसवार, प्यादे भी हैं। इसमे बड़ी विशाल बुद्धि होनी चाहिए। कैसी-कैसी ब्राह्मणियाँ हैं, कोई तो बड़ी मददगार हैं, सर्विस में कितनी खुशी रहती है। तुमको नशा चढ़ना चाहिए। सर्विस बिगर क्या पद पायेंगे। माँ-बाप को तो बच्चों के लिए रिगॉर्ड रहता है। परन्तु वह अपना खुद रिगार्ड नहीं रखते तो बाबा क्या कहेंगे।

तुम बच्चों को थोड़े में ही सबको बाप का सन्देश देना है। बोलो, बाप कहते हैं मनमनाभव। गीता में कुछ अक्षर है आटे में लून (नमक)। यह ह्यूज़ दुनिया कितनी बड़ी है, बुद्धि में आना चाहिए। कितनी बड़ी दुनिया है, कितने मनुष्य हैं, यह फिर कुछ भी नहीं रहेंगे। कोई खण्ड का नाम निशान नहीं होगा। हम स्वर्ग के मालिक बनते ह़ैं यह दिन-रात खुशी रहनी चाहिए। नॉलेज तो बहुत सहज है, समझाने वाले बड़े रमज़-बाज़ चाहिए। अनेक प्रकार की युक्तियाँ हैं। बाप कहते हैं मैं तुमको बहुत डिप्लोमैट बनाता हूँ। वह डिप्लोमैट एम्बेसेडर को कहते हैं। तो बच्चों की बुद्धि में याद रहना चाहिए। ओहो! बेहद का बाप हमको डायरेक्शन देते हैं, तुम धारण कर औरों को भी बाप का परिचय देते हो। सिवाए तुम्हारे बाकी सारी दुनिया नास्तिक है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। कोई तो नास्तिक भी हैं ना। बाप को याद ही नहीं करते। खुद कहते हैं बाबा हमको याद भूल जाती है, तो नास्तिक ठहरे ना। ऐसा बाप जो साहेबज़ादा बनाते, वह याद नहीं आता है! यह समझने में भी बड़ी विशालबुद्धि चाहिए। बाप कहते हैं मैं हर 5 हज़ार वर्ष बाद आता हूँ। तुम्हारे द्वारा ही कार्य कराता हूँ। तुम वारियर्स कितने अच्छे हो। 'वन्दे मातरम्' तुम गाये जाते हो। तुम ही पूज्य थे फिर पुजारी बने हो। अब श्रीमत पर फिर से पूज्य बन रहे हो। तो तुम बच्चों को बड़ा शान्ति से सर्विस करनी है। तुम्हें अशान्ति नहीं होनी चाहिए। जिनकी रग-रग में भूत भरे हुए हैं, वह क्या पद पायेंगे। लोभ भी बड़ा भूत है। बाबा सब देखते रहते हैं हर एक की चलन कैसी है। बाबा कितना नशा चढ़ाते हैं, कोई सर्विस नहीं करते, सिर्फ खाते-पीते रहते तो फिर 21 जन्म सर्विस करनी पड़ेगी। दास-दासियां भी तो बनेंगे ना। पिछाड़ी में सबको साक्षात्कार होना है। दिल पर तो सर्विसएबुल ही चढ़ेंगे। तुम्हारी सर्विस ही यह है - किसको अमरलोक का वासी बनाना। बाबा हिम्मत तो बहुत दिलाते हैं, धारणा करो, देह-अभिमानियों को धारणा हो नहीं सकती। तुम जानते हो बाप को याद कर हम वेश्यालय से शिवालय में जाते हैं, तो ऐसा बनकर भी दिखाना है।

बाबा तो चिट्ठियों में लिखते हैं - लाडले रूहानी साहेबजादों, अब श्रीमत पर चलेंगे, महारथी बनेंगे तो शहज़ादे जरूर बनेंगे। एम ऑब्जेक्ट ही यह है। एक ही सच्चा बाबा तुमको सब बातें अच्छी रीति समझा रहे हैं। सर्विस कर औरों का कल्याण भी करते रहो। योगबल नहीं तो फिर इच्छायें होती हैं, यह चाहिए, वह चाहिए। वह खुशी नहीं रहती, कहा जाता खुशी जैसी खुराक नहीं। साहेबजादों को तो बहुत खुशी रहनी चाहिए। वह नहीं है तो फिर अनेक प्रकार की बातें आती हैं। अरे, बाप विश्व की बादशाही दे रहे हैं, बाकी और क्या चाहिए! हरेक अपनी दिल से पूछे कि हम इतने मीठे बाबा की क्या सर्विस करते हैं? बाप कहते हैं सबको मैसेज देते जाओ - साहेब आया हुआ है। वास्तव में तो तुम सब ब्रदर्स हो। भल कहते हैं हम सब भाई-भाई को मदद करनी चाहिए। इस ख्याल से भाई कह देते हैं। यहाँ तो बाप कहते हैं - तुम एक बाप के बच्चे भाई-भाई हो। बाप है ही स्वर्ग की स्थापना करने वाला। हेविन बनाते हैं बच्चों द्वारा। सर्विस की युक्तियाँ तो बहुत समझाते हैं। मित्र-सम्बन्धियों को भी समझाना है। देखो, बच्चे विलायत में हैं वह भी सर्विस कर रहे हैं। दिन-प्रतिदिन लोग आ़फतें देखकर समझेंगे - मरने के पहले वर्सा तो ले लें। बच्चे अपने मित्र-सम्बन्धियों को भी उठा रहे हैं। पवित्र भी रहते हैं। बाकी निरन्तर भाई-भाई की अवस्था रहे, वह मुश्किल है। बाप ने तो बच्चों को साहेबज़ादे का टाइटिल कितना अच्छा दिया है। अपने को देखना चाहिए। सर्विस नहीं करेंगे तो हम क्या बनेंगे? अगर कोई ने जमा किया तो वह खाते-खाते चुक्तू हो गया और ही उनके खाते में चढ़ता है। सर्विस करने वाले को कभी यह ख्याल भी न आये कि हमने इतना दिया, उनसे सबकी परवरिश होती है इसलिए मदद करने वालों की खातिरी भी की जाती है, समझाना चाहिए वह खिलाने वाले हैं। रूहानी बच्चे तुमको खिलाते हैं। तुम उनकी सेवा करते हो, यह बड़ा हिसाब है। मन्सा, वाचा, कर्मणा उन्हों की सर्विस ही नहीं करेंगे तो वह खुशी कैसे होगी। शिवबाबा को याद कर भोजन बनाते हैं तो उनकी ताकत मिलेगी। दिल से पूछना है हम सबको राज़ी करते हैं? महारथी बच्चे कितनी सर्विस कर रहे हैं। बाबा रैगजीन पर चित्र बनवाते हैं, यह चित्र कभी टूटेंगे-फूटेंगे नहीं। बाबा के बच्चे बैठे हैं, आपेही भेज देंगे। बाप फिर पैसे कहाँ से लायेंगे। यह सब सेन्टर्स कैसे चलते हैं? बच्चे ही चलाते हैं ना। शिवबाबा कहते हैं मेरे पास तो एक कौड़ी भी नहीं है। आगे चलकर तुमको आपेही आकर कहेंगे हमारे मकान तुम काम में लगाओ। तुम कहेंगे अब टू लेट। बाप है ही गरीब निवाज। गरीबों के पास कहाँ से आये। कोई तो करोड़पति, पदमपति भी हैं। उन्हों के लिए यहाँ ही स्वर्ग है। यह है माया का पाम्प। उनका फाल हो रहा है। बाप कहते हैं तुम पहले साहेबजादे बने हो फिर शहजादे जाकर बनेंगे। परन्तु इतनी सर्विस भी करके दिखाओ ना। बहुत खुशी में रहना चाहिए। हम साहेबजादे हैं फिर शहजादे बनने वाले हैं। शहजादे तब बनेंगे जब बहुतों की सर्विस करेंगे। कितनी खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) किसी को कभी न तो नाराज़ करना है, न नाराज़ होना है। अपनी होशियारी का या सेवा करने का अहंकार नहीं दिखाना है। जैसे बाप बच्चों का रिगॉर्ड रखते हैं ऐसे स्वयं का रिगार्ड स्वयं ही रखना है।

2) योगबल से अपनी सब इच्छायें समाप्त करनी है। सदा इसी खुशी वा नशे में रहना है कि हम साहेबजादे सो शहजादे बनने वाले हैं। सदा शान्ति में रह सर्विस करनी है। रग-रग में जो भूत भरे हुए हैं, उन्हें निकाल देना है।

वरदान:-

हद की रॉयल इच्छाओं से मुक्त रह सेवा करने वाले नि:स्वार्थ सेवाधारी भव

जैसे ब्रह्मा बाप ने कर्म के बन्धन से मुक्त, न्यारे बनने का सबूत दिया। सिवाए सेवा के स्नेह के और कोई बन्धन नहीं। सेवा में जो हद की रायॅल इच्छायें होती हैं वह भी हिसाब-किताब के बन्धन में बांधती हैं, सच्चे सेवाधारी इस हिसाब-किताब से भी मुक्त रहते हैं। जैसे देह का बन्धन, देह के संबंध का बंधन है, ऐसे सेवा में स्वार्थ - यह भी बंधन है। इस बन्धन से वा रॉयल हिसाब-किताब से भी मुक्त नि:स्वार्थ सेवाधारी बनो।

स्लोगन:-

वायदों को फाइल में नहीं रखो, फाइनल बनकर दिखाओ।

24-06-2019

24-06-2019        प्रात:मुरली        ओम् शान्ति       "बापदादा"      मधुबन


(प्रात:क्लास में सुनाने के लिए मातेश्वरी जी के मधुर महावाक्य)


गीत:- 
यह मेरा छोटा-सा संसार है... 

ओम् शान्ति। 
नॉलेजफुल, बेहद का बाप आत्माओं से बात करते हैं। आत्माओं की जो ओरीज्नल स्टेज थी अभी वह कुछ और हो गई है। ऐसे नहीं कहेंगे कि आत्मा सदा से एक ही स्टेज में है। आत्मा भले अनादि है परन्तु उसकी स्टेज बदलती है, जैसे-जैसे समय बीतता जाता है तो उनकी स्थिति बदलती जाती है, वैसे आत्मा अनादि अविनाशी है, लेकिन आत्मा जैसा कर्म करती है वैसा फल पाती है। तो करने वाली रेसपान्सिबुल आत्मा है। तो अभी बाप भी उनसे बात करते हैं, यह तो सबकी बुद्धि में है कि आत्मा का पिता परमपिता परमात्मा है।

जब पिता कहते हैं तो जरूर हम उसके पुत्र ठहरे, ऐसे नहीं वो पिता है तो हम भी पिता है। अगर आत्मा सो परमात्मा कहें तो आत्मा को ही परमपिता भी कहें। परन्तु पिता और पुत्र के रिलेशन में पिता कहने में आता है। अगर हम सब भी पितायें है तो फिर पिता कहेगा कौन! जरूर पुत्र और पिता दो चीज़ हैं। पिता कहने का सम्बन्ध पुत्र से बनता है और पुत्र के सम्बन्ध में ही पिता का सम्बन्ध आता है। तो उनको कहा ही जाता है परम पिता परम आत्मा। अभी वह बाप बैठ करके समझाते हैं कि अभी तुम्हारी जो स्थिति है और जो पहले स्थिति थी, उसमें फर्क है। अभी मैं आया हूँ उसी फर्क को मिटाने के लिए। बाप समझ दे करके समझाते हैं कि तुम्हारी जो ओरीज्नल स्टेज थी, अभी उसी को पकड़ लो। कैसे पकड़ो, उसका ज्ञान भी दे रहे हैं तो बल भी दे रहे हैं। कहते हैं तुम मुझे याद करो तो श्रेष्ठ कर्म करने का बल आयेगा, नहीं तो तुम्हारे कर्म श्रेष्ठ नहीं रहेंगे। कई कहते हैं कि हम चाहते हैं कि अच्छा काम करें लेकिन पता नहीं फिर क्या होता है जो हमारा मन अच्छे तरफ लगता नहीं है, दूसरी तरफ लग जाता है क्योंकि आत्मा में अच्छे कर्म करने का बल नहीं है। हमारी स्थिति तमोप्रधान होने के कारण तमो का प्रभाव अभी जोर से है, जो हमको दबाता है इसलिए बुद्धि उसी तरफ जल्दी चली जाती है और अच्छे तरफ बुद्धि जाने में रूकावट आती है। तो बाप कहते हैं अभी मेरे से योग लगाओ और जो मैं समझ देता हूँ, उसी आधार से अपने पापों का जो बोझा है, बन्धन है, जो रूकावटें बन सामने आती हैं उससे अपना रास्ता साफ करते चलो। फिर श्रेष्ठ कर्म करते रहेंगे तो तुम्हारे में सतोप्रधानता की वह पॉवर आती जायेगी, उसी आधार से तुम फिर से उस स्थिति को प्राप्त करेंगे जो तुम्हारी असुल थी।

फिर जैसी आत्मा वैसा शरीर भी मिलेगा और संसार भी वैसा ही होगा। तो ऐसा संसार अभी परमपिता परमात्मा बनाते हैं इसलिए उसको कहा जाता है वर्ल्ड क्रियेटर, परन्तु ऐसे नहीं कि दुनिया कभी है ही नहीं जो बैठ करके बनाते हैं, लेकिन ऐसी और इस तरीके से दुनिया बनाते हैं। दूसरे किसी को भी दुनिया बनाने वाला नहीं कहेंगे, क्राइस्ट आया, बुद्ध आया तो उसने अपना नया धर्म स्थापन किया लेकिन दुनिया को बदलना और दुनिया बनाना, यह काम उसका है जो वर्ल्ड क्रियेटर, वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी है। तो यह भी समझना है कि उनका कर्तव्य सभी आत्माओं से भिन्न है, लेकिन वह भी अपना कर्तव्य वा एक्ट अन्य आत्माओं की तरह इस मनुष्य सृष्टि में ही आ करके करते हैं। बाकी तो हरेक आत्मा का एक्ट अपना चलता है, ऐसे नहीं कहेंगे कि यह सभी एक्ट परमात्मा का ही चलता है, यह हरेक आत्मा का अपना-अपना कर्म का खाता चलता है, जो करते हैं सो पाते हैं, उसमें फिर कई अच्छी आत्मायें भी हैं, जैसे क्राइस्ट, बुद्ध आये, इस्लामी आये, गांधी आया, जो जो अच्छे अच्छे आये वे सब अपना-अपना पार्ट प्ले करके गये। इसी तरह से आप आत्माओं का भी बहुत जन्मों का पार्ट है। एक शरीर छोड़ा दूसरा लिया, हर एक का जितने भी जन्मों का हिसाब होगा, आत्मा वह पार्ट बजाती है। आत्मा में सारा रिकॉर्ड भरा हुआ है, जो वो प्ले करती है। यह है प्ले करने का स्थान, इसलिये इसको नाटक भी कहते हैं, ड्रामा भी कहते हैं। इसमें एक बार परमात्मा का भी एक्ट है, इसलिये उनके एक्ट की महिमा सबसे ऊंच है। लेकिन ऊंचा किसमें हैं? वह आ करके हमारी दुनिया को बदलते हैं।

यह है ही कर्म का खेत, जहाँ हरेक मनुष्य आत्मा अपना-अपना पार्ट प्ले करती है। इसमें परमात्मा का भी पार्ट है लेकिन वह आत्माओं के सदृश्य जन्म-मरण में नहीं आते हैं। आत्माओं के सदृश्य उनके कर्म का खाता उल्टा नहीं बनता है। वह कहते हैं मैं तो सिर्फ तुम आत्माओं को लिबरेट करने आता हूँ इसीलिये मुझे लिब्रेटर, बन्धन से छुड़ाने वाला गति सद्गति दाता कहते हैं।

आत्मा पर माया का जो बन्धन चढ़ा है, उसे उतारकर प्युअर बनाते हैं और कहते हैं कि मेरा काम है आत्माओं को सर्व बन्धनों से छुड़ा करके वापस ले जाना, तो सृष्टि के जो अनादि नियम और कायदे हैं उन्हें भी समझना है, फिर इस मनुष्य सृष्टि की वृद्धि किस तरह से होती है, फिर वह टाइम भी आता है जब यह कम होती है। ऐसे नहीं कि बढ़ती है तो बढ़ती ही जाती है, नहीं। कम भी होती है। तो सृष्टि में हर चीज़ का नियम है। अपने शरीर का भी नियम है, पहले बाल, फिर किशोर, फिर युवा, फिर वृद्ध। तो वृद्ध भी जल्दी नहीं, वृद्ध होते-होते जड़जड़ीभूत हो जाते हैं तो हर बात का बढ़ना और उसका अन्त होना, यह भी नियम है। इसी तरह से सृष्टि की जनरेशन्स का भी नियम है। एक जीवन की भी स्टेजेज़ हैं तो फिर जन्मों की भी स्टेजेज़ हैं, फिर जनरेशन्स भी जो चली उसकी भी स्टेजेज़ हैं, इसी तरह सभी धर्मों की भी स्टेजेज़ हैं। पहला जो धर्म है वह सबसे ताकत वाला है, पीछे आहिस्ते-आहिस्ते जो आते हैं, उनकी ताकत कम होती जाती है। तो धर्मों का बंटना, धर्मों का चलना, हरेक बात नियमों से चलती है, इन सब बातों को भी समझना है।

इसी हिसाब से बाप भी कहते हैं मेरा भी इसमें पार्ट है। मैं भी एक सोल हूँ, मैं गॉड कोई दूसरी चीज़ नहीं हूँ। मैं भी सोल ही हूँ परन्तु मेरा काम बहुत बड़ा और ऊंचा है इसलिये मुझे गॉड कहते हैं। जैसी तुम आत्मा हो मैं भी वैसा ही हूँ। जैसे आपका बच्चा है वो भी तो मनुष्य है, आप भी तो मनुष्य हो, उसमें तो कोई फर्क नहीं है ना। तो मैं भी आत्मा ही हूँ, आत्मा, आत्मा में कोई फर्क नहीं है लेकिन कर्तव्य में बहुत भारी फर्क है इसीलिये कहते हैं मेरा जो कर्तव्य है वह सबसे भिन्न है। मैं कोई हद के एक धर्म का स्थापक नहीं हूँ, मैं तो दुनिया का क्रियेटर हूँ, वो हो गये धर्म के क्रियेटर। जैसे वो आत्मायें अपना काम अपने समय पर करती हैं, वैसे मैं भी अपने समय पर आता हूँ। मेरा कर्तव्य विशाल है, मेरा कर्तव्य महान है और सबसे निराला है इसलिये कहते हैं तेरे काम निराले। उनको सर्वशक्तिवान भी कहते हैं, सबसे शक्तिशाली काम है आत्माओं को माया के बंधनों से छुड़ाना और नई दुनिया का सैपलिंग लगाना इसलिए उनको अंग्रेजी में कहते हैं हेविनली गॉड फादर। जैसे क्राइस्ट को कहेंगे क्रिश्चियनिटी का फादर, उनको हेविनली गॉड फादर नहीं कहेंगे। हेविन का स्थापक परमात्मा है। तो हेविन वर्ल्ड हो गई ना, हेविन कोई एक धर्म नहीं है। तो वह वर्ल्ड का स्थापक हो गया और उस वर्ल्ड में एक धर्म, एक राज्य होगा, तत्व आदि सब चेन्ज हो जायेंगे इसलिये बाप को कहते हैं हेविनली गॉड फादर।

दूसरा, गॉड इज़ ट्रूथ कहते हैं, तो ट्रूथ क्या चीज़ है, किसमें ट्रूथ? यह भी समझने की बात है। कई समझते हैं कि जो सच बोलता है वही गॉड है। गॉड कोई और चीज़ नहीं है, बस सच बोलना चाहिए। परन्तु नहीं, गॉड इज ट्रूथ का मतलब ही है कि गॉड ने ही आ करके सभी बातों की सच्चाई बताई है, गॉड इज ट्रूथ माना गॉड ही ट्रूथ बतलाता है, उसमें ही सच्चाई है, तब तो उनको नॉलेजफुल कहते हैं। ओशन ऑफ नॉलेज, ओशन ऑफ ब्लिस, गॉड नोज़, (ईश्वर जानता है)... तो जरूर विशेष कुछ जानने की बात है ना! तो वह कौनसी जानकारी है? यह नहीं कि इसने चोरी की, गॉड नोज़। भले वह जानता सबकुछ है परन्तु उसकी महिमा जो है ना, वह इसी पर है कि हमारी दुनिया जो नीचे गिरी है वह ऊंची कैसे चढ़े, इस चक्र की बातों को वह जानता है इसलिये कहते हैं गॉड नोज़। तो परमात्मा की महिमा उस तरीके से आती है जो मनुष्य से भिन्न है क्योंकि उनका जानना सबसे भिन्न है। मनुष्य का जानना हद है, कहते भी हैं मनुष्य अल्पज्ञ है और परमात्मा के लिए कहते हैं वह सर्वज्ञ है, जिसको अंग्रेजी में नॉलेजफुल कहते हैं यानि सर्व का ज्ञाता अथवा जानने वाला है। तो जो सर्वज्ञ है वही ट्रूथ को जान सकता है, यथार्थ बातों की नॉलेज जिसके पास होगी, जरूर वह सबको देगा ना। अगर खुद जाने, दूसरों को न दे तो उससे हमें क्या फायदा! जानने दो। परन्तु नहीं। उसके जानकारी से हमें कोई फायदा मिला है, तब तो हम उसकी क्वालिफिकेशन्स गाते हैं। उसके पीछे पड़ते हैं। कभी कुछ भी होता है तो कहते हैं हे भगवान! अब तू यह कर! खैर कर, रहम कर, मेरा दु:ख दूर कर, तो हम उससे मांगते हैं ना। उससे कुछ सम्बन्ध है ना इसलिए उस तरीके से याद करते हैं, जैसे उसने हमारे पर कोई एहसान किया है। अगर कभी किया ही नहीं होता तो हम क्यों उसके लिये माथाकुटी करते। जब कोई मुसीबत के समय मदद करता है तो दिल में आता है कि इसने बड़ी मुसीबत के समय मुझे हेल्प की थी। समय पर मेरी रक्षा की थी, तो उसके प्रति दिल में प्रेम रहता है। तो परमात्मा के प्रति भी ऐसा ही प्रेम आता है कि उसने हमारी समय पर मदद की है। परन्तु ऐसे नहीं कि कभी कोई मनुष्य का अच्छा हो गया तो कहें यह भगवान ने किया... बस भगवान ऐसा ही करता है। लेकिन उसका बड़ा काम है, वर्ल्ड का काम है, दुनिया के सम्बन्ध की बात है। बाकी ऐसे नहीं कि किसी को थोड़ा पैसा मिल गया, यह भगवान ने किया, यह तो हम भी अच्छे कर्म करते हैं, तो उस कर्म का फल मिलता है। अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब चलता है, उसका भी हम पाते रहते हैं लेकिन परमात्मा ने आ करके जो कर्म सिखाया उसका जो फल है, वह अलग है। अल्पकाल का सुख तो बुद्धि के आधार पर भी मिलता है। परन्तु उसने जो नॉलेज दी उससे हम सदा सुख पाते हैं। तो परमात्मा का काम भिन्न हो गया ना इसलिए कहते हैं कि मैं ही आ करके कर्म की जो यथार्थ नॉलेज है वो सिखाता हूँ, जिसको कहा है कर्मयोग श्रेष्ठ है, इसमें कर्म को, घर गृहस्थ को छोड़ने की बात नहीं है। सिर्फ तुम अपने कर्मों को पवित्र कैसे बनाओ, उसकी नॉलेज मैं बतलाता हूँ। तो कर्म को पवित्र बनाना है, कर्म छोड़ना नहीं है। कर्म तो अनादि चीज़ है। यह कर्मक्षेत्र भी अनादि है। मनुष्य है तो कर्म भी है, परन्तु उस कर्म को तुम श्रेष्ठ कैसे बनाओ वह आ करके सिखाता हूँ जिससे फिर तुम्हारे कर्म का खाता अकर्म रहता है। अकर्म का मतलब है कोई बुरा खाता नहीं बनता है। अच्छा।

ऐसे बापदादा और माँ के मीठे-मीठे बहुत अच्छे, खबरदार रहने वाले बच्चों के प्रति यादप्यार और गुडमा-र्निंग। अच्छा।

वरदान:- 
सदा उमंग-उत्साह में रह मन से खुशी के गीत गाने वाले अविनाशी खुशनसीब भव 

आप खुशनसीब बच्चे अविनाशी विधि से अविनाशी सिद्धियां प्राप्त करते हो। आपके मन से सदा वाह-वाह की खुशी के गीत बजते रहते हैं। वाह बाबा! वाह तकदीर! वाह मीठा परिवार! वाह श्रेष्ठ संगम का सुहावना समय! हर कर्म वाह-वाह है इसलिए आप अविनाशी खुशनसीब हो। आपके मन में कभी व्हाई, आई (क्यों, मैं) नहीं आ सकता। व्हाई के बजाए वाह-वाह और आई के बजाए बाबा-बाबा शब्द ही आता है।

स्लोगन:- 
जो संकल्प करते हो उसे अविनाशी गवर्मेन्ट की स्टैम्प लगा दो तो अटल रहेंगे।

22-06-2019

22-06-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम सब आपस में रूहानी भाई-भाई हो, तुम्हारा रूहानी प्यार होना चाहिए, आत्मा का प्यार आत्मा से हो, जिस्म से नहीं''

प्रश्नः-

बाप ने अपने घर की वन्डरफुल बात कौन-सी सुनाई है?

उत्तर:-

जो भी आत्मायें मेरे घर में आती हैं, वह अपने-अपने सेक्शन में अपने नम्बर पर फिक्स होती हैं। वह कभी भी हिलती डुलती नहीं। वहाँ पर सभी धर्म की आत्मायें मेरे नज़दीक रहती हैं। वहाँ से नम्बरवार अपने-अपने समय पर पार्ट बजाने आती हैं यह वन्डरफुल नॉलेज इसी समय कल्प में एक बार ही तुम्हें मिलती है। दूसरा कोई यह नॉलेज नहीं दे सकता।

ओम् शान्ति।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बच्चे जानते हैं हम आत्माओं को बाप समझाते हैं और बाप अपने को आत्माओं का बाप समझते हैं। ऐसे कोई समझते नहीं और न कोई कभी समझाते हैं कि अपने को आत्मा समझो। यह बाप ही आत्माओं को बैठ समझाते हैं। इस ज्ञान की प्रालब्ध तुम नई दुनिया में लेने वाले हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। यह भी कोई सभी को याद नहीं रहता कि यह दुनिया बदलने वाली है, बदलाने वाला बाप है। यहाँ तो सम्मुख बैठे हैं, जब घर में जाते हैं तो सारा दिन अपने धन्धे आदि में ही लग जाते हैं। बाप की श्रीमत है - बच्चे, कहाँ भी रहते तुम मुझे याद करो। जैसे कन्या होती है तो वह जानती नहीं कि हमको कौन पति मिलेगा, चित्र देखती है तो उनकी याद ठहर जाती है। कहाँ भी रहते एक-दो को दोनों याद करते हैं, इसको कहा जाता है जिस्मानी प्यार। यह है रूहानी प्यार। रूहानी प्यार किसके साथ? बच्चों का रूहानी बाप के साथ और बच्चों का बच्चों के साथ। तुम बच्चों का आपस में भी बहुत प्यार होना चाहिए यानी आत्माओं का आत्माओं के साथ भी प्यार चाहिए। यह शिक्षा भी अभी तुम बच्चों को मिलती है। दुनिया के मनुष्यों को कुछ भी पता नहीं। तुम सब भाई-भाई हो तो आपस में जरूर प्यार होना चाहिए क्योंकि एक बाप के बच्चे हो ना। इसको कहा जाता है रूहानी प्यार। ड्रामा प्लैन अनुसार सिर्फ पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही रूहानी बाप आकर रूहानी बच्चों को सम्मुख समझाते हैं। और बच्चे जानते हैं कि बाप यहाँ आये हुए हैं। हम बच्चों को गुल-गुल, पवित्र पतित से पावन बनाकर साथ ले जायेंगे। ऐसे नहीं कि कोई हाथ से पकड़ कर ले जाते हैं। सभी आत्मायें ऐसे उड़ेंगी जैसे टिड्डियों का झुण्ड जाता है। उन्हों का भी कोई गाइड होता है। गाइड के साथ और भी गाइड्स होते हैं जो फ्रन्ट में रहते हैं। सारा झुण्ड जब इकट्ठा जाता है तो बहुत आवाज़ होती है। सूर्य की रोशनी को भी ढक देते हैं, इतना बड़ा झुण्ड होता है। तुम आत्माओं का तो कितना बड़ा अनगिनत झुण्ड है। कभी गिनती नहीं कर सकते। यहाँ मनुष्यों की गिनती नहीं कर सकते। भल आदमशुमारी निकालते हैं। वह भी एक्यूरेट नहीं निकालते हैं। आत्मायें कितनी हैं, वह हिसाब कभी निकाल नहीं सकते। अन्दाज लगाया जाता है कि सतयुग में कितने मनुष्य होंगे क्योंकि सिर्फ भारत ही रह जाता है। तुम्हारी बुद्धि में है कि हम विश्व के मालिक बन रहे हैं। आत्मा जब शरीर में है तो जीवात्मा है, तो दोनों इकट्ठे सुख अथवा दु:ख भोगते हैं। ऐसे बहुत लोग समझते हैं कि आत्मा ही परमात्मा है, वह कभी दु:ख नहीं भोगती, निर्लेप है। बहुत बच्चे इस बात में भी मूंझते हैं कि हम अपने को आत्मा निश्चय तो करें। लेकिन बाप को कहाँ याद करें? यह तो जानते हो बाप परमधाम निवासी है। बाप ने अपना परिचय दिया हुआ है। कहाँ भी चलते-फिरते बाप को याद करो। बाप रहते हैं परमधाम में। तुम्हारी आत्मा भी वहाँ रहने वाली है फिर यहाँ पार्ट बजाने आती है। यह भी ज्ञान अभी मिला है।

जब तुम देवता हो वहाँ तुमको यह याद नहीं रहता है कि फलाने-फलाने धर्म की आत्मायें ऊपर में हैं। ऊपर से आकर यहाँ शरीर धारण कर पार्ट बजाती हैं, यह चिन्तन वहाँ नहीं चलता। आगे यह पता नहीं था कि बाप भी परमधाम में रहते हैं, वहाँ से यहाँ आकर शरीर में प्रवेश करते हैं। अब वह किस शरीर में प्रवेश करते हैं, वह अपनी एड्रेस तो बताते हैं। तुम अगर लिखो कि शिवबाबा केयरआफ परमधाम, तो परमधाम में तो चिट्ठी जा नहीं सकती इसलिए लिखते ही हो शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा, फिर यहाँ की एड्रेस डालते हो क्योंकि तुम जानते हो बाप यहाँ ही आते हैं, इस रथ में प्रवेश करते हैं। यूं तो आत्मायें भी ऊपर रहने वाली हैं। तुम भाई-भाई हो। सदैव यही समझो यह आत्मा है, इनका फलाना नाम है। आत्मा को यहाँ देखते हैं परन्तु मनुष्य देह-अभिमान में आ जाते हैं। बाप देही-अभिमानी बनाते हैं। बाप कहते हैं तुम अपने को आत्मा समझो और फिर मुझे याद करो। इस समय बाप समझाते हैं जब मैं यहाँ आया हूँ, आकर बच्चों को ज्ञान भी देता हूँ। पुराने आरगन्स लिए हैं, जिसमें मुख्य यह मुख है। आंखें भी हैं, ज्ञान अमृत मुख से मिलता है। गऊमुख कहते हैं ना अर्थात् माता का यह मुख है। बड़ी माता द्वारा तुमको एडाप्ट करते हैं। कौन? शिवबाबा। वह यहाँ है ना। यह ज्ञान सारा बुद्धि में रहना चाहिए। मैं तुमको प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा एडाप्ट करता हूँ। तो यह माता भी हो गई। गाया भी जाता है तुम मात-पिता हम बालक तेरे....... तो वह सब आत्माओं का बाप है। उनको माता नहीं कहेंगे। वह तो बाप ही है। बाप से वर्सा मिलता है फिर माता चाहिए। वह यहाँ आते हैं। अभी तुमको मालूम पड़ा है बाप ऊपर में रहते हैं। हम आत्मायें भी ऊपर रहती हैं। फिर यहाँ आती हैं पार्ट बजाने। दुनिया को इन बातों का कुछ भी पता नहीं। वह तो ठिक्कर भित्तर में परमात्मा को कह देते हैं, फिर तो अनगिनत हो जायें। इसको कहा जाता है घोर अंधियारा। गायन भी है ज्ञान सूर्य प्रगटा, अज्ञान अंधेर विनाश। इस समय तुमको ज्ञान है - यह है रावण राज्य, जिस कारण अंधियारा है। वहाँ तो रावण राज्य होता नहीं इसलिए कोई विकार नहीं। देह-अभिमान भी नहीं। वहाँ आत्म-अभिमानी रहते हैं। आत्मा को ज्ञान है - अब छोटा बच्चा हैं, अब हम जवान बने हैं, अब वृद्ध शरीर हुआ है इसलिए अब यह शरीर छोड़ दूसरा लेना है। वहाँ ऐसे नहीं कहते फलाना मर गया। वह तो है ही अमरलोक। खुशी से एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। अभी आयु पूरी हुई है, यह छोड़ नया लेना है इसलिए सन्यासी लोग सर्प का मिसाल देते हैं। मिसाल वास्तव में बाप का दिया हुआ है। वह फिर सन्यासी लोग उठाते हैं। तब बाप कहते हैं यह जो ज्ञान मैं तुमको देता हूँ, यह प्राय:लोप हो जाता है। बाप के अक्षर भी हैं, तो चित्र भी हैं परन्तु जैसे आटे में नमक। तो बाप बैठ अर्थ समझाते हैं - जैसे सर्प पुरानी खाल छोड़ देता है और नई खाल आ जाती है। उनके लिए ऐसे नहीं कहेंगे एक शरीर छोड़ दूसरे में प्रवेश करते हैं। नहीं। खाल बदलने का एक सर्प का ही मिसाल है। वह खाल उनकी देखने में भी आती है। जैसे कपड़ा उतारा जाता है वैसे सर्प भी खाल छोड़ देता है, दूसरी मिल जाती है। सर्प तो जिन्दा ही रहता है, ऐसे भी नहीं सदैव अमर रहता है। 2-3 खाल बदली कर फिर मर जायेंगे। वहाँ भी तुम समय पर एक खाल छोड़ दूसरी ले लेते हो। जानते हो अभी हमको गर्भ में जाना है। वहाँ तो है ही योगबल की बात। योगबल से तुम जन्मते हो, इसलिए अमर कहा जाता है। आत्मा कहती है अब हम बूढ़ा हो गया हूँ, शरीर पुराना हुआ है। साक्षात्कार हो जाता है। अब हम जाकर छोटा बच्चा बनूंगा। आपेही शरीर छोड़ आत्मा भागकर जाए छोटे बच्चे में प्रवेश करती है। उस गर्भ को जेल नहीं, महल कहा जाता है। पाप तो कोई होते नहीं हैं जो भोगना पड़े। गर्भ महल में आराम से रहते हैं, दु:ख की कोई बात नहीं। न कोई ऐसी गन्दी चीज़ खिलाते हैं जिससे बीमार हो जायें।

अब बाप कहते हैं - बच्चे, तुमको निवार्णधाम में जाना है, यह दुनिया बदलनी है। पुरानी से फिर नई होगी। हर एक चीज बदलती है। झाड़ से बीज निकलते हैं, फिर से बीज लगाओ तो कितना फल मिलता है। एक बीज से कितने दाने निकलते हैं। सतयुग में एक ही बच्चा पैदा होता है - योगबल से। यहाँ विकार से 4-5 बच्चे पैदा करते हैं। सतयुग और कलियुग में बहुत फ़र्क है जो बाप बतलाते हैं। नई दुनिया फिर पुरानी कैसे होती है, उसमें आत्मा कैसे 84 जन्म लेती है - यह भी समझाया है। हर एक आत्मा अपना-अपना पार्ट बजाकर फिर जब जायेगी तो अपनी-अपनी जगह पर जाकर खड़ी रहेगी। जगह बदलती नहीं है। अपने-अपने धर्म में अपनी जगह पर नम्बरवार खड़े होंगे, फिर नम्बरवार ही नीचे आना है इसलिए छोटे-छोटे मॉडल्स बनाकर रखते हैं मूलवतन के। सब धर्मों का अपना-अपना सेक्शन है। देवी-देवता है पहला धर्म, फिर नम्बरवार आते हैं। नम्बरवार ही जाकर रहेंगे। तुम भी नम्बरवार पास होते हो, उन मार्क्स के हिसाब से जगह लेते हो। यह बाप की पढ़ाई कल्प में एक ही बार होती है। तुम आत्माओं का कितना छोटा सिजरा होगा। जैसे तुम्हारा इतना बड़ा झाड है। तुम बच्चों ने दिव्य दृष्टि से देखकर फिर यहाँ बैठकर चित्र आदि बनाये हैं। आत्मा कितनी छोटी है, शरीर कितना बड़ा है। सब आत्मायें वहाँ जाकर बैठेंगी। बहुत थोड़ी जगह में नजदीक में जाकर रहती हैं। मनुष्यों का झाड़ कितना बड़ा है। मनुष्यों को तो जगह चाहिए ना - चलने, फिरने, खेलने, पढ़ने, नौकरी करने की। सब कुछ करने की जगह चाहिए। निराकारी दुनिया में आत्माओं की छोटी जगह होगी इसलिए इन चित्रों में भी दिखाया है। बना-बनाया नाटक है, शरीर छोड़कर आत्माओं को वहाँ जाना है। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम वहाँ कैसे रहते हैं और दूसरे धर्म वाले कैसे रहते हैं। फिर कैसे अलग-अलग होते हैं नम्बरवार। यह सब बातें तुमको कल्प-कल्प एक ही बाप आकर सुनाते हैं। बाकी तो सभी हैं जिस्मानी पढ़ाई। उनको रूहानी पढ़ाई नहीं कह सकते हैं।

अभी तुम जानते हो हम आत्मा हैं। आई माना आत्मा, माई माना मेरा यह शरीर है। मुनष्य यह नहीं जानते। उन्हों का तो सदैव दैहिक सम्बन्ध रहता है। सतयुग में भी दैहिक सम्बन्ध होगा। परन्तु वहाँ तुम आत्म-अभिमानी रहते हो। यह पता पड़ता है कि हम आत्मा हैं, यह हमारा शरीर अब वृद्ध हुआ है, इसलिए हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। इसमें मूंझने की भी कोई बात नहीं है। तुम बच्चों को तो बाप से राजाई लेनी है। जरूर बेहद का बाप है ना। मनुष्य जब तक ज्ञान को पूरा नहीं समझते हैं तब तक अनेक प्रश्न पूछते हैं। ज्ञान है तुम ब्राह्मणों को। तुम ब्राह्मणों का वास्तव में मन्दिर भी अजमेर में है। एक होते हैं पुष्करणी ब्राह्मण, दूसरे सारसिद्ध। अजमेर में ब्रह्मा का मन्दिर देखने जाते हैं। ब्रह्मा बैठा है, दाढ़ी आदि दी हुई है। उनको मनुष्य के रूप में दिखाया है। तुम ब्राह्मण भी मनुष्य के रूप में हो। ब्राह्मणों को देवता नहीं कहा जाता है। सच्चे-सच्चे ब्राह्मण तुम हो ब्रह्मा की औलाद। वह कोई ब्रह्मा की औलाद नहीं हैं, पीछे आने वालों को यह मालूम नहीं पड़ता है। तुम्हारा यह विराट रूप है। यह बुद्धि में याद रहना चाहिए। यह सारी नॉलेज है जो तुम कोई को अच्छी रीति समझा सकते हो। हम आत्मा हैं, बाप के बच्चे हैं, यह यथार्थ रीति समझकर, यह निश्चय पक्का-पक्का होना चाहिए। यह तो यथार्थ बात है, सभी आत्माओं का बाप एक परमात्मा है। सभी उनको याद करते हैं। 'हे भगवान्' मनुष्यों के मुख से जरूर निकलता है। परमात्मा कौन है - यह कोई भी नहीं जानते हैं, जब तक कि बाप आकर समझाये। बाप ने समझाया है यह लक्ष्मी-नारायण जो विश्व के मालिक थे, यही नहीं जानते थे तो ऋषि-मुनि फिर कैसे जान सकते! अभी तुमने बाप द्वारा जाना है। तुम हो आस्तिक, क्योंकि तुम रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त को जानते हो। कोई अच्छी रीति जानते हैं, कोई कम। बाप सम्मुख आकर पढ़ाते हैं फिर कोई अच्छी रीति धारण करते हैं, कोई कम धारण करते हैं। पढ़ाई बिल्कुल सिम्पुल भी है, बड़ी भी है। बाप में इतना ज्ञान है जो सागर को स्याही बनाओ तो भी अन्त नहीं पाया जा सकता। बाप सहज करके समझाते हैं। बाप को जानना है, स्वदर्शन चक्रधारी बनना है। बस! अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा याद सहज बनी रहे उसके लिए चलते फिरते यह चिंतन करना कि हम आत्मा हैं, परमधाम निवासी आत्मा यहाँ पार्ट बजाने आई हैं। बाप भी परमधाम में रहते हैं। वह ब्रह्मा तन में आये हैं।

2) जैसे रूहानी बाप से आत्मा का प्यार है, ऐसे आपस में भी रूहानी प्यार से रहना है। आत्मा का आत्मा से प्यार हो, शरीर से नहीं। आत्म-अभिमानी बनने का पूरा-पूरा अभ्यास करना है।

वरदान:-

पवित्र प्यार की पालना द्वारा सर्व को स्नेह के सूत्र में बांधने वाले मास्टर स्नेह के सागर भव

जब स्नेह के सागर और स्नेह सम्पन्न नदियों का मेल होता है तो नदी भी बाप समान मास्टर स्नेह का सागर बन जाती है इसलिए विश्व की आत्मायें स्नेह के अनुभव से स्वत: समीप आती हैं। पवित्र प्यार वा ईश्वरीय परिवार की पालना, चुम्बक के समान स्वत: ही हर एक को समीप ले आता है। यह ईश्वरीय स्नेह सबको सहयोगी बनाए आगे बढ़ने के सूत्र में बांध देता है।

स्लोगन:-

संकल्प, बोल, समय, गुण और शक्तियों के खजाने जमा करो तो इनका सहयोग मिलता रहेगा।

23-06-19

23-06-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 17-12-84 मधुबन


व्यर्थ को समाप्त करने का साधन-समर्थ संकल्पों का खजाना ज्ञान मुरली

आज बापदादा संगमयुगी अलौकिक रूहानी महफिल में मिलन मनाने आये हैं। यह रूहानी महफिल, रूहानी मिलन सारे कल्प में अभी ही कर सकते हो। आत्माओं से परम आत्मा का मिलन, यह श्रेष्ठ मिलन सतयुगी सृष्टि में भी नहीं होगा इसलिए इस युग को महान युग, महा मिलन का युग, सर्व प्राप्तियों का युग, असम्भव से सम्भव होने का युग, सहज और श्रेष्ठ अनुभूतियों का युग, विशेष परिवर्तन का युग, विश्व कल्याण का युग, सहज वरदानों का युग कहा जाता है। ऐसे युग में महान पार्टधारी तुम आत्मायें हो। ऐसा महान नशा सदा रहता है? सारी विश्व जिस बाप को एक सेकण्ड की झलक देखने की चात्रक है, उस बाप के सेकण्ड में अधिकारी बनने वाले हम श्रेष्ठ आत्मायें हैं, यह स्मृति में रहता है? यह स्मृति स्वत: ही समर्थ बनाती है। ऐसी समर्थ आत्मायें बने हो? समर्थ अर्थात् व्यर्थ को समाप्त करने वाले। व्यर्थ है तो समर्थ नहीं। अगर मंसा में व्यर्थ संकल्प है तो समर्थ संकल्प ठहर नहीं सकते। व्थर्थ बार-बार नीचे ले आता है। समर्थ संकल्प समर्थ बाप के मिलन का भी अनुभव कराता, माया जीत भी बनाता। सफलता स्वरूप सेवाधारी भी बनाता। व्यर्थ संकल्प उमंग-उत्साह को समाप्त करता है। वह सदा क्यों, क्या की उलझन में रहता इसलिए छोटी-छोटी बातों में स्वयं से दिलशिकस्त रहता। व्यर्थ संकल्प सदा सर्व प्राप्तियों के खजाने को अनुभव करने से वंचित कर देता। व्यर्थ संकल्प वाले के मन की चाहना वा मन की इच्छायें बहुत ऊंची होती हैं। यह करूंगा,यह करूँ,यह प्लैन बहुत तेजी से बनाते अर्थात् तीव्रगति से बनाते हैं क्योंकि व्यर्थ संकल्पों की गति फास्ट होती है इसलिए बहुत ऊंची-ऊंची बातें सोचते हैं, लेकिन समर्थ न होने के कारण प्लैन और प्रैक्टिकल में महान अन्तर हो जाता है इसलिए दिलशिकस्त हो जाते हैं। समर्थ संकल्प वाले सदा जो सोचेंगे वह करेंगे। सोचना और करना दोनों समान होगा। सदा धैर्यवत गति से संकल्प और कर्म में सफल होंगे। व्यर्थ संकल्प तेज तूफान की तरह हलचल में लाता है। समर्थ संकल्प सदा बहार के समान हरा-भरा बना देता है। व्यर्थ संकल्प एनर्जी अर्थात् आत्मिक शक्ति और समय गंवाने के निमित्त बनता है। समर्थ संकल्प सदा आत्मिक शक्ति अर्थात् एनर्जी जमा करता है। समय सफल करता है। व्यर्थ संकल्प रचना होते हुए भी, व्यर्थ रचना, आत्मा रचता को भी परेशान करती है अर्थात् मास्टर सर्व शक्तिवान समर्थ आत्मा की शान से परे कर देती है। समर्थ संकल्प से सदा श्रेष्ठ शान के स्मृति स्वरूप रहते हैं। इस अन्तर को समझते भी हो फिर भी कई बच्चे व्यर्थ संकल्पों की शिकायत अभी भी करते हैं। अब तक भी व्यर्थ संकल्प क्यों चलता, इसका कारण? जो बापदादा ने समर्थ संकल्पों का खजाना दिया है - वह है ज्ञान की मुरली। मुरली का एक-एक महावाक्य समर्थ खजाना है। इस समर्थ संकल्प के खजाने का महत्व कम होने के कारण समर्थ संकल्प धारण नहीं होता तो व्यर्थ को चांस मिल जाता है। हर समय एक-एक महावाक्य मनन करते रहें तो समर्थ बुद्धि में व्यर्थ आ नहीं सकता है। खाली बुद्धि रह जाती है, इसलिए खाली स्थान होने के कारण व्यर्थ आ जाता है। जब मार्जिन ही नहीं होगी तो व्यर्थ आ कैसे सकता। समर्थ संकल्पों से बुद्धि को बिजी रखने का साधन नहीं आना अर्थात् व्यर्थ संकल्पों का आह्वान करना।

बिजी रखने के बिजनेसमैन बनो। दिन-रात इन ज्ञान रत्नों के बिजनेसमैन बनो। न फुर्सत होगी न व्यर्थ संकल्पों को मार्जिन होगी। तो विशेष बात "बुद्धि को समर्थ संकल्पों से सदा भरपूर रखो।'' उसका आधार है रोज की मुरली सुनना, समाना और स्वरूप बनना। यह तीन स्टेजेस हैं। सुनना बहुत अच्छा लगता है। सुनने के बिना रह नहीं सकते। यह भी स्टेज है। ऐसी स्टेज वाले सुनने के समय तक सुनने की इच्छा, सुनने का रस होने के कारण उस समय तक उसी रस की मौज में रहते हैं। सुनने में मस्त भी रहते हैं, बहुत अच्छा, बहुत अच्छा... यह गीत भी खुशी से गाते हैं। लेकिन सुनना समाप्त हुआ तो वह रस भी समाप्त हो जाता है क्योंकि समाया नहीं। समाने की शक्ति द्वारा बुद्धि को समर्थ संकल्पों से सम्पन्न नहीं किया तो व्यर्थ आता रहता है। समाने वाले सदा भरपूर रहते हैं इसलिए व्यर्थ संकल्पों से किनारा रहता है। लेकिन स्वरूप बनने वाले शक्तिशाली बन औरों को भी शक्तिशाली बनाते हैं। तो वह कमी रह जायेगी।

व्यर्थ से तो बचते हैं, शुद्ध संकल्पों में रहते हैं लेकिन शक्ति स्वरूप नहीं बन सकते। स्वरूप बनने वाले सदा सम्पन्न, सदा समर्थ, शक्तिशाली किरणों द्वारा औरों के भी व्यर्थ को समाप्त करने वाले होते हैं। तो अपने आप से पूछो कि मैं कौन हूँ। सुनने वाले, समाने वाले वा स्वरूप बनने वाले? शक्तिशाली आत्मा सेकेण्ड में व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर देती है। तो शक्तिशाली आत्मायें हो ना? तो व्यर्थ को परिवर्तन करो। अभी तक व्यर्थ में शक्ति और समय गंवाते रहेंगे तो समर्थ कब बनेंगे? बहुतकाल का समर्थ ही बहुतकाल का सम्पन्न राज्य कर सकता है। समझा।

अभी अपने समर्थ स्वरूप द्वारा औरों को समर्थ बनाने का समय है। स्व के व्यर्थ को समाप्त करो। हिम्मत है ना? जैसे महाराष्ट्र है वैसे ही महान हो ना। महा संकल्प करने वाले हो ना। कमजोर संकल्प वाले नहीं। संकल्प किया और हुआ। इसको कहते हैं महान संकल्प। ऐसे महान आत्मायें हो ना और पंजाब वाले क्या सोचते हैं? पंजाब के बहादुर हैं ना। माया की शक्ति वाले गवर्मेन्ट को ललकार कर रहे हैं। ईश्वरीय शक्ति वाले माया को ललकार कर रहे हैं। माया को ललकार करने वाले हो ना। घबराने वाले तो नहीं हो ना। जैसे वह कहते हैं हमारा राज्य हो, आप भी माया को ललकार करते हो, गर्जना से कहते हो कि अब हमारा राज्य आने वाला है। ऐसे बहादुर हो ना। पंजाब वाले भी बहादुर हैं। महाराष्ट्र वाले महान हैं और कर्नाटक वालों की विशेषता है - महान भावना। भावना के कारण भावना का फल सहज मिलता रहता है। कर्नाटक वाले भावना द्वारा महान फल खाने वाले हैं इसलिए सदा खुशी में नाचते रहते हैं। तो खुशी का फल खाने वाले खुशनसीब आत्मायें हैं। तो महाराष्ट्र महान संकल्पधारी और पंजाब महान ललकार करने वाले महान राज्य अधिकारी और कर्नाटक महान फल खाने वाले। तीनों ही महान हो गये ना।

महाराष्ट्र अर्थात् सबमें महान। हर संकल्प महान, स्वरूप महान, कर्म महान, सेवा महान। सबमें महान। तो आज महान की तीन नदियाँ मिली हैं। महान नदियाँ मिल गई ना। महान नदियों का महासागर से मिलन है इसलिए मिलन महफिल में आये हैं। आज महफिल भी मनानी है ना। अच्छा - ऐसे सदा समर्थ, सदा हर महावाक्य के स्वरूप बनने वाले, बहुतकाल की समर्थ आत्माओं को समर्थ बनाने वाले बापदादा का सर्व समर्थियों सम्पन्न यादप्यार और नमस्ते।

दादियों से:- यह महामण्डली बैठी है। आदि में ओम् मण्डली रही और अन्त में महामण्डली हो गई। सभी महान आत्माओं की मण्डली है ना। वह अपने को महामण्डलेश्वर कहलाते हैं और आप अपने को महा सेवाधारी कहलाते हो। महामण्डलेश्वर वा महामण्डलेश्वरी नहीं कहलाते लेकिन महा सेवाधारी। तो महान सेवाधारियों की महान मण्डली। महा सेवाधारी अर्थात् हर संकल्प से स्वत: ही सेवा के निमित्त बने हुए। हर संकल्प द्वारा सेवा होती रहती है। जो स्वत: योगी हैं वह स्वत: सेवाधारी हैं। सिर्फ चेक करो - कि स्वत: सेवा हो रही है? तो अनुभव करेंगे कि सेवा के सिवाए सेकण्ड और संकल्प भी जा नहीं सकता। चलते-फिरते हर कार्य करते सेवा श्वास-श्वांस सेकण्ड-सेकण्ड में सेवा समाई हुई है, इसको कहा जाता है स्वत: सेवाधारी। ऐसे हो ना। अभी विशेष प्रोग्राम से सेवा करने की स्थिति समाप्त हुई। स्वत: सेवा के निमित्त बन गये। यह अभी औरों को चांस दिया है। वह प्रोग्राम भी बनायेंगे, प्रैक्टिकल भी करेंगे लेकिन आप लोगों की सेवा अभी स्वत: सेवाधारियों की है। प्रोग्राम के समय तक नहीं लेकिन सदा ही प्रोग्राम है। सदा ही सेवा की स्टेज पर हो। ऐसी मण्डली है ना। जैसे शरीर श्वांस के बिना चल नहीं सकता, ऐसे आत्मा सेवा के बिना रह नहीं सकती। यह श्वांस चलता ही रहता है ना आटोमेटिक। ऐसे सेवा स्वत: चलती है। सेवा ही जैसेकि आत्मा का श्वांस है। ऐसे है ना? कितने घण्टे सेवा की, यह हिसाब निकाल सकते हो? धर्म कर्म है ही सेवा। चलना भी सेवा, बोलना भी सेवा, करना भी सेवा तो स्वत: सेवाधारी, सदा के सेवाधारी। जो भी संकल्प उठता उसमें सेवा समाई है। हर बोल में सेवा समाई हुई है क्योंकि व्यर्थ तो समाप्त हो गया। तो समर्थ माना सेवा। ऐसे को कहा जाता है महामण्डली वाली महान आत्मायें हैं। अच्छा -

सभी आपके साथी भी बापदादा के सम्मुख हैं। ओम मण्डली वाले सब महामण्डली वाले आदि के सेवाधारी सदा सेवाधारी हैं। बापदादा के सामने सभी महामण्डली की महान आत्मायें हैं। फिर पान का बीड़ा उठाने वाले तो महान मण्डली वाले ही हुए ना। पान का बीड़ा उठाया ना। बिना कुछ सोचने के, संकल्प करने के दृढ़ संकल्प किया और निमित्त बन गये। इसको कहा जाता है महान आत्मायें। महान कर्तव्य के निमित्त बने हो। एक्जैम्पुल तो बने। बिना एक्जैम्पुल देखे हुए विश्व के लिए एक्जैम्पुल बन गये। तुरत दान महापुण्य। ऐसी महान आत्मायें हो। अच्छा।

पार्टियों से

1. महाराष्ट्र तथा पंजाब ग्रुप

आप सब बच्चे निर्भय हो ना। क्यों? क्योंकि आप सदा निर्वैर हो। आपका किसी से भी वैर नहीं है। सभी आत्माओं के प्रति भाई-भाई की शुभ भावना, शुभ कामना है। ऐसी शुभ भावना, कामना वाली आत्मायें सदा निर्भय रहती हैं। भयभीत होने वाले नहीं। स्वयं योगयुक्त स्थिति में स्थित हैं तो कैसी भी परिस्थिति में सेफ जरूर हैं। तो सदा सेफ रहने वाले हो ना? बाप की छत्रछाया में रहने वाले सदा सेफ है। छत्रछाया से बाहर निकले तो फिर भय है। छत्रछाया के अन्दर निर्भय हैं। कितना भी कोई कुछ भी करे लेकिन बाप की याद एक किला है। जैसे किले के अन्दर कोई नहीं आ सकता। ऐसे याद के किले के अन्दर सेफ। हलचल में भी अचल। घबराने वाले नहीं। यह तो कुछ भी नहीं देखा। यह रिहर्सल है। रीयल तो और है। रिहर्सल पक्का कराने के लिए की जाती है। तो पक्के हो गये, बहादुर हो गये? बाप से लगन है तो कैसी भी समस्याओं में पहुँच गये। समस्या जीत बन गये। लगन निर्विघ्न बनने की शक्ति देती है। बस सिर्फ 'मेरा बाबा' यह महामंत्र याद रहे। यह भूला तो गये। यही याद रहा तो सदा सेफ हैं।

2. सदा अपने को अचल अडोल आत्मायें अनुभव करते हो? किसी भी प्रकार की हलचल अचल अडोल स्थिति में विघ्न नहीं डाले। ऐसी विघ्न-विनाशक अचल अडोल आत्मायें बने हो। विघ्न-विनाशक आत्मायें हर विघ्न को ऐसे पार करती जैसे विघ्न नहीं एक खेल है। तो खेल करने में सदा मज़ा आता है ना। कोई परिस्थिति को पार करना और खेल करना अन्तर होगा ना। अगर विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं तो परिस्थिति खेल अनुभव होती है। पहाड़ राई के समान अनुभव होता है। ऐसे विघ्न-विनाशक हो, घबराने वाले तो नहीं। नॉलेजफुल आत्मायें पहले से ही जानती हैं कि यह सब तो आना ही है, होना ही है। जब पहले से पता होता है तो कोई बात बड़ी बात नहीं लगती। अचानक कुछ होता है तो छोटी बात भी बड़ी लगती, पहले से पता होता तो बड़ी बात भी छोटी लगती। आप सब नॉलेजफुल हो ना। वैसे तो नॉलेजफुल हो लेकिन जब परिस्थितियों का समय होता है उस समय नॉलेजफुल की स्थिति भूले नहीं, अनेक बार किया हुआ अब रिपीट कर रहे हो। जब नथिंग न्यु है तो सब सहज है। आप सब किले की पक्की ईटें हो। एक-एक ईट का बहुत महत्व है। एक भी ईट हिलती तो सारी दीवार को हिला देती। तो आप ईट अचल हो, कोई कितना भी हिलाने की कोशिश करे लेकिन हिलाने वाला हिल जाए आप न हिलें। ऐसी अचल आत्माओं को, विघ्न-विनाशक आत्माओं को बापदादा रोज़ मुबारक देते हैं, ऐसे बच्चे ही बाप की मुबारक के अधिकारी हैं। ऐसे अचल-अडोल बच्चों को बाप और सारा परिवार देखकर हर्षित होता है। अच्छा!

वरदान:-

समर्थ स्थिति का स्विच आन कर व्यर्थ के अंधकार को समाप्त करने वाले अव्यक्त फरिश्ता भव

जैसे स्थूल लाइट का स्विच आन करने से अंधकार समाप्त हो जाता है। ऐसे समर्थ स्थिति है स्विच। इस स्विच को आन करो तो व्यर्थ का अंधकार समाप्त हो जायेगा। एक-एक व्यर्थ संकल्प को समाप्त करने की मेहनत से छूट जायेंगे। जब स्थिति समर्थ होगी तो महादानी-वरदानी बन जायेंगे क्योंकि दाता का अर्थ ही है समर्थ। समर्थ ही दे सकता है और जहाँ समर्थ है वहाँ व्यर्थ खत्म हो जाता है। तो यही अव्यक्त फरिश्तों का श्रेष्ठ कार्य है।

स्लोगन:-

सत्यता के आधार से सर्व आत्माओं के दिल की दुआयें प्राप्त करने वाले ही भाग्यवान आत्मा है।

21-06-2019

21-06-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - शरीर सहित जो कुछ भी देखने में आता है, यह सब विनाश होना है, तुम आत्माओं को अब घर लौटना है इसलिए पुरानी दुनिया को भूल जाओ''

प्रश्नः-

तुम बच्चे किन शब्दों में सभी को बाप का मैसेज सुना सकते हो?

उत्तर:-

सभी को सुनाओ कि बेहद का बाप बेहद का वर्सा देने आया है। अब हद के वर्से का समय पूरा हुआ अर्थात् भक्ति पूरी हुई। अब रावण राज्य समाप्त होता है। बाप आया है तुम्हें रावण 5 विकारों की जेल से छुड़ाने। यह पुरूषोत्तम संगमयुग है, इसमें तुम्हें पुरूषार्थ कर दैवी गुणों वाला बनना है। सिर्फ पुरूषोत्तम संगमयुग को भी समझ लें तो स्थिति श्रेष्ठ बन सकती है।

ओम् शान्ति।

अब रूहानी बच्चे क्या कर रहे हैं? अव्यभिचारी याद में बैठे हैं। एक होती है अव्यभिचारी याद, दूसरी होती है व्यभिचारी याद। अव्यभिचारी याद अथवा अव्यभिचारी भक्ति जब पहले शुरू होती है तो सब शिव की पूजा करते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान् वही है, वह बाप भी है फिर शिक्षक भी है। पढ़ाते हैं। क्या पढ़ाते हैं? मनुष्य से देवता बनाते हैं। देवता से मनुष्य बनने में तुम बच्चों को 84 जन्म लगे हैं। और मनुष्य से देवता बनने में एक सेकण्ड लगता है। यह तो बच्चे जानते हैं - हम बाप की याद में बैठे हैं। वह हमारा टीचर भी है, सतगुरू भी है। योग सिखाते हैं कि एक की याद में रहो। वह खुद कहते हैं - हे आत्माओं, हे बच्चे, देह के सब सम्बन्ध छोड़ो, अब वापिस जाना है। यह पुरानी दुनिया बदल रही है। अभी यहाँ रहना नहीं है। पुरानी दुनिया के विनाश लिए ही यह बारूद आदि बनाये हुए हैं। नैचुरल कैलेमिटीज भी मदद करती है। विनाश तो होना है जरूर। तुम पुरूषोत्तम संगमयुग पर हो। यह आत्मा जानती है। हम अभी लौट रहे हैं इसलिए बाप कहते हैं इस पुरानी दुनिया, पुरानी देह को भी छोड़ना है। देह सहित जो भी इस दुनिया में देखने में आता है, यह सब विनाश हो जाना है। शरीर भी खत्म होना है। अब हम आत्माओं को घर लौटना है। लौटने बिगर नई दुनिया में आ नहीं सकेंगे। अब तुम पुरूषोत्तम बनने का पुरूषार्थ कर रहे हो। पुरूषोत्तम हैं यह देवतायें। सबसे ऊंच ते ऊंच है निराकार बाप। फिर मनुष्य सृष्टि में आओ तो इसमें हैं ऊंच देवता। वह भी मनुष्य हैं परन्तु दैवीगुणों वाले। फिर वही आसुरी गुणों वाले बनते हैं। अब फिर आसुरी गुणों से दैवीगुणों में जाना पड़े। सतयुग में जाना पड़े। किसको? तुम बच्चों को। तुम बच्चे पढ़ रहे हो औरों को भी पढ़ाते हो। सिर्फ बाप का ही मैसेज देना है। बेहद का बाप बेहद का वर्सा देने आये हैं। अब हद का वर्सा पूरा होता है।

बाप ने समझाया है - 5 विकारों रूपी रावण की जेल में सब मनुष्य हैं। सब दु:ख ही उठाते हैं। सूखी रोटी मिलती है। बाप आकरके सबको रावण की जेल से छुड़ाए सदा सुखी बनाते हैं। बाप के सिवाए मनुष्य को देवता कोई बना न सके। तुम यहाँ बैठे हो, मुनष्य से देवता बनने के लिए। अभी है कलियुग। बहुत धर्म हो गये हैं। तुम बच्चों को रचता और रचना का परिचय खुद बाप बैठ देते हैं। तुम सिर्फ ईश्वर, परमात्मा कहते थे। तुमको यह पता नहीं था कि वह बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। उनको कहा जाता है सतगुरु। अकालमूर्त भी कहा जाता है। तुमको आत्मा और जीव कहा जाता है। वह अकालमूर्त इस शरीर रूपी तख्त पर बैठे हैं। वह जन्म नहीं लेते हैं। तो वह अकालमूर्त बाप बच्चों को समझाते हैं - मेरा अपना रथ नहीं है, मैं तुम बच्चों को पावन कैसे बनाऊं! मुझे तो रथ चाहिए ना। अकालमूर्त को भी तख्त तो चाहिए। अकाल तख्त मनुष्य का होता है, और कोई का नहीं होता है। तुम हर एक को तख्त चाहिए। अकालमूर्त आत्मा यहाँ विराजमान है। वह सभी का बाप है, उनको कहा जाता है महाकाल, वह पुनर्जन्म में नहीं आते हैं। तुम आत्मायें पुनर्जन्म में आती हो। मैं आता हूँ कल्प के संगमयुगे। भक्ति को रात, ज्ञान को दिन कहा जाता है। यह पक्का याद करो। मुख्य हैं ही दो बातें - अल्फ और बे, बाप और बादशाही। बाप आकर बादशाही देते हैं और बादशाही के लिए पढ़ाते हैं इसलिए इसको पाठशाला भी कहा जाता है। भगवानुवाच, भगवान् तो है निराकार। उनका भी पार्ट होना चाहिए। वह है ऊंच ते ऊंच भगवान्, उनको सभी याद करते हैं। बाप कहते हैं ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जो भक्ति मार्ग में याद न करता हो। दिल से ही सब पुकारते हैं - हे भगवान्, हे लिबरेटर, ओ गॉड फादर क्योंकि वह है सभी आत्माओं का फादर, जरूर बेहद का ही सुख देंगे। हद का बाप हद का सुख देते हैं। कोई को पता नहीं। अब बाप आये हैं, कहते हैं - बच्चों, और संग तोड़ मुझ एक बाप को याद करो। यह भी बाप ने बताया है तुम देवी-देवता नई दुनिया में रहते हो। वहाँ तो अपार सुख हैं। उन सुखों का अन्त नहीं पाया जाता है। नये मकान में सदैव सुख होता है, पुराने में दु:ख होता है। तब तो बाप बच्चों के लिए नया मकान बनवाते हैं। बच्चों का बुद्धि-योग नये मकान में चला जाता है। यह तो हुई हद की बात। अभी तो बेहद का बाप नई दुनिया बना रहे हैं। पुरानी दुनिया में जो कुछ देखते हो वह कब्रिस्तान होना है, अभी परिस्तान स्थापन हो रहा है। तुम संगमयुग पर हो। कलियुग की तरफ भी देख सकते हो, सतयुग की तरफ भी देख सकते हो। तुम संगमयुग पर साक्षी हो देखते हो। प्रदर्शनी में अथवा म्युज़ियम में आते हैं तो वहाँ भी तुम संगम पर खड़ा कर दो। इस तरफ है कलियुग, उस तरफ है सतयुग। हम बीच में हैं। बाप नई दुनिया स्थापन करते हैं। जहाँ पर बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं। और कोई भी धर्म वाला नहीं आता है। सिर्फ तुम ही पहले-पहले आते हो। अभी तुम स्वर्ग में जाने का पुरूषार्थ कर रहे हो। पावन बनने के लिए ही मुझे पुकारा है कि हे बाबा, हमको पावन बनाकर पावन दुनिया में ले चलो। ऐसे नहीं कहते कि शान्तिधाम में ले चलो। परमधाम को कहा जाता है स्वीट होम। अभी हमको घर जाना है, जिसको मुक्तिधाम कहा जाता है, जिसके लिए ही सन्यासी आदि शिक्षा देते हैं। वह सुखधाम का ज्ञान दे नहीं सकते। वह हैं निवृति मार्ग वाले। तुम बच्चों को समझाया गया है - कौन-कौन धर्म कब-कब आते हैं। मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ में पहले-पहले फाउन्डेशन तुम्हारा है। बीज को कहा जाता है वृक्षपति। बाप कहते हैं मैं वृक्षपति ऊपर में निवास करता हूँ। जब झाड़ एकदम जड़जड़ीभूत हो जाता है, तब मैं आता हूँ देवता धर्म स्थापन करने। बनेन ट्री का बड़ा वन्डरफुल झाड़ है। बिगर फाउन्डेशन बाकी सारा झाड़ खड़ा है। इस बेहद के झाड़ में भी आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। बाकी सब धर्म खड़े हैं।

तुम मूलवतन निवासी थे। यहाँ पार्ट बजाने आये हो। तुम बच्चे आलराउन्ड पार्ट बजाने वाले हो इसलिए 84 जन्म हैं मैक्सीमम। फिर मिनिमम एक जन्म। मनुष्य फिर कह देते 84 लाख जन्म। वह भी किसके होंगे - यह भी समझ नहीं सकते। बाप आकर तुम बच्चों को समझाते हैं - 84 जन्म तुम लेते हो। पहले-पहले मेरे से तुम बिछुड़ते हो। सतयुगी देवतायें ही पहले होते हैं। जब वह आत्मायें यहाँ पार्ट बजाती हैं तो बाकी सब आत्मायें कहाँ चली जाती हैं? यह भी तुम जानते हो - बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में होती हैं। तो शान्तिधाम अलग हुआ ना। बाकी दुनिया तो यही है। पार्ट यहाँ बजाते हैं। नई दुनिया में सुख का पार्ट, पुरानी दुनिया में दु:ख का पार्ट बजाना पड़ता है। सुख और दु:ख का यह खेल है। वह है रामराज्य। दुनिया में कोई भी मनुष्य यह नहीं जानते कि सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। न रचयिता को, न रचना के आदि, मध्य, अन्त को जानते हैं। ज्ञान का सागर एक बाप को ही कहा जाता है। रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान कोई शास्त्र में है नहीं। मैं तुमको सुनाता हूँ। फिर यह प्राय: लोप हो जाता है। सतयुग में यह रहता नहीं। भारत का ही प्राचीन सहज राजयोग गाया हुआ है। गीता में भी राजयोग नाम आता है। बाप तुम्हें राजयोग सिखलाकर राजाई का वर्सा देते हैं। बाकी रचना से वर्सा मिल न सके। वर्सा मिलता ही है रचता बाप से। हर एक मनुष्य क्रियेटर है, बच्चों को रचते हैं। वह हैं हद के ब्रह्मा, यह है बेहद के ब्रह्मा। वह है निराकार आत्माओं के पिता, वह लौकिक पिता, यह फिर है प्रजापिता। प्रजापिता कब होना चाहिए? क्या सतयुग में? नहीं। पुरूषोत्तम संगमयुग पर होना चाहिए। मनुष्यों को यह भी पता नहीं है कि सतयुग कब होता है। उन्होंने तो सतयुग, कलियुग आदि को लाखों वर्ष दे दिये हैं। बाप समझाते हैं 1250 वर्ष का एक युग होता है। 84 जन्मों का भी हिसाब चाहिए ना। सीढ़ी का भी हिसाब चाहिए ना - हम कैसे उतरते हैं। पहले-पहले फाउन्डेशन में हैं देवी-देवता। उनके बाद फिर आते हैं इस्लामी, बौद्धी। बाप ने झाड़ का राज़ भी बताया है। बाप के सिवाए तो कोई सिखला न सके। तुमको कहेंगे यह चित्र आदि कैसे बनायें? किसने सिखाया? बोलो, बाबा ने हमें ध्यान में दिखाया, फिर हम यहाँ बनाते हैं। फिर उनको बाप ही इस रथ में आकर करेक्ट करते हैं कि ऐसे-ऐसे बनाओ। खुद ही करेक्ट करते हैं।

कृष्ण को श्याम-सुन्दर कहते हैं, परन्तु मनुष्य तो समझ नहीं सकते कि क्यों कहा जाता है? यह वैकुण्ठ का मालिक था तो गोरा था फिर गांवड़े का छोरा सांवरा बना, इसलिए उनको ही श्याम-सुन्दर कहते हैं। यही पहले आते हैं। ततत्वम्। इन लक्ष्मी-नारायण की राजाई चलती है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कौन करते हैं? यह भी किसको पता नहीं है। भारत को भी भुलाए हिन्दुस्तान के रहवासी हिन्दू कह देते हैं। मैं भारत में ही आता हूँ। भारत में देवताओं का राज्य था जो अब प्राय:लोप हो गया है। मैं आता हूँ फिर से स्थापना करने। पहले-पहले है ही आदि सनातन देवी देवता धर्म। यह झाड़ वृद्धि को पाता रहता है। नये-नये पत्ते, मठ-पंथ पिछाड़ी में आते हैं। तो उनकी भी शोभा हो जाती है। फिर अन्त में जब सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाता है, तब फिर मैं आता हूँ। यदा यदा हि.......। आत्मा अपने को भी नहीं जानती, तो बाप को भी नहीं जानती। अपने को भी गाली देते, बाप को और देवताओं को भी गाली देते रहते हैं। तमोप्रधान, बेसमझ बन जाते हैं तब मैं आता हूँ। पतित दुनिया में ही आना पड़े। तुम मनुष्यों को जीयदान देते हो अर्थात् मनुष्य से देवता बनाते हो। सब दु:खों से दूर कर देते हो, सो भी आधाकल्प के लिए। गायन भी है ना वन्दे मातरम्। कौन-सी मातायें, जिनकी वन्दना करते हैं? तुम मातायें हो, सारी सृष्टि को बहिश्त बनाती हो। भल पुरूष भी हैं, लेकिन मैजारिटी माताओं की है इसलिए बाप माताओं की महिमा करते हैं। बाप आकर तुमको इतनी महिमा लायक बनाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपार सुखों की दुनिया में चलने के लिए संगम पर खड़ा होना है। साक्षी हो सब कुछ देखते हुए बुद्धियोग नई दुनिया में लगाना है। बुद्धि में रहे अभी हम वापस घर लौट रहे हैं।

2) सभी को जीयदान देना है, मनुष्य से देवता बनाने की सेवा करनी है। बेहद के बाप से पढ़कर दूसरों को पढ़ाना है। दैवी गुण धारण करने और कराने हैं।

वरदान:-

अपने पोजीशन की स्मृति द्वारा माया पर विजय प्राप्त करने वाले निरन्तर योगी भव

जैसे स्थूल पोजीशन वाले अपनी पोजीशन को कभी भूलते नहीं। ऐसे आपका पोजीशन है - मास्टर सर्वशक्तिमान, इसे सदा स्मृति में रखो और रोज़ अमृतवेले इस स्मृति को इमर्ज करो तो निरन्तर योगी बन जायेंगे और सारा दिन उसका सहयोग मिलता रहेगा। फिर मास्टर सर्वशक्तिमान के आगे माया आ नहीं सकती, जब आप अपनी स्मृति की ऊंची स्टेज पर रहेंगे तो माया चींटी को जीतना सहज हो जायेगा।

स्लोगन:-

आत्मा रूपी पुरुष को श्रेष्ठ बनाने वाले ही सच्चे पुरुषार्थी हैं।

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