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11-09-2019

11-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - बेहद की स्कॉलरशिप लेनी है तो अभ्यास करो - एक बाप के सिवाए और कोई भी याद न आये''

प्रश्नः-

बाप का बनने के बाद भी यदि खुशी नहीं रहती है तो उसका कारण क्या है?

उत्तर:-

1- बुद्धि में पूरा ज्ञान नहीं रहता। 2- बाप को यथार्थ रीति याद नहीं करते। याद न करने के कारण माया धोखा देती है इसलिए खुशी नहीं रहती। तुम बच्चों की बुद्धि में नशा रहे - बाप हमें विश्व का मालिक बनाते हैं, तो सदा हुल्लास और खुशी रहे। बाप का जो वर्सा है - पवित्रता, सुख और शान्ति, इसमें फुल बनो तो खुशी रहेगी।

ओम् शान्ति।

ओम् शान्ति का अर्थ तो बच्चों को अच्छी रीति मालूम है - मैं आत्मा, यह मेरा शरीर। यह अच्छी रीति याद करो। भगवान माना आत्माओं का बाप हमको पढ़ाते हैं। ऐसे कभी सुना है? वह तो समझते हैं कृष्ण पढ़ाते हैं, परन्तु उनका तो नाम-रूप है ना। यह तो पढ़ाने वाला है निराकार बाप। आत्मा सुनती है और परमात्मा सुनाते हैं। यह नई बात है ना। विनाश तो होने का ही है ना। एक हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि, दूसरे हैं विनाश काले प्रीत बुद्धि। आगे तुम भी कहते थे ईश्वर सर्वव्यापी है, पत्थर भित्तर में है। इन सब बातों को अच्छी रीति समझना है। यह तो समझाया है आत्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। आत्मा कभी घटती-बढ़ती नहीं। वह है इतनी छोटी आत्मा, इतनी छोटी आत्मा ही 84 जन्म लेकर सारा पार्ट बजाती है। आत्मा शरीर को चलाती है। ऊंच ते ऊंच बाप पढ़ाते हैं तो जरूर मर्तबा भी ऊंच मिलेगा। आत्मा ही पढ़कर मर्तबा पाती है। आत्मा कोई देखी नहीं जाती। बहुत कोशिश करते हैं कि देखें आत्मा कैसे आती है, कहाँ से निकलती है? परन्तु मालूम नहीं पड़ता है। करके कोई देखे भी तो भी समझ नहीं सकेंगे। यह तो तुम समझते हो आत्मा ही शरीर में निवास करती है। आत्मा अलग है, जीव अलग है। आत्मा छोटी-बड़ी नहीं होती है। जीव छोटे से बड़ा होता है। आत्मा ही पतित और पावन बनती है। आत्मा ही बाप को बुलाती है - हे पतित आत्माओं को पावन बनाने वाले बाबा आओ। यह भी समझाया है - सभी आत्मायें हैं ब्राइड्स (सीतायें) और वह है राम, ब्राइडग्रूम एक। वो लोग फिर सभी को ब्राइडग्रूम कह देते हैं। अब ब्राइडग्रूम सबमें प्रवेश करे, यह तो हो नहीं सकता। यह बुद्धि में उल्टा ज्ञान होने के कारण ही नीचे गिरते आये हैं क्योंकि बहुत ग्लानि करते, पाप करते, डिफेम करते हैं। बाप की बहुत भारी निंदा की है। बच्चे कभी बाप की ग्लानि करेंगे क्या! परन्तु आजकल बिगड़ते हैं तो बाप को भी गाली देने लगते हैं। यह तो है बेहद का बाप। आत्मा ही बेहद के बाप की ग्लानि करती है - बाबा आप कच्छ-मच्छ अवतार हो। कृष्ण की भी ग्लानि की है - रानियों को भगाया, यह किया, माखन चुराया। अब माखन आदि चुराने की उनको क्या दरकार पड़ी। कितने तमोप्रधान बुद्धि बन पड़े हैं। बाप कहते हैं मैं आकर तुमको पावन बनाने की बहुत सहज युक्ति बताता हूँ। बाप ही पतित-पावन सर्वशक्तिमान अथॉरिटी है। जैसे साधू-सन्त आदि जो भी हैं, उनको शास्त्रों की अथॉरिटी कहते हैं। शंकराचार्य को भी वेदों-शास्त्रों आदि की अथॉरिटी कहेंगे, उनका कितना भभका होता है। शिवाचार्य का तो कोई भभका नहीं, इनके साथ कोई पलटन नहीं। यह तो बैठ सभी वेदों-शास्त्रों का सार सुनाते हैं। अगर शिवबाबा भभका दिखाये तो पहले इनका (ब्रह्मा का) भी भभका चाहिए। परन्तु नहीं। बाप कहते हैं मैं तो तुम बच्चों का सर्वेन्ट हूँ। बाप इनमें प्रवेश कर बच्चों को समझाते हैं कि बच्चे तुम पतित बने हो। तुम पावन बन फिर 84 जन्मों के बाद पतित बन गये हो। इनकी ही हिस्ट्री-जॉग्राफी फिर से रिपीट होगी। इन्होंने ही 84 जन्म भोगे हैं। फिर उन्हें ही सतोप्रधान बनने की युक्ति बताते हैं। बाप ही सर्वशक्तिमान् है। ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों-शास्त्रों का सार समझाते हैं। चित्रों में ब्रह्मा को शास्त्र दिखाते हैं। परन्तु वास्तव में शास्त्रों आदि की बात है नहीं। न बाबा के पास शास्त्र हैं, न इनके पास, न तुम्हारे पास शास्त्र हैं। यह तो तुमको नित्य नई-नई बातें सुनाते हैं। यह तो जानते हो कि सभी भक्ति मार्ग के शास्त्र हैं। मैं कोई शास्त्र थोड़ेही सुनाता हूँ। मैं तो तुमको मुख से सुनाता हूँ। तुमको राजयोग सिखाता हूँ, जिसका फिर भक्ति मार्ग में नाम गीता रख दिया है। मेरे पास वा तुम्हारे पास कोई गीता आदि है क्या? यह तो पढ़ाई है। पढ़ाई में अध्याय, श्लोक आदि थोड़ेही होते हैं। मैं तुम बच्चों को पढ़ाता हूँ, हूबहू कल्प-कल्प ऐसे ही पढ़ाता रहूँगा। कितनी सहज बात समझाता हूँ - अपने को आत्मा समझो। यह शरीर तो मिट्टी हो जाता है। आत्मा अविनाशी है, शरीर तो घड़ी-घड़ी जलता रहता है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है।
बाप कहते हैं मैं तो एक ही बार आता हूँ। शिव रात्रि मनाते भी हैं। वास्तव में होना चाहिए शिव जयन्ती। परन्तु जयन्ती कहने से माता के गर्भ से जन्म हो जाता है, इसलिए शिव रात्रि कह देते हैं। द्वापर-कलियुग की रात्रि में मेरे को ढूँढते हैं। कहते हैं सर्वव्यापी है। तो तेरे में भी है ना, फिर धक्के क्यों खाते हो! एकदम जैसे देवता से आसुरी सम्प्रदाय के बन जाते हैं। देवतायें कभी शराब पीते हैं क्या? वही आत्मायें फिर गिरी हैं तो शराब आदि पीने लग पड़ी हैं। बाप कहते हैं अब इस पुरानी दुनिया का विनाश भी जरूर होना है। पुरानी दुनिया में हैं अनेक धर्म, नई दुनिया में है एक धर्म। एक से अनेक धर्म हुए हैं फिर एक जरूर होना है। मनुष्य तो कह देते कलियुग में अभी 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं, इसको कहा जाता है घोर अन्धियारा। ज्ञान सूर्य प्रगटा, अज्ञान अन्धेर विनाश। मनुष्यों में बहुत अज्ञान है। बाप ज्ञान सूर्य, ज्ञान सागर आते हैं तो तुम्हारा भक्ति मार्ग का अज्ञान मिट जाता है। तुम बाप को याद करते-करते पवित्र बन जाते हो, खाद निकल जाती है। यह है योग अग्नि। काम अग्नि काला बना देती है। योग अग्नि अर्थात् शिवबाबा की याद गोरा बनाती है। कृष्ण का नाम भी रखा है - श्याम-सुन्दर। परन्तु अर्थ थोड़ेही समझते हैं। बाप आकर अर्थ समझाते हैं। पहले-पहले सतयुग में कितने सुन्दर हैं। आत्मा पवित्र सुन्दर है तो शरीर भी पवित्र सुन्दर लेती है। वहाँ कितना धन दौलत सब कुछ नया होता है। नई धरनी फिर पुरानी होती है। अब इस पुरानी दुनिया का विनाश जरूर होना है। खूब तैयारियां हो रही हैं। भारतवासी इतना नहीं समझते हैं, जितना वह समझते हैं कि हम अपने कुल का विनाश कर रहे हैं। कोई प्रेरक है। साइंस द्वारा हम अपना ही विनाश लाते हैं। यह भी समझते हैं क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले पैराडाइज़ था। इन गॉड-गॉडेज का राज्य था। भारत ही प्राचीन था। इस राजयोग से लक्ष्मी-नारायण ऐसे बने थे। वह राजयोग फिर बाप ही सिखला सकते हैं। सन्यासी सिखला न सकें। आजकल कितनी ठगी लगी पड़ी है। बाहर में जाकर कहते हैं - हम भारत का प्राचीन योग सिखलाते हैं। और फिर कहते हैं अण्डा खाओ, शराब आदि भल पियो, कुछ भी करो। अब वह कैसे राजयोग सिखला सकेंगे। मनुष्य को देवता कैसे बनायेंगे। बाप समझाते हैं आत्मा कितनी ऊंच है फिर पुनर्जन्म लेते-लेते सतोप्रधान से तमोप्रधान बन जाती है। अब तुम फिर से स्वर्ग की स्थापना कर रहे हो। वहाँ दूसरा कोई धर्म होता ही नहीं। अब बाप कहते हैं नर्क का विनाश तो जरूर होना है। यहाँ तक जो आये हैं वह फिर स्वर्ग में जरूर जायेंगे। शिवबाबा का थोड़ा भी ज्ञान सुना तो स्वर्ग में जायेंगे जरूर। फिर जितना पढ़ेंगे, बाप को याद करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। अभी विनाश काल तो सबके लिए है। विनाश काले प्रीत बुद्धि जो हैं, सिवाए बाप के और कोई को याद नहीं करते हैं, वही ऊंच पद पाते हैं। इसको कहा जाता है बेहद की स्कॉलरशिप, इसमें तो रेस करनी चाहिए। यह है ईश्वरीय लॉटरी। एक तो याद, दूसरा दैवीगुण धारण करने हैं और राजा-रानी बनना है तो प्रजा भी बनानी है। कोई बहुत प्रजा बनाते हैं, कोई कम। प्रजा बनती है सर्विस से। म्युज़ियम, प्रदर्शनी आदि में ढेर प्रजा बनती है। इस समय तुम पढ़ रहे हो फिर सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी डिनायस्टी में चले जायेंगे। यह है तुम ब्राह्मणों का कुल। बाप ब्राह्मण कुल एडाप्ट कर उन्हों को पढ़ाते हैं। बाप कहते हैं मैं एक कुल और दो डिनायस्टी बनाता हूँ। सूर्यवंशी महाराजा-महारानी, चन्द्रवंशी राजा-रानी। इन्हों को कहेंगे डबल सिरताज फिर बाद में जब विकारी राजायें होते हैं तो उनको लाइट का ताज नहीं होता। उन डबल ताज वालों के मन्दिर बनाकर उनको पूजते हैं। पवित्र के आगे माथा टेकते हैं। सतयुग में यह बातें होती नहीं। वह है ही पावन दुनिया, वहाँ पतित होते नहीं। उसको कहा जाता है सुखधाम, वाइसलेस वर्ल्ड। इसको कहा जाता है विशश वर्ल्ड। एक भी पावन नहीं। सन्यासी घरबार छोड़ भागते हैं, राजा गोपीचन्द का भी मिसाल है ना। तुम जानते हो कोई भी मनुष्य एक-दो को गति-सद्गति दे नहीं सकते हैं। सर्व का सद्गति दाता मैं ही हूँ। मैं आकर सबको पावन बनाता हूँ। एक तो पवित्र बन शान्तिधाम चले जायेंगे और दूसरे पवित्र बन सुखधाम में जायेंगे। यह है अपवित्र दु:खधाम। सतयुग में बीमारी आदि कुछ भी होती नहीं। तुम उस सुखधाम के मालिक थे फिर रावणराज्य में दु:खधाम के मालिक बने हो। बाप कहते हैं कल्प-कल्प तुम मेरी श्रीमत पर स्वर्ग स्थापन करते हो। नई दुनिया का राज्य लेते हो। फिर पतित नर्कवासी बनते हो। देवतायें ही फिर विकारी बन जाते हैं। वाम मार्ग में गिरते हैं।
मीठे-मीठे बच्चों को बाप ने आकर परिचय दिया है कि मैं एक ही बार पुरूषोत्तम संगमयुग पर आता हूँ। मैं युगे-युगे तो आता ही नहीं हूँ। कल्प के संगमयुगे आता हूँ, न कि युगे-युगे। कल्प के संगम पर क्यों आता हूँ? क्योंकि नर्क को स्वर्ग बनाता हूँ। हर 5 हज़ार वर्ष बाद आता हूँ। कई बच्चे लिखते हैं - बाबा, हमको खुशी नहीं रहती है, उल्लास नहीं रहता है। अरे, बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं, ऐसे बाप को याद कर तुमको खुशी नहीं रहती है! तुम पूरा याद नहीं करते हो तब खुशी नहीं ठहरती है। पति को याद करते खुशी होती है, जो पतित बनाते हैं और बाप जो डबल सिरताज बनाते हैं, उनको याद करके खुशी नहीं होती है! बाप के बच्चे बने हो फिर भी कहते हो खुशी नहीं! पूरा ज्ञान बुद्धि में नहीं है। याद नहीं करते हो इसलिए माया धोखा देती है। बच्चों को कितना अच्छी रीति समझाते हैं। कल्प-कल्प समझाते हैं। आत्मायें जो पत्थरबुद्धि बन पड़ी हैं, उनको पारसबुद्धि बनाता हूँ। नॉलेजफुल बाप ही आकर नॉलेज देते हैं। वह हर बात मंत फुल है। प्योरिटी में फुल, प्यार में फुल। ज्ञान का सागर, सुख का सागर, प्यार का सागर है ना। ऐसे बाप से तुमको यह वर्सा मिलता है। ऐसा बनने के लिए ही तुम आते हो। बाकी वह सतसंग आदि तो सब हैं भक्ति मार्ग के। उनमें एम आब्जेक्ट कुछ भी है नहीं। इसको तो गीता पाठशाला कहा जाता है, वेद पाठशाला नहीं होती। गीता से नर से नारायण बनते हो। जरूर बाप ही बनायेंगे ना। मनुष्य, मनुष्य को देवता बना न सकें। बाप बार-बार बच्चों को समझाते हैं - बच्चे, अपने को आत्मा समझो। तुम कोई देह थोड़ेही हो। आत्मा कहती है मैं एक देह छोड़ दूसरी लेती हूँ। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

10-09-2019

10-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम जितना समय बाप की याद में रहेंगे उतना समय कमाई ही कमाई है, याद से ही तुम बाप के समीप आते जायेंगे''

प्रश्नः-

जो बच्चे याद में नहीं रह सकते हैं, उन्हें किस बात में लज्जा आती है?

उत्तर:-

अपना चार्ट रखने में उन्हें लज्जा आती। समझते हैं सच लिखेंगे तो बाबा क्या कहेंगे। लेकिन बच्चों का कल्याण इसमें ही है कि सच्चा-सच्चा चार्ट लिखते रहें। चार्ट लिखने में बहुत फायदे हैं। बाबा कहते - बच्चे, इसमें लज्जा मत करो।

ओम् शान्ति।

रूहानी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। अब तुम बच्चे 15 मिनट पहले आकर यहाँ बाप की याद में बैठते हो। अब यहाँ और तो कोई काम है नहीं। बाप की याद में ही आकर बैठते हो। भक्ति मार्ग में तो बाप का परिचय है नहीं। यहाँ बाप का परिचय मिला है और बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। मैं तो सब बच्चों का बाप हूँ। बाप को याद करने से वर्सा तो ऑटोमेटिकली याद आना चाहिए। छोटे बच्चे तो नहीं हो ना। भल लिखते हैं हम 5 मास वा 2 मास के हैं परन्तु तुम्हारी कर्मेन्द्रियां तो बड़ी हैं। तो रूहानी बाप समझाते हैं, यहाँ बाप और वर्से की याद में बैठना है। जानते हो हम नर से नारायण बनने के पुरूषार्थ में तत्पर हैं वा स्वर्ग में जाने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हैं। तो यह बच्चों को नोट करना चाहिए - हमने यहाँ बैठे-बैठे कितना समय याद किया? लिखने से बाप समझ जायेंगे। ऐसे नहीं कि बाप को मालूम पड़ता है - हर एक कितना समय याद में रहते हैं? वह तो हर एक अपने चार्ट से समझ सकते हैं - बाप की याद थी या बुद्धि कहाँ और तरफ चली गई? यह भी बुद्धि में है अभी बाबा आयेंगे तो यह भी याद ठहरी ना। कितना समय याद किया, वह चार्ट में सच लिखेंगे। झूठ लिखने से तो और ही सौगुणा पाप चढ़ेगा और ही नुकसान हो जायेगा इसलिए सच लिखना है - जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। और यह भी जानते हो हम नज़दीक आते जाते हैं। आखरीन जब याद पूरी हो जायेगी तो हम फिर बाबा के पास चले जायेंगे। फिर कोई तो झट नई दुनिया में आकर पार्ट बजायेंगे, कोई वहाँ ही बैठे रहेंगे। वहाँ कोई संकल्प तो आयेगा नहीं। वह है ही मुक्तिधाम, दु:ख-सुख से न्यारे। सुखधाम में जाने के लिए अब तुम पुरूषार्थ करते हो। जितना तुम याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। याद का चार्ट रखने से ज्ञान की धारणा भी अच्छी होगी। चार्ट रखने में तो फायदा ही है। बाबा जानते हैं याद में न रहने कारण लिखने में लज्जा आती है। बाबा क्या कहेंगे, मुरली में सुना देंगे। बाप कहते हैं इसमें लज्जा की क्या बात है। दिल अन्दर हर एक समझ सकते हैं - हम याद करते हैं वा नहीं? कल्याणकारी बाप तो समझाते हैं, नोट करेंगे तो कल्याण होगा। जब तक बाबा आये, उतना समय जो बैठे उसमें याद का चार्ट कितना रहा? फ़र्क देखना चाहिए। प्यारी चीज़ को तो बहुत याद किया जाता है। कुमार-कुमारी की सगाई होती है तो दिल में एक-दो की याद ठहर जाती है। फिर शादी होने से पक्की हो जाती है। बिगर देखे समझ जाते हैं - हमारी सगाई हुई है। अभी तुम बच्चे जानते हो कि शिवबाबा हमारा बेहद का बाप है। भल देखा नहीं है परन्तु बुद्धि से समझ सकते हो, वह बाप अगर नाम-रूप से न्यारा है तो फिर पूजा किसकी करते हो? याद क्यों करते हो? नाम-रूप से न्यारी बेअन्त तो कोई चीज़ होती नहीं। जरूर चीज़ को देखा जाता है तब वर्णन होता है। आकाश को भी देखते हैं ना। बेअन्त कह नहीं सकते। भक्ति मार्ग में भगवान को याद करते है - 'हे भगवान' तो बेअन्त थोड़ेही कहेंगे। 'हे भगवान' कहने से तो झट उनकी याद आती है तो जरूर कोई चीज़ है। आत्मा को भी जाना जाता है, देखा नहीं जाता।
सब आत्माओं का एक ही बाप होता है, उनको भी जाना जाता है। तुम बच्चे जानते हो - बाप आकर पढ़ाते भी हैं। आगे यह मालूम नहीं था कि पढ़ाते भी हैं। कृष्ण का नाम डाल दिया है। कृष्ण तो इन आंखों से देखने में आता है। उनके लिए तो बेअन्त, नाम-रूप से न्यारा कह न सकें। कृष्ण तो कभी कहेंगे नहीं - मामेकम् याद करो। वह तो सम्मुख है। उनको बाबा भी नहीं कहेंगे। मातायें तो कृष्ण को बच्चा समझ गोद में बिठाती हैं। जन्माष्टमी पर छोटे कृष्ण को झुलायेंगे। क्या सदैव छोटा ही है! फिर रास विलास भी करते हैं। तो जरूर थोड़ा बड़ा हुआ फिर उनसे बड़ा हुआ वा क्या हुआ, कहाँ गया, किसको भी पता नहीं। सदैव छोटा शरीर तो नहीं होगा ना। कुछ भी ख्याल नहीं करते हैं। यह पूजा आदि की रस्म चली आती है। ज्ञान तो कोई में है नहीं। दिखाते हैं कृष्ण ने कंसपुरी में जन्म लिया। अब कंसपुरी की तो बात ही नहीं। कोई का भी विचार नहीं चलता। भक्त लोग तो कहेंगे कृष्ण हाज़िराहज़ूर है फिर उनको स्नान भी कराते हैं, खिलाते भी हैं। अब वह खाता तो नहीं। रखते हैं मूर्ति के सामने और खुद खा लेते हैं। यह भी भक्ति मार्ग हुआ ना। श्रीनाथ जी पर इतना भोग लगाते हैं, वह तो खाता नहीं, खुद खा जाते हैं। देवियों की पूजा में भी ऐसे करते हैं। खुद ही देवियाँ बनाते हैं, उनकी पूजा आदि कर फिर डुबो देते हैं। जेवरात आदि उतारकर ड़ुबोते हैं फिर वहाँ तो बहुत रहते हैं, जिसको जो हाथ में आया वह उठा लेते हैं। देवियों की ही जास्ती पूजा होती है। लक्ष्मी और दुर्गा दोनों की मूर्तियाँ बनाते हैं। बड़ी मम्मा भी यहाँ बैठी है ना, जिसको ब्रह्मपुत्रा भी कहते हैं। समझेंगे ना कि इस जन्म और भविष्य के रूप की पूजा कर रहे हैं। कितना वन्डरफुल ड्रामा है। ऐसी-ऐसी बातें शास्त्रों में आ न सकें। यह है प्रैक्टिकल एक्टिविटी। तुम बच्चों को अब ज्ञान है। समझते हो सबसे जास्ती चित्र बनाये हैं आत्माओं के। जब रूद्र यज्ञ रचते हैं तो लाखों सालिग्राम बनाते हैं। देवियों के कब लाखों चित्र नहीं बनायेंगे। वह तो जितने पुजारी होंगे उतनी देवियाँ बनाते होंगे। वह तो एक ही टाइम पर लाख सालिग्राम बनाते हैं। उनका कोई फिक्स दिन नहीं होता है। कोई मुहूर्त्त आदि नहीं होता है। जैसे देवियों की पूजा फिक्स टाइम पर होती है। सेठ लोगों को तो जब ख्याल में आयेगा कि रूद्र या सालिग्राम रचें तो ब्राह्मण बुलायेंगे। रूद्र कहा जाता है एक बाप को फिर उनके साथ ढेर सालिग्राम बनाते हैं। वो सेठ लोग कहते हैं इतने सालिग्राम बनाओ। उनकी तिथि-तारीख कोई मुकरर नहीं होती। ऐसे भी नहीं कि शिव जयन्ती पर ही रूद्र पूजा करते हैं। नहीं, अक्सर करके शुभ दिन बृहस्पति को ही रखते हैं। दीपमाला पर लक्ष्मी का चित्र थाली में रखकर उनकी पूजा करते हैं। फिर रख देते हैं। वह है महालक्ष्मी, युगल हैं ना। मनुष्य इन बातों को जानते नहीं। लक्ष्मी को पैसे कहाँ से मिलेंगे? युगल तो चाहिए ना। तो यह (लक्ष्मी-नारायण) युगल हैं। नाम फिर महालक्ष्मी रख देते हैं। देवियाँ कब हुई, महालक्ष्मी कब होकर गई? यह सब बातें मनुष्य नहीं जानते हैं। तुमको अब बाप बैठ समझाते हैं। तुम्हारे में भी सबको एकरस धारणा नहीं होती है। बाबा इतना सब समझाकर फिर भी कहते शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? मूल बात है यह। भक्ति मार्ग में कितना पैसा वेस्ट करते हैं। यहाँ तुम्हारी पाई भी वेस्ट नहीं होती है। तुम सर्विस करते हो सालवेन्ट बनने के लिए। भक्ति मार्ग में तो बहुत पैसे खर्च करते हैं, इनसालवेन्ट बन पड़ते हैं। सब मिट्टी में मिल जाता है। कितना फर्क है! इस समय जो कुछ करते हैं वह ईश्वरीय सर्विस में शिवबाबा को देते हैं। शिवबाबा तो खाते नहीं हैं, खाते तुम हो। तुम ब्राह्मण बीच में ट्रस्टी हो। ब्रह्मा को नहीं देते हो। तुम शिवबाबा को देते हो। कहते हैं - बाबा, आपके लिए धोती-कमीज़ लाई है। बाबा कहते हैं - इनको देने से तुम्हारा कुछ भी जमा नहीं होगा। जमा वह होता है जो तुम शिवबाबा को याद कर इनको देते हो। फिर यह तो समझते हो ब्राह्मण शिवबाबा के खजाने से ही पलते हैं। बाबा से पूछने की दरकार नहीं है कि क्या भेजूँ? यह तो लेंगे नहीं। तुम्हारा जमा ही नहीं होगा, अगर ब्रह्मा को याद किया तो। ब्रह्मा को तो लेना है शिवबाबा के खजाने से। तो शिवबाबा ही याद पड़ेगा। तुम्हारी चीज़ क्यों लेवें। बी.के. को देना भी रांग है। बाबा ने समझाया है तुम कोई से भी चीज़ लेकर पहनेंगे तो उनकी याद आती रहेगी। कोई हल्की चीज़ है तो उनकी बात नहीं। अच्छी चीज़ तो और ही याद दिलायेगी - फलाने ने यह दिया है। उनका कुछ जमा तो होता नहीं। तो घाटा पड़ा ना। शिवबाबा कहते हैं मामेकम् याद करो। मुझे कपड़े आदि की दरकार नहीं। कपड़े आदि बच्चों को चाहिए। वह शिवबाबा के खजाने से पहनेंगे। मुझे तो अपना शरीर है नहीं। यह तो शिवबाबा के खजाने से लेने के हकदार हैं। राजाई के भी हकदार हैं। बाप के घर में ही बच्चे खाते पीते हैं ना। तुम भी सर्विस करते, कमाई करते रहते हो। जितनी सर्विस बहुत, उतनी बहुत कमाई होगी। खायेंगे, पियेंगे शिवबाबा के भण्डारे से। उनको नहीं देंगे तो जमा ही नहीं होगा। शिवबाबा को ही देना होता है। बाबा, आपसे भविष्य 21 जन्मों के लिए पद्मापद्मपति बनेंगे। पैसे तो खत्म हो जायेंगे इसलिए समर्थ को हम दे देते हैं। बाप समर्थ हैं ना। 21 जन्मों के लिए वह देते हैं। इनडायरेक्ट भी ईश्वर अर्थ देते हैं ना। इनडायरेक्ट में इतना समर्थ नहीं है। अभी तो बहुत समर्थ है क्योंकि सम्मुख है। वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी इस समय के लिए है।
ईश्वर अर्थ कुछ दान-पुण्य करते हैं तो अल्पकाल के लिए कुछ मिल जाता है। यहाँ तो बाप तुमको समझाते हैं - मैं सम्मुख हूँ। मैं ही देने वाला हूँ। इसने भी शिवबाबा को सब कुछ देकर सारे विश्व की बादशाही ले ली ना। यह भी जानते हो - इस व्यक्त का ही अव्यक्त रूप में साक्षात्कार होता है। इनमें शिवबाबा आकर बच्चों से बात करते हैं। कभी भी यह ख्याल नहीं करना चाहिए - हम मनुष्य से लेवें। बोलो, शिवबाबा के भण्डारे में भेज दो, इनको देने से तो कुछ नहीं मिलेगा, और ही घाटा पड़ जायेगा। गरीब होंगे, करके 3-4 रूपये की कोई चीज़ तुमको देंगे। इनसे तो शिवबाबा के भण्डारे में डालने से पद्म हो जायेगा। अपने को घाटा थोड़ेही डालना है। पूजा अक्सर देवियों की ही होती है क्योंकि तुम देवियां ही खास निमित्त बनती हो ज्ञान देने के। भल गोप भी समझाते हैं परन्तु अक्सर करके तो मातायें ही ब्राह्मणी बन रास्ता बताती हैं इसलिए देवियों का नाम जास्ती है। देवियों की बहुत पूजा होती है। यह भी तुम बच्चे समझते हो आधाकल्प हम पूज्य थे। पहले हैं फुल पूज्य, फिर सेमी पूज्य क्योंकि दो कला कम हो जाती है। राम की डिनायस्टी कहेंगे त्रेता में। वह तो लाखों वर्ष की बात कह देते हैं, तो उनका कोई हिसाब ही नहीं हो सकता। भक्ति मार्ग वालों की बुद्धि में और तुम्हारी बुद्धि में कितना रात-दिन का फ़र्क है! तुम हो ईश्वरीय बुद्धि, वह हैं रावण की बुद्धि। तुम्हारी बुद्धि में है कि यह सारा चक्र ही 5 हज़ार वर्ष का है, जो फिरता रहता है। जो रात में हैं वह कहते हैं लाखों वर्ष, जो दिन में हैं वह कहते 5 हज़ार वर्ष। आधाकल्प भक्ति मार्ग में तुमने असत्य बातें सुनी हैं। सतयुग में ऐसी बातें होती ही नहीं। वहाँ तो वर्सा मिलता है। अब तुमको डायरेक्ट मत मिलती है। श्रीमद् भगवत गीता है ना। और कोई शास्त्र पर श्रीमद् नाम है नहीं। हर 5हज़ार वर्ष बाद यह पुरूषोत्तम संगमयुग, गीता का युग आता है। लाखों वर्ष की तो बात हो नहीं सकती है। कभी भी कोई आये तो ले जाओ संगम पर। बेहद के बाप ने रचयिता अर्थात् अपना और रचना का सारा परिचय दिया है। फिर भी कहते हैं - अच्छा, बाप को याद करो, और कुछ धारणा नहीं कर सकते हो तो अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। पवित्र तो बनना ही है। बाप से वर्सा लेते हो तो दैवीगुण भी धारण करने हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) 21 जन्मों के लिए पद्मों की कमाई जमा करने के लिए डायरेक्ट ईश्वरीय सेवा में सब कुछ सफल करना है। ट्रस्टी बन शिवबाबा के नाम पर सेवा करनी है।

2) याद में जितना समय बैठते, उतना समय बुद्धि कहाँ-कहाँ गई - यह चेक करना है। अपना सच्चा-सच्चा पोतामेल रखना है। नर से नारायण बनने के लिए बाप और वर्से की याद में रहना है।

वरदान:-

अविनाशी प्राप्तियों की स्मृति से अपने श्रेष्ठ भाग्य की खुशी में रहने वाले इच्छा मात्रम् अविद्या भव

जिसका बाप ही भाग्य विधाता हो उसका भाग्य क्या होगा! सदा यही खुशी रहे कि भाग्य तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। "वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य और भाग्य विधाता बाप'' यही गीत गाते खुशी में उड़ते रहो। ऐसा अविनाशी खजाना मिला है जो अनेक जन्म साथ रहेगा, कोई छीन नहीं सकता, लूट नहीं सकता। कितना बड़ा भाग्य है जिसमें कोई इच्छा नहीं, मन की खुशी मिल गई तो सर्व प्राप्तियां हो गई। कोई अप्राप्त वस्तु है ही नहीं इसलिए इच्छा मात्रम् अविद्या बन गये।

स्लोगन:-

विकर्म करने का टाइम बीत गया, अभी व्यर्थ संकल्प, बोल भी बहुत धोखा देते हैं।

07-09-2019

07-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - बाप कल्प-कल्प आकर तुम बच्चों को अपना परिचय देते हैं, तुम्हें भी सबको बाप का यथार्थ परिचय देना है''

प्रश्नः-

बच्चों के किस प्रश्न को सुनकर बाप भी वन्डर खाते हैं?

उत्तर:-

बच्चे कहते हैं - बाबा आपका परिचय देना बहुत मुश्किल है। हम आपका परिचय कैसे दें? यह प्रश्न सुनकर बाप को भी वन्डर लगता है। जब तुम्हें बाप ने अपना परिचय दिया है तो तुम भी दूसरों को दे सकते हो, इसमें मुश्किलात की बात ही नहीं। यह तो बहुत सहज है। हम सब आत्मायें निराकार हैं तो जरूर उनका बाप भी निराकार होगा।

ओम् शान्ति।

मीठे-मीठे रूहानी बच्चे समझते हैं बेहद के बाप पास बैठे हैं। यह भी जानते हैं बेहद का बाप इस रथ पर ही आते हैं। जब बापदादा कहते हैं, यह तो जानते हैं कि शिवबाबा है और वह इस रथ पर बैठा है। अपना परिचय दे रहे हैं। बच्चे जानते हैं वह बाबा है, बाबा मत देते हैं कि रूहानी बाप को याद करो तो पाप भस्म हो जाएं, जिसको योग अग्नि कहते हैं। अभी तुम बाप को तो पहचानते हो। तो ऐसे कभी थोड़ेही कहेंगे कि बाप का परिचय दूसरे को कैसे दूँ। तुमको भी बेहद के बाप का परिचय है तो जरूर दे भी सकते हो। परिचय कैसे दें, यह तो प्रश्न ही नहीं उठ सकता है। जैसे तुमने बाप को जाना है, वैसे तुम कह सकते हो कि हम आत्माओं का बाप तो एक ही है, इसमें मूँझने की दरकार ही नहीं रहती। कोई-कोई कहते हैं बाबा आपका परिचय देना बड़ा मुश्किल होता है। अरे, बाप का परिचय देना - इसमें तो मुश्किलात की कोई बात ही नहीं। जानवर भी इशारे से समझ जाते हैं कि मैं फलाने का बच्चा हूँ। तुम भी जानते हो कि हम आत्माओं का वह बाप है। हम आत्मा अभी इस शरीर में प्रवेश हैं। जैसे बाबा ने समझाया है कि आत्मा अकालमूर्त्त है। ऐसे नहीं उसका कोई रूप नहीं है। बच्चों ने पहचाना है - बिल्कुल सिम्पुल बात है। आत्माओं का एक ही निराकार बाप है। हम सब आत्मायें भाई-भाई हैं। बाप की सन्तान हैं। बाप से हमको वर्सा मिलता है। यह भी जानते हैं ऐसा कोई बच्चा इस दुनिया में नहीं होगा जो बाप को और उनकी रचना को न जानता हो। बाप के पास क्या प्रापर्टी है, वह सब जानते हैं। यह है ही आत्माओं और परमात्मा का मेला। यह कल्याणकारी मेला है। बाप है ही कल्याणकारी। बहुत कल्याण करते हैं। बाप को पहचानने से समझते हो - बेहद के बाप से हमको बेहद का वर्सा मिलता है। वह जो सन्यासी गुरू होते हैं, उनके शिष्यों को गुरू के वर्से का मालूम नहीं रहता है। गुरू के पास क्या मिलकियत है, यह कोई शिष्य मुश्किल जानते होंगे। तुम्हारी बुद्धि में तो है - वह शिवबाबा है, मिलकियत भी बाबा के पास होती है। बच्चे जानते हैं बेहद के बाप के पास मिलकियत है - विश्व की बादशाही स्वर्ग। यह बातें सिवाए तुम बच्चों के और कोई की बुद्धि में नहीं हैं। लौकिक बाप के पास क्या मिलकियत है, वह उनके बच्चे ही जानते हैं। अभी तुम कहेंगे हम जीते जी पारलौकिक बाप के बने हैं। उनसे क्या मिलता है, वह भी जानते हैं। हम पहले शूद्र कुल में थे, अभी ब्राह्मण कुल में आ गये हैं। यह नॉलेज है कि बाबा इस ब्रह्मा तन में आते हैं, इनको प्रजापिता ब्रह्मा कहा जाता है। वह (शिव) तो है सब आत्माओं का फादर। इनको (प्रजापिता ब्रह्मा को) ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर कहते हैं। अब हम इनके बच्चे बने हैं। शिवबाबा के लिए तो कहते हैं वह हाज़िराहजूर है। जानी-जाननहार है। यह भी अब तुम समझते हो कि वह कैसे रचना के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज देते हैं। वह सब आत्माओं का बाप है, उनको नाम-रूप से न्यारा कहना तो झूठ है। उनका नाम-रूप भी याद है। रात्रि भी मनाते हैं, जयन्ती तो मनुष्यों की होती है। शिवबाबा की रात्रि कहेंगे। बच्चे समझते हैं रात्रि किसको कहा जाता है। रात में घोर अन्धियारा हो जाता है। अज्ञान अन्धियारा है ना। ज्ञान सूर्य प्रगटा अज्ञान अन्धेर विनाश - अभी भी गाते हैं परन्तु अर्थ कुछ नहीं समझते। सूर्य कौन है, कब प्रगटा, कुछ नहीं समझते। बाप समझाते हैं ज्ञान सूर्य को ज्ञान सागर भी कहा जाता है। बेहद का बाप ज्ञान का सागर है। सन्यासी, गुरू, गोसाई आदि अपने को शास्त्रों की अथॉरिटी समझते हैं, वह सब है भक्ति। बहुत वेद-शास्त्र पढ़कर विद्वान होते हैं। तो बाप रूहानी बच्चों को बैठ समझाते हैं, इनको कहा जाता है आत्मा और परमात्मा का मेला। तुम समझते हो बाप इस रथ में आये हुए हैं। इस मिलन को ही मेला कहते हैं। जब हम घर जाते हैं तो वह भी मेला है। यहाँ बाप खुद बैठ पढ़ाते हैं। वह फादर भी है, टीचर भी है। यह एक ही प्वाइंट अच्छी रीति धारण करो, भूलो मत। अब बाप तो है निराकार, उनको अपना शरीर नहीं है तो जरूर लेना पड़े। तो खुद कहते हैं मैं प्रकृति का आधार लेता हूँ। नहीं तो बोलूँ कैसे? शरीर बिगर तो बोलना होता नहीं। तो बाप इस तन में आते हैं, इनका नाम रखा है ब्रह्मा। हम भी शूद्र से ब्राह्मण बनें तो नाम बदलना ही चाहिए। नाम तो तुम्हारे रखे थे। परन्तु उसमें भी अभी देखो तो कई हैं ही नहीं इसलिए ब्राह्मणों की माला नहीं होती। भक्त माला और रूद्र माला गाई हुई है। ब्राह्मणों की माला नहीं होती। विष्णु की माला तो चली आई है। पहले नम्बर में माला का दाना कौन है? कहेंगे युगल इसलिए सूक्ष्मवतन में भी युगल दिखाया है। विष्णु भी 4 भुजा वाला दिखाया है। दो भुजा लक्ष्मी की, दो भुजा नारायण की।
बाप समझाते हैं मैं धोबी हूँ। मैं योगबल से तुम आत्माओं को शुद्ध बनाता हूँ फिर भी तुम विकार में जाकर अपना श्रृंगार ही गँवा देते हो। बाप आते हैं सबको शुद्ध बनाने। आत्माओं को आकर सिखलाते हैं तो सिखलाने वाला जरूर यहाँ चाहिए ना। पुकारते भी हैं आकर पावन बनाओ। कपड़ा भी मैला होता है तो उनको धोकर शुद्ध बनाया जाता है। तुम भी पुकारते हो - हे पतित पावन बाबा, आकर पावन बनाओ। आत्मा पावन बनें तो शरीर भी पावन मिले। तो पहली-पहली मूल बात होती है बाप का परिचय देना। बाप का परिचय कैसे दें, यह तो प्रश्न ही नहीं पूछ सकते। तुमको भी बाप ने परिचय दिया है तब तो तुम आये हो ना। बाप पास आते हो, बाप कहाँ है? इस रथ में। यह है अकाल तख्त। तुम आत्मा भी अकाल मूर्त्त हो। यह सब तुम्हारे तख्त हैं, जिस पर तुम आत्मायें विराजमान हो। वह तो अकाल तख्त जड़ हो गया ना। तुम जानते हो मैं अकाल मूर्त्त अर्थात् निराकार, जिसका साकार रूप नहीं है। मैं आत्मा अविनाशी हूँ, कब विनाश हो न सके। एक शरीर छोड़ दूसरा लेता हूँ। मुझ आत्मा का पार्ट अविनाशी नूँधा हुआ है। आज से 5 हज़ार वर्ष पहले भी हमारा ऐसे ही पार्ट शुरू हुआ था। वन-वन संवत से हम यहाँ पार्ट बजाने घर से आते हैं। यह है ही 5 हज़ार वर्ष का पा। वह तो लाखों वर्ष कह देते हैं इसलिए थोड़े वर्षों का विचार में नहीं आता। तो बच्चे ऐसा कभी कह नहीं सकते कि हम बाप का परिचय किसको कैसे दें। ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछते हैं तो वन्डर लगता है। अरे, तुम बाप के बने हो, फिर बाप का परिचय क्यों नहीं दे सकते हो! हम सब आत्मायें हैं, वह हमारा बाबा है। सर्व की सद्गति करते हैं। सद्गति कब करेंगे यह भी तुमको अभी पता पड़ा है। कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर आकर सर्व की सद्गति करेंगे। वह तो समझते हैं - अभी 40 हज़ार वर्ष पड़े हैं और पहले से ही कह देते नाम-रूप से न्यारा है। अब नाम-रूप से न्यारी कोई चीज़ थोड़ेही होती है। पत्थर भित्तर का भी नाम है ना। तो बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, तुम आये हो बेहद के बाप के पास। बाप भी जानते हैं, कितने ढेर बच्चे हैं। बच्चों को अभी हद और बेहद से भी पार जाना है। सब बच्चों को देखते हैं, जानते हैं इन सबको मैं लेने लिए आया हूँ। सतयुग में तो बहुत थोड़े होंगे। कितना क्लीयर है इसलिए चित्रों पर समझाया जाता है। नॉलेज तो बिल्कुल इज़ी है। बाकी याद की यात्रा में टाइम लगता है। ऐसे बाप को तो कभी भूलना नहीं चाहिए। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो तो पावन बन जायेंगे। मैं आता ही हूँ पतित से पावन बनाने। तुम अकालमूर्त्त आत्मायें सब अपने-अपने तख्त पर विराजमान हो। बाबा ने भी इस तख्त का लोन लिया है। इस भाग्यशाली रथ में बाप प्रवेश होते हैं। कोई कहते हैं परमात्मा का नाम-रूप नहीं है। यह तो हो ही नहीं सकता। उनको पुकारते हैं, महिमा गाते हैं, तो ज़रूर कोई चीज़ है ना। तमोप्रधान होने कारण कुछ भी समझते नहीं। बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, इतनी 84 लाख योनियां तो कोई होती नहीं। हैं ही 84 जन्म। पुनर्जन्म भी सबका होगा। ऐसे थोड़ेही ब्रह्म में जाकर लीन होंगे वा मोक्ष को पायेंगे। यह तो बना-बनाया ड्रामा है। एक भी कम-जास्ती नहीं हो सकता। इस अनादि अविनाशी ड्रामा से ही फिर छोटे-छोटे ड्रामा वा नाटक बनाते हैं। वह हैं विनाशी। अभी तुम बच्चे बेहद में खड़े हो। तुम बच्चों को यह नॉलेज मिली हुई है - हमने कैसे 84 जन्म लिए हैं। अभी बाप ने बताया है, आगे किसको पता नहीं था। ऋषि-मुनि भी कहते थे - हम नहीं जानते हैं। बाप आते ही हैं संगमयुग पर, इस पुरानी दुनिया को चेंज करने। ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की स्थापना फिर से करते हैं। वह तो लाखों वर्ष कह देते हैं। कोई बात याद भी न आ सके। महाप्रलय भी कोई होती नहीं। बाप राजयोग सिखलाते हैं फिर राजाई तुम पाते हो। इसमें तो संशय की कोई बात ही नहीं। तुम बच्चे जानते हो पहले नम्बर में सबसे प्यारा है बाप फिर नेक्स्ट प्यारा है श्रीकृष्ण। तुम जानते हो श्रीकृष्ण है स्वर्ग का पहला प्रिन्स, नम्बरवन। वही फिर 84 जन्म लेते हैं। उसके ही अन्तिम जन्म में मैं प्रवेश करता हूँ। अब तुमको पतित से पावन बनना है। पतित-पावन बाप ही है, पानी की नदियां थोड़ेही पावन कर सकती हैं। यह नदियां तो सतयुग में भी होती हैं। वहाँ तो पानी बहुत शुद्ध रहता है। किचड़ा आदि कुछ नहीं रहता। यहाँ तो कितना किचड़ा पड़ता रहता है। बाबा का देखा हुआ है, उस समय तो ज्ञान नहीं था। अभी वन्डर लगता है पानी कैसे पावन बना सकता है।
तो बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, कभी भी मूँझो नहीं कि बाप को याद कैसे करें। अरे, तुम बाप को याद नहीं कर सकते हो! वह हैं कुख की सन्तान, तुम हो एडाप्टेड बच्चे। एडाप्टेड बच्चों को जिस बाप से मिलकियत मिलती है, उनको भूल सकते हैं क्या? बेहद के बाप से बेहद की मिलकियत मिलती है तो उनको भूलना थोड़ेही चाहिए। लौकिक बच्चे बाप को भूलते हैं क्या। परन्तु यहाँ माया का आपोजीशन होता है। माया की युद्ध चलती है, सारी दुनिया कर्मक्षेत्र है। आत्मा इस शरीर में प्रवेशकर यहाँ कर्म करती है। बाप कर्म-अकर्म-विकर्म का राज़ समझाते हैं। यहाँ रावण राज्य में कर्म विकर्म बन जाते हैं। वहाँ रावण राज्य ही नहीं तो कर्म अकर्म हो जाते हैं, विकर्म कोई होता ही नहीं। यह तो बहुत सहज बात है। यहाँ रावण राज्य में कर्म विकर्म होते हैं इसलिए विकर्मो का दण्ड भोगना पड़ता है। ऐसे थोड़ेही कहेंगे रावण अनादि है। नहीं, आधाकल्प है रावण राज्य, आधाकल्प है राम राज्य। तुम जब देवता थे तो तुम्हारे कर्म अकर्म होते थे। अब यह है नॉलेज। बच्चे बने हो तो फिर पढ़ाई भी पढ़नी है। बस, फिर और कोई धन्धे आदि का ख्याल भी नहीं आना चाहिए। परन्तु गृहस्थ व्यवहार में रहते धन्धा आदि भी करने वाले हैं तो बाप कहते हैं कमल फूल समान रहो। ऐसे देवता तुम बनने वाले हो। वह निशानी विष्णु को दे दी है क्योंकि तुमको शोभेगा नहीं। उनको शोभता है। वही विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बनने वाले हैं। वह है ही अहिंसा परमो देवी-देवता धर्म। न कोई विकार की काम कटारी होती, न कोई लड़ाई-झगड़ा आदि होता है। तुम डबल अहिंसक बनते हो। सतयुग के मालिक थे। नाम ही है गोल्डन एज। कंचन दुनिया। आत्मा और काया दोनों कंचन बन जाती हैं। कंचन काया कौन बनाते हैं? बाप। अभी तो आइरन एज है ना। अब तुम कहते हो सतयुग पास हो गया है। कल सतयुग था ना। तुम राज्य करते थे। तुम नॉलेजफुल बनते जाते हो। सब तो एक जैसे नहीं बनेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मैं आत्मा अकाल तख्त नशीन हूँ, इस स्मृति में रहना है, हद और बेहद से पार जाना है इसलिए हदों में बुद्धि नहीं फँसानी है।

2) बेहद बाप से बेहद की मिलकियत मिलती है, इस नशे में रहना है। कर्म-अकर्म-विकर्म की गति को जान विकर्मों से बचना है। पढ़ाई के समय धन्धे आदि से बुद्धि निकाल लेनी है।

वरदान:-

सेवा में स्नेह और सत्यता की अथॉरिटी के बैलेन्स द्वारा सफलतामूर्त भव

जैसे इस झूठ खण्ड में ब्रह्मा बाप को सत्यता की अथॉरिटी का प्रत्यक्ष स्वरूप देखा। उनके अथॉरिटी के बोल कभी अंहकार की भासना नहीं देंगे। अथॉरिटी के बोल में स्नेह समाया हुआ है। अथॉरिटी के बोल सिर्फ प्यारे नहीं प्रभावशाली होते हैं। तो फालो फादर करो - स्नेह और अथॉरिटी, निमार्णता और महानता दोनों साथ-साथ दिखाई दें। वर्तमान समय सेवा में इस बैलेन्स को अन्डरलाइन करो तो सफलता मूर्त बन जायेंगे।

स्लोगन:-

मेरे को तेरे में परिवर्तन करना अर्थात् भाग्य का अधिकार लेना।

09-09-2019

09-09-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - ब्राह्मण हैं चोटी और शूद्र हैं पांव, जब शूद्र से ब्राह्मण बनें तब देवता बन सकेंगे''

प्रश्नः-

तुम्हारी शुभ भावना कौन-सी है, जिसका भी मनुष्य विरोध करते हैं?

उत्तर:-

तुम्हारी शुभ भावना है कि यह पुरानी दुनिया खत्म हो नई दुनिया स्थापन हो जाए इसके लिए तुम कहते हो कि यह पुरानी दुनिया अब विनाश हुई कि हुई। इसका भी मनुष्य विरोध करते हैं।

प्रश्नः-

इस इन्द्रप्रस्थ का मुख्य कायदा क्या है?

उत्तर:-

कोई भी पतित शूद्र को इस इन्द्रप्रस्थ की सभा में नहीं ला सकते। अगर कोई ले आते हैं तो उस पर भी पाप लग जाता है।

ओम् शान्ति।

रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ समझाते हैं। रूहानी बच्चे जानते हैं हम अपने लिए अपना दैवी राज्य फिर से स्थापन कर रहे हैं क्योंकि तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियां हो, तुम ही जानते हो। परन्तु माया तुम्हें भी भुला देती है। तुम देवता बनना चाहते हो तो माया तुमको ब्राह्मण से शूद्र बना देती है। शिवबाबा को याद न करने से ब्राह्मण शूद्र बन जाते हैं। बच्चों को यह मालूम है कि हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं। जब राज्य स्थापन हो जायेगा फिर यह पुरानी सृष्टि नहीं रहेगी। सबको इस विश्व से शान्तिधाम में भेज देते हैं। यह है तुम्हारी भावना। परन्तु तुम जो कहते हो यह दुनिया खत्म हो जानी है तो जरूर लोग विरोध करेंगे ना। कहेंगे कि ब्रह्माकुमारियां यह फिर क्या कहती हैं। विनाश, विनाश ही कहती रहती हैं। तुम जानते हो इस विनाश में ही खास भारत और आम दुनिया की भलाई है। यह बात दुनिया वाले नहीं जानते। विनाश होगा तो सब चले जायेंगे मुक्तिधाम। अभी तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय के बने हो। पहले आसुरी सम्प्रदाय के थे। तुमको ईश्वर खुद कहते हैं मामेकम् याद करो। यह तो बाप जानते हैं सदैव याद में कोई रह न सके। सदैव याद रहे तो विकर्म विनाश हो जाएं फिर तो कर्मातीत अवस्था हो जाए। अभी तो सब पुरूषार्थी हैं। जो ब्राह्मण बनेंगे वही देवता बनेंगे। ब्राह्मणों के बाद हैं देवतायें। बाप ने समझाया है ब्राह्मण हैं चोटी। जैसे बच्चे बाजोली खेलते हैं - पहले आता है माथा चोटी। ब्राह्मणों को हमेशा चोटी होती है। तुम हो ब्राह्मण। पहले शूद्र अर्थात् पैर थे। अभी बने हो ब्राह्मण चोटी फिर देवता बनेंगे। देवता कहते हैं मुख को, क्षत्रिय भुजाओं को, वैश्य पेट को, शूद्र पैर को। शूद्र अर्थात् क्षुद्र बुद्धि, तुच्छ बुद्धि। तुच्छ बुद्धि उनको कहते हैं जो बाप को नहीं जानते और ही बाप की ग्लानि करते रहते हैं। तब बाप कहते हैं जब-जब भारत में ग्लानि होती है, मैं आता हूँ। जो भारतवासी हैं बाप उन्हों से ही बात करते हैं। यदा यदाहि धर्मस्य..... बाप आते भी हैं भारत में। और कोई जगह आते ही नहीं। भारत ही अविनाशी खण्ड है। बाप भी अविनाशी है। वह कभी जन्म-मरण में नहीं आते। बाप अविनाशी आत्माओं को ही बैठ सुनाते हैं। यह शरीर तो है विनाशी। अभी तुम शरीर का भान छोड़कर अपने को आत्मा समझने लगे हो। बाप ने समझाया था कि होली पर कोकी पकाते हैं तो कोकी सारी जल जाती है, धागा नहीं जलता। आत्मा कभी विनाश नहीं होती है। इस पर ही यह मिसाल है। यह कोई भी मनुष्य मात्र को मालूम नहीं कि आत्मा अविनाशी है। वह तो कह देते आत्मा निर्लेप है। बाप कहते हैं - नहीं, आत्मा ही अच्छा वा बुरा कर्म करती है इस शरीर द्वारा। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा लेती है और कर्मभोग भोगती है, तो वह हिसाब-किताब ले आई ना, इसलिए आसुरी दुनिया में मनुष्य अपार दु:ख भोगते हैं। आयु भी कम रहती है परन्तु मनुष्य इन दु:खों को भी सुख समझ बैठे हैं। तुम बच्चे कितना कहते हो निर्विकारी बनो फिर भी कहते हैं विष बिगर हम रह नहीं सकते हैं क्योंकि शूद्र सम्प्रदाय हैं ना। क्षुद्र बुद्धि हैं। तुम बने हो ब्राह्मण चोटी। चोटी तो सबसे ऊंच है। देवताओं से भी ऊंच है। तुम इस समय देवताओं से भी ऊंच हो क्योंकि बाप के साथ हो। बाप इस समय तुमको पढ़ाते हैं। बाप ओबीडियन्ट सर्वेन्ट बना है ना। बाप बच्चों का ओबीडियन्ट सर्वेन्ट होता है ना। बच्चे को पैदा कर, सम्भाल कर, पढ़ाकर फिर बड़ा कर जब बुढ़े होते हैं तो सारी मिलकियत बच्चे को देकर खुद गुरू कर किनारे जाकर बैठते हैं। वानप्रस्थी बन जाते हैं। मुक्तिधाम जाने के लिए गुरू करते हैं। परन्तु वह मुक्तिधाम में तो जा न सकें। तो माँ-बाप बच्चों की सम्भाल करते हैं। समझो माँ बीमार पड़ती है, बच्चे टट्टी कर देते हैं तो बाप को उठानी पड़े ना। तो माँ-बाप बच्चे के सर्वेन्ट ठहरे ना। सारी मिलकियत बच्चों को दे देते हैं। बेहद का बाप भी कहते हैं मैं जब आता हूँ तो कोई छोटे बच्चों के पास नहीं आता हूँ। तुम तो बड़े हो ना। तुमको बैठ शिक्षा देते हैं। तुम शिवबाबा के बच्चे बनते हो तो बी.के. कहलाते हो। उनसे पहले शूद्र कुमार-कुमारी थे, वेश्यालय में थे। अभी तुम वेश्यालय में रहने वाले नहीं हो। यहाँ कोई विकारी रह न सकें। हुक्म नहीं। तुम हो बी.के.। यह स्थान है ही बी.के. के रहने लिए। कोई-कोई बहुत अनाड़ी बच्चे हैं जो यह समझते नहीं कि शूद्र कहा जाता है पतित विकार में जाने वाले को, उन्हों को यहाँ रहने का हुक्म नहीं, आ नहीं सकते। इन्द्र सभा की बात है ना। इन्द्रसभा तो यह है, जहाँ ज्ञान वर्षा होती है। कोई बी.के. ने अपवित्र को छिपाकर सभा में बिठाया तो दोनों को श्राप मिल गया कि पत्थर बन जाओ। सच्चा-सच्चा यह इन्द्रप्रस्थ है ना। यह कोई शूद्र कुमार-कुमारियों का सतसंग नहीं है। पवित्र होते हैं देवतायें, पतित होते हैं शूद्र। पतितों को बाप आकर पावन देवता बनाते हैं। अभी तुम पतित से पावन बन रहे हो। तो यह हो गई इन्द्र सभा। अगर बिगर पूछे कोई विकारी को ले आते हैं तो बहुत सज़ा मिल जाती है। पत्थरबुद्धि बन जाते हैं। यहाँ पारस बुद्धि बन रहे हो ना। तो उनको जो ले आते हैं, उनको भी श्राप मिल जाता है। तुम विकारियों को छिपाकर क्यों ले आई? इन्द्र (बाप) से पूछा भी नहीं। तो कितनी सजा मिलती है। यह हैं गुप्त बातें। अभी तुम देवता बन रहे हो। बड़े कड़े कायदे हैं। अवस्था ही गिर पड़ती है। एकदम पत्थरबुद्धि बन पड़ते हैं। हैं भी पत्थरबुद्धि। पारसबुद्धि बनने का पुरूषार्थ ही नहीं करते। यह गुप्त बातें हैं जो तुम बच्चे ही समझ सकते हो। यहाँ बी.के. रहते हैं, उन्हों को देवता अर्थात् पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बाप बना रहे हैं।
बाप मीठे-मीठे बच्चों को समझाते हैं - कोई भी कायदा न तोड़े। नहीं तो उन्हें 5 भूत पकड़ लेंगे। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार - यह 5 बड़े-बड़े भूत हैं, आधाकल्प के। तुम यहाँ भूतों को भगाने आये हो। आत्मा जो शुद्ध पवित्र थी वह अपवित्र, अशुद्ध, दु:खी, रोगी बन गई है। इस दुनिया में अथाह दु:ख हैं। बाप आकर ज्ञान वर्षा करते हैं। तुम बच्चों द्वारा ही करते हैं। तुम्हारे लिए स्वर्ग रचते हैं। तुम ही योगबल से देवता बनते हो। बाप खुद नहीं बनते हैं। बाप तो है सर्वेन्ट। टीचर भी स्टूडेन्ट का सर्वेन्ट होता है। सेवा कर पढ़ाते हैं। टीचर कहते हैं हम तुम्हारा मोस्ट ओबीडियन्ट सर्वेन्ट हूँ। कोई को बैरिस्टर, इन्जीनियर आदि बनाते हैं तो सर्वेन्ट हुआ ना। वैसे ही गुरू लोग भी रास्ता बताते हैं। सर्वेन्ट बन मुक्तिधाम ले जाने की सेवा करते हैं। परन्तु आजकल तो गुरू कोई ले नहीं जा सकते हैं क्योंकि वह भी पतित हैं। एक ही सतगुरू सदा पवित्र है बाकी गुरू लोग भी सब पतित हैं। यह दुनिया ही सारी पतित है। पावन दुनिया कहा जाता है सतयुग को, पतित दुनिया कहा जाता है कलियुग को। सतयुग को ही पूरा स्वर्ग कहेंगे। त्रेता में दो कला कम हो जाती हैं। यह बातें तुम बच्चे ही समझकर और धारण करते हो। दुनिया के मनुष्य तो कुछ नहीं जानते। ऐसे भी नहीं, सारी दुनिया स्वर्ग में जायेगी। जो कल्प पहले थे, वही भारतवासी फिर आयेंगे और सतयुग-त्रेता में देवता बनेंगे। वही फिर द्वापर से अपने को हिन्दू कहलायेंगे। यूँ तो हिन्दू धर्म में अब तक भी जो आत्मायें ऊपर से उतरती हैं, वह भी अपने को हिन्दू कहलाती हैं लेकिन वह तो देवता नहीं बनेंगी और ना ही स्वर्ग में आयेंगी। वह फिर भी द्वापर के बाद अपने समय पर उतरेंगी और अपने को हिन्दू कहलायेंगी। देवता तो तुम ही बनते हो, जिनका आदि से अन्त तक पार्ट है। यह ड्रामा में बड़ी युक्ति है। बहुतों की बुद्धि में नहीं बैठता है तो ऊंच पद भी नहीं पा सकते हैं।
यह है सत्य नारायण की कथा। वह तो झूठी कथा सुनाते हैं, उससे कोई लक्ष्मी वा नारायण बनते थोड़ेही हैं। यहाँ तुम प्रैक्टिकल में बनते हो, कलियुग में है ही सब झूठ। झूठी माया....... रावण का राज्य है ही झूठ। सच खण्ड बाप बनाते हैं। यह भी तुम ब्राह्मण बच्चे जानते हो, सो भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार क्योंकि पढ़ाई है, कोई बहुत थोड़ा पढ़ते हैं तो फेल हो पड़ते हैं। यह तो एक ही बार पढ़ाई हो सकती है। फिर तो पढ़ना मुश्किल हो जायेगा। शुरू में जो पढ़कर शरीर छोड़कर गये हैं तो संस्कार वह लेकर गये हैं। फिर आकर पढ़ते होंगे। नाम-रूप तो बदल जाता है। आत्मा को ही सारा 84 का पार्ट मिला हुआ है, जो भिन्न-भिन्न नाम, रूप, देश, काल में पार्ट बजाती है। इतनी छोटी आत्मा उनको कितना बड़ा शरीर मिलता है। आत्मा तो सबमें होती है ना। इतनी छोटी आत्मा इतने छोटे मच्छर में भी है। यह सब बहुत सूक्ष्म समझने की बातें हैं। जो बच्चे यह अच्छी रीति समझते हैं वही माला का दाना बनते हैं। बाकी तो जाकर पाई पैसे का पद पायेंगे। अभी तुम्हारा यह फूलों का बगीचा बन रहा है। पहले तुम कांटे थे। बाप कहते हैं काम विकार का कांटा बड़ा खराब है। यह आदि, मध्य, अन्त दु:ख देता है। दु:ख का मूल कारण ही है काम। काम को जीतने से ही जगतजीत बनेंगे, इसमें ही बहुतों को मुश्किलातें फील होती हैं। बड़ा मुश्किल पवित्र बनते हैं। जो कल्प पहले बने थे वही बनेंगे। समझा जाता है कौन पुरूषार्थ कर ऊंच ते ऊंच देवता बनेंगे। नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनते हैं ना। नई दुनिया में स्त्री-पुरूष दोनों पावन थे। अब पतित हैं। पावन थे तो सतोप्रधान थे। अभी तमोप्रधान बन गये हैं। यहाँ दोनों को पुरूषार्थ करना है। यह ज्ञान सन्यासी दे नहीं सकते। वह धर्म ही अलग है, निवृत्ति मार्ग का। यहाँ भगवान तो स्त्री-पुरूष दोनों को पढ़ाते हैं। दोनों को कहते हैं अब शूद्र से ब्राह्मण बनकर फिर लक्ष्मी-नारायण बनना है। सब तो नहीं बनेंगे। लक्ष्मी-नारायण की भी डिनायस्टी होती है। उन्हों ने राज्य कैसे लिया - यह कोई नहीं जानते हैं। सतयुग में इनका राज्य था, यह भी समझते हैं परन्तु सतयुग को फिर लाखों वर्ष दे दिया है तो यह अज्ञानता हुई ना। बाप कहते हैं यह है ही कांटों का जंगल। वह है फूलों का बगीचा। यहाँ आने से पहले तुम असुर थे। अभी तुम असुर से देवता बन रहे हो। कौन बनाते हैं? बेहद का बाप। देवताओं का राज्य था तो दूसरा कोई था नहीं। यह भी तुम समझते हो। जो नहीं समझ सकते हैं, उनको ही पतित कहा जाता है। यह है ब्रह्माकुमार-कुमारियों की सभा। अगर कोई शैतानी का काम करते हैं तो अपने को श्रापित कर देते हैं। पत्थरबुद्धि बन पड़ते हैं। सोने की बुद्धि नर से नारायण बनने वाले तो हैं नहीं - प्रूफ मिल जाता है। थर्ड ग्रेड दास-दासियां जाकर बनेंगे। अभी भी राजाओं के पास दास-दासियां हैं। यह भी गायन है - किनकी दबी रहेगी धूल में.......। आग के गोले भी आयेंगे तो ज़हर के गोले भी आयेंगे। मौत तो आना है जरूर। ऐसी-ऐसी चीजें तैयार कर रहे हैं जो कोई मनुष्य की वा हथियारों आदि की दरकार नहीं रहेगी। वहाँ से बैठे-बैठे ऐसे बाम्ब्स छोड़ेंगे, उनकी हवा ऐसे फैलेगी जो झट खलास कर देगी। इतने करोड़ों मनुष्यों का विनाश होना है, कम बात है क्या! सतयुग में कितने थोड़े होते हैं। बाकी सब चले जायेंगे शान्तिधाम, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। सुखधाम में है स्वर्ग, दु:खधाम में है यह नर्क। यह चक्र फिरता रहता है। पतित बन जाने से दु:खधाम बन जाता है फिर बाप सुखधाम में ले जाते हैं। परमपिता परमात्मा अभी सर्व की सद्गति कर रहे हैं तो खुशी होनी चाहिए ना। मनुष्य डरते हैं, यह नहीं समझते मौत से ही गति-सद्गति होनी है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) फूलों के बगीचे में चलने के लिए अन्दर जो काम-क्रोध के कांटे हैं, उन्हें निकाल देना है। ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जिससे श्राप मिल जाए।

2) सचखण्ड का मालिक बनने के लिए सत्य नारायण की सच्ची कथा सुननी और सुनानी है। इस झूठ खण्ड से किनारा कर लेना है।

वरदान:-

स्वदर्शन चक्र द्वारा माया के सब चक्रों को समाप्त करने वाले मायाजीत भव

अपने आपको जानना अर्थात् स्व का दर्शन होना और चक्र का ज्ञान जानना अर्थात् स्वदर्शन चक्रधारी बनना। जब स्वदर्शन चक्रधारी बनते हो तो अनेक माया के चक्र स्वत: समाप्त हो जाते हैं। देहभान का पा, सम्बन्ध का पा, समस्याओं का पा...माया के अनेक चक्र हैं। 63 जन्म इन्हीं अनेक चक्रों में फंसते रहे अब स्वदर्शन चक्रधारी बनने से मायाजीत बन गये। स्वदर्शन चक्रधारी बनना अर्थात् ज्ञान योग के पंखों से उड़ती कला में जाना।

स्लोगन:-

विदेही स्थिति में रहो तो परिस्थितियां सहज पार हो जायेंगी।

06-09-2019

06-09-2019        प्रात:मुरली        ओम् शान्ति       "बापदादा"      मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हें बाप समान खुदाई खिदमतगार बनना है, संगम पर बाप आते हैं तुम बच्चों की खिदमत (सेवा) करने''

प्रश्नः- 
यह पुरूषोत्तम संगमयुग ही सबसे सुहावना और कल्याणकारी है - कैसे?

उत्तर:- 
इसी समय तुम बच्चे स्त्री और पुरूष दोनों ही उत्तम बनते हो। यह संगमयुग है ही कलियुग अन्त और सतयुग आदि के बीच का समय। इस समय ही बाप तुम बच्चों के लिए ईश्वरीय युनिवर्सिटी खोलते हैं, जहाँ तुम मनुष्य से देवता बनते हो। ऐसी युनिवर्सिटी सारे कल्प में कभी नहीं होती। इसी समय सबकी सद्गति होती है।

ओम् शान्ति। 
रूहानी बाप रूहानी बच्चों को बैठ समझाते हैं। यहाँ बैठे-बैठे एक तो तुम बाप को याद करते हो क्योंकि वह पतित-पावन है, उनको याद करने से ही पावन सतोप्रधान बनने की तुम्हारी एम है। ऐसे नहीं, सतो तक एम है। सतोप्रधान बनना है इसलिए बाप को भी जरूर याद करना है फिर स्वीट होम को भी याद करना है क्योंकि वहाँ जाना है फिर माल-मिलकियत भी चाहिए इसलिए अपने स्वर्ग धाम को भी याद करना है क्योंकि यह प्राप्ति होती है। बच्चे जानते हैं हम बाप के बच्चे बने हैं, बरोबर बाप से शिक्षा लेकर हम स्वर्ग में जायेंगे - नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। बाकी जो भी जीव की आत्मायें हैं वह शान्तिधाम में चली जायेंगी। घर तो जरूर जाना है। बच्चों को यह भी मालूम हुआ, अभी है रावण राज्य। इसकी भेंट में सतयुग को फिर नाम दिया जाता है राम राज्य। दो कला कम हो जाती हैं। उनको सूर्यवंशी, उनको चन्द्रवंशी कहा जाता है। जैसे क्रिश्चियन की डिनायस्टी एक ही चलती है, वैसे यह भी है एक ही डिनायस्टी। परन्तु उसमें सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी हैं। यह बातें कोई भी शास्त्रों में नहीं हैं। बाप बैठ समझाते हैं, जिसको ही ज्ञान अथवा नॉलेज कहा जाता है। स्वर्ग स्थापन हो गया फिर नॉलेज की दरकार नहीं। यह नॉलेज बच्चों को पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही सिखलाई जाती है। तुम्हारे सेन्टर्स पर वा म्युज़ियम में बहुत बड़े-बड़े अक्षरों में जरूर लिखा हुआ हो कि बहनों और भाइयों यह पुरूषोत्तम संगमयुग है, जो एक ही बार आता है। पुरूषोत्तम संगमयुग का अर्थ भी नहीं समझते हैं तो यह भी लिखना है - कलियुग अन्त और सतयुग आदि का संगम। तो संगमयुग सबसे सुहावना, कल्याणकारी हो जाता है। बाप भी कहते हैं मैं पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही आता हूँ। तो संगमयुग का अर्थ भी समझाया है। वेश्यालय का अन्त, शिवालय का आदि - इसको कहा जाता है पुरूषोत्तम संगमयुग। यहाँ सब हैं विकारी, वहाँ सब हैं निर्विकारी। तो जरूर उत्तम तो निर्विकारी को कहेंगे ना। पुरूष और स्त्री दोनों उत्तम बनते हैं इसलिए नाम ही है पुरूषोत्तम। इन बातों का बाप और तुम बच्चों के सिवाए किसको पता नहीं कि यह संगमयुग है। किसके ख्याल में नहीं आता कि पुरूषोत्तम संगमयुग कब होता है। अभी बाप आये हुए हैं, वह है मनुष्य सृष्टि का बीजरूप। उनकी ही इतनी महिमा है, वह ज्ञान का सागर, आनंद का सागर है, पतित-पावन है। ज्ञान से सद्गति करते हैं। ऐसे तुम कभी नहीं कहेंगे कि भक्ति से सद्गति। ज्ञान से सद्गति होती है और सद्गति है ही सतयुग में। तो जरूर कलियुग का अन्त और सतयुग आदि के संगम पर आयेंगे। कितना क्लीयर कर बाप समझाते हैं। नये भी आते हैं, हूबहू जैसे कल्प-कल्प आये हैं, आते रहते हैं। राजधानी ऐसे ही स्थापन होनी है। तुम बच्चों को मालूम है - हम खुदाई खिदमतगार सच्चे-सच्चे ठहरे। एक को थोड़ेही पढ़ायेंगे। एक पढ़ते हैं फिर इन द्वारा तुम पढ़कर औरों को पढ़ाते हो इसलिए यहाँ यह बड़ी युनिवर्सिटी खोलनी पड़ती है। सारी दुनिया में और कोई युनिवर्सिटी है ही नहीं। न कोई दुनिया में जानता है कि ईश्वरीय युनिवर्सिटी भी होती है। अभी तुम बच्चे जानते हो - गीता का भगवान शिव आकर यह युनिवर्सिटी खोलते हैं। नई दुनिया का मालिक देवी-देवता बनाते हैं। इस समय आत्मा जो तमोप्रधान बन गई है, फिर उसको ही सतोप्रधान बनना है। इस समय सब तमोप्रधान हैं ना। भल कई कुमार भी पवित्र रहते हैं, कुमारियाँ भी पवित्र रहती हैं, सन्यासी भी पवित्र रहते हैं परन्तु आजकल वह पवित्रता नहीं है। पहले-पहले जब आत्मायें आती हैं, वह पवित्र रहती हैं। फिर अपवित्र बन जाती हैं क्योंकि तुम जानते हो सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो से सबको पास होना होता है। अन्त में सब तमोप्रधान बन जाते हैं। अभी बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं - यह झाड़ तमोप्रधान जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है, पुराना हो गया है तो जरूर इनका विनाश होना चाहिए। यह है वैराइटी धर्मों का झाड़, इसलिए कहते हैं विराट लीला। कितना बड़ा बेहद का झाड़ है। वह तो जड़ झाड़ होते हैं, जो बीज डालो वह झाड़ निकलता है। यह फिर है वैराइटी धर्मों का वैराइटी चित्र। हैं सब मनुष्य, परन्तु उनमें वैराइटी बहुत है, इसलिए विराट लीला कहा जाता है। सब धर्म कैसे नम्बरवार आते हैं, यह भी तुम जानते हो। सबको जाना है फिर आना है। यह ड्रामा बना हुआ है। है भी कुदरती ड्रामा। कुदरत यह है जो इतनी छोटी सी आत्मा अथवा परम आत्मा में कितना पार्ट भरा हुआ है। परम-आत्मा को मिलाकर परमात्मा कहा जाता है। तुम उनको बाबा कहते हो क्योंकि सभी आत्माओं का वह सुप्रीम बाप है ना। बच्चे जानते हैं आत्मा ही सारा पार्ट बजाती है। मनुष्य यह नहीं जानते। वह तो कह देते आत्मा निर्लेप है। वास्तव में यह अक्षर रांग है। यह भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिख देना चाहिए - आत्मा निर्लेप नहीं है। आत्मा ही जैसे-जैसे अच्छे वा बुरे कर्म करती है तो ऐसा वह फल पाती है। बुरे संस्कारों से पतित बन पड़ती है, तब तो देवताओं के आगे जाकर उनकी महिमा गाते हैं। अभी तुमको 84 जन्मों का पता पड़ गया है, और कोई भी मनुष्य नहीं जानता। तुम उनको 84 जन्म सिद्ध कर बतलाते हो तो कहते हैं - क्या शास्त्र सब झूठे हैं? क्योंकि सुना है मनुष्य 84 लाख योनियां लेते हैं। अभी बाप बैठ समझाते हैं वास्तव में सर्व शास्त्रमई शिरोमणी है ही गीता। बाप अभी हमको राजयोग सिखला रहे हैं जो 5 हज़ार वर्ष पहले सिखलाया था।

तुम जानते हो हम पवित्र थे, पवित्र गृहस्थ धर्म था। अभी इनको धर्म नहीं कहेंगे। अधर्मी बन पड़े हैं अर्थात् विकारी बन गये हैं। इस खेल को तुम बच्चे समझ गये हो। यह बेहद का ड्रामा है जो हर 5 हज़ार वर्ष बाद रिपीट होता रहता है। लाखों वर्ष की बात तो कोई समझ भी न सके। यह तो जैसे कल की बात है। तुम शिवालय में थे, आज वेश्यालय में हो फिर कल शिवालय में होंगे। सतयुग को कहा जाता है शिवालय, त्रेता को सेमी कहा जाता है। इतने वर्ष वहाँ रहेंगे। पुनर्जन्म में तो आना ही है। इनको कहा जाता है रावण राज्य। तुम आधाकल्प पतित बनें, अब बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र बनो। कुमार और कुमारियां तो हैं ही पवित्र। उन्हों को फिर समझाया जाता है - ऐसे गृहस्थ में फिर जाना नहीं है जो फिर पवित्र होने का पुरूषार्थ करना पड़े। भगवानुवाच है कि पावन बनो, तो बेहद के बाप का मानना पड़े ना। तुम गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रह सकते हो। फिर बच्चों को पतित बनने की आदत क्यों डालते हो। जबकि बाप 21 जन्मों के लिए पतित होने से बचाते हैं। इसमें लोक लाज कुल की मर्यादा भी छोड़नी पड़े। यह है बेहद की बात। बैचलर्स (कुमार) तो सब धर्मों में बहुत रहते हैं परन्तु सेफ्टी से रहना ज़रा मुश्किल होता है, फिर भी रावण राज्य में रहते हैं ना। विलायत में भी ऐसे बहुत मनुष्य शादी नहीं करते हैं फिर पिछाड़ी में कर लेते हैं कम्पैनियनशिप के लिए। क्रिमिनल आई से नहीं करते हैं। ऐसे भी दुनिया में बहुत होते हैं। पूरी सम्भाल करते हैं, फिर जब मरते हैं तो कुछ उनको देकर जाते हैं। कुछ धर्माऊ लगा देते हैं। ट्रस्ट बनाकर जाते हैं। विलायत में भी बड़े-बड़े ट्रस्ट होते हैं जो फिर यहाँ भी मदद करते हैं। यहाँ ऐसा ट्रस्ट नहीं होगा जो विलायत को भी मदद करे। यहाँ तो गरीब लोग हैं, क्या मदद करेंगे! वहाँ तो उन्हों के पास पैसे बहुत हैं। भारत तो गरीब है ना। भारतवासियों की क्या हालत है! भारत कितना सिरताज था, कल की बात है। खुद भी कहते हैं 3 हज़ार वर्ष पहले पैराडाइज़ था। बाप ही बनाते हैं। तुम जानते हो बाप कैसे ऊपर से नीचे आते हैं - पतितों को पावन बनाने। वह है ही ज्ञान का सागर, पतित-पावन, सर्व का सद्गति दाता अर्थात् सबको पावन बनाने वाला। तुम बच्चे जानते हो मेरी महिमा तो सब गाते हैं। मैं यहाँ पतित दुनिया में ही आता हूँ तुमको पावन बनाने। तुम पावन बन जाते हो तो फिर पहले-पहले पावन दुनिया में आते हो। बहुत सुख उठाते हो फिर रावण राज्य में गिरते हो। भल गाते तो हैं परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर, पतित-पावन है। परन्तु पावन बनाने के लिए कब आयेंगे - यह कोई भी जानते ही नहीं हैं। बाप कहते हैं तुम मेरी महिमा करते हो ना। अब मैं आया हूँ तुमको अपना परिचय दे रहा हूँ। मैं हर 5 हज़ार वर्ष के बाद इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर आता हूँ, कैसे आता हूँ वह भी समझाता हूँ। चित्र भी हैं। ब्रह्मा कोई सूक्ष्मवतन में नहीं होता है। ब्रह्मा यहाँ है और ब्राह्मण भी यहाँ हैं, जिसको ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर कहा जाता है, जिसका फिर सिजरा बनता है। मनुष्य सृष्टि का सिजरा तो प्रजापिता ब्रह्मा से ही चलेगा ना। प्रजापिता है तो जरूर उनकी प्रजा होगी। कुख वंशावली तो हो न सके, जरूर एडप्टेड होंगे। ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर है तो जरूर एडाप्ट किया होगा। तुम सब एडाप्टेड बच्चे हो। अभी तुम ब्राह्मण बने हो फिर तुमको देवता बनना है। शूद्र से ब्राह्मण फिर ब्राह्मण से देवता, यह बाजोली का खेल है। विराट रूप का भी चित्र है ना। वहाँ से सबको यहाँ आना है जरूर। जब सब आ जाते हैं फिर क्रियेटर भी आते हैं। वह क्रियेटर डायरेक्टर है, एक्ट भी करते हैं। बाप कहते हैं - हे आत्मायें तुम मुझे जानते हो। तुम आत्मायें मेरे सब बच्चे हो ना। तुमने पहले सतयुग में शरीरधारी बन कितना अच्छा सुख का पार्ट बजाया फिर 84 जन्म बाद तुम कितना दु:ख में आ गये हो। ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर, प्रोड्युशर होते हैं ना। यह है बेहद का ड्रामा। बेहद ड्रामा को कोई भी जानते नहीं हैं। भक्ति मार्ग में ऐसी-ऐसी बातें बताते हैं जो मनुष्यों की बुद्धि में वही बैठ गयी हैं।

अब बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, यह सब भक्ति मार्ग के शास्त्र हैं। भक्ति मार्ग की ढेर सामग्री है, जैसे बीज की सामग्री झाड़ है, इतने छोटे बीज से झाड़ कितना अथाह फैल जाता है। भक्ति का भी इतना विस्तार है। ज्ञान तो बीज है, उसमें कोई भी सामग्री की दरकार नहीं रहती है। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो और कोई व्रत नेम नहीं है। यह सब बन्द हो जाता है। तुमको सद्गति मिल जायेगी फिर कोई बात की दरकार नहीं। तुमने ही बहुत भक्ति की है। उसका फल तुमको देने के लिए आया हूँ। देवतायें शिवालय में थे ना, तब तो मन्दिर में जाकर उन्हों की महिमा गाते हैं। अब बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, मैंने 5 हज़ार वर्ष पहले भी तुमको समझाया था कि अपने को आत्मा समझो। देह के सब सम्बन्ध छोड़ मुझ एक बाप को याद करो तो इस योग अग्नि से तुम्हारे पाप भस्म हो जायेंगे। बाप जो कुछ अभी समझाते हैं, कल्प-कल्प समझाते आये हैं। गीता में भी कोई-कोई अक्षर अच्छे हैं। मनमनाभव अर्थात् मुझे याद करो। शिवबाबा कहते हैं मैं यहाँ आया हूँ। किसके तन में आता हूँ, वह भी बताता हूँ। ब्रह्मा द्वारा सब वेदों-शास्त्रों का सार तुमको सुनाता हूँ। चित्र भी दिखाते हैं परन्तु अर्थ नहीं समझते। अभी तुम समझते हो - शिवबाबा कैसे ब्रह्मा तन द्वारा सब शास्त्रों आदि का सार सुनाते हैं। 84 जन्मों के ड्रामा का राज़ भी तुमको समझाते हैं। इनके ही बहुत जन्मों के अन्त में आता हूँ। यही फिर पहले नम्बर का प्रिन्स बनते हैं फिर 84 जन्मों में आते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस रावण राज्य में रहते पतित लोकलाज़ कुल की मर्यादा को छोड़ बेहद बाप की बात माननी है, गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल समान रहना है।

2) इस वैराइटी विराट लीला को अच्छी तरह समझना है, इसमें पार्ट बजाने वाली आत्मा निर्लेप नहीं, अच्छे-बुरे कर्म करती और उसका फल पाती है, इस राज़ को समझकर श्रेष्ठ कर्म करने हैं।

वरदान:- 
रूहानी अथॉरिटी के साथ निरहंकारी बन सत्य ज्ञान का प्रत्यक्ष स्वरूप दिखाने वाले सच्चे सेवाधारी भव

जैसे वृक्ष में जब सम्पूर्ण फल की अथॉरिटी आ जाती है तो वृक्ष झुक जाता है अर्थात् निर्माण बनने की सेवा करता है। ऐसे रूहानी अथॉरिटी वाले बच्चे जितनी बड़ी अथॉरिटी उतने निर्माण और सर्व के स्नेही होंगे। अल्पकाल की अथॉरिटी वाले अंहकारी होते हैं लेकिन सत्यता की अथॉरिटी वाले अथॉरिटी के साथ निरंहकारी होते हैं - यही सत्य ज्ञान का प्रत्यक्ष स्वरूप है। सच्चे सेवाधारी की वृत्ति में जितनी अथॉरिटी होगी उसकी वाणी में उतना ही स्नेह और नम्रता होगी।

स्लोगन:- 
बिना त्याग के भाग्य नहीं मिलता।

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