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23-07-2019

23-07-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - याद से ही बैटरी चार्ज होगी, शक्ति मिलेगी, आत्मा सतोप्रधान बनेगी इसलिए याद की यात्रा पर विशेष अटेन्शन दोˮ

प्रश्नः-

जिन बच्चों का प्यार एक बाप से है, उनकी निशानी क्या होगी?

उत्तर:-

1. यदि एक बाप से प्यार है तो बाप की नज़र उन्हें निहाल कर देगी, 2. वे पूरा नष्टोमोहा होंगे, 3. जिन्हें बेहद के बाप का प्यार पसन्द आ गया, वह और किसी के प्यार में फँस नहीं सकते, 4. उनकी बुद्धि झूठ खण्ड के झूठे मनुष्यों से टूट जाती है। बाबा तुम्हें अभी ऐसा प्यार देते हैं जो अविनाशी बन जाता है। सतयुग में भी तुम आपस में बहुत प्यार से रहते हो।

ओम् शान्ति।

बेहद के बाप का प्यार अभी एक ही बार तुम बच्चों को मिलता है, जिस प्यार को भक्ति में भी बहुत याद करते हैं। बाबा, बस आपका ही प्यार चाहिए। तुम मात पिता..... तुम ही सब-कुछ हो। एक से ही आधाकल्प के लिए प्यार मिल जाता है। तुम्हारे इस रूहानी प्यार की महिमा अपरम्पार है। बाप ही तुम बच्चों को शान्तिधाम का मालिक बनाते हैं। अभी तुम दु:खधाम में हो। अशान्ति और दु:ख में सब चिल्लाते हैं। धनी धोणी किसका नहीं है इसलिए भक्ति मार्ग में याद करते हैं। परन्तु कायदेसिर भक्ति का भी समय होता है आधाकल्प।

यह तो बच्चों को समझाया है, ऐसे नहीं कि बाप अन्तर्यामी है। बाप को सबके अन्दर जानने की दरकार ही नहीं। वह तो थॉट रीडर्स होते हैं। वह भी यह विद्या सीखते हैं। यहाँ वह बात ही नहीं। बाप आते हैं, बाप और बच्चे ही यह सारा पार्ट बजाते हैं। बाप जानते हैं सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। उसमें बच्चे कैसे पार्ट बजाते हैं। ऐसे नहीं कि वह हर एक के अन्दर को जानते हैं। यह तो रात को भी समझाया कि हर एक के अन्दर तो विकार ही हैं। बहुत छी-छी मनुष्य हैं। बाप आकर गुल-गुल (फूल) बनाते हैं। यह बाप का प्यार तुम बच्चों को एक ही बार मिलता है जो फिर अविनाशी हो जाता है। वहाँ तुम एक-दो से बहुत प्यार करते हो। अभी तुम मोहजीत बन रहे हो। सतयुगी राज्य को मोहजीत राजा, रानी तथा प्रजा का राज्य कहा जाता है। वहाँ कभी कोई रोते नहीं। दु:ख का नाम नहीं। तुम बच्चे जानते हो बरोबर भारत में हेल्थ, वेल्थ और हैप्पीनेस था, अब नहीं है क्योंकि अभी रावण राज्य है। इसमें सब दु:ख भोगते हैं, फिर बाप को याद करते हैं कि आकर सुख-शान्ति दो, रहम करो। बेहद का बाप है रहमदिल। रावण है बेरहम करने वाला, दु:ख का रास्ता बताने वाला। सब मनुष्य दु:ख के रास्ते पर चलते हैं। सबसे बड़े ते बड़ा दु:ख देने वाला है काम विकार इसलिए बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, काम विकार पर जीत पहनो तो जगतजीत बनेंगे। इन लक्ष्मी-नारायण को जगत जीत कहेंगे ना। तुम्हारे सामने एम ऑबजेक्ट खड़ी है। मन्दिरों में भल जाते हैं परन्तु उनकी बायोग्राफी कुछ नहीं जानते। जैसे गुड़ियों की पूजा होती है। देवियों की पूजा करते हैं, रचकर खूब श्रृंगार कराकर भोग आदि लगाते हैं। परन्तु वह देवियाँ तो कुछ भी खाती नहीं। खा जाते हैं ब्राह्मण लोग। क्रियेट कर फिर पालना कर विनाश कर देते, इसको कहा जाता है अन्धश्रद्धा। सतयुग में यह बातें होती नहीं। यह सब रस्म रिवाज निकलती है कलियुग में। तुम पहले-पहले एक शिवबाबा की पूजा करते हो, जिसको अव्यभिचारी राइटियस पूजा कहा जाता है। फिर होती है व्यभिचारी पूजा। ‘बाबा' अक्षर कहने से ही परिवार की खुशबू आती है। तुम भी कहते हो ना तुम मात-पिता...... तुम्हारे इस ज्ञान देने की कृपा से हमको सुख घनेरे मिलते हैं। बुद्धि में याद है कि हम पहले-पहले मूलवतन में थे। वहाँ से यहाँ आते हैं शरीर लेकर पार्ट बजाने। पहले-पहले हम दैवी चोला लेते हैं अर्थात् देवता कहलाते हैं। फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण में आते भिन्न-भिन्न पार्ट बजाते हैं। यह बातें तुम पहले नहीं जानते थे। अब बाबा ने आकर आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज तुम बच्चों को दिया है। अपनी भी नॉलेज दी है कि मैं इस तन में प्रवेश करता हूँ। यह अपने 84 जन्मों को नहीं जानते थे। तुम भी नहीं जानते थे। श्याम-सुन्दर का राज़ तो समझाया है। यह श्रीकृष्ण है नई दुनिया का पहला प्रिन्स और राधे सेकण्ड नम्बर में। थोड़े वर्ष का फ़र्क पड़ता है। सृष्टि के आदि में इनको पहले नम्बर में कहा जाता है इसलिए ही कृष्ण को सब प्यार करते हैं, इनको ही श्याम और सुन्दर कहा जाता है। स्वर्ग में तो सब सुन्दर ही थे। अभी स्वर्ग कहाँ है! चक्र फिरता रहता है। ऐसे नहीं कि समुद्र के नीचे चले जाते हैं। जैसे कहते हैं लंका, द्वारिका नीचे चली गई। नहीं, यह चक्र फिरता है। इस चक्र को जानने से तुम चक्रवर्ती महाराजा-महारानी विश्व के मालिक बनते हो। प्रजा भी तो अपने को मालिक समझती है ना। कहेंगे, हमारा राज्य है। भारतवासी कहेंगे हमारा राज्य है। भारत नाम है। हिन्दुस्तान नाम रांग है। वास्तव में आदि सनातन देवी-देवता धर्म ही है। परन्तु धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट होने कारण अपने को देवता नहीं कह सकते। यह भी ड्रामा की नूँध है। नहीं तो बाप कैसे आकर फिर से देवी-देवता धर्म की स्थापना करे। आगे तुमको भी इन सब बातों का मालूम नहीं था, अब बाप ने समझाया है।

ऐसा मीठा बाबा, उनको भी फिर तुम भूल जाते हो! सबसे मीठा बाबा है ना। बाकी रावण राज्य में तुमको सब दु:ख ही देते हैं ना, इसलिए बेहद के बाप को याद करते हैं। उनकी याद में प्रेम के आंसू बहाते हैं - हे साजन, कब आकर सजनियों से मिलेंगे? क्योंकि तुम सब हो भक्तियां। भक्तियों का पति हुआ भगवान्। भगवान् आकर भक्ति का फल देते हैं, रास्ता बताते हैं और समझाते हैं - यह 5 हज़ार वर्ष का खेल है। रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को कोई भी मनुष्य नहीं जानते हैं। रूहानी बाप और रूहानी बच्चे ही जानते हैं। कोई मनुष्य नहीं जानते, देवतायें भी नहीं जानते। यह स्प्रीचुअल फादर ही जानते हैं। वह अपने बच्चों को बैठ समझाते हैं। और कोई भी देहधारी के पास यह रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज हो न सके। यह नॉलेज होती ही है रूहानी बाप के पास। उनको ही ज्ञान-ज्ञानेश्वर कहा जाता है। ज्ञान-ज्ञानेश्वर तुमको ज्ञान देते हैं, राज-राजेश्वर बनाने के लिए इसलिए इसको राजयोग कहा जाता है। बाकी वह सभी हैं हठयोग। हठयोगियों के भी चित्र बहुत हैं। सन्यासी जब आते हैं, वह आकर बाद में हठयोग सिखलाते हैं। जब बहुत वृद्धि हो जाती है तब हठयोग आदि सिखलाते हैं। बाप ने समझाया है मैं आता ही हूँ संगम पर, आकर राजधानी स्थापन करता हूँ। स्थापना यहाँ करते हैं, न कि सतयुग में। सतयुग आदि में तो राजाई है तो जरूर संगम पर स्थापना होती है। यहाँ कलियुग में हैं सब पुजारी, सतयुग में हैं पूज्य। तो बाप पूज्य बनाने के लिए आते हैं। पुजारी बनाने वाला है रावण। यह सब जानना चाहिए ना। यह है ऊंच ते ऊंच पढ़ाई। इस टीचर को कोई जानते नहीं। वह सुप्रीम बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। यह कोई नहीं जानते। बाप ही आकर अपना पूरा परिचय देते हैं। बच्चों को खुद पढ़ाकर फिर साथ में ले जाते हैं। बेहद के बाप का लव मिलता है तो फिर और कोई लव पसन्द नहीं आता। इस समय है ही झूठ खण्ड। झूठी माया, झूठी काया...... भारत अब झूठ खण्ड है फिर सतयुग में होगा सच खण्ड। भारत कभी विनाश को नहीं पाता है। यह है सबसे बड़े ते बड़ा तीर्थ। जहाँ बेहद का बाप बच्चों को बैठ सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का राज़ समझाते हैं और सर्व की सद्गति करते हैं। यह बहुत बड़ा तीर्थ है। भारत की महिमा अपरम्पार है। परन्तु यह भी तुम समझ सकते हो - भारत है वन्डर ऑफ वर्ल्ड। वह हैं माया के 7 वन्डर्स। ईश्वर का वन्डर एक ही है। बाप एक, उनका वन्डरफुल स्वर्ग भी एक है। उनको ही हेविन, पैराडाइज़ कहते हैं। सच्चा-सच्चा नाम एक ही है स्वर्ग, यह है नर्क। ऑलराउन्ड चक्र तुम ब्राह्मण ही लगाते हो। हम सो ब्राह्मण, सो देवता.......। चढ़ती कला, उतरती कला। चढ़ती कला तेरे भाने सर्व का भला। भारतवासी ही चाहते हैं कि विश्व में शान्ति भी हो, सुख भी हो। स्वर्ग में तो है ही सुख, दु:ख का नाम नहीं। उनको कहा जाता है ईश्वरीय राज्य। सतयुग में सूर्यवंशी फिर सेकण्ड ग्रेड में हैं चन्द्रवंशी। तुम हो आस्तिक, वह हैं नास्तिक। तुम धनी के बन बाप से वर्सा लेने का पुरूषार्थ करते हो। तुम्हारी माया के साथ गुप्त लड़ाई चलती है। बाप आते हैं रात्रि को। शिवरात्रि है ना। परन्तु शिव की रात्रि का भी अर्थ नहीं समझते। ब्रह्मा की रात पूरी होती है, दिन शुरू होता है। वह कहते हैं कृष्ण भगवानुवाच, यह तो है शिव भगवानुवाच। अब राइट कौन? कृष्ण तो पूरे 84 जन्म लेते हैं। बाप कहते हैं मैं आता हूँ साधारण बूढ़े तन में। यह भी अपने जन्मों को नहीं जानते हैं। बहुत जन्मों के अन्त में जब पतित बन जाते हैं तो पतित सृष्टि, पतित राज्य में आता हूँ। पतित दुनिया में अनेक राज्य, पावन दुनिया में होता है एक राज्य। हिसाब है ना। भक्ति मार्ग में जब बहुत नौधा भक्ति करते हैं, सिर काटने पर आ जाते हैं तब उनकी मनोकामना पूरी होती है। बाकी उसमें रखा कुछ भी नहीं हैं, उसको कहा जाता है नौधा भक्ति। जबसे रावण राज्य शुरू होता है तब से भक्ति के कर्मकाण्ड की बातें मनुष्य पढ़ते-पढ़ते नीचे आ जाते हैं, कहते हैं व्यास भगवान् ने शास्त्र बनाये, क्या-क्या बैठ लिखा है? भक्ति और ज्ञान का राज़ अभी तुम बच्चों ने समझा है। सीढ़ी और झाड़ में यह सब समझानी है। उसमें 84 जन्म भी दिखाये हैं। सब तो 84 जन्म नहीं लेते हैं। जो शुरू में आये होंगे वही पूरे 84 जन्म लेंगे। यह नॉलेज तुमको अभी ही मिलती है फिर सोर्स ऑफ इनकम हो जाती है। 21 जन्म कोई अप्राप्त वस्तु नहीं रहती है, जिसकी प्राप्ति के लिए पुरूषार्थ करना पड़े। उसको कहा जाता बाप का एक ही स्वर्ग है वन्डर ऑफ दी वर्ल्ड। नाम ही है पैराडाइज़। उनका बाप मालिक बनाते हैं। वह तो सिर्फ वन्डर्स दिखाते हैं, परन्तु तुमको तो बाप उसका मालिक बनाते हैं इसलिए अब बाप कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। सिमर-सिमर सुख पाओ, कलह कलेष मिटे सब तन के, जीवनमुक्ति पद पाओ। पवित्र बनने के लिए याद की यात्रा भी बहुत जरूरी है। मनमनाभव, तो फिर अन्त मती सो गति हो जायेगी। गति कहा जाता है शान्तिधाम को। सद्गति होती है यहाँ। सद्गति के अगेन्स्ट होती है दुर्गति।

अभी तुम बाप को और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जान गये हो। तुमको बाप का लव मिलता है। बाप नज़र से निहाल कर देते हैं। सम्मुख आकर ही नॉलेज सुनायेंगे ना। इसमें प्रेरणा की तो कोई बात ही नहीं। बाप डायरेक्शन देते हैं, ऐसे याद करने से शक्ति मिलेगी। जैसे बैटरी चार्ज होती है ना। यह मोटर है, इसकी बैटरी डल हो गई है। अब सर्वशक्तिमान् बाप के साथ बुद्धि का योग लगाने से फिर तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। बैटरी चार्ज हो जायेगी। बाप ही आकर सबकी बैटरी चार्ज करते हैं। सर्वशक्तिमान् बाप ही है। यह मीठी-मीठी बातें बाप ही बैठ समझाते हैं। वह भक्ति के शास्त्र तो जन्म-जन्मान्तर पढ़ते आये हो। अब बाप सब धर्म वालों के लिए एक ही बात सुनाते हैं। कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे। अब याद करना तुम बच्चों का काम है, इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं है। पतित-पावन एक बाप ही है। फिर पावन बन सब घर चले जायेंगे। सबके लिए यह नॉलेज है। यह है सहज राजयोग और सहज ज्ञान। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सर्व शक्तिमान् बाप से अपना बुद्धियोग लगाकर बैटरी चार्ज करनी है। आत्मा को सतोप्रधान बनाना है। याद की यात्रा में कभी मूँझना नहीं है।

2) पढ़ाई पढ़कर अपने ऊपर आपेही कृपा करनी है। बाप समान प्यार का सागर बनना है। जैसे बाप का प्यार अविनाशी है, ऐसे सबसे अविनाशी सच्चा प्यार रखना है, मोहजीत बनना है।

वरदान:-

दृढ़ता की शक्ति से मन-बुद्धि को सीट पर सेट करने वाले सहजयोगी भव

बच्चों का बाप से प्यार है इसलिए याद में शक्तिशाली हो बैठने का, चलने का, सेवा करने का अटेन्शन बहुत देते हैं लेकिन मन पर अगर पूरा कन्ट्रोल नहीं है, मन आर्डर में नहीं है तो थोड़ा टाइम अच्छा बैठते हैं फिर हिलना डुलना शुरू कर देते हैं। कभी सेट होते कभी अपसेट। लेकिन एकाग्रता की वा दृढ़ता की शक्ति से मन-बुद्धि को एकरस स्थिति की सीट पर सेट कर दो तो सहजयोगी बन जायेंगे।

स्लोगन:-

जो भी शक्तियां हैं उन्हें समय पर यूज़ करो तो बहुत अच्छे-अच्छे अनुभव होंगे।

 

 

22-07-2019

22-07-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बहन-भाई के भी भान से निकल भाई-भाई समझो तो सिविल आई बन जायेगी, आत्मा जब सिविल-आइज्ड बनें तब कर्मातीत बन सकती हैˮ

प्रश्नः-

अपनी खामियों को निकालने के लिए कौन-सी युक्ति रचनी चाहिए?

उत्तर:-

अपने कैरेक्टर्स का रजिस्टर रखो। उसमें रोज़ का पोतामेल नोट करो। रजिस्टर रखने से अपनी कमियों का मालूम पड़ेगा फिर सहज ही उन्हें निकाल सकेंगे। खामियों को निकालते-निकालते उस अवस्था तक पहुँचना है जो एक बाप के सिवाए दूसरा कुछ भी याद न रहे। किसी भी पुरानी चीज़ में ममत्व न रहे। अन्दर कुछ भी मांगने की तमन्ना न रहे।

ओम् शान्ति।

एक है मानव बुद्धि, दूसरी है ईश्वरीय बुद्धि, फिर होगी दैवी बुद्धि। मानव बुद्धि है आसुरी बुद्धि। क्रिमिनल आइज्ड हैं ना। एक होते हैं सिविल-आइज्ड, दूसरे होते हैं क्रिमिनल-आइज्ड। देवतायें हैं वाइसलेस, सिविल-आइज्ड और यहाँ कलियुगी मनुष्य हैं विशश क्रिमिनल-आइज्ड। उनके ख्यालात ही विशश होंगे। क्रिमिनल-आइज्ड मनुष्य रावण की जेल में पड़े रहते हैं। रावण राज्य में सब हैं क्रिमिनल-आइज्ड, एक भी सिविल-आइज्ड नहीं हैं। अभी तुम हो पुरुषोत्तम संगमयुग पर। अभी बाबा तुमको क्रिमिनल-आइज्ड से बदल कर सिविल-आइज्ड बना रहे हैं। क्रिमिनल-आइज्ड में भी अनेक प्रकार होते हैं - कोई सेमी, कोई कैसे। जब सिविल-आइज्ड बन जायेंगे तब कर्मातीत अवस्था होगी फिर ब्रदर्ली-आइज़ (भाई-भाई की दृष्टि) बन जायेगी। आत्मा, आत्मा को देखती है, शरीर तो रहते ही नहीं तो क्रिमिनल-आइज्ड कैसे होंगे इसलिए बाप कहते हैं अपने को बहन-भाई के भान से निकालते जाओ। भाई-भाई समझो। यह भी बड़ी गुह्य बात है। कभी किसकी बुद्धि में आ नहीं सकती। सिविल-आइज्ड का अर्थ किसी की बुद्धि में आ नहीं सकता। अगर आ जाए तो ऊंच पद पा लेवे। बाप समझाते हैं अपने को आत्मा समझो, शरीर को भूलना है। यह शरीर छोड़ना भी है बाप की याद में। मैं आत्मा बाबा के पास जा रहा हूँ। देह का अभिमान छोड़, पवित्र बनाने वाले बाप की याद में ही शरीर छोड़ना है। क्रिमिनल-आइज्ड होंगे तो अन्दर में जरूर खाता रहेगा। मंज़िल बहुत भारी है। भल कोई भी अच्छे-अच्छे बच्चे हो तो भी कुछ न कुछ भूलें होती जरूर हैं क्योंकि माया है ना। कर्मातीत तो कोई भी हो नहीं सकता। कर्मातीत अवस्था को पिछाड़ी में पायेंगे तब सिविल-आइज्ड हो सकते हैं। फिर वह रूहानी ब्रदर्ली लव रहता है। रूहानी ब्रदर्ली लव बहुत अच्छा रहता है, फिर क्रिमिनल दृष्टि नहीं होती, तब ही ऊंच पद पा सकेंगे। बाबा एम ऑब्जेक्ट तो पूरी बतलाते हैं। बच्चे समझते हैं कि यह-यह हमारे में खामी है। रजिस्टर जब रखेंगे तब खामी का भी मालूम पड़ेगा। हो सकता है कोई रजिस्टर न रखने से भी सुधर सकता है। परन्तु जो कच्चे हैं उनको रजिस्टर जरूर रखना चाहिए। कच्चे तो बहुत हैं, कोई-कोई को तो लिखना ही नहीं आता है। अवस्था तुम्हारी ऐसी चाहिए जो और कोई की याद नहीं आये। हम आत्मा बिना शरीर के आई, अब अशरीरी बनकर जाना है। इस पर एक कहानी है - उसने कहा तुम लाठी भी न उठाओ, वह भी पिछाड़ी में याद आयेगी। कोई भी चीज़ में ममत्व नहीं रखना है। बहुतों का ममत्व पुरानी वस्तुओं में रहता है। कुछ भी याद न आये सिवाए बाप के। कितनी ऊंची मंज़िल है। कहाँ ठिकरियाँ, कहाँ शिवबाबा की याद। मांगने की तमन्ना नहीं होनी चाहिए। हरेक को कम से कम 6 घण्टा सर्विस जरूर करनी चाहिए। वैसे तो गवर्मेन्ट की सर्विस 8 घण्टा होती है परन्तु पाण्डव गवर्मेन्ट की सर्विस कम से कम 5-6 घण्टा जरूर करो। विशश मनुष्य कभी बाबा को याद नहीं कर सकते हैं। सतयुग में है वाइसलेस वर्ल्ड। देवी-देवताओं की महिमा गाई जाती है - सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण....... तुम बच्चों की अवस्था कितनी उपराम रहनी चाहिए। कोई भी छी-छी चीज़ में ममत्व नहीं रहना चाहिए। शरीर में भी ममत्व न रहे, इतना योगी बनना है। जब सच-सच ऐसे योगी होंगे तो वह जैसे फ्रेश (ताजा) रहेंगे। जितना तुम सतोप्रधान बनते जायेंगे, खुशी का पारा उतना चढ़ता जायेगा। 5 हज़ार वर्ष पहले भी ऐसी खुशी थी। सतयुग में भी वही खुशी होगी। यहाँ भी खुशी रहेगी फिर यही खुशी साथ में ले जायेंगे। अन्त मती सो गति कहा जाता है ना। अभी की मत है फिर गति सतयुग में होगी। यह बहुत विचार सागर मंथन करना होता है।

बाप तो है ही दु:ख हर्ता, सुख कर्ता। तुम कहते हो हम बाप के बच्चे हैं तो किसको भी दु:ख नहीं देना चाहिए। सबको सुख का रास्ता बताना चाहिए। यदि सुख नहीं देते तो जरूर दु:ख देंगे। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है, जबकि तुम पुरुषार्थ करते हो सतोप्रधान बनने के लिए। पुरुषार्थी भी नम्बरवार होते हैं। जब बच्चे अच्छी सर्विस करते हैं तो बाप उनकी महिमा करते हैं यह फलाना बच्चा योगी है। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं वह वाइसलेस लाइफ में हैं। जिसको ज़रा भी ऐसे-वैसे ख्यालात नहीं आते हैं वही पिछाड़ी में कर्मातीत अवस्था को पायेंगे। तुम ब्राह्मण ही सिविल-आइज्ड बन रहे हो। मनुष्य को कभी देवता नहीं कहा जा सकता है। जो क्रिमिनल-आइज्ड होगा वह पाप जरूर करेगा। सतयुगी दुनिया पवित्र दुनिया है। यह है पतित दुनिया। यह अर्थ भी समझते नहीं है। जब ब्राह्मण बनें तब समझें। कहते हैं ज्ञान तो बहुत अच्छा है, जब फुर्सत होगी तब आऊंगा। बाबा समझते हैं आयेगा कभी भी नहीं। यह तो बाप की इनसल्ट हुई। मनुष्य से देवता बनते हैं तो फौरन करना चाहिए ना। कल पर डाला तो माया नाक से पकड़ गटर में डाल देगी। कल-कल करते काल खा जायेगा। शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिए। काल तो सिर पर खड़ा है। कितने मनुष्य अचानक मर पड़ते हैं। अभी बाम्ब्स गिरे तो कितने मनुष्य मर जायेंगे! अर्थक्वेक होती है ना, तो पहले थोड़ेही पता पड़ता है। ड्रामा अनुसार नैचुरल कैलेमिटीज भी होनी है, जिसको तो कोई जान नहीं सकता। बहुत नुकसान हो जाता है। फिर गवर्मेन्ट रेल का किराया आदि भी बढ़ा देती है। मनुष्यों को तो जाना ही पड़े। ख्याल करते रहते हैं - कैसे आमदनी बढ़ायें जो मनुष्य दे सकें। अनाज कितना महंगा हो गया है। तो बाप बैठ समझाते हैं - सिविल-आइज्ड को कहेंगे पवित्र आत्मा। यह तो दुनिया ही क्रिमिनल-आइज्ड है। तुम अभी सिविल-आइज्ड बनते हो। मेहनत है, ऊंच पद पाना मासी का घर नहीं है। जो बहुत सिविल-आइज्ड बनेंगे वही ऊंच पद पायेंगे। तुम तो यहाँ आये हो नर से नारायण बनने के लिए। परन्तु जो सिविल-आइज्ड नहीं बनते, ज्ञान उठा नहीं सकते, वह पद भी कम पायेंगे। इस समय सभी मनुष्यों की है क्रिमिनल-आइज्ड। सतयुग में होती है सिविल-आइज्ड।

बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, तुम देवी-देवता स्वर्ग के मालिक बनना चाहते हो तो बहुत-बहुत सिविल-आइज्ड बनो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तब 100 प्रतिशत सोल कॉन्सेस बन सकेंगे। कोई को भी अर्थ समझाना है। सतयुग में पाप की कोई बात ही नहीं होती। वह है ही सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण सिविल-आइज्ड। चन्द्रवंशी की भी दो कला कम होती हैं। चन्द्रमा की भी पिछाड़ी में आकर बाकी लकीर रहती है। एकदम निल नहीं होती है। कहेंगे प्राय: लोप हो गया। बादलों में दिखाई नहीं पड़ता। तो बाप कहते हैं तुम्हारी ज्योति भी बिल्कुल बुझ नहीं जाती है, कुछ न कुछ लाइट रहती है। सुप्रीम बैटरी से फिर तुम पॉवर लेते हो। खुद ही आकर सिखलाते हैं कि मेरे साथ तुम कैसे योग रख सकते हो। टीचर पढ़ाते हैं तो बुद्धियोग टीचर के साथ रहता है ना। टीचर जो मत देंगे वह पढ़ेंगे। हम भी पढ़कर टीचर अथवा बैरिस्टर बनेंगे, इसमें कृपा वा आशीर्वाद आदि की बात ही नहीं रहती है। माथा टेकने की भी दरकार नहीं। हाँ, कोई हरीओम या राम-राम करते हैं तो रिटर्न में करना पड़ता है। यह एक इज्ज़त देनी होती है। अहंकार नहीं दिखाना है। तुम जानते हो हमको तो एक बाप को ही याद करना है। कोई भक्ति छोड़ते हैं तो भी हंगामा हो जाता है। भक्ति छोड़ने वाले को नास्तिक समझते हैं। उनके नास्तिक कहने और तुम्हारे कहने में कितना फ़र्क है। तुम कहते हो वह बाप को नहीं जानते हैं इसलिए नास्तिक, निधन के हैं, इसीलिए सब लड़ते-झगड़ते रहते हैं। घर-घर में झगड़ा-अशान्ति है। क्रोध की निशानी है अशान्ति। वहाँ कितनी अपार शान्ति है। मनुष्य कहते हैं भक्ति में बड़ी शान्ति मिलती है, परन्तु वह है अल्पकाल के लिए। सदा के लिए शान्ति चाहिए ना। तुम धणी से निधनके बन जाते हो तब शान्ति से फिर अशान्ति में आ जाते हो। बेहद का बाप बेहद सुख का वर्सा देते हैं। हद के बाप से हद के सुख का वर्सा मिलता है। वह वास्तव में है दु:ख का, काम कटारी का वर्सा, जिसमें दु:ख ही दु:ख है इसलिए बाप कहते हैं - तुम आदि-मध्य-अन्त दु:ख पाते हो।

बाप कहते हैं मुझ पतित-पावन बाप को याद करो, इसको कहा जाता है सहज याद और सहज ज्ञान, सृष्टि चक्र का। तुम अपने को आदि सनातन देवी-देवता धर्म का समझेंगे तो जरूर स्वर्ग में आयेंगे। स्वर्ग में सब सिविल-आइज्ड थे, देह-अभिमानी को क्रिमिनल-आइज्ड कहा जाता है। सिविल-आइज्ड में कोई विकार नहीं होता। बाप कितना सहज कर समझाते हैं परन्तु बच्चों को यह भी याद नहीं रहता है क्योंकि क्रिमिनल-आइज्ड हैं। तो छी-छी दुनिया ही उन्हें याद पड़ती है। बाप कहते हैं इस दुनिया को भूल जाओ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ऐसा योगी बनना है जो शरीर में ज़रा भी ममत्व न रहे। कोई भी छी-छी चीज़ में आसक्ति न जाये। अवस्था ऐसी उपराम रहे। खुशी का पारा चढ़ा हुआ हो।

2) काल सिर पर खड़ा है इसलिए शुभ कार्य में देरी नहीं करनी है। कल पर नहीं छोड़ना है।

वरदान:-

बीमारी कान्सेस के बजाए खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करने वाले सोल कान्सेस भव

तन तो सबके पुराने हैं ही। हर एक को कोई न कोई छोटी बड़ी बीमारी है। लेकिन तन का प्रभाव अगर मन पर आ गया तो डबल बीमार हो बीमारी कान्सेस हो जायेंगे, इसलिए मन में कभी भी बीमारी का संकल्प नहीं आना चाहिए, तब कहेंगे सोल कान्सेस। बीमारी से कभी घबराओ नहीं। थोड़ा सा दवाई रूपी फ्रूट खाकर उसे विदाई दे दो। खुशी-खुशी से हिसाब-किताब चुक्तू करो।

स्लोगन:-

हर गुण, हर शक्ति का अनुभव करना अर्थात् अनुभवी मूर्त बनना।

20-07-2019

20-07-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - कलंगीधर बनने के लिए अपनी अवस्था अचल-अडोल बनाओ, जितना तुम पर कलंक लगते हैं, उतना तुम कलंगीधर बनते होˮ

प्रश्नः-

बाप की आज्ञा क्या है? किस मुख्य आज्ञा पर चलने वाले बच्चे दिल तख्तनशीन बनते हैं?

उत्तर:-

बाप की आज्ञा है - मीठे बच्चे, तुम्हें कोई से भी खिट-खिट नहीं करनी है। शान्ति में रहना है। अगर कोई को तुम्हारी बात अच्छी नहीं लगती तो तुम चुप रहो। एक-दो को तंग नहीं करो। बापदादा के दिलतख्तनशीन तब बन सकते जब अन्दर कोई भी भूत न रहे, मुख से कभी कोई कडुवे बोल न निकलें, मीठा बोलना जीवन की धारणा हो जाए।

ओम् शान्ति।

भगवानुवाच, आत्म-अभिमानी भव - पहले-पहले जरूर कहना पड़े। यह है बच्चों के लिए सावधानी। बाप कहते हैं कि हम बच्चे-बच्चे कहते हैं तो आत्माओं को ही देखता हूँ, शरीर तो पुरानी जुत्ती है। यह सतोप्रधान बन नहीं सकता। सतोप्रधान शरीर तो सतयुग में ही मिलेगा। अभी तुम्हारी आत्मा सतोप्रधान बन रही है। शरीर तो वही पुराना है। अभी तुमको अपनी आत्मा को सुधारना है। पवित्र बनना है। सतयुग में शरीर भी पवित्र मिलेगा। आत्मा को शुद्ध करने के लिए एक बाप को याद करना होता है। बाप भी आत्मा को देखते हैं। सिर्फ देखने से आत्मा शुद्ध नहीं बनेगी। वह तो जितना बाप को याद करेंगे उतना शुद्ध होते जायेंगे। यह तो तुम्हारा काम है। बाप को याद करते-करते सतोप्रधान बनना है। बाप तो आया ही है रास्ता बताने। यह शरीर तो अन्त तक पुराना ही रहेगा। यह तो सिर्फ कर्मेन्द्रियां हैं, जिससे आत्मा का कनेक्शन है। आत्मा गुल-गुल बन जाती है फिर कर्तव्य भी अच्छे करती है। वहाँ पंछी जानवर भी अच्छे-अच्छे रहते हैं। यहाँ चिड़िया मनुष्यों को देख भागती है, वहाँ तो ऐसे अच्छे-अच्छे पंछी तुम्हारे आगे-पीछे घूमते फिरते रहेंगे वह भी कायदेसिर। ऐसे नहीं घर के अन्दर घुस आयेंगे, गंद करके जायेंगे। नहीं, बहुत कायदे की दुनिया होती है। आगे चल तुमको सब साक्षात्कार होते रहेंगे। अभी मार्जिन तो बहुत पड़ी है। स्वर्ग की महिमा तो अपरमअपार है। बाप की महिमा भी अपरमअपार है, तो बाप के प्रापर्टी की महिमा भी अपरमअपार है। बच्चों को कितना नशा चढ़ना चाहिए। बाप कहते हैं मैं उन आत्माओं को याद करता हूँ, जो सर्विस करते हैं वह ऑटोमेटिकली याद आते हैं। आत्मा में मन-बुद्धि है ना। समझते हैं कि हम फर्स्ट नम्बर की सर्विस करते या सेकण्ड नम्बर की करते हैं। यह सब नम्बरवार समझते हैं। कोई तो म्युजियम बनाते हैं, प्रेजीडेण्ट, गवर्नर आदि के पास जाते हैं। जरूर अच्छी रीति समझाते होंगे। सबमें अपना-अपना गुण है। कोई में अच्छे गुण होते हैं तो कहा जाता है यह कितना गुणवान है। जो सर्विसएबुल होंगे वह सदैव मीठा बोलेंगे। कड़ुवा कभी बोल नहीं सकेंगे। जो कड़ुवा बोलने वाले हैं उनमें भूत है। देह-अभिमान है नम्बरवन, फिर उनके पीछे और भूत प्रवेश करते हैं।

मनुष्य बद-चलन भी बहुत चलते हैं। बाप कहते हैं इन बिचारों का दोष नहीं है। तुमको मेहनत ऐसी करनी है जैसे कल्प पहले की है, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो फिर आहिस्ते-आहिस्ते सारे विश्व की डोर तुम्हारे हाथों में आने वाली है। ड्रामा का चक्र है, टाइम भी ठीक बताते हैं। बाकी बहुत कम समय बचा है। वो लोग आजादी देते हैं तो दो टुकड़ा कर देते हैं, आपस में लड़ते रहें। नहीं तो उन्हों का बारूद आदि कौन लेगा। यह भी उन्हों का व्यापार है ना। ड्रामा अनुसार यह भी उन्हों की चालाकी है। यहाँ भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। वह कहते यह टुकड़ा हमको मिले, पूरा बंटवारा नहीं किया गया है, इस तरफ पानी जास्ती जाता है, खेती बहुत होती है, इस तरफ पानी कम है। आपस में लड़ पड़ते हैं, फिर सिविलवार हो पड़ती है। झगड़े तो बहुत होते हैं। तुम जब बाप के बच्चे बने हो तो तुम भी गाली खाते हो। बाबा ने समझाया था - अभी तुम कलंगीधर बनते हो। जैसे बाबा गाली खाते हैं, तुम भी गाली खाते हो। यह तो जानते हो कि इन बिचारों को पता नहीं है कि यह विश्व के मालिक बनते हैं। 84 जन्मों की बात तो बहुत सहज है। आपेही पूज्य, आपेही पुजारी भी तुम बनते हो। कोई की बुद्धि में धारणा नहीं होती है, यह भी ड्रामा में उनका ऐसा पार्ट है। कर क्या सकते हैं। कितना भी माथा मारो परन्तु ऊपर चढ़ नहीं सकते हैं। तदबीर तो कराई जाती है लेकिन उनकी तकदीर में नहीं है। राजधानी स्थापन होती है, उनमें सब चाहिए। ऐसा समझकर शान्त में रहना चाहिए। कोई से भी खिटपिट की बात नहीं। प्यार से समझाना पड़ता है - ऐसे न करो। यह आत्मा सुनती है, इससे और ही पद कम हो जायेगा। कोई-कोई को अच्छी बात समझाओ तो भी अशान्त हो पड़ते हैं, तो छोड़ देना चाहिए। खुद भी ऐसा होगा तो एक-दो को तंग करता रहेगा। यह पिछाड़ी तक रहेगा। माया भी दिन-प्रतिदिन कड़ी होती जाती है। महारथियों से माया भी महारथी होकर लड़ती है। माया के त़ूफान आते हैं फिर प्रैक्टिस हो जाती है बाप को याद करने की, एकदम जैसे अचल-अडोल रहते हैं। समझते हैं माया हैरान करेगी। डरना नहीं है। कलंगीधर बनने वालों पर कलंक लगते हैं, इसमें नाराज़ नहीं होना चाहिए। अखबार वाले कुछ भी खिल़ाफ डालते हैं क्योंकि पवित्रता की बात है। अबलाओं पर अत्याचार होंगे। अकासुर-बकासुर नाम भी है। स्त्रियों का नाम भी पूतना, सूपनखा है।

अब बच्चे पहले-पहले महिमा भी बाप की सुनाते हैं। बेहद का बाप कहते हैं तुम आत्मा हो। यह नॉलेज एक बाप के सिवाए कोई दे नहीं सकता। रचता और रचना का ज्ञान, यह है पढ़ाई, जिससे तुम स्वदर्शन चक्रधारी बन चक्रवर्ती राजा बनते हो। अलंकार भी तुम्हारे हैं परन्तु तुम ब्राह्मण पुरूषार्थी हो इसलिए यह अलंकार विष्णु को दे दिया है। यह सब बातें - आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, कोई भी बता नहीं सकते। आत्मा कहाँ से आई, निकल कैसे जाती, कभी कहते हैं आंखों से निकली, कभी कहते हैं भ्रकुटी से निकली, कभी कहते हैं माथे से निकल गई। यह तो कोई जान नहीं सकता। अभी तुम जानते हो - आत्मा शरीर ऐसे छोड़ेगी, बैठे-बैठे बाप की याद में देह का त्याग कर देंगे। बाप के पास तो खुशी से जाना है। पुराना शरीर खुशी से छोड़ना है। जैसे सर्प का मिसाल है। जानवरों में भी जो अक्ल है, वह मनुष्यों में नहीं है। वह सन्यासी आदि तो सिर्फ दृष्टांत देते हैं। बाप कहते हैं तुमको ऐसा बनना है जैसे भ्रमरी कीड़े को ट्रांसफर कर देती है, तुमको भी मनुष्य रूपी कीड़े को ट्रांसफर कर देना है। सिर्फ दृष्टान्त नहीं देना है लेकिन प्रैक्टिकल करना है। अब तुम बच्चों को वापिस घर जाना है। तुम बाप से वर्सा पा रहे हो तो अन्दर में खुशी होनी चाहिए। वह तो वर्से को जानते ही नहीं। शान्ति तो सबको मिलती है, सब शान्तिधाम में जाते हैं। सिवाए बाप के कोई भी सर्व की सद्गति नहीं करते। यह भी समझाना होता है, तुम्हारा निवृत्ति मार्ग है, तुम तो ब्रह्म में लीन होने का पुरूषार्थ करते हो। बाप तो प्रवृत्ति मार्ग बनाते हैं। तुम सतयुग में आ नहीं सकते हो। तुम यह ज्ञान किसको समझा नहीं सकेंगे। यह बहुत गुह्य बात है। पहले तो कोई को अलफ-बे ही पढ़ाना पड़ता है। बोलो तुमको दो बाप हैं - हद का और बेहद का। हद के बाप के पास जन्म लेते हो विकार से। कितने अपार दु:ख मिलते हैं। सतयुग में तो अपार सुख हैं। वहाँ तो जन्म ही मक्खन मिसल होता है। कोई दु:ख की बात नहीं। नाम ही है स्वर्ग। बेहद के बाप से बेहद की बादशाही का वर्सा मिलता है। पहले है सुख, पीछे है दु:ख। पहले दु:ख फिर सुख कहना रांग है। पहले नई दुनिया स्थापन होती है, पुरानी थोड़ेही स्थापन होती है। पुराना मकान कभी कोई बनाते हैं क्या। नई दुनिया में तो रावण हो न सके। यह भी बाप समझाते हैं तो बुद्धि में युक्तियां हों। बेहद का बाप बेहद का सुख देते हैं। कैसे देते हैं आओ तो समझायें। कहने की भी युक्ति चाहिए। दु:खधाम के दु:खों का भी तुम साक्षात्कार कराओ। कितने अथाह दु:ख हैं, अपरम्पार हैं। नाम ही है दु:खधाम। इनको सुखधाम कोई कह नहीं सकता। सुखधाम में श्रीकृष्ण रहते हैं। कृष्ण के मन्दिर को भी सुखधाम कहते हैं। वह सुखधाम का मालिक था, जिसकी मन्दिरों में अभी पूजा होती है। अभी यह बाबा लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जायेंगे तो कहेंगे ओहो! यह तो हम बनते हैं। इनकी पूजा थोड़ेही करेंगे। नम्बरवन बनते हैं तो फिर सेकण्ड थर्ड की पूजा क्यों करें। हम तो सूर्यवंशी बनते हैं। मनुष्यों को थोड़ेही पता है। वह तो सबको भगवान् कहते रहते हैं। अंधकार कितना है। तुम कितना अच्छी रीति समझाते हो। टाइम लगता है। जो कल्प पहले लगा था, जल्दी कुछ भी कर नहीं सकते। हीरे जैसा जन्म तुम्हारा यह अभी का है। देवताओं का भी हीरे जैसा जन्म नहीं कहेंगे। वह कोई ईश्वरीय परिवार में थोड़ेही हैं। यह है तुम्हारा ईश्वरीय परिवार। वह है दैवी परिवार। कितनी नई-नई बातें हैं। गीता में तो आटे में नमक मिसल है। कितनी भूल कर दी है - कृष्ण का नाम डालकर। बोलो, तुम देवताओं को तो देवता कहते हो फिर कृष्ण को भगवान् क्यों कहते हो। विष्णु कौन है? यह भी तुम समझते हो। मनुष्य तो बिगर ज्ञान के ऐसे ही पूजा करते रहते हैं। प्राचीन भी देवी-देवता हैं जो स्वर्ग में होकर गये हैं। सतो, रजो, तमो में सबको आना है। इस समय सब तमोप्रधान हैं। बच्चों को प्वाइंट्स तो बहुत समझाते हैं। बैज़ पर भी तुम अच्छा समझा सकते हो। बाप और पढ़ाने वाले टीचर को याद करना पड़े। परन्तु माया की भी कितनी कशमकशा चलती है। बहुत अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स निकलती रहती हैं। अगर सुनेंगे नहीं तो सुना कैसे सकेंगे। अक्सर करके बाहर में बड़े महारथी इधर-उधर जाते हैं तो मुरली मिस कर देते हैं, फिर पढ़ते नहीं। पेट भरा हुआ है। बाप कहते हैं कितनी गुह्य-गुह्य बातें तुमको सुनाता हूँ, जो सुनकर धारण करना है। धारणा नहीं होगी तो कच्चे रह जायेंगे। बहुत बच्चे भी विचार सागर मंथन कर अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स सुनाते हैं। बाबा देखते हैं, सुनते हैं जैसी-जैसी अवस्था ऐसी-ऐसी प्वाइंट्स निकाल सकते हैं। जो कभी इसने नहीं सुनाई है वह सर्विसएबुल बच्चे निकालते हैं। सर्विस पर ही लगे रहते हैं। मैगज़ीन में भी अच्छी प्वाइंट्स डालते हैं।

तो तुम बच्चे विश्व का मालिक बनते हो। बाप कितना ऊंच बनाते हैं, गीत में भी है ना सारे विश्व की बागड़ोर तुम्हारे हाथ में होगी। कोई छीन न सके। यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक थे ना। उन्हों को पढ़ाने वाला जरूर बाप ही होगा। यह भी तुम समझा सकते हो। उन्होंने राज्य पद पाया कैसे? मन्दिर के पुजारी को पता नहीं। तुमको तो अथाह खुशी होनी चाहिए। यह भी तुम समझा सकते हो ईश्वर सर्वव्यापी नहीं। इस समय तो 5 भूत सर्वव्यापी हैं। एक-एक में यह विकार हैं। माया के 5 भूत हैं। माया सर्वव्यापी है। तुम फिर ईश्वर सर्वव्यापी कह देते हो। यह तो भूल है ना। ईश्वर सर्वव्यापी हो कैसे सकता। वह तो बेहद का वर्सा देते हैं। कांटों को फूल बनाते हैं। समझाने की प्रैक्टिस भी बच्चों को करनी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जब कोई अशान्ति फैलाते हैं या तंग करते हैं तो तुम्हें शान्त रहना है। अगर समझानी मिलते हुए भी कोई अपना सुधार नहीं कर सकते तो कहेंगे इनकी तकदीर क्योंकि राजधानी स्थापन हो रही है।

2) विचार सागर मंथन कर ज्ञान की नई-नई प्वाइंट्स निकाल सर्विस करनी है। बाप मुरली में रोज़ जो गुह्य बातें सुनाते हैं, वह कभी मिस नहीं करनी है।

वरदान:-

समय प्रमाण हर शक्ति का अनुभव प्रैक्टिकल स्वरूप में करने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव

मास्टर का अर्थ है कि जिस शक्ति का जिस समय आह्वान करो वो शक्ति उसी समय प्रैक्टिकल स्वरूप में अनुभव हो। आर्डर किया और हाजिर। ऐसे नहीं कि आर्डर करो सहनशक्ति को और आये सामना करने की शक्ति, तो उसको मास्टर नहीं कहेंगे। तो ट्रायल करो कि जिस समय जो शक्ति आवश्यक है उस समय वही शक्ति कार्य में आती है? एक सेकण्ड का भी फर्क पड़ा तो जीत के बजाए हार हो जायेगी।

स्लोगन:-

बुद्धि में जितना ईश्वरीय नशा हो, कर्म में उतनी ही नम्रता हो।

21-07-19

21-07-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''मातेश्वरी'' रिवाइज: 02-01-85 मधुबन


सर्वोत्तम स्नेह, सम्बन्ध और सेवा

आज बापदादा सभी बच्चों की स्नेह भरी सौगातें देख रहे थे। हर एक बच्चे की स्नेह सम्पन्न याद सौगात भिन्न-भिन्न प्रकार की थी। एक बापदादा को, अनेक बच्चों की सौगातें अनेक संख्या में मिलीं। ऐसी सौगातें और इतनी सौगातें विश्व में किसी को भी मिल नहीं सकतीं। यह थी दिल की सौगातें दिलाराम को। और सभी मनुष्य आत्मायें स्थूल सौगात देते हैं। लेकिन संगमयुग में यह विचित्र बाप और विचित्र सौगातें हैं। तो बापदादा सभी के स्नेह की सौगात देख हर्षित हो रहे थे। ऐसा कोई भी बच्चा नहीं था - जिसकी सौगात नहीं पहुँची हो। भिन्न-भिन्न मूल्य की जरूर थी। किसी की ज्यादा मूल्य की थी, किसी की कम। जितना अटूट और सर्व सम्बन्ध का स्नेह था उतने वैल्यु की सौगात थी। नम्बरवार स्नेह और सम्बन्ध के आधार से दिल की सौगात थी। दोनों ही बाप सौगातों में से नम्बरवार मूल्यवान की माला बना रहे थे, और माला को देख चेक कर रहे थे कि मूल्य का अन्तर विशेष किस बात से है। तो क्या देखा? स्नेह सभी का है, सम्बन्ध भी सभी का है, सेवा भी सभी की है लेकिन स्नेह में आदि से अब तक संकल्प द्वारा वा स्वप्न में भी और कोई व्यक्ति या वैभव की तरफ बुद्धि आकर्षित नहीं हुई हो। एक बाप के एकरस अटूट स्नेह में सदा समाये हुए हों। सदा स्नेह के अनुभवों के सागर में ऐसा समाया हुआ हो जो सिवाए उस संसार के और कोई व्यक्ति वा वस्तु दिखाई न दे। बेहद के स्नेह का आकाश और बेहद के अनुभवों का सागर। इस आकाश और सागर के सिवाए और कोई आकर्षण न हो। ऐसे अटूट स्नेह की सौगात नम्बरवार वैल्युएबल थी। जितने वर्ष बीते हैं उतने वर्षों के स्नेह की वैल्यु आटोमेटिक जमा होती रहती है और उतनी वैल्यु की सौगात बापदादा के सामने प्रत्यक्ष हुई। तीन बातों की विशेषता सभी की देखी -

1. स्नेह अटूट है - दिल का स्नेह है वा समय प्रमाण आवश्यकता के कारण, अपने मतलब को सिद्ध करने के कारण है - ऐसा स्नेह तो नहीं है? 2. सदा स्नेह स्वरूप इमर्ज रूप में है वा समय पर इमर्ज होता बाकी समय मर्ज रहता है? 3. दिल खुश करने का स्नेह है वा जिगरी दिल का स्नेह है? तो स्नेह में यह सब बातें चेक की।

2. सम्बन्ध में - पहली बात सर्व सम्बन्ध है वा कोई-कोई विशेष सम्बन्ध है? एक भी सम्बन्ध की अनुभूति अगर कम है तो सम्पन्नता में कमी है और समय प्रति समय वह रहा हुआ एक सम्बन्ध भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेता है। जैसे बाप शिक्षक सतगुरू यह विशेष सम्बन्ध तो जोड़ लिया लेकिन छोटा सा सम्बन्ध पोत्रा धोत्रा भी नहीं बनाया तो वह भी सम्बन्ध अपने तरफ खींच लेगा। तो सम्बन्ध में सर्व सम्बन्ध है?

दूसरी बात - बाप से हर सम्बन्ध 100 प्रतिशत है वा कोई सम्बन्ध 100 प्रतिशत है, कोई 50 प्रतिशत है वा नम्बरवार हैं? परसेन्टेज में भी फुल है वा थोड़ा अलौकिक, थोड़ा लौकिक, दोनों में परसेन्टेज में बांटा हुआ है?

तीसरा - सर्व सम्बन्ध की अनुभूति का रूहानी रस सदा अनुभव करते वा जब आवश्यकता होती है तब अनुभव करते? सदा सर्व सम्बन्धों का रस लेने वाले हैं वा कभी-कभी?

3. सेवा में - सेवा में विशेष क्या चेक किया होगा? पहली बात - जो मोटे रूप में चेकिंग है - मन, वाणी, कर्म वा तन-मन-धन सब प्रकार की सेवा का खाता जमा है? दूसरी बात - तन-मन-धन, मन-वाणी-कर्म इन 6 बातों में जितना कर सकते हैं उतना किया है वा जितना कर सकते हैं, उतना न कर यथा शक्ति स्थिति के प्रमाण किया है? आज स्थिति बहुत अच्छी है तो सेवा की परसेन्टेज भी अच्छी, कल कारण अकारण स्थिति कमजोर है तो सेवा की परसेन्टेज भी कमजोर रही है। जितना और उतना नहीं हुआ। इस कारण यथा शक्ति नम्बरवार बन जाते हैं।

तीसरी बात - जो बापदादा द्वारा ज्ञान का खजाना, शक्तियों का खजाना, गुणों का खजाना, खुशियों का खजाना, श्रेष्ठ समय का खजाना, शुद्ध संकल्पों का खजाना मिला है, उन सब खजानों द्वारा सेवा की है वा कोई-कोई खजाने द्वारा सेवा की है? अगर एक खजाने में भी सेवा करने में कमी की है वा फराखदिल हो खजानों को कार्य में नहीं लगाया है, थोड़ा बहुत कर लिया अर्थात् कन्जूसी की तो इसका भी रिजल्ट में अन्तर पड़ जाता है!

चौथी बात - दिल से की है वा ड्युटी प्रमाण की है सेवा की सदा बहती गंगा है वा सेवा में कभी बहना कभी रूकना। मूड है तो सेवा की, मूड नहीं तो नहीं की। ऐसे रुकने वाले तालाब तो नहीं है।

ऐसे तीनों बातों की चेकिंग प्रमाण हरेक की वैल्यु चेक की। तो ऐसे-ऐसे विधिपूर्वक हर एक अपने आपको चेक करो। और इस नये वर्ष में यही दृढ़ संकल्प करो कि कमी को सदा के लिए समाप्त कर सम्पन्न बन, नम्बरवन मूल्यवान सौगात बाप के आगे रखेंगे। चेक करना और फिर चेन्ज करना आयेगा ना। रिजल्ट प्रमाण अभी किसी न किसी बात में मैजारिटी यथाशक्ति है। सम्पन्न शक्ति स्वरुप नहीं है इसलिए अब बीती को बीती कर वर्तमान और भविष्य सम्पन्न, शक्तिशाली बनो।

आप लोगों के पास भी सौगातें इकट्ठी होती हैं तो चेक करते हो ना कौन-सी कौन-सी वैल्युएबल हैं। बाप-दादा भी बच्चों का यही खेल कर रहे थे। सौगातें तो अथाह थीं। हर एक ने अपने अनुसार अच्छे ते अच्छा उमंग उत्साह भरा संकल्प, शक्तिशाली संकल्प बाप के आगे किया है। अब सिर्फ यथाशक्ति के बजाए सदा शक्तिशाली - यह परिवर्तन करना। समझा। अच्छा!

सभी सदा के स्नेही, दिल के स्नेही, सर्व सम्बन्धों के स्नेही, रूहानी रस के अनुभवी आत्मायें, सर्व खजानों द्वारा शक्तिशाली, सदा सेवाधारी, सर्व बातों में यथाशक्ति को सदा शक्तिशाली में परिवर्तन करने वाले, विशेष स्नेही और समीप सम्बन्धी आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

दादी जानकी जी से - मधुबन का श्रृंगार मधुबन में पहुंच गया। भले पधारे। बापदादा और मधुबन का विशेष श्रृंगार हो, विशेष श्रृंगार से क्या होता है? चमक हो जाती है ना। तो बापदादा और मधुबन विशेष श्रृंगार को देख हर्षित हो रहे हैं। विशेष सेवा में बाप के स्नेह और सम्बन्ध को प्रत्यक्ष किया, यह विशेष सेवा सबके दिलों को समीप लाने वाली है। रिजल्ट तो सदा अच्छी है। फिर भी समय-समय की अपनी विशेषता की रिजल्ट होती है तो बाप के स्नेह को अपनी स्नेही सूरत से नयनों से प्रत्यक्ष किया यह विशेष सेवा की। सुनने वाला बनाना, यह कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन स्नेही बनाना यह है विशेष सेवा। जो सदा होती रहेगी। कितने पतंगे देखे, शमा पर फिदा होने की इच्छा वाले कितने परवाने देखे? अभी नयनों की नज़र से परवानों को शमा की ओर इशारा करने का ही विशेष समय है। इशारा मिला और चलते रहेंगे। उड़ते-उड़ते पहुँच जायेंगे। तो यह विशेष सेवा आवश्यक भी है और की भी है। ऐसी रिजल्ट है ना। अच्छा है हर कदम में अनेक आत्माओं की सेवा समाई हुई है, कितने कदम उठाये? तो जितने कदम उतने ही आत्माओं की सेवा। अच्छा चक्र रहा। उन्हों के भी उमंग उत्साह की अभी सीजन है। जो होता है वह अच्छे से अच्छा होता है। बापदादा के मुरबी बच्चों के हर कर्म की रेखा से अनेकों के कर्मों की रेखा बदलती है। तो हर कर्म की रेखा से अनेकों की तकदीर की लकीर खींची। चलना अर्थात् तकदीर खींचना। तो जहाँ-जहाँ जाते हैं अपने कर्मों की कलम से अनेकों की तकदीर की लकीरें खींचते जाते। तो कदम अर्थात् कर्म ही मुरबी बच्चों के तकदीर की लकीर खींचने की सेवा के निमित्त बनें। तो अभी बाकी लास्ट आवाज है - “यही हैं, यही हैंˮ जिसको ढूँढते हैं वे यही हैं। अभी सोचते हैं - यह हैं वा वह हैं। लेकिन सिर्फ एक ही आवाज निकले यही हैं। अभी वह समय समीप आ रहा है। तकदीर की लकीर लम्बी होते-होते यह भी बुद्धि का जो थोड़ा सा ताला रहा हुआ है वह खुल जायेगा। चाबी तो लगाई है, खुला भी है लेकिन अभी थोड़ा सा अटका हुआ है, वह भी दिन आ जायेगा।

टीचर्स बहिनों के साथ:- टीचर्स अर्थात् सदा सम्पन्न। तो सम्पन्नता की अनुभूति करने वाली हो ना। स्वयं सर्व खजानों से सम्पन्न होंगे तब दूसरों की सेवा कर सकेंगे। अपने में सम्पन्नता नहीं तो दूसरे को क्या देंगे। सेवाधारी का अर्थ ही है सर्व खजानों से सम्पन्न। सदा भरपूरता का नशा और खुशी। कोई एक भी खजाने की कमी नहीं। शक्ति है, गुण नहीं। गुण हैं शक्ति नहीं - ऐसा नहीं, सर्व खजाने में सम्पन्न। जिस शक्ति का जिस समय आह्वान करें, शक्ति स्वरूप बन जाए - इसको कहा जाता है सम्पन्नता। ऐसे हो? जो याद और सेवा के बैलेंस में रहता है, कभी याद ज्यादा हो, कभी सेवा ज्यादा हो - नहीं, दोनों समान हो, बैलेंस में रहने वाले हो, वही सम्पन्नता की ब्लैसिंग के अधिकारी होते हैं। ऐसे सेवाधारी हो, क्या लक्ष्य रखती हो? सर्व खजानों से सम्पन्न, एक भी गुण कम हुआ तो सम्पन्न नहीं। एक शक्ति भी कम हुई तो भी सम्पन्न नहीं कहेंगे। सदा सम्पन्न और सर्व में सम्पन्न दोनों ही हो। ऐसे को कहा जाता है योग्य सेवाधारी। समझा। हर कदम में सम्पन्नता। ऐसे अनुभवी आत्मा अनुभव की अथॉरिटी है। सदा बाप के साथ का अनुभव हो।

कुमारियों से - सदा लकी कुमारियाँ हो ना। सदा अपना भाग्य का चमकता हुआ सितारा अपने मस्तक पर अनुभव करते हो। मस्तक में भाग्य का सितारा चमक रहा है ना कि चमकने वाला है? बाप का बनना अर्थात् सितारा चमकना। तो बन गये या अभी सौदा करने का सोच रही हो? सोचने वाली हो या करने वाली हो? कोई सौदा तुड़ाने चाहे तो टूट सकता है? बाप से सौदा कर फिर दूसरा सौदा किया तो क्या होगा? फिर अपने भाग्य को देखना पड़ेगा। कोई लखपति का बनकर गरीब का नहीं बनता। गरीब साहूकार का बनता है। साहूकार वाला गरीब नहीं बनेगा। बाप का बनने के बाद कहाँ संकल्प भी जा नहीं सकता - ऐसे पक्के हो? जितना संग होगा उतना रंग पक्का होगा। संग कच्चा तो रंग भी कच्चा इसलिए पढ़ाई और सेवा दोनों का संग चाहिए। तो सदा के लिए पक्के अचल रहेंगे। हलचल में नहीं आयेंगे। पक्का रंग लग गया तो इतने हैण्ड्स से इतने ही सेंटर खुल सकते हैं क्योंकि कुमारियाँ हैं ही निर्बन्धन। औरों का भी बन्धन खत्म करेंगी ना। सदा बाप के साथ पक्का सौदा करने वाली। हिम्मत है तो बाप की मदद भी मिलेगी। हिम्मत कम तो मदद भी कम। अच्छा - ओम् शान्ति।

वरदान:-

परमात्म दुलार को प्राप्त करने वाले अब के सो भविष्य के राज दुलारे भव

संगमयुग पर आप भाग्यवान बच्चे ही दिलाराम के दुलार के पात्र हो। यह परमात्म दुलार कोटों में कोई आत्माओं को ही प्राप्त होता है। इस दिव्य दुलार द्वारा राज दुलारे बन जाते हो। राजदुलारे अर्थात् अब भी राजे और भविष्य के भी राजे। भविष्य से भी पहले अब स्वराज्य अधिकारी बन गये। जैसे भविष्य राज्य की महिमा है एक राज्य, एक धर्म..ऐसे अभी सर्व कर्मेन्द्रियों पर आत्मा का एक छत्र राज्य है।

स्लोगन:-

अपनी सूरत से बाप की सीरत दिखाने वाले ही परमात्म स्नेही हैं। सूचना:-आज मास का तीसरा रविवार है, सभी संगठित रूप में सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अन्तर्राष्ट्रीय योग में सम्मिलित हो, बीजरूप बाप के साथ अपने पूर्वज स्वरूप की स्मृति में स्थित रह पूरे वृक्ष को स्नेह और शक्ति की सकाश देने की सेवा करें। सारा दिन मैं पूर्वज आत्मा हूँ इस स्वमान में रहने का अभ्यास करें।

19-07-2019

19-07-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम यहाँ याद में रहकर पाप दग्ध करने के लिए आये हो इसलिए बुद्धियोग निष्फल न जाए, इस बात का पूरा ध्यान रखना हैˮ

प्रश्नः-

कौन-सा सूक्ष्म विकार भी अन्त में मुसीबत खड़ी कर देता है?

उत्तर:-

अगर सूक्ष्म में भी हबच (लालच) का विकार है, कोई चीज़ हबच के कारण इकट्ठी करके अपने पास जमा करके रख दी तो वही अन्त में मुसीबत के रूप में याद आती है इसलिए बाबा कहते - बच्चे, अपने पास कुछ भी न रखो। तुम्हें सब संकल्पों को भी समेटकर बाप की याद में रहने की टेव (आदत) डालनी है इसलिए देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करो।

ओम् शान्ति।

बच्चों को रोज़-रोज़ याद दिलाते हैं - देही-अभिमानी बनो क्योंकि बुद्धि इधर-उधर जाती है। अज्ञानकाल में भी कथा वार्ता सुनते हैं तो बुद्धि बाहर भटकती है। यहाँ भी भटकती है इसलिए रोज़-रोज़ कहते हैं देही-अभिमानी बनो। वह तो कहेंगे हम जो सुनाते हैं उस पर ध्यान दो, धारण करो। शास्त्र जो सुनाते हैं वह वचन ध्यान पर रखो। यहाँ तो बाप आत्माओं को समझाते हैं, तुम सब स्टूडेण्ट देही-अभिमानी होकर बैठो। शिवबाबा आते हैं पढ़ाने के लिए। ऐसा कोई कॉलेज नहीं होगा जहाँ समझेंगे शिवबाबा पढ़ाने आते हैं। ऐसा स्कूल होना ही चाहिए पुरूषोत्तम संगमयुग पर। स्टूडेण्ट बैठे हैं और यह भी समझते हैं परमपिता परमात्मा आते हैं हमको पढ़ाने। शिवबाबा आते हैं हमको पढ़ाने। पहली-पहली बात समझाते हैं तुमको पावन बनना है तो मामेकम् याद करो परन्तु माया घड़ी-घड़ी भुला देती है इसलिए बाप ख़बरदार करते हैं। कोई को समझाना है तो भी पहली-पहली बात समझाओ कि भगवान् कौन है? भगवान् जो पतित-पावन दु:ख हर्ता, सुख कर्ता है, वह कहाँ है? उनको याद तो सब करते हैं। जब कोई आ़फतें आती हैं, कहते हैं हे भगवान् रहम करो। किसको बचाना होता है तो भी कहते हैं हे भगवान्, ओ गॉड हमको दु:ख से लिबरेट करो। दु:ख तो सबको है। यह तो पक्का मालूम है सतयुग को सुखधाम कहा जाता है, कलियुग को दु:खधाम कहा जाता है। यह बच्चे जानते हैं फिर भी माया भुला देती है। यह याद में बिठाने की रस्म भी ड्रामा में है क्योंकि बहुत हैं जो सारा दिन याद नहीं करते हैं, एक मिनट भी याद नहीं करते हैं फिर याद दिलाने के लिए यहाँ बिठाते हैं। याद करने की युक्ति बतलाते हैं तो पक्का हो जाए। बाप की याद से ही हमको सतोप्रधान बनना है। सतोप्रधान बनने की बाप ने फर्स्टक्लास रीयल युक्ति बताई है। पतित-पावन तो एक ही है, वह आकर युक्ति बताते हैं। यहाँ तुम बच्चे शान्ति में तब बैठते हो जबकि बाप के साथ योग है। अगर बुद्धि का योग यहाँ-वहाँ गया तो शान्त में नहीं हैं, गोया अशान्त हैं। जितना समय यहाँ-वहाँ बुद्धियोग गया, वह निष्फल हुआ क्योंकि पाप तो कटते नहीं। दुनिया यह नहीं जानती कि पाप कैसे कटते हैं! यह बड़ी महीन बातें हैं। बाप ने कहा है मेरी याद में बैठो, तो जब तक याद की तार जुटी हुई है, उतना समय सफलता है। ज़रा भी बुद्धि इधर-उधर गई तो वह टाइम वेस्ट हुआ, निष्फल हुआ। बाप का डायरेक्शन है ना कि बच्चे मुझे याद करो, अगर याद नहीं किया तो निष्फल हुआ। इससे क्या होगा? तुम जल्दी सतोप्रधान नहीं बनेंगे फिर तो आदत पड़ जायेगी। यह होता रहेगा। आत्मा इस जन्म के पाप तो जानती है। भल कोई कहते हैं हमको याद नहीं है, परन्तु बाबा कहते हैं 3-4 वर्ष से लेकर सब बातें याद रहती हैं। शुरू में इतने पाप नहीं होते हैं, जितने बाद में होते हैं। दिन-प्रतिदिन क्रिमिनल आई होती जाती है, त्रेता में दो कला कम होती हैं। चन्द्रमा की 2 कला कितने में कम होती हैं। धीरे-धीरे कम होती जाती हैं फिर 16 कला सम्पूर्ण भी चन्द्रमा को कहा जाता है, सूर्य को नहीं कहते। चन्द्रमा की है एक मास की बात, यह फिर है कल्प की बात। दिन-प्रतिदिन नीचे उतरते जाते हैं। फिर याद की यात्रा से ऊपर चढ़ सकते हैं। फिर तो दरकार नहीं जो हम याद करें और ऊपर चढ़ें। सतयुग के बाद फिर उतरना है। सतयुग में भी याद करें तो नीचे उतरे ही नहीं। ड्रामा अनुसार उतरना ही है, तो याद ही नहीं करते हैं। उतरना भी जरूर है फिर याद करने का उपाय बाप ही बतलाते हैं क्योंकि ऊपर जाना है। संगम पर ही आकर बाप सिखलाते हैं कि अब चढ़ती कला शुरू होती है। हमको फिर अपने सुखधाम में जाना है। बाप कहते हैं अब सुखधाम में जाना है तो मुझे याद करो। याद से तुम्हारी आत्मा सतोप्रधान बन जायेगी।

तुम दुनिया से निराले हो, बैकुण्ठ दुनिया से बिल्कुल न्यारा है। बैकुण्ठ था, अब नहीं है। कल्प की आयु लम्बी कर देने के कारण भूल गये हैं। अभी तुम बच्चों को तो बैकुण्ठ बहुत नज़दीक दिखाई देता है। बाकी थोड़ा टाइम है। याद की यात्रा में ही कमी है इसलिए समझते हैं अभी टाइम है। याद की यात्रा जितनी होनी चाहिए उतनी नहीं है। तुम पैगाम पहुँचाते हो ड्रामा के प्लैन अनुसार, कोई को पैगाम नहीं देते हैं तो गोया सर्विस नहीं करते हैं। सारी दुनिया में पैगाम तो पहुँचाना है कि बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। गीता पढ़ने वाले जानते हैं, एक ही गीता शास्त्र है, जिसमें यह महावाक्य हैं। परन्तु उसमें कृष्ण भगवानुवाच लिख दिया है तो याद किसको करें। भल शिव की भक्ति करते हैं परन्तु यथार्थ ज्ञान नहीं जो श्रीमत पर चलें। इस समय तुमको मिलती है ईश्वरीय मत, इनके पहले थी मानव मत। दोनों में रात-दिन का फ़र्क है। मानव मत कहती है ईश्वर सर्वव्यापी है। ईश्वर की मत कहती है नहीं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ स्वर्ग की स्थापना करने तो जरूर यह नर्क है। यहाँ 5 विकार सबमें प्रवेश हैं। विकारी दुनिया है तब तो मैं आता हूँ निर्विकारी बनाने के लिए। जो ईश्वर के बच्चे बने, उनके पास विकार तो हो नहीं सकते। रावण का चित्र 10 शीश वाला दिखाते हैं। कभी कोई कह न सके कि रावण की सृष्टि निर्विकारी है। तुम जानते हो अभी रावण राज्य है, सभी में 5 विकार हैं। सतयुग में है रामराज्य, कोई भी विकार नहीं। इस समय मनुष्य कितने दु:खी हैं। शरीर को कितने दु:ख लगते हैं, यह है दु:खधाम, सुखधाम में तो शारीरिक दु:ख भी नहीं होते हैं। यहाँ तो कितनी हॉस्पिटल्स भरी हुई हैं, इनको स्वर्ग कहना भी बड़ी भूल है। तो समझकर औरों को समझाना है, वह पढ़ाई कोई को समझाने के लिए नहीं है। इम्तहान पास किया और नौकरी पर चढ़ा। यहाँ तो तुमको सबको पैगाम देना है। सिर्फ एक बाप थोड़ेही देंगे। जो बहुत होशियार हैं उनको टीचर कहा जाता है, कम होशियार हैं तो उनको स्टूडेण्ट कहा जाता है। तुम्हें सबको पैगाम देना है, पूछना है भगवान् को जानते हो? वह तो बाप है सबका। तो मूल बात है बाप का परिचय देना क्योंकि कोई जानते नहीं हैं। ऊंच ते ऊंच बाप है, सारे विश्व को पावन बनाने वाला है। सारा विश्व पावन था, जिसमें भारत ही था। और कोई धर्म वाला कह न सके कि हम नई दुनिया में आये हैं। वह तो समझते हैं हमारे से आगे कोई होकर गये हैं। क्राइस्ट भी जरूर कोई में आयेगा। उनके आगे जरूर कोई थे। बाप बैठ समझाते हैं मैं इस ब्रह्मा तन में प्रवेश करता हूँ। यह भी कोई मानते नहीं कि ब्रह्मा के तन में आते हैं। अरे, ब्राह्मण तो चाहिए जरूर। ब्राह्मण कहाँ से आयेंगे। जरूर ब्रह्मा से ही तो आयेंगे ना। अच्छा, ब्रह्मा का बाप कभी सुना? वह है ग्रेट-ग्रेट ग्रैण्ड फादर। उनका साकार फादर कोई नहीं। ब्रह्मा का साकार बाप कौन? कोई बतला न सके। ब्रह्मा तो गाया हुआ है। प्रजापिता भी है। जैसे निराकार शिवबाबा कहते हैं, उनका बाप बताओ? फिर साकार प्रजापिता ब्रह्मा का बाप बताओ। शिवबाबा तो एडाप्ट किया हुआ नहीं है। यह एडाप्ट किया हुआ है। कहेंगे इनको शिवबाबा ने एडाप्ट किया। विष्णु को शिवबाबा ने एडाप्ट किया है, ऐसा नहीं कहेंगे। यह तो तुम जानते हो ब्रह्मा सो विष्णु बनते हैं। एडाप्ट तो हुआ नहीं। शंकर के लिए भी बताया है, उनका कोई पार्ट है नहीं। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा यह 84 का चक्र है। शंकर फिर कहाँ से आया। उनकी रचना कहाँ है। बाप की तो रचना है, वह सब आत्माओं का बाप है और ब्रह्मा की रचना हैं सब मनुष्य। शंकर की रचना कहाँ है? शंकर से कोई मनुष्य दुनिया नहीं रची जाती। बाप आकर यह सब बातें समझाते हैं फिर भी बच्चे घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। हरेक की बुद्धि नम्बरवार है ना। जितनी बुद्धि उतनी टीचर की पढ़ाई धारण कर सकते हैं। यह है बेहद की पढ़ाई। पढ़ाई के अनुसार ही नम्बरवार पद पाते हैं। भल पढ़ाई एक ही है मनुष्य से देवता बनने की परन्तु डिनायस्टी बनती है ना। यह भी बुद्धि में आना चाहिए कि हम कौन-सा पद पायेंगे? राजा बनना तो मेहनत का काम है। राजाओं के पास दास-दासियां भी चाहिए। दास-दासियां कौन बनते हैं, यह भी तुम समझ सकते हो। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार हरेक को दासियां मिलती होंगी। तो ऐसा नहीं पढ़ना चाहिए जो जन्म-जन्मान्तर दास-दासी बनें। पुरूषार्थ करना है ऊंच बनने का।

तो सच्ची शान्ति बाप की याद में है, जरा भी बुद्धि इधर-उधर गई तो टाइम वेस्ट होगा। कमाई कम होगी। सतोप्रधान बन नहीं सकेंगे। यह भी समझाया है कि हाथों से काम करते रहो, दिल से बाप को याद करो। शरीर को तन्दरूस्त रखने के लिए घूमना फिरना, यह भी भल करो। परन्तु बुद्धि में बाप की याद रहे। अगर साथ में कोई हो तो झरमुई-झगमुई नहीं करनी है। यह तो हर एक की दिल गवाही देती है। बाबा समझा देते हैं ऐसी अवस्था में चक्कर लगाओ। पादरी लोग जाते हैं एकदम शान्त में, तुम लोग ज्ञान की बातें सारा समय तो नहीं करेंगे फिर जबान को शान्त में लाकर शिवबाबा की याद में रेस करनी चाहिए। जैसे खाने के समय बाबा कहते हैं - याद में बैठकर खाओ, अपना चार्ट देखो। बाबा अपना तो बताते हैं कि हम भूल जाते हैं। कोशिश करता हूँ, बाबा को कहता हूँ बाबा हम पूरा समय याद में रहूँगा। आप हमारी खाँसी बंद करो। शुगर कम करो। अपने साथ जो मेहनत करता हूँ, वह बताता हूँ। परन्तु मैं खुद ही भूल जाता हूँ तो खाँसी कम कैसे होगी। जो बातें बाबा के साथ करता हूँ, वह सच सुनाता हूँ। बाबा बच्चों को बता देते हैं, बच्चे बाप को नहीं सुनाते, लज्जा आती है। झाड़ू लगाओ, खाना बनाओ तो भी शिवबाबा की याद में बनाओ तो ताकत आयेगी। यह भी युक्ति चाहिए, इसमें तुम्हारा ही कल्याण होगा फिर तुम याद में बैठेंगे तो औरों को भी कशिश होगी। एक-दो को कशिश तो होती है ना। जितना तुम जास्ती याद में रहेंगे उतना सन्नाटा अच्छा हो जायेगा। एक-दो का प्रभाव ड्रामा अनुसार पड़ता है। याद की यात्रा तो बहुत कल्याणकारी है, इसमें झूठ बोलने की दरकार नहीं है। सच्चे बाप के बच्चे हैं तो सच्चा होकर चलना है। बच्चों को तो सब कुछ मिलता है। विश्व की बादशाही मिलती है तो फिर लोभ कर 10-20 साड़ियाँ आदि क्यों इकट्ठी करते हो। अगर बहुत चीजें इकट्ठी करते रहेंगे तो मरने समय भी याद आयेगी इसलिए मिसाल देते हैं कि स्त्री ने उनको कहा लाठी भी छोड़ दो, नहीं तो यह भी याद आयेगी। कुछ भी याद नहीं रहना चाहिए। नहीं तो अपने लिए ही मुसीबत लाते हैं। झूठ बोलने से सौगुणा पाप चढ़ जाता है। शिवबाबा का भण्डारा सदैव भरा रहता है, जास्ती रखने की भी दरकार क्या है। जिसकी चोरी हो जाती है तो सब कुछ दिया जाता है। तुम बच्चों को बाप से राजाई मिलती है, तो क्या कपड़े आदि नहीं मिलेंगे। सिर्फ फालतू खर्चा नहीं करना चाहिए क्योंकि अबलायें ही मदद करती हैं स्वर्ग की स्थापना में। उनके पैसे ऐसे बरबाद भी नहीं करने चाहिए। वह तुम्हारी परवरिश करती हैं तो तुम्हारा काम है उन्हों की परवरिश करना। नहीं तो सौ गुणा पाप सिर पर चढ़ता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप की याद में बैठते समय ज़रा भी बुद्धि इधर-उधर नहीं भटकनी चाहिए। सदा कमाई जमा होती रहे। याद ऐसी हो जो सन्नाटा हो जाए।

2) शरीर को तन्दुरूस्त रखने के लिये घूमने फिरने जाते हो तो आपस में झरमुई-झगमुई (परचिंतन) नहीं करना है। जबान को शान्त में रख बाप को याद करने की रेस करनी है। भोजन भी बाप की याद में खाना है।

वरदान:-

सम्बन्ध-सम्पर्क में सन्तुष्टता की विशेषता द्वारा माला में पिरोने वाले सन्तुष्टमणी भव

संगमयुग सन्तुष्टता का युग है। जो स्वयं से भी सन्तुष्ट हैं और सम्बन्ध-सम्पर्क में भी सदा सन्तुष्ट रहते वा सन्तुष्ट करते हैं वही माला में पिरोते हैं क्योंकि माला सम्बन्ध से बनती है। अगर दाने का दाने से सम्पर्क नहीं हो तो माला नहीं बनेंगी इसलिए सन्तुष्टमणी बन सदा सन्तुष्ट रहो और सर्व को सन्तुष्ट करो। परिवार का अर्थ ही है सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना। कोई भी प्रकार की खिटखिट न हो।

स्लोगन:-

विघ्नों का काम है आना और आपका काम है विघ्न-विनाशक बनना।

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