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28-05-2020

28-05-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - देही-अभिमानी बन बाप को याद करो तो याद का बल जमा होगा, याद के बल से तुम सारे विश्व का राज्य ले सकते हो”

प्रश्नः-

कौन-सी बात तुम बच्चों के ख्याल-ख्वाब में भी नहीं थी, जो प्रैक्टिकल हुई है?

उत्तर:-

तुम्हारे ख्याल ख्वाब में भी नहीं था कि हम भगवान से राजयोग सीखकर विश्व के मालिक बनेंगे। राजाई के लिए पढ़ाई पढ़ेंगे। अभी तुम्हें अथाह खुशी है कि सर्वशक्तिमान बाप से बल लेकर हम सतयुगी स्वराज्य अधिकारी बनते हैं।

ओम् शान्ति। यहाँ बच्चियाँ बैठती हैं प्रैक्टिस के लिए। वास्तव में यहाँ (संदली पर) बैठना उनको चाहिए जो देही-अभिमानी बन बाप की याद में बैठे। अगर याद में नहीं बैठेंगी तो वह टीचर कहला नहीं सकती। याद में शक्ति रहती है, ज्ञान में शक्ति नहीं है। इसको कहा ही जाता है - याद का बल। योगबल संन्यासियों का अक्षर है। बाप डिफीकल्ट अक्षर काम में नहीं लाते। बाप कहते हैं बच्चों अब बाप को याद करो। जैसे छोटे बच्चे माँ-बाप को याद करते हैं ना। वह तो देहधारी हैं। तुम बच्चे हो विचित्र। यह चित्र यहाँ तुमको मिलता है। तुम रहने वाले विचित्र देश के हो। वहाँ चित्र रहता नहीं। पहले-पहले यह पक्का करना है - हम तो आत्मा हैं इसलिए बाप कहते हैं - बच्चे, देही-अभिमानी बनो, अपने को आत्मा निश्चय करो। तुम निर्वाण देश से आये हो। वह तुम सभी आत्माओं का घर है। यहाँ पार्ट बजाने आते हो। पहले-पहले कौन आते हैं? यह भी तुम्हारी बुद्धि में है। दुनिया में कोई नहीं जिसको यह ज्ञान हो। अब बाप कहते हैं शास्त्र आदि जो कुछ पढ़ते हो उन सबको भूल जाओ। कृष्ण की महिमा, फलाने की महिमा कितनी करते हैं। गांधी की भी कितनी महिमा करते हैं। जैसेकि वह रामराज्य स्थापन करके गये हैं। परन्तु शिव भगवानुवाच आदि सनातन राजा-रानी के राज्य का जो कायदा था, बाप ने राजयोग सिखाकर राजा-रानी बनाया, उस ईश्वरीय रस्म-रिवाज को भी तोड़ डाला। बोला राजाई नहीं चाहिए, हमको प्रजा का प्रजा पर राज्य चाहिए। अब उसकी क्या हालत हुई! दु:ख ही दु:ख, लड़ते-झगड़ते रहते हैं। अनेक मतें हो गई हैं। अभी तुम बच्चे श्रीमत पर राज्य लेते हो। इतनी तुम्हारे में ताकत रहती है जो वहाँ लश्कर आदि होता नहीं। डर की कोई बात नहीं। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, अद्वेत राज्य था। दो थे ही नहीं जो ताली बजे। उसको कहा ही जाता है - अद्वेत राज्य। तुम बच्चों को बाप देवता बनाते हैं। फिर द्वेत से दैत्य बन जाते हैं रावण द्वारा। अभी तुम बच्चे जानते हो हम भारतवासी सारे विश्व के मालिक थे। तुमको विश्व का राज्य सिर्फ याद बल से मिला था। अब फिर मिल रहा है। कल्प-कल्प मिलता है, सिर्फ याद के बल से। पढ़ाई में भी बल है। जैसे बैरिस्टर बनते हैं तो बल है ना। वह है पाई-पैसे का बल। तुम योगबल से विश्व पर राज्य करते हो। सर्वशक्तिमान बाप से बल मिलता है। तुम कहते हो - बाबा, हम कल्प-कल्प आपसे सतयुग का स्वराज्य लेते हैं फिर गँवाते हैं, फिर लेते हैं। तुमको पूरा ज्ञान मिला है। अभी हम श्रीमत पर श्रेष्ठ विश्व का राज्य लेते हैं। विश्व भी श्रेष्ठ बन जाता है। यह रचता और रचना का ज्ञान तुमको अभी है। इन लक्ष्मी-नारायण को भी ज्ञान नहीं होगा कि हमने राजाई कैसे ली! यहाँ तुम पढ़ते हो फिर जाकर राजाई करते हो। कोई अच्छे धनवान के घर में जन्म लेते हैं तो कहा जाता है ना इसने आगे जन्म में अच्छा कर्म किया है, दान-पुण्य किया है। जैसा कर्म ऐसा जन्म मिलता है। अभी तो यह है ही रावण राज्य। यहाँ जो भी कर्म करते हैं वह विकर्म होता है। सीढ़ी उतरनी ही है। सबसे बड़े ऊंच से ऊंच देवी-देवता धर्म वालों को भी सीढ़ी उतरनी है। सतो, रजो, तमो में आना है। हर एक चीज़ नई से फिर पुरानी होती है। तो अभी तुम बच्चों को अथाह खुशी होनी चाहिए। तुम्हारे ख्याल-ख्वाब (संकल्प-स्वप्न) में भी नहीं था कि हम विश्व के मालिक बनते हैं।

भारतवासी जानते हैं कि इन लक्ष्मी-नारायण का सारे विश्व पर राज्य था। पूज्य थे सो फिर पुजारी बने हैं। गाया भी जाता है आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। अब तुम्हारी बुद्धि में यह होना चाहिए। यह नाटक तो बड़ा वन्डरफुल है। कैसे हम 84 जन्म लेते हैं, उनको कोई नहीं जानते। शास्त्रों में 84 लाख जन्म लगा देते हैं। बाप कहते हैं यह सब भक्ति मार्ग के गपोड़े हैं। रावण राज्य है ना। राम राज्य और रावण राज्य कैसे होता है, यह तुम बच्चों के सिवाए और कोई की बुद्धि में नहीं है। रावण को हर वर्ष जलाते हैं, तो दुश्मन है ना। 5 विकार मनुष्य के दुश्मन हैं। रावण है कौन, क्यों जलाते हैं - कोई भी नहीं जानते। जो अपने को संगमयुगी समझते हैं उनकी स्मृति में रहता है कि अभी हम पुरूषोत्तम बन रहे हैं। भगवान हमको राजयोग सिखलाकर नर से नारायण, भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी बनाते हैं। तुम बच्चे जानते हो हमको ऊंच ते ऊंच निराकार भगवान पढ़ाते हैं। कितनी अथाह खुशी होनी चाहिए। स्कूल में स्टूडेन्ट की बुद्धि में रहता है ना - हम स्टूडेन्ट हैं। वह तो है कॉमन टीचर, पढ़ाने वाला। यहाँ तो तुमको भगवान पढ़ाते हैं। जब पढ़ाई से इतना ऊंच पद मिलता है तो कितना अच्छा पढ़ना चाहिए। है बहुत इज़ी सिर्फ सवेरे आधा-पौना घण्टा पढ़ना है। सारा दिन धन्धे आदि में याद भूल जाती है इसलिए यहाँ सवेरे आकर याद में बैठते हैं। कहा जाता है बाबा को बहुत प्रेम से याद करो - बाबा, आप हमको पढ़ाने आये हैं, अभी हमको पता पड़ा है कि आप 5 हज़ार वर्ष बाद आकर पढ़ाते हैं। बाबा के पास बच्चे आते हैं तो बाबा पूछते हैं आगे कब मिले हो? ऐसा प्रश्न कोई भी साधू-संन्यासी आदि कभी पूछ न सके। वहाँ तो सतसंग में जो चाहे जाकर बैठते हैं। बहुतों को देखकर सब अन्दर घुस जाते हैं। तुम भी अभी समझते हो - हम गीता, रामायण आदि कितना खुशी से जाकर सुनते थे। समझते तो कुछ नहीं थे। वह सब भक्ति की ही खुशी है। बहुत खुशी में नाचते रहते हैं। परन्तु फिर नीचे उतरते आते हैं। किस्म-किस्म के हठयोग आदि करते हैं। तन्दुरूस्ती के लिए ही सब करते हैं। तो बाप समझाते हैं यह सब है भक्ति मार्ग की रस्म-रिवाज। रचता और रचना को कोई भी नहीं जानते। तो बाकी रहा ही क्या। रचता रचना को जानने से तुम क्या बनते हो और न जानने से तुम क्या बन पड़ते हो? तुम जानने से सालवेन्ट बनते हो, न जानने से वही भारतवासी इनसालवेन्ट बन पड़े हैं। गपोड़े मारते रहते हैं। क्या-क्या दुनिया में होता रहता है। कितने पैसे, सोना आदि लूटते हैं! अब तुम बच्चे जानते हो - वहाँ तो हम सोने के महल बनायेंगे। बैरिस्टरी आदि पढ़ते हैं तो अन्दर में रहता है ना - हम यह इम्तहान पास कर फिर यह करेंगे, घर बनायेंगे। तुमको क्यों नहीं बुद्धि में आता है हम स्वर्ग का प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने के लिए पढ़ रहे हैं। खुशी कितनी रहनी चाहिए। परन्तु बाहर जाने से ही खुशी गुम हो जाती है। छोटी-छोटी बच्चियाँ इस ज्ञान में लग जाती हैं। सम्बन्धी कुछ भी समझते नहीं, कह देते जादू है। कहते हैं हम पढ़ने नहीं देंगे। इस हालत में जब तक सगीर हैं तो माँ-बाप का कहना मानना पड़े। हम ले नहीं सकते। बहुत खिट-पिट हो पड़ती है। शुरू में कितनी खिटपिट हुई। बच्ची कहे हम 18 वर्ष की हैं, बाप कहे नहीं, 16 वर्ष की है, सगीर है, झगड़ा कर पकड़ ले जाते थे। सगीर माना ही बाप के हुक्म में चलना है। बालिग है फिर जो चाहे सो करे। कायदे भी हैं ना। बाबा कहते तुम जब बाप के पास आते हो तो कायदा है अपने लौकिक बाप का सर्टीफिकेट (चिट्ठी) लेकर आओ। फिर मैनर्स भी देखने होते हैं। मैनर्स ठीक नहीं हैं तो वापिस जाना पड़ेगा। खेल में भी ऐसे होता है। ठीक नहीं खेलते तो उनको कहेंगे बाहर जाओ। आबरू (इज्जत) गँवाते हो। अभी तुम बच्चे जानते हो हम युद्ध के मैदान में हैं। कल्प-कल्प बाप आकर हमको माया पर जीत पहनाते हैं। मूल बात ही है पावन बनने की। पतित बने हैं विकार से। बाप कहते हैं काम महाशत्रु है। यह आदि-मध्य-अन्त दु:ख देने वाला है। जो ब्राह्मण बनेंगे वही फिर देवी-देवता धर्म में आयेंगे। ब्राह्मणों में भी नम्बरवार होते हैं। शमा पर परवाने आते हैं। कोई तो जल मरते हैं, कोई फेरी पहनकर चले जाते हैं। यहाँ भी आये हैं, कोई तो एकदम फिदा होते हैं, कोई सुनकर फिर चले जाते हैं। आगे तो ब्लड से भी लिखकर देते थे - बाबा, हम आपके हैं। फिर भी माया हरा लेती है। इतनी माया की युद्ध चलती है, इनको ही युद्ध स्थल कहा जाता है। यह भी तुम समझते हो। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों-शास्त्रों का सार समझाते हैं। चित्र तो ढेर बना दिये हैं ना। नारद का भी मिसाल इस समय का है। सब कहते हैं - हम लक्ष्मी अथवा नारायण बनेंगे। बाप कहते हैं अपने अन्दर में देखो - हम लायक हैं? हमारे में कोई विकार तो नहीं हैं? नारद भक्त तो सब हैं ना। यह एक मिसाल लिखा है।

भक्ति मार्ग वाले कहते हैं हम श्री लक्ष्मी को वर सकते हैं? बाप कहते हैं कि नहीं, जब ज्ञान सुनें तब सद्गति को पा सकें। मैं पतित-पावन ही सबकी सद्गति करने वाला हूँ। अभी तुम समझते हो बाप हमको रावण राज्य से लिबरेट कर रहे हैं। वह है जिस्मानी यात्रा। भगवानुवाच - मनमनाभव। बस, इसमें धक्के खाने की बात नहीं। वह सब हैं भक्ति मार्ग के धक्के। आधाकल्प ब्रह्मा का दिन, आधाकल्प है ब्रह्मा की रात। तुम समझते हो हम सब बी.के. का अभी आधाकल्प दिन होगा। हम सुखधाम में होंगे। वहाँ भक्ति नहीं होगी। अभी तुम बच्चे जानते हो हम सबसे साहूकार बनते हैं, तो कितनी खुशी होनी चाहिए। तुम सब पहले रफ पत्थर थे, अब बाप सीरान (धार) पर चढ़ा रहे हैं। बाबा जौहरी भी है ना। ड्रामा अनुसार बाबा ने रथ भी अनुभवी लिया है। गायन भी है गांव का छोरा। कृष्ण गांव का छोरा कैसे हो सकता है। वह तो सतयुग में था। उनको तो झूलों में झुलाते हैं। ताज पहनाते हैं फिर गांव का छोरा क्यों कहते? गांव के छोरे श्याम ठहरे। अभी सुन्दर बनने आये हो। बाप ज्ञान की सीरान पर चढ़ाते हैं ना। यह सत का संग कल्प-कल्प, कल्प में एक ही बार मिलता है। बाकी सब हैं झूठ संग इसलिए बाप कहते हैं हियर नो ईविल.... ऐसी बातें मत सुनो जहाँ हमारी और तुम्हारी ग्लानि करते रहते हैं।

जो कुमारियाँ ज्ञान में आती हैं वह तो कह सकती हैं कि हमारा बाप की प्रापर्टी में हिस्सा है। क्यों न हम उनसे भारत की सेवा अर्थ सेन्टर खोलूँ। कन्या दान तो देना ही है। वह हिस्सा हमको दो तो हम सेन्टर खोलें। बहुतों का कल्याण होगा। ऐसी युक्ति रचनी चाहिए। यह है तुम्हारी ईश्वरीय मिशन। तुम पत्थरबुद्धि को पारसबुद्धि बनाते हो। जो हमारे धर्म के होंगे वह आयेंगे। एक ही घर में देवी-देवता धर्म का फूल निकल आयेगा। बाकी नहीं आयेंगे। मेहनत लगती है ना। बाप सभी आत्माओं को पावन बनाकर सबको ले जाते हैं इसलिए बाबा ने समझाया था - संगम के चित्र पर ले जाओ। इस तरफ है कलियुग, उस तरफ है सतयुग। सतयुग में हैं देवतायें, कलियुग में हैं असुर। इसको कहा जाता है पुरूषोत्तम संगमयुग। बाप ही पुरूषोत्तम बनाते हैं। जो पढ़ेंगे वह सतयुग में आयेंगे, बाकी सब मुक्तिधाम में चले जायेंगे। फिर अपने-अपने समय पर आयेंगे। यह गोले का चित्र बड़ा अच्छा है। बच्चों को सर्विस का शौक होना चाहिए। हम ऐसी-ऐसी सर्विस कर, गरीबों का उद्धार कर उनको स्वर्ग का मालिक बनायेंगे। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने आपको देखना है हम श्री लक्ष्मी, श्री नारायण समान बन सकते हैं? हमारे में कोई विकार तो नहीं है? फेरी लगाने वाले परवाने हैं या फिदा होने वाले? ऐसे मैनर्स तो नहीं हैं जो बाप की आबरू (इज्जत) जाये।

2) अथाह खुशी में रहने के लिए - सवेरे-सवेरे प्रेम से बाप को याद करना है और पढ़ाई पढ़नी है। भगवान हमें पढ़ाकर पुरूषोत्तम बना रहे हैं, हम संगमयुगी हैं, इस नशे में रहना है।

वरदान:-

रूहानी शक्ति को हर कर्म में यूज़ करने वाले युक्तियुक्त जीवनमुक्त भव

इस ब्राह्मण जीवन की विशेषता है ही रूहानियत। रूहानियत की शक्ति से ही स्वयं को वा सर्व को परिवर्तन कर सकते हो। इस शक्ति से अनेक प्रकार के जिस्मानी बन्धनों से मुक्ति मिलती है। लेकिन युक्तियुक्त बन हर कर्म में लूज़ होने के बजाए, रूहानी शक्ति को यूज़ करो। मन्सा-वाचा और कर्मणा तीनों में साथ-साथ रूहानियत की शक्ति का अनुभव हो। जो तीनों में युक्तियुक्त हैं वो ही जीवनमुक्त हैं।

स्लोगन:-

सत्यता की विशेषता द्वारा खुशी और शक्ति की अनुभूति करते चलो।

27-05-2020

27-05-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - निश्चय ज्ञान योग से बैठता, साक्षात्कार से नहीं। साक्षात्कार की ड्रामा में नूँध है, बाकी उससे किसी का कल्याण नहीं होता”

प्रश्नः-

बाप कौन-सी ताकत नहीं दिखाते लेकिन बाप के पास जादूगरी अवश्य है?

उत्तर:-

मनुष्य समझते हैं भगवान तो ताकतमंद है, वह मरे हुए को भी जिंदा कर सकते हैं, परन्तु बाबा कहते यह ताकत मैं नहीं दिखाता। बाकी कोई नौधा भक्ति करते हैं तो उन्हें साक्षात्कार करा देता हूँ। यह भी ड्रामा में नूँध है। साक्षात्कार कराने की जादूगरी बाप के पास है इसलिए कई बच्चों को घर बैठे भी ब्रह्मा वा श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हो जाता है।

गीत:-

कौन आया मेरे मन के द्वारे............

ओम् शान्ति। यह बच्चों के अनुभव का गीत है। सतसंग तो बहुत हैं, खास भारत में तो ढेर सतसंग हैं, अनेक मत-मतान्तर हैं, वास्तव में वह कोई सतसंग नहीं। सतसंग एक होता है। बाकी तुम वहाँ किसी विद्वान, आचार्य, पण्डित का मुँह देखेंगे, बुद्धि उस तरफ जायेगी। यहाँ फिर अनोखी बात है। यह सतसंग एक ही बार इस संगमयुग पर होता है। यह तो बिल्कुल नई बात है, उस बेहद के बाप का शरीर तो कोई है नहीं। कहते हैं मैं तुम्हारा निराकार शिवबाबा हूँ। तुम और सतसंगों में जाते हो तो शरीरों को ही देखते हो। शास्त्र याद कर फिर सुनाते हैं, अनेक प्रकार के शास्त्र हैं, वह तो तुम जन्म-जन्मान्तर सुनते आये हो। अब है नई बात। बुद्धि से आत्मा जानती है, बाप कहते हैं - हे मेरे सिकीलधे बच्चे, हे मेरे सालिग्रामों! तुम बच्चे जानते हो 5 हज़ार वर्ष पहले इस शरीर द्वारा बाबा ने पढ़ाया था। तुम्हारी बुद्धि एकदम दूर चली जाती है। तो बाबा आया है। बाबा अक्षर कितना मीठा है। वह है मात-पिता। कोई भी सुनेंगे तो कहेंगे पता नहीं इन्हों के मात-पिता कौन हैं? बरोबर वह साक्षात्कार कराते हैं तो उसमें भी वह मूँझते हैं। कभी ब्रह्मा को, कभी कृष्ण को देख लेते हैं। तो विचार करते रहते कि ये क्या है? ब्रह्मा का भी बहुतों को घर बैठे साक्षात्कार होता है। अब ब्रह्मा की तो कभी कोई पूजा करते नहीं हैं। कृष्ण आदि की तो करते हैं। ब्रह्मा को तो कोई जानते भी नहीं होंगे। प्रजापिता ब्रह्मा तो अब आया है, यह है प्रजापिता। बाप बैठ समझाते हैं कि सारी दुनिया पतित है तो जरूर यह भी बहुत जन्मों के अन्त में पतित ठहरे। कोई भी पावन नहीं है इसलिए कुम्भ के मेले पर, हरिद्वार गंगा सागर के मेले पर जाते हैं, समझते हैं स्नान करने से पावन बन जायेंगे। लेकिन यह नदियाँ कोई पतित-पावनी थोड़ेही हो सकती। नदियाँ तो निकलती हैं सागर से। वास्तव में तुम हो ज्ञान गंगायें, महत्व तुम्हारा है। तुम ज्ञान गंगायें जहाँ तहाँ निकलती हो, वो लोग फिर दिखलाते हैं, तीर मारा और गंगा निकली। तीर मारने की तो बात नहीं। यह ज्ञान गंगायें देश-देशान्तर जाती हैं।

शिवबाबा कहते मैं ड्रामा के बन्धन में बांधा हुआ हूँ। सभी का पार्ट निश्चित किया हुआ है। मेरा भी पार्ट निश्चित है। कोई समझते भगवान तो बहुत ताकतमंद है, मरे हुए को भी जिंदा कर सकते हैं। यह सभी गपोड़े हैं। मैं आता हूँ पढ़ाने के लिए। बाकी ताकत क्या दिखायेंगे। साक्षात्कार की भी जादूगरी है। नौधा भक्ति करते हैं तो मैं साक्षात्कार कराता हूँ। जैसे काली का रूप दिखलाते हैं, उन पर फिर तेल चढ़ाते हैं। अब ऐसी काली तो है नहीं, परन्तु काली की नौधा भक्ति बहुत करते हैं। वास्तव में काली तो जगत अम्बा है। काली का ऐसा रूप तो नहीं, परन्तु नौधा भक्ति करने से बाबा भावना का भाड़ा दे देते हैं। काम चिता पर बैठने से काले बने, अब ज्ञान चिता पर बैठ गोरे बनते हैं। जो काली अब जगदम्बा बनी है वह साक्षात्कार कैसे करायेगी। वह तो अभी बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्त वाले जन्म में है। देवतायें तो अभी हैं नहीं। तो वह क्या साक्षात्कार करायेंगे। बाप समझाते हैं यह साक्षात्कार की चाबी मेरे हाथ में है। अल्पकाल के लिए भावना पूरी करने के लिए साक्षात्कार करा देता हूँ। परन्तु वह कोई मेरे से नहीं मिलते। मिसाल एक काली का देते हैं। इस रीति बहुत हैं - हनुमान, गणेश आदि। भल सिक्ख लोग भी गुरूनानक की बहुत भक्ति करें तो उन्हें भी साक्षात्कार हो जायेगा। परन्तु वह तो नीचे चले आते हैं। बाबा बच्चों को दिखलाते हैं देखो यह गुरूनानक की भक्ति कर रहे हैं। साक्षात्कार फिर भी मैं कराता हूँ। वह कैसे साक्षात्कार करायेंगे। उनके पास साक्षात्कार कराने की चाबी नहीं है। यह बाबा कहते हैं मुझे विनाश, स्थापना का साक्षात्कार भी उस बाबा ने कराया, परन्तु साक्षात्कार से कोई का भी कल्याण नहीं। ऐसे तो बहुतों को साक्षात्कार होते थे। आज वह हैं नहीं। बहुत बच्चे कहते हैं हमको जब साक्षात्कार हो तो निश्चय बैठे। परन्तु निश्चय साक्षात्कार से नहीं हो सकता। निश्चय बैठता है ज्ञान और योग से। 5 हज़ार वर्ष पहले भी मैंने कहा था कि यह साक्षात्कार मैं कराता हूँ। मीरा ने भी साक्षात्कार किया। ऐसे नहीं कि आत्मा वहाँ चली गई। नहीं, बैठे-बैठे साक्षात्कार कर लेते हैं लेकिन मेरे को नहीं प्राप्त कर सकते।

बाप कहते हैं कोई भी बात का संशय हो तो जो भी ब्राह्मणियाँ (टीचर्स) हैं, उनसे पूछो। यह तो जानते हो बच्चियाँ भी नम्बरवार हैं, नदियाँ भी नम्बरवार होती हैं। कोई तो तलाव भी हैं, बहुत गंदा, बांसी पानी होता है। वहाँ भी श्रद्धाभाव से मनुष्य जाते हैं। वह है भक्ति की अन्धश्रद्धा। कभी भी कोई से भक्ति छुड़ानी नहीं है। जब ज्ञान में आ जायेंगे तो भक्ति आपेही छूट जायेगी। बाबा भी नारायण का भक्त था, चित्र में देखा लक्ष्मी दासी बन नारायण के पांव दबा रही है तो यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। सतयुग में ऐसा होता नहीं। तो मैंने एक आर्टिस्ट को कहा कि लक्ष्मी को इस दासीपने से विदाई दे दो। बाबा भक्त तो था परन्तु ज्ञान थोड़ेही था। भक्त तो सभी हैं। हम तो बाबा के बच्चे मालिक हैं। ब्रह्माण्ड का भी मालिक बच्चों को बनाते हैं। कहते हैं तुमको राज्य-भाग्य देता हूँ। ऐसा बाबा कभी देखा? उस बाप को पूरा याद करना है। उनको तुम इन आंखों से नहीं देख सकते। उनसे योग लगाना है। याद और ज्ञान भी बिल्कुल सहज है। बीज और झाड़ को जानना है। तुम उस निराकारी झाड़ से साकारी झाड़ में आये हो। बाबा ने साक्षात्कार का राज़ भी समझाया। झाड़ का राज़ भी समझाया। कर्म-अकर्म-विकर्म की गति भी बाबा ने समझाई है। बाप, टीचर, गुरू तीनों से ही शिक्षा मिलती है। अभी बाबा कहते हैं मैं तुमको ऐसी शिक्षा देता हूँ, ऐसे कर्म सिखलाता हूँ जो तुम 21 जन्म सदा सुखी बन जाते हो। टीचर शिक्षा देते हैं ना। गुरू लोग भी पवित्रता की शिक्षा देते हैं अथवा कथायें सुनाते हैं। परन्तु धारणा बिल्कुल नहीं होती। यहाँ तो बाप कहते हैं अन्त मति सो गति होगी। मनुष्य जब मरते हैं तो भी कहते हैं राम-राम कहो तो बुद्धि उस तरफ चली जाती है। अभी बाप कहते हैं तुम्हारा साकार से योग छूटा। अब मैं तुमको बहुत अच्छे कर्म सिखलाता हूँ। श्री कृष्ण का चित्र देखो, पुरानी दुनिया को लात मारते और नई दुनिया में आते हैं। तुम भी पुरानी दुनिया को लात मार नई दुनिया में जाते हो। तो तुम्हारी नर्क के तरफ है लात, स्वर्ग तरफ है मुँह। शमशान में भी अन्दर जब घुसते हैं तो मुर्दे का मुँह उस तरफ कर लेते हैं। लात पिछाड़ी तरफ कर लेते हैं। तो यह चित्र भी ऐसा बनाया है।

मम्मा, बाबा और तुम बच्चे, तुमको तो मम्मा-बाबा को फालो करना पड़े, जो उनकी गद्दी पर बैठो। राजा के बच्चे प्रिन्स-प्रिन्सेज कहलाते हैं ना। तुम जानते हो हम भविष्य में प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हैं। ऐसा कोई बाप-टीचर-गुरू होगा जो तुमको ऐसे कर्म सिखलाये! तुम सदाकाल के लिए सुखी बनते हो। यह शिवबाबा का वर है, वह आशीर्वाद करते हैं। यह नहीं, हमारे ऊपर उनकी कृपा है। सिर्फ कहने से कुछ नहीं होगा। तुमको सीखना होता है। सिर्फ आशीर्वाद से तुम नहीं बन जायेंगे। उसकी मत पर चलना है। ज्ञान और योग की धारणा करनी है। बाप समझाते हैं कि मुख से राम-राम कहना भी आवाज़ हो जाता। तुमको तो वाणी से परे जाना है। चुप रहना है। खेल भी बहुत अच्छे-अच्छे निकलते हैं। अनपढ़े को बुद्धू कहा जाता है। बाबा कहते हैं कि अब सभी को भूल कर तुम बिल्कुल बुद्धू बन जाओ। मैं जो तुमको मत देता हूँ उस पर चलो। परमधाम में तुम सभी आत्मायें बिना शरीर के रहती हो फिर यहाँ आकर शरीर लेती हो तब जीव आत्मा कहा जाता है। आत्मा कहती है मैं एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हूँ। तो बाप कहते मैं तुमको फर्स्टक्लास कर्म सिखलाता हूँ। टीचर पढ़ाते हैं, इसमें ताकत की क्या बात है। साक्षात्कार कराते हैं, इसको जादूगरी कहा जाता है। मनुष्य से देवता बनाना, ऐसी जादूगरी कोई कर न सके। बाबा सौदागर भी है, पुराना लेकर नया देते हैं। इनको पुराना लोहे का बर्तन कहा जाता है। इनका कोई मूल्य नहीं है। आजकल देखो तांबे के भी पैसे नहीं बनते। वहाँ तो सोने के सिक्के होते हैं। वन्डर है ना। क्या से क्या हो गया है!

बाप कहते हैं मैं तुमको नम्बरवन कर्म सिखलाता हूँ। मनमनाभव हो जाओ। फिर है पढ़ाई जिससे स्वर्ग का प्रिन्स बनेंगे। अभी देवता धर्म जो प्राय:लोप हो गया है, वह फिर से स्थापन होता है। मनुष्य तुम्हारी नई बातें सुनकर वन्डर खाते हैं, कहते हैं कि स्त्री-पुरूष दोनों ही इकट्ठे रह पवित्र रह सकें - यह कैसे हो सकता! बाबा तो कहते भल इकट्ठे रहो, नहीं तो मालूम कैसे पड़े। बीच में ज्ञान तलवार रखनी है, इतनी बहादुरी दिखानी है। परीक्षा होती है। तो मनुष्य इन बातों में वन्डर खाते हैं क्योंकि शास्त्रों में तो ऐसी बातें हैं नहीं। यहाँ तो प्रैक्टिकल में मेहनत करनी पड़ती है। गन्धर्वी विवाह की बात यहाँ की है। अभी तुम पवित्र बनते हो। तो बाबा कहते बहादुरी दिखलाओ। संन्यासियों के आगे सबूत देना है। समर्थ बाबा ही सारी दुनिया को पावन बनाते हैं। बाप कहते हैं भल साथ में रहो सिर्फ नंगन नहीं होना है। यह सभी हैं युक्तियां। बड़ी जबरदस्त प्राप्ति है सिर्फ एक जन्म बाबा के डायरेक्शन पर पवित्र रहना है। योग और ज्ञान से एवरहेल्दी बनते हैं 21 जन्मों के लिए, इसमें मेहनत है ना। तुम हो शक्ति सेना। माया पर जीत पहन जगतजीत बनते हो। सभी थोड़ेही बनेंगे। जो बच्चे पुरूषार्थ करेंगे वही ऊंच पद पायेंगे। तुम भारत को ही पवित्र बनाकर फिर भारत पर ही राज्य करते हो। लड़ाई से कभी सृष्टि की बादशाही मिल न सके। यह वन्डर है ना। इस समय सब आपस में लड़कर खलास हो जाते हैं। मक्खन भारत को मिलता है। दिलाने वाली हैं वन्दे मातरम्। मैजारटी माताओं की है। अब बाबा कहते हैं जन्म-जन्मान्तर तुम गुरू करते आये, शास्त्र पढ़ते आये हो। अब हम तुमको समझाते हैं - जज योर सेल्फ, राइट क्या है? सतयुग है राइटियस दुनिया। माया अनराइटियस बनाती है। अब भारतवासी, इरिलीजस बन पड़े हैं। रिलीजन नहीं इसलिए माइट नहीं रही है। इरिलीजस, अनराइटियस, अनलॉफुल, इनसालवेन्ट बन पड़े हैं। बेहद का बाप है इसलिए बेहद की बातें समझाते हैं, कहते हैं कि फिर तुमको रिलीजस मोस्ट पावरफुल बनाता हूँ। स्वर्ग बनाना तो पावरफुल का काम है। परन्तु है गुप्त। इनकागनीटो वारियर्स हैं। बाप का बच्चों पर बहुत प्यार होता है। मत देते हैं। बाप की मत, टीचर की मत, गुरू की मत, सोनार की मत, धोबी की मत - इसमें सभी मतें आ जाती हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस एक अन्तिम जन्म में बाप के डायरेक्शन पर चल घर गृहस्थ में रहते पवित्र रहना है। इसमें बहादुरी दिखानी है।

2) श्रीमत पर सदा श्रेष्ठ कर्म करने हैं। वाणी से परे जाना है, जो कुछ पढ़ा वा सुना है उसे भूल बाप को याद करना है।

वरदान:-

शुभ चिंतन द्वारा ज्ञान सागर में समाने वाले अतीन्द्रिय सुख के अनुभवी भव

जैसे सागर के अन्दर रहने वाले जीव जन्तु सागर में समाये हुए होते हैं, बाहर नहीं निकलना चाहते, मछली भी पानी के अन्दर रहती है, सागर व पानी ही उसका संसार है। ऐसे आप बच्चे भी शुभ चिंतन द्वारा ज्ञान सागर बाप में सदा समाये रहो, जब तक सागर में समाने का अनुभव नहीं किया तब तक अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने का, सदा हर्षित रहने का अनुभव नहीं कर सकेंगे। इसके लिए स्वयं को एकान्तवासी बनाओ अर्थात् सर्व आकर्षण के वायब्रेशन से अन्तर्मुखी बनो।

स्लोगन:-

अपने चेहरे को ऐसा चलता फिरता म्यूज़ियम बनाओ जिसमें बाप बिन्दु दिखाई दे।

25-05-2020

25-05-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - याद में रहने की मेहनत करो तो पावन बनते जायेंगे, अभी बाप तुम्हें पढ़ा रहे हैं फिर साथ में ले जायेंगे।”

प्रश्नः-

कौन-सा पैगाम तुम्हें सभी को देना है?

उत्तर:-

अब घर चलना है इसलिए पावन बनो। पतित-पावन बाप कहते हैं मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे, यह पैगाम सभी को दो। बाप ने अपना परिचय तुम बच्चों को दिया है, अब तुम्हारा कर्तव्य है बाप का शो करना। कहा भी जाता सन शोज़ फादर।

गीत:-

मरना तेरी गली में..........

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत का अर्थ सुना कि बाबा हम आपकी रुद्र माला में पिरो ही जायेंगे। यह गीत तो भक्ति मार्ग के बने हुए हैं, जो भी दुनिया में सामग्री है, जप-तप, पूजा-पाठ यह सब है भक्ति मार्ग। भक्ति रावण राज्य, ज्ञान रामराज्य। ज्ञान को कहा जाता है नॉलेज, पढ़ाई। भक्ति को पढ़ाई नहीं कहा जाता। उसमें कोई उद्देश्य नहीं कि हम क्या बनेंगे, भक्ति पढ़ाई नहीं है। राजयोग सीखना यह पढ़ाई है, पढ़ाई एक जगह स्कूल में पढ़ी जाती है। भक्ति में तो दर-दर धक्के खाते हैं। पढ़ाई माना पढ़ाई। तो पढ़ाई पूरी रीति पढ़नी चाहिए। बच्चे जानते हैं हम स्टूडेन्ट हैं। बहुत हैं जो अपने को स्टूडेन्ट नहीं समझते हैं, क्योंकि पढ़ते ही नहीं हैं। न बाप को बाप समझते हैं, न शिवबाबा को सद्गति दाता समझते हैं। ऐसे भी हैं बुद्धि में कुछ भी बैठता ही नहीं, राजधानी स्थापन होती है ना। उसमें सभी प्रकार के होते हैं। बाप आये ही हैं पतितों को पावन बनाने। बाप को बुलाते हैं - हे पतित-पावन आओ। अब बाप कहते हैं पावन बनो। बाप को याद करो। हर एक को पैगाम देना है बाप का। इस समय भारत ही वेश्यालय है। पहले भारत ही शिवालय था। अभी दोनों ताज़ नहीं हैं। यह भी तुम बच्चे ही जानते हो अब पतित-पावन बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम पतित से पावन बन जायेंगे। याद में ही मेहनत है। बहुत थोड़े हैं जो याद में रहते हैं। भक्त माला भी थोड़ों की है ना। धन्ना भगत, नारद, मीरा आदि का नाम है। इसमें भी सब तो नहीं आकर पढ़ेंगे। कल्प पहले जिन्होंने पढ़ा है, वही आते हैं। कहते भी हैं बाबा हम आपसे कल्प पहले भी मिले थे, पढ़ने अथवा याद की यात्रा सीखने। अभी बाप आये ही हैं तुम बच्चों को ले जाने। समझाते हैं तुम्हारी आत्मा पतित है इसलिए बुलाते हो कि आकर पावन बनाओ। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो, पवित्र बनो। बाप पढ़ाते हैं फिर साथ में भी ले जायेंगे। बच्चों को अन्दर बहुत खुशी होनी चाहिए। बाप पढ़ा रहे हैं, कृष्ण को बाप नहीं कहेंगे। कृष्ण को पतित-पावन नहीं कहेंगे। यह किसको भी पता नहीं कि बाप किसको कहा जाता है और फिर वह ज्ञान कैसे देते हैं। यह तुम ही जानते हो। बाप अपना परिचय बच्चों को ही देते हैं। नये-नये कोई से बाप नहीं मिल सकते। बाप कहेंगे सन शोज़ फादर। बच्चे ही बाप का शो करेंगे। बाप को कोई से भी मिलने, बात करने का नहीं है। भल इतना समय बाबा नये-नये से मिलते रहते हैं, ड्रामा में था, ढेर आते थे। मिलेट्री वालों के लिए भी बाबा ने समझाया है, उनका उद्धार करना है, उनको भी धंधा तो करना ही है। नहीं तो दुश्मन वार कर लेंगे। सिर्फ बाप को याद करना है। गीता में है जो युद्ध के मैदान में शरीर छोड़ेंगे, वह स्वर्ग में जायेंगे। परन्तु ऐसे तो जा न सकें। स्वर्ग स्थापन करने वाला भी जब आये तब ही जायेंगे। स्वर्ग क्या चीज़ है, यह भी कोई नहीं जानते हैं। अभी तुम बच्चे 5 विकारों रूपी रावण से युद्ध करते हो, बाप कहते हैं अशरीरी भव। अपने को आत्मा निश्चय कर मुझे याद करो। और कोई ऐसे कह न सके।

सर्वशक्तिमान एक बाप के सिवाए कोई को कह नहीं सकते। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को नहीं कह सकते। ऑलमाइटी एक ही बाप है। वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी, ज्ञान का सागर एक बाप को ही कहा जाता है। यह जो साधु-सन्त आदि हैं वह हैं शास्त्रों की अथॉरिटी। भक्ति की भी अथॉरिटी नहीं कहेंगे। शास्त्रों की अथॉरिटी हैं, उन्हों का सारा मदार शास्त्रों पर है। समझते हैं भक्ति का फल भगवान को देना है। भक्ति कब शुरू हुई, कब पूरी होनी है, यह पता नहीं है। भक्त समझते हैं भक्ति से भगवान राज़ी होगा। भगवान से मिलने की इच्छा रहती है, परन्तु वह किसकी भक्ति से राज़ी होगा? जरूर उनकी ही भक्ति करेंगे तब तो राज़ी होगा ना। तुम शंकर की भक्ति करो तो बाप राज़ी कैसे होगा, क्या हनूमान की भक्ति करेंगे तो बाप राज़ी होगा? दीदार हो जाता है, बाकी मिलता कुछ नहीं है। बाप कहते हैं मैं भल साक्षात्कार कराता हूँ, परन्तु ऐसे नहीं कि मेरे साथ आकर मिलेंगे। नहीं, तुम मेरे साथ मिलते हो। भगत भक्ति करते हैं भगवान से मिलने के लिए। कहते हैं पता नहीं कि भगवान किस रूप में आकर मिले, इसलिए उसे कहा जाता है ब्लाइन्ड-फेथ। अभी तुम बाप से मिले हो। जानते हो वह निराकार बाप जब शरीर धारण करे तब ही अपना परिचय दे कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। 5 हज़ार वर्ष पहले भी तुमको राज्य-भाग्य दिया था फिर तुमको 84 जन्म लेने पड़े। यह सृष्टि चक्र फिरता रहता है। द्वापर के बाद ही दूसरे धर्म आते हैं, अपना-अपना धर्म आकर स्थापन करते हैं। इसमें कोई बड़ाई की बात नहीं है। बड़ाई किसकी भी नहीं है। ब्रह्मा की बड़ाई तब है जब बाप आकर प्रवेश करते हैं। नहीं तो यह धंधा करता था, इनको भी थोड़ेही पता था मेरे में भगवान आयेंगे। बाप ने प्रवेश कर समझाया है कि कैसे मैंने इनमें प्रवेश किया। कैसे इनको दिखाया - मेरा सो तुम्हारा, तुम्हारा सो मेरा, देख लो। तुम मेरे मददगार बनते हो - अपने तन-मन-धन से तो उनकी एवज में तुमको यह मिलेगा। बाप कहते हैं - मैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ, जो अपने जन्मों को नहीं जानते। परन्तु मैं कब आता हूँ, कैसे आता हूँ, यह किसको पता नहीं है। अभी तुम देखते हो साधारण तन में बाप आये हैं। इन द्वारा हमको ज्ञान और योग सिखला रहे हैं। ज्ञान तो बहुत सहज है। नर्क का फाटक बन्द हो स्वर्ग का फाटक कैसे खुलता है - यह भी तुम जानते हो। द्वापर में रावण राज्य शुरू होता है अर्थात् नर्क का द्वार खुलता है। नई और पुरानी दुनिया को आधा-आधा में रखा जाता है। तो अब बाप कहते हैं - मैं तुम बच्चों को पतित से पावन होने की युक्ति बताता हूँ। बाप को याद करो तो जन्म-जन्मान्तर के पाप नाश हो जाएं। इस जन्म के पाप भी बताने हैं। याद तो रहते हैं ना - क्या पाप किये हैं? क्या-क्या दान-पुण्य किया है? इसको अपने छोटेपन का पता है ना। कृष्ण का ही नाम है सांवरा और गोरा, श्याम सुन्दर। उनका अर्थ कभी कोई की बुद्धि में नहीं आयेगा। नाम श्याम-सुन्दर है तो चित्र में काला बना दिया है। रघुनाथ के मन्दिर में देखेंगे - वहाँ भी काला, हनूमान का मन्दिर देखो, तो सबको काला बना देते हैं। यह है ही पतित दुनिया। अभी तुम बच्चों को ओना (]िफा) है कि हम सांवरे से सुन्दर बनें। उसके लिए तुम बाप की याद में रहते हो। बाप कहते हैं यह अन्तिम जन्म है। मुझे याद करो तो पाप भस्म होंगे। जानते हैं बाप आये हैं ले जाने। तो जरूर शरीर यहाँ छोड़ेगे। शरीर सहित थोड़ेही ले जायेंगे। पतित आत्मायें भी जा न सकें। जरूर बाप पावन बनने की युक्ति बतायेंगे। तो कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हों। भक्ति मार्ग में है अन्धश्रद्धा। शिव काशी कहते हैं फिर कहते हैं शिव ने गंगा लाई, भागीरथ से गंगा निकली। अब पानी माथे से कैसे निकलेगा। भागीरथ कोई ऊपर पहाड़ पर बैठा है क्या, जिसकी जटाओं से गंगा आयेगी! पानी जो बरसता है, सागर से खींचते हैं, जो सारी दुनिया में पानी जाता है। नदियाँ तो सब तरफ हैं। पहाड़ों पर बर्फ जम जाती है, वह भी पानी आता रहता है। पहाड़ों के अन्दर गुफाओं में जो पानी रहता है, वह फिर कुओं में आता रहता है। वह भी बरसात के आधार पर है। बरसात न पड़े तो कुएं भी सूख जाते हैं।

कहते भी हैं बाबा हमको पावन बनाकर स्वर्ग में ले जाओ। आश ही स्वर्ग, कृष्णपुरी की है। विष्णुपुरी का किसको पता नहीं है। कृष्ण के मुरीद कहेंगे - जहाँ देखो कृष्ण ही कृष्ण है। अरे, जबकि परमात्मा सर्वव्यापी है तो क्यों नहीं कहते जिधर देखो परमात्मा ही परमात्मा है। परमात्मा के मुरीद फिर ऐसे कहते यह सब उनके ही रूप हैं। वही यह सारी लीला कर रहे हैं। भगवान ने रूप धरे हैं, लीला करने के लिए। तो जरूर अभी लीला करेंगे ना। परमात्मा की दुनिया स्वर्ग में देखो, वहाँ गंद की कोई बात नहीं होती। यहाँ तो गंद ही गंद है और फिर यहाँ कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है। परमात्मा ही सुख देते हैं। बच्चा आया सुख हुआ, मरा तो दु:ख होगा। अरे, भगवान ने तुमको चीज़ दी फिर ली तो इसमें तुमको रोने की क्या दरकार है! सतयुग में यह रोने आदि का दु:ख होता नहीं। मोहजीत राजा का दृष्टान्त दिखाया है। यह सब हैं झूठे दृष्टान्त। उनमें कोई सार नहीं है। सतयुग में ऋषि-मुनि होते नहीं। और यहाँ भी ऐसी बात हो नहीं सकती। ऐसा कोई मोहजीत राजा हो नहीं सकता। भगवानुवाच - यादव, कौरव, पाण्डव क्या करत भये? तुम्हारा बाप से योग है। बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों द्वारा भारत को स्वर्ग बनाता हूँ। अब जो पवित्र बनते हैं वह पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। कोई भी मिले उनको यह बोलो भगवान कहते हैं मामेकम् याद करो। मेरे से प्रीत लगाओ और कोई को याद न करो। यह है अव्यभिचारी याद। यहाँ कोई जल आदि नहीं चढ़ाना है। भक्ति मार्ग में यह धंधा आदि करते, याद करते थे ना। गुरू लोग भी कहते हैं, मुझे याद करो, अपने पति को याद नहीं करो। तुम बच्चों को कितनी बातें समझाते हैं। मूल बात है कि सभी को पैगाम दो - बाबा कहते हैं मामेकम् याद करो। बाबा माना ही भगवान। भगवान तो निराकार है। कृष्ण को सब भगवान नहीं कहेंगे। कृष्ण तो बच्चा है। शिवबाबा इसमें ना होता तो तुम होते क्या? शिवबाबा ने इन द्वारा तुमको एडाप्ट किया, अपना बनाया है। यह माता भी है, पिता भी है। माता तो साकार में चाहिए ना। वह तो है ही पिता। तो ऐसी-ऐसी बातें अच्छी रीति धारण करो।

तुम बच्चों को कभी भी किसी बात में मूंझना नहीं है। पढ़ाई को कभी नहीं छोड़ना। कई बच्चे संगदोष में आकर रूठकर अपनी पाठशाला खोल देते हैं। अगर आपस में लड़-झगड़कर जाए अपनी पाठशाला खोली तो मूर्खपना है, रूठते हैं तो पाठशाला खोलने के लायक ही नहीं हैं। वह देह-अभिमान तुम्हारा चलेगा ही नहीं क्योंकि बुद्धि में तो दुश्मनी है तो वह याद आयेगी। कुछ भी किसको समझा नहीं सकेंगे। ऐसे भी होता है, जिसको ज्ञान देते हैं वह तीखे चले जाते हैं, खुद गिर पड़ते हैं। खुद भी समझते हैं मेरे से उनकी अवस्था अच्छी है। पढ़ने वाला राजा बन जाए और पढ़ाने वाला दास-दासी बन जाते हैं, ऐसे-ऐसे भी हैं। पुरुषार्थ कर बाप के गले का हार बनना है। बाबा जीते जी मैं आपका बना हूँ। बाप की याद से ही बेड़ा पार होना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कभी किसी बात में मूँझना नहीं है। आपस में रूठकर पढ़ाई नहीं छोड़नी है। दुश्मनी बनाना भी देह अभिमान है। संगदोष से अपनी बहुत-बहुत सम्भाल करनी है। पावन बनना है, अपनी चलन से बाप का शो करना है।

2) प्रीत बुद्धि बन एक बाप की अव्यभिचारी याद में रहना है। तन-मन-धन से बाप के कार्य में मददगार बनना है।

वरदान:-

स्वयं को स्वयं ही परिवर्तन कर विश्व के आधारमूर्त बनने वाले श्रेष्ठ पद के अधिकारी भव

श्रेष्ठ पद पाने के लिए बापदादा की यही शिक्षा है कि बच्चे स्वयं को बदलो। स्वयं को बदलने के बजाए, परिस्थितियों को व अन्य आत्माओं का बदलने का सोचते हो या संकल्प आता है कि यह सैलवेशन मिले, सहयोग व सहारा मिले तो परिवर्तित हों - ऐसे किसी भी आधार पर परिवर्तन होने वाले की प्रालब्ध भी आधार पर ही रहेगी क्योंकि जितनों का आधार लेंगे उतना जमा का खाता शेयर्स में बंट जायेगा इसलिए सदा लक्ष्य रखो कि स्वयं को परिवर्तन होना है। मैं स्वयं विश्व का आधारमूर्त हूँ।

स्लोगन:-

संगठन में उमंग-उत्साह और श्रेष्ठ संकल्प से सफलता हुई पड़ी है।

26-05-2020

26-05-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - सदा इसी नशे में रहो कि हम संगमयुगी ब्राह्मण हैं, हम जानते हैं जिस बाबा को सब पुकार रहे हैं, वह हमारे सम्मुख है”

प्रश्नः-

जिन बच्चों का बुद्धियोग ठीक होगा, उन्हें कौन-सा साक्षात्कार होता रहेगा?

उत्तर:-

सतयुगी नई राजधानी में क्या-क्या होगा, कैसे हम स्कूल में पढ़ेंगे फिर राज्य चलायेंगे। यह सब साक्षात्कार जैसे-जैसे नज़दीक आते जायेंगे, होता रहेगा। परन्तु जिनका बुद्धियोग ठीक है, जो अपने शान्तिधाम और सुखधाम को याद करते हैं, धंधा धोरी करते भी एक बाप की याद में रहते हैं, उन्हें ही यह सब साक्षात्कार होंगे।

गीत:-

ओम नमो शिवाए ............

ओम् शान्ति। भक्ति मार्ग में और जो भी सतसंग होते हैं, उनमें तो सब गये होंगे। वहाँ या तो कहेंगे बोलो सब वाह गुरू या राम का नाम बतायेंगे। यहाँ बच्चों को कुछ कहने की भी जरूरत नहीं रहती। एक ही बार कह दिया है, घड़ी-घड़ी कहने की दरकार नहीं। बाप भी एक है, उनका कहना भी एक ही है। क्या कहते हैं? बच्चों मामेकम् याद करो। पहले सीखकर फिर आकर यहाँ बैठते हैं। हम जिस बाप के बच्चे हैं उनको याद करना है। यह भी तुमने अभी ब्रह्मा द्वारा जाना है कि हम सभी आत्माओं का बाप वह एक है। दुनिया यह नहीं जानती। तुम जानते हो हम सब उस बाप के बच्चे हैं, उनको सभी गॉड फादर कहते हैं। अब फादर कहते हैं मैं इस साधारण तन में तुमको पढ़ाने आता हूँ। तुम जानते हो बाबा इनमें आये हैं, हम उनके बने हैं। बाबा ही आकर पतित से पावन होने का रास्ता बताते हैं। यह सारा दिन बुद्धि में रहता है। यूँ शिवबाबा की सन्तान तो सब हैं परन्तु तुम जानते हो और कोई नहीं जानते हैं। तुम बच्चे समझते हो हम आत्मा हैं, हमको बाप ने फरमान किया है कि मुझे याद करो। मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। सब चिल्लाते रहते हैं कि पतित-पावन आओ, हम पतित बने हैं। यह देह नहीं कहती। आत्मा इस शरीर द्वारा कहती है। 84 जन्म भी आत्मा लेती है ना। यह बुद्धि में रहना चाहिए कि हम एक्टर्स हैं। बाबा ने हमको अब त्रिकालदर्शी बनाया है। आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान दिया है। बाप को ही सब बुलाते हैं ना। अभी भी वह कहेंगे, कहते रहते हैं कि आओ और तुम संगमयुगी ब्राह्मण कहते हो बाबा आया हुआ है। इस संगमयुग को भी तुम जानते हो, यह पुरूषोत्तम युग गाया जाता है। पुरूषोत्तम युग होता ही है कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि के बीच में। सतयुग में सत पुरूष, कलियुग में झूठे पुरूष रहते हैं। सतयुग में जो होकर गये हैं, उन्हों के चित्र हैं। सबसे पुराने ते पुराने यह चित्र हैं, इनसे पुराने चित्र कोई होते नहीं। ऐसे तो बहुत मनुष्य फालतू चित्र बैठ बनाते हैं। यह तुम जानते हो कौन-कौन होकर गये हैं। जैसे नीचे अम्बा का चित्र बनाया है अथवा काली का चित्र है, तो ऐसी भुजाओं वाली हो थोड़ेही सकती है। अम्बा को भी दो भुजायें होंगी ना। मनुष्य तो जाकर हाथ जोड़ते पूजा करते हैं। भक्ति मार्ग में अनेक प्रकार के चित्र बनाये हैं। मनुष्य के ऊपर ही भिन्न-भिन्न प्रकार की सजावट करते हैं तो रूप बदल जाता है। यह चित्र आदि वास्तव में कोई है नहीं। यह सब है भक्ति मार्ग। यहाँ तो मनुष्य लूले लंगड़े निकल पड़ते हैं। सतयुग में ऐसे नहीं होते। सतयुग को भी तुम जानते हो आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। यहाँ तो ड्रेस देखो हर एक की अपनी-अपनी कितनी वैराइटी है। वहाँ तो यथा राजा रानी तथा प्रजा होते हैं। जितना नज़दीक होते जायेंगे तो तुमको अपनी राजधानी की ड्रेस आदि का भी साक्षात्कार होता रहेगा। देखते रहेंगे हम ऐसे स्कूल में पढ़ते हैं, यह करते हैं। देखेंगे भी वह जिनका बुद्धियोग अच्छा है। अपने शान्तिधाम-सुखधाम को याद करते हैं। धंधाधोरी तो करना ही है। भक्ति मार्ग में भी धंधा आदि तो करते हैं ना। ज्ञान कुछ भी नहीं था। यह सब है भक्ति। उसको कहेंगे भक्ति का ज्ञान। वह यह ज्ञान दे न सकें कि तुम विश्व के मालिक कैसे बनेंगे। अभी तुम यहाँ पढ़कर भविष्य विश्व के मालिक बनते हो। तुम जानते हो यह पढ़ाई है ही नई दुनिया, अमरलोक के लिए। बाकी कोई अमरनाथ पर शंकर ने पार्वती को अमरकथा नहीं सुनाई है। वह तो शिव-शंकर को मिला देते हैं।

अभी बाप तुम बच्चों को समझा रहे हैं, यह भी सुनते हैं। बाप बिगर सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ कौन समझा सकेंगे। यह कोई साधू-सन्त आदि नहीं है। जैसे तुम गृहस्थ व्यवहार में रहते थे, वैसे यह भी। ड्रेस आदि सब वही है। जैसे घर में माँ बाप बच्चे होते हैं, फ़र्क कुछ नहीं है। बाप इस रथ पर सवार हो आते हैं बच्चों के पास। यह भाग्यशाली रथ गाया जाता है। कभी बैल पर सवारी भी दिखाते हैं। मनुष्यों ने उल्टा समझ लिया है। मन्दिर में कभी बैल हो सकता है क्या? कृष्ण तो है प्रिन्स, वह थोड़ेही बैल पर बैठेंगे। भक्ति मार्ग में मनुष्य बहुत मूंझे हुए हैं। मनुष्यों को है भक्ति मार्ग का नशा। तुमको है ज्ञान मार्ग का नशा। तुम कहते हो इस संगम पर बाबा हमको पढ़ा रहे हैं। तुम हो इस दुनिया में परन्तु बुद्धि से जानते हो हम ब्राह्मण संगमयुग पर हैं। बाकी सब मनुष्य कलियुग में हैं। यह अनुभव की बातें हैं। बुद्धि कहती है हम कलियुग से अब निकल आये हैं। बाबा आया हुआ है। यह पुरानी दुनिया ही बदलने वाली है। यह तुम्हारी बुद्धि में है, और कोई नहीं जानते। भल एक ही घर में रहने वाले हैं, एक ही परिवार के हैं, उसमें भी बाप कहेगा हम संगमयुगी हैं, बच्चा कहेगा नहीं, हम कलियुग में हैं। वन्डर है ना। बच्चे जानते हैं - हमारी पढ़ाई पूरी होगी तो विनाश होगा। विनाश होना जरूरी है। तुम्हारे में भी कोई जानते हैं, अगर यह समझें दुनिया विनाश होनी है तो नई दुनिया के लिए तैयारी में लग जाएं। बैग-बैगेज तैयार कर लें। बाकी थोड़ा समय है, बाबा के तो बन जायें। भूख मरेंगे तो भी पहले बाबा फिर बच्चे। यह तो बाबा का भण्डारा है। तुम शिवबाबा के भण्डारे से खाते हो। ब्राह्मण भोजन बनाते हैं इसलिए ब्रह्मा भोजन कहा जाता है। जो पवित्र ब्राह्मण हैं, याद में रहकर बनाते हैं, सिवाए ब्राह्मणों के शिवबाबा की याद में कोई रह नहीं सकते। वह ब्राह्मण थोड़ेही शिवबाबा की याद में रहते हैं। शिवबाबा का भण्डारा यह है, जहाँ ब्राह्मण भोजन बनाते हैं। ब्राह्मण योग में रहते हैं। पवित्र तो हैं ही। बाकी है योग की बात। इसमें ही मेहनत लगती है। गपोड़ा चल न सके। ऐसे कोई कह न सके कि मैं सम्पूर्ण योग में हूँ वा 80 परसेन्ट योग में हूँ। कोई भी कह न सके। ज्ञान भी चाहिए। तुम बच्चों में योगी वह है जो अपनी दृष्टि से ही किसी को शान्त कर दे। यह भी ताकत है। एकदम सन्नाटा हो जायेगा, जब तुम अशरीरी बन जाते हो फिर बाप की याद में रहते हो तो यही सच्ची याद है। फिर से यह प्रैक्टिस करनी है। जैसे तुम यहाँ याद में बैठते हो, यह प्रैक्टिस कराई जाती है। फिर भी सब कोई याद में रहते नहीं हैं। कहाँ-कहाँ बुद्धि भागती रहती है। तो वह फिर नुकसान कर लेते हैं। यहाँ संदली पर बिठाना उनको चाहिए जो समझें हम ड्रिल टीचर हैं। बाप की याद में सामने बैठे हैं। बुद्धियोग और कोई तरफ न जाये। सन्नाटा हो जायेगा। तुम अशरीरी बन जाते हो और बाप की याद में रहते हो। यह है सच्ची याद। सन्यासी भी शान्ति में बैठते हैं, वह किसकी याद में रहते हैं? वह कोई रीयल याद नहीं। कोई को फायदा नहीं दे सकेंगे। वह सृष्टि को शान्त नहीं कर सकते। बाप को जानते ही नहीं। ब्रह्म को ही भगवान समझते रहते। वह तो है नहीं। अभी तुमको श्रीमत मिलती है - मामेकम् याद करो। तुम जानते हो हम 84 जन्म लेते हैं। हर जन्म में थोड़ी-थोड़ी कला कम होती जाती है। जैसे चन्द्रमा की कला कम होती जाती है। देखने से इतना मालूम थोड़ेही पड़ता है। अभी कोई भी सम्पूर्ण नहीं बना है। आगे चल तुमको साक्षात्कार होंगे। आत्मा कितनी छोटी है। उनका भी साक्षात्कार हो सकता है। नहीं तो बच्चियां कैसे बताती हैं कि इनमें लाइट कम है, इनमें जास्ती है। दिव्यदृष्टि से ही आत्मा को देखती हैं। यह भी सभी ड्रामा में नूँध है। मेरे हाथ में कुछ नहीं है। ड्रामा मुझ से कराते हैं, यह सब ड्रामा अनुसार चलता रहता है। भोग आदि यह सब ड्रामा में नूँध है। सेकेण्ड बाई सेकेण्ड एक्ट होता है।

अभी बाप शिक्षा देते हैं कि पावन कैसे बनना है। बाप को याद करना है। कितनी छोटी आत्मा है जो पतित बनी है फिर पावन बननी है। वन्डरफुल बात है ना। कुदरत कहते हैं ना। बाप से तुम सब कुदरती बातें सुनते हो। सबसे कुदरती बात है - आत्मा और परमात्मा की, जो कोई नहीं जानते हैं। ऋषि मुनि आदि कोई भी नहीं जानते। इतनी छोटी आत्मा ही पत्थरबुद्धि फिर पारसबुद्धि बनती है। बुद्धि में यही चिन्तन चलता रहे कि हम आत्मा पत्थरबुद्धि बनी थी, अब फिर बाप को याद कर पारसबुद्धि बन रही हैं। लौकिक रीति तो बाप भी बड़ा फिर टीचर गुरू भी बड़े मिलते हैं। यह तो एक ही बिन्दी बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। सारा कल्प देहधारी को याद किया है। अब बाप कहते हैं - मामेकम् याद करो। तुम्हारी बुद्धि को कितना महीन बनाते हैं। विश्व का मालिक बनना - कोई कम बात है क्या! यह भी कोई ख्याल नहीं करते कि यह लक्ष्मी-नारायण सतयुग के मालिक कैसे बनें। तुम भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हो। नया कोई इन बातों को समझ न सके। पहले मोटे रूप से समझा फिर महीनता से समझाया जाता है। बाप है बिन्दी, वह फिर इतना बड़ा-बड़ा लिंग रूप बना देते हैं। मनुष्यों के भी बहुत बड़े-बड़े चित्र बनाते हैं। परन्तु ऐसे है नहीं। मनुष्यों के शरीर तो यही होते हैं। भक्ति मार्ग में क्या-क्या बैठ बनाया है। मनुष्य कितना मूँझे हुए हैं। बाप कहते हैं जो पास्ट हो गया वह फिर होगा। अभी तुम बाप की श्रीमत पर चलो। इनको भी बाबा ने श्रीमत दी, साक्षात्कार कराया ना। तुमको हम बादशाही देता हूँ, अब इस सर्विस में लग जाओ। अपना वर्सा लेने का पुरूषार्थ करो। यह सब छोड़ दो। तो यह भी निमित्त बना। सब तो ऐसे निमित्त नहीं बनते हैं, जिनको नशा चढ़ा तो आकर बैठ गये। हमको तो राजाई मिलती है। फिर यह पाई पैसे क्या करेंगे। तो अब बाप बच्चों को पुरूषार्थ कराते हैं, राजधानी स्थापन हो रही है, कहते भी हैं हम लक्ष्मी-नारायण से कम नहीं बनेंगे। तो श्रीमत पर चलकर दिखाओ। चूँ चां मत करो। बाबा ने थोड़ेही कहा - बाल बच्चों का क्या हाल होगा। एक्सीडेंट में अचानक कोई मर जाते हैं तो कोई भूखा रहता है क्या। कोई न कोई मित्र-सम्बन्धी आदि देते हैं खाने के लिए। यहाँ देखो बाबा पुरानी झोपड़ी में रहते हैं। तुम बच्चे आकर महलों में रहते हो। बाप कहेंगे बच्चे अच्छी रीति रहें, खायें, पियें। जो कुछ भी नहीं ले आये हैं उनको भी सब कुछ अच्छी रीति मिलता है। इस बाबा से भी अच्छी रीति रहते हैं। शिवबाबा कहते हैं हम तो हैं ही रमता योगी। कोई का भी कल्याण करने जा सकता हूँ। जो ज्ञानी बच्चे हैं वह कभी साक्षात्कार आदि की बातों में खुश नहीं होंगे। सिवाए योग के और कुछ भी नहीं। इन साक्षात्कार की बातों में खुश नहीं होना। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योग की ऐसी स्थिति बनानी है जो दृष्टि से ही किसी को शान्त कर दें। एकदम सन्नाटा हो जाए। इसके लिए अशरीरी बनने का अभ्यास करना है।

2) ज्ञान के सच्चे नशे में रहने के लिए याद रहे कि हम संगमयुगी हैं, अब यह पुरानी दुनिया बदलने वाली है, हम अपने घर जा रहे हैं। श्रीमत पर सदा चलते रहना है, चूँ चाँ नहीं करनी है।

वरदान:-

लक्ष्य के प्रमाण लक्षण के बैलेन्स की कला द्वारा चढ़ती कला का अनुभव करने वाले बाप समान सम्पन्न भव

बच्चों में विश्व कल्याण की कामना भी है तो बाप समान बनने की श्रेष्ठ इच्छा भी है, लेकिन लक्ष्य के प्रमाण जो लक्षण स्वयं को वा सर्व को दिखाई दें उसमें अन्तर है इसलिए बैलेन्स करने की कला अब चढ़ती कला में लाकर इस अन्तर को मिटाओ। संकल्प है लेकिन दृढ़ता सम्पन्न संकल्प हो तो बाप समान सम्पन्न बनने का वरदान प्राप्त हो जायेगा। अभी जो स्वदर्शन और परदर्शन दोनों चक्र घूमते हैं, व्यर्थ बातों के जो त्रिकालदर्शी बन जाते हो - इसका परिवर्तन कर स्वचिंतक स्वदर्शन चक्रधारी बनो।

स्लोगन:-

सेवा का भाग्य प्राप्त होना ही सबसे बड़ा भाग्य है।

24-05-20

24-05-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 15-01-86 मधुबन


सस्ता सौदा और बचत का बजट

रत्नागर बाप अपने बड़े ते बड़े सौदा करने वाले सौदागर बच्चों को देख मुस्करा रहे हैं। सौदा कितना बड़ा और करने वाले सौदागर दुनिया के अन्तर में कितने साधारण, भोले-भाले हैं। भगवान से सौदा करने वाली कौन आत्मायें भाग्यवान बनीं। यह देख मुस्करा रहे हैं। इतना बड़ा सौदा एक जन्म का जो 21 जन्म सदा मालामाल हो जाते। देना क्या और लेना क्या है। अनगिनत पदमों की कमाई वा पदमों का सौदा कितना सहज करते हो। सौदा करने में समय भी वास्तव में एक सेकेण्ड लगता है। और कितना सस्ता सौदा किया? एक सेकण्ड में और एक बोल में सौदा कर लिया - दिल से माना मेरा बाबा। इस एक बोल से इतना बड़ा अनगिनत खजाने का सौदा कर लेते हो। सस्ता सौदा है ना। न मेहनत है, न मंहगा है। न समय देना पड़ता है। और कोई भी हद के सौदे करते तो कितना समय देना पड़ता। मेहनत भी करनी पड़ती और मंहगा भी दिन-प्रतिदिन होता ही जाता है। और चलेगा कहाँ तक? एक जन्म की भी गारन्टी नहीं। तो अब श्रेष्ठ सौदा कर लिया है वा अभी सोच रहे हो कि करना है? पक्का सौदा कर लिया है ना? बापदादा अपने सौदागर बच्चों को देख रहे थे। सौदागरों की लिस्ट में कौन-कौन नामीग्रामी हैं। दुनिया वाले भी नामीग्रामी लोगों की लिस्ट बनाते हैं ना। विशेष डायरेक्टरी भी बनाते हैं। बाप की डायरेक्टरी में किन्हों के नाम हैं? जिनमें दुनिया वालों की ऑख नहीं जाती, उन्होंने ही बाप से सौदा किया और परमात्म नयनों के सितारे बन गये, नूरे रत्न बन गये। नाउम्मींद आत्माओं को विशेष आत्मा बना दिया। ऐसा नशा सदा रहता है? परमात्म डायरेक्टरी के विशेष वी.आई.पी. हम हैं इसलिए ही गायन है भोलों का भगवान। है चतुर-सुजान लेकिन पसन्द भोले ही आते हैं। दुनिया की बाहरमुखी चतुराई बाप को पसन्द नहीं। उन्हों का कलियुग में राज्य हैं, जहाँ अभी-अभी लखपति अभी-अभी कखपति हैं। लेकिन आप सभी सदा के लिए पदमापदमति बन जाते हो। भय का राज्य नहीं। निर्भय हैं।

आज की दुनिया में धन भी है और भय भी हैं। जितना धन उतना भय में ही खाते, भय में ही सोते। और आप बेफिकर बादशाह बन जाते। निर्भय बन जाते हो। भय का भी भूत कहा जाता है। आप उस भूत से भी छूट जाते हो। छूट गये हो ना? कोई भय है? जहाँ मेरापन होगा वहाँ भय जरूर होगा। "मेरा बाबा”। सिर्फ एक ही शिवबाबा है जो निर्भय बनाता है। उनके सिवाए कोई भी सोना हिरण भी अगर मेरा है तो भी भय है। तो चेक करो मेरा मेरा का संस्कार ब्राह्मण जीवन में भी किसी भी सूक्ष्म रूप में रह तो नहीं गया है? सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली मना रहे हो ना। चांदी वा सोना, रीयल तभी बनता है जब आग में गलाकर जो कुछ मिक्स होता है उसको समाप्त कर देते हैं। रीयल सिल्वर जुबली, रीयल गोल्डन जुबली है ना। तो जुबली मनाने के लिए रीयल सिल्वर, रीयल गोल्ड बनना ही पड़ेगा। ऐसे नहीं जो सिल्वर जुबली वाले हैं वह सिल्वर ही हैं। यह तो वर्षों के हिसाब से सिल्वर जुबली कहते हैं। लेकिन हो सभी गोल्डन एज के अधिकारी गोल्डन एज वाले। तो चेक करो रीयल गोल्ड कहाँ तक बने हैं? सौदा तो किया लेकिन आया और खाया। ऐसे तो नहीं? इतना जमा किया जो 21 पीढ़ी सदा सम्पन्न रहें? आपकी वंशावली भी मालामाल रहे। न सिर्फ 21 जन्म लेकिन द्वापर में भी भक्त आत्मा होने के कारण कोई कमी नहीं होगी। इतना धन द्वापर में भी रहता है जो दान-पुण्य अच्छी तरह से कर सकते हो। कलियुग के अन्त में भी देखो, अन्तिम जन्म में भी भिखारी तो नहीं बने हो ना! दाल-रोटी खाने वाले बने ना। काला धन तो नहीं है लेकिन दाल-रोटी तो है ना। इस समय की कमाई वा सौदा पूरा ही कल्प भिखारी नहीं बनायेगा, इतना इकट्ठा किया है जो अन्तिम जन्म में भी दाल-रोटी खाते हो, इतना बचत का हिसाब रखते हो? बजट बनाना आता है? जमा करने में होशियार हो ना! नहीं तो 21 जन्म क्या करेंगे? कमाई करने वाले बनेंगे या राज्य अधिकारी बन राज्य करेंगे? रॉयल फैमली को कमाने की जरूरत नहीं होती। प्रजा को कमाना पड़ेगा। उसमें भी नम्बर हैं। साहूकार प्रजा और साधारण प्रजा। गरीब तो होता ही नहीं है। लेकिन रॉयल फैमली पुरुषार्थ की प्रारब्ध राज्य प्राप्त करती है। जन्म-जन्म रॉयल फैमली के अधिकारी बनते हैं। राज्य तख्त के अधिकारी हर जन्म में नहीं बनते लेकिन रायल फैमली का अधिकार जन्म-जन्म प्राप्त करते हैं। तो क्या बनेंगे? अब बजट बनाओ। बचत की स्कीम बनाओ।

आजकल के जमाने में वेस्ट से बेस्ट बनाते हैं। वेस्ट को ही बचाते हैं। तो आप सब भी बचत का खाता सदा स्मृति में रखो। बजट बनाओ। संकल्प शक्ति, वाणी की शक्ति, कर्म की शक्ति, समय की शक्ति कैसे और कहाँ कार्य में लगानी है। ऐसे न हो यह सब शक्तियाँ व्यर्थ चली जाएं। संकल्प भी अगर साधारण हैं, व्यर्थ हैं तो व्यर्थ और साधारण दोनों बचत नहीं हुई। लेकिन गँवाया। सारे दिन में अपना चार्ट बनाओ। इन शक्तियों को कार्य में लगाकर कितना बढ़ाया! क्योंकि जितना कार्य में लगायेंगे उतना शक्ति बढ़ेगी। जानते सभी हो कि संकल्प शक्ति है लेकिन कार्य में लगाने का अभ्यास, इसमें नम्बरवार हैं। कोई फिर, न तो कार्य में लगाते, न पाप कर्म में गँवाते। लेकिन साधारण दिनचर्या में न कमाया न गँवाया। जमा तो नहीं हुआ ना। साधारण सेवा की दिनचर्या वा साधारण प्रवृत्ति की दिनचर्या इसको बजट का खाता जमा होना नहीं कहेंगे। सिर्फ यह नहीं चेक करो कि यथाशक्ति सेवा भी की, पढाई भी की। किसको दु:ख नहीं दिया। कोई उल्टा कर्म नहीं किया। लेकिन दु:ख नहीं दिया तो सुख दिया? जितनी और जैसी शक्तिशाली सेवा करनी चाहिए उतनी की? जैसे बापदादा सदा डायरेक्शन देते हैं कि मैं-पन का, मेरेपन का त्याग ही सच्ची सेवा है, ऐसे सेवा की? उल्टा बोल नहीं बोला, लेकिन ऐसा बोल बोला जो किसी ना-उम्मींद को उम्मींदवार बना दिया। हिम्मतहीन को हिम्मतवान बनाया? खुशी के उमंग, उत्साह में किसको लाया? यह है जमा करना, बचत करना। ऐसे ही दो घण्टा, 4 घण्टा बीत गया, वह बचत नहीं हुई। सब शक्तियां बचत कर जमा करो। ऐसा बजट बनाओ। यह साल बजट बनाकर कार्य करो। हर शक्ति को कार्य में कैसे लगावें, यह प्लैन बनाओ। ईश्वरीय बजट ऐसा बनाओ जो विश्व की हर आत्मा कुछ न कुछ प्राप्त करके ही आपके गुण गान करे। सभी को कुछ न कुछ देना ही है। चाहे मुक्ति दो, चाहे जीवनमुक्ति दो। मनुष्य आत्मायें तो क्या प्रकृति को भी पावन बनाने की सेवा कर रहे हो। ईश्वरीय बजट अर्थात् सर्व आत्मायें प्रकृति सहित सुखी वा शान्त बन जावें। वह गवर्मेन्ट बजट बनाती है इतना पानी देंगे, इतने मकान देंगे, इतनी बिजली देंगे। आप क्या बजट बनाते हो? सभी को अनेक जन्मों तक मुक्ति और जीवनमुक्ति देवें। भिखारीपन से, दु:ख अशान्ति से मुक्त करें। आधाकल्प तो आराम से रहेंगे। उन्हों की आश तो पूर्ण हो ही जायेगी। वह लोग तो मुक्ति ही चाहते हैं ना। जानते नहीं हैं लेकिन मांगते तो हैं ना। तो स्वयं के प्रति और विश्व के प्रति ईश्वरीय बजट बनाओ। समझा क्या करना है! सिल्वर और गोल्डन जुबली दोनों इसी वर्ष में कर रहे हो ना। तो यह महत्व का वर्ष है। अच्छा।

सदा श्रेष्ठ सौदा स्मृति में रखने वाले, सदा जमा का खाता बढ़ाने वाले, सदा हर शक्तियों को कार्य में लगाए वृद्धि करने वाले, सदा समय के महत्व को जान महान बनने और बनाने वाले, ऐसे श्रेष्ठ धनवान, श्रेष्ठ समझदार बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

कुमारों से:- कुमार जीवन भी लकी जीवन है क्योंकि उल्टी सीढ़ी चढ़ने से बच गये। कभी संकल्प तो नहीं आता है उल्टी सीढ़ी चढ़ने का! चढ़ने वाले भी उतर रहे हैं। सभी प्रवृत्ति वाले भी अपने को कुमार कुमारी कहलाते हैं ना। तो सीढ़ी उतरे ना! तो सदा अपने इस श्रेष्ठ भाग्य को स्मृति में रखो। कुमार जीवन अर्थात् बन्धनों से बचने की जीवन। नहीं तो देखो कितने बन्धनों में होते हैं। तो बन्धनों में खिंचने से बच गये। मन से भी स्वतंत्र, सम्बन्ध से भी स्वतंत्र। कुमार जीवन है ही स्वतंत्र। कभी स्वप्न में भी ख्याल तो नहीं आता- थोड़ा कोई सहयोगी मिल जाए! कोई साथी मिल जाए! बीमारी में मदद हो जाए- ऐसे कभी सोचते हो! बिल्कुल ख्याल नहीं आता? कुमार जीवन अर्थात् सदा उड़ते पंछी बंधन में फंसे हुए नहीं। कभी भी कोई संकल्प न आवे। सदा निर्बन्धन हो तीव्रगति से आगे बढ़ते चलो।

कुमारियों से:- कुमारियों को सेवा में आगे बढ़ने की लिफ्ट मिली हुई है। यह लिफ्ट ही श्रेष्ठ गिफ्ट है। इस गिफ्ट को यूज़ करना आता है ना! जितना स्वयं को शक्तिशाली बनायेंगी उतना सेवा भी शक्तिशाली करेंगी। अगर स्वयं ही किसी बात में कमजोर होंगी तो सेवा भी कमजोर होगी इसलिए शक्तिशाली बन शक्तिशाली सेवाधारी बन जाओ। ऐसी तैयारी करती चलो। जो समय आने पर सफलता-पूर्वक सेवा में लग जाओ और नम्बर आगे ले लो। अभी तो पढ़ाई में टाइम देना पड़ता है फिर तो एक ही काम होगा इसलिए जहाँ भी हो ट्रेनिंग करती रहो। निमित्त बनी हुई आत्माओं के संग से तैयारी करती रहो। तो योग्य सेवाधारी बन जायेंगी। जितना आगे बढ़ेगी उतना अपना ही फायदा है।

सेवाधारी - टीचर्स बहनों से

1. सेवाधारी अर्थात् सदा निमित्त। निमित्त भाव- सेवा में स्वत: ही सफलता दिलाता है। निमित्त भाव नहीं तो सफलता नहीं। सदा बाप के थे, बाप के हैं और बाप के ही रहेंगे - ऐसी प्रतिज्ञा कर ली है ना। सेवाधारी अर्थात् हर कदम बाप के कदम पर रखने वाले। इसको कहते हैं फालो फादर करने वाले। हर कदम श्रेष्ठ मत पर श्रेष्ठ बनाने वाले सेवाधारी हो ना। सेवा में सफलता प्राप्त करना, यही सेवाधारी का श्रेष्ठ लक्ष्य है। तो सभी श्रेष्ठ लक्ष्य रखने वाले हो ना। जितना सेवा में वा स्व में व्यर्थ समाप्त हो जाता है उतना ही स्व और सेवा समर्थ बनती है। तो व्यर्थ को खत्म करना, सदा समर्थ बनना। यही सेवाधारियों की विशेषता है। जितना स्वयं निमित्त बनी हुई आत्मायें शक्तिशाली होंगी उतना सेवा भी शक्तिशाली होगी। सेवाधारी का अर्थ ही है सेवा में सदा उमंग-उत्साह लाना। स्वयं उमंग-उत्साह में रहने वाले औरों को उमंग उत्साह दिला सकते हैं। तो सदा प्रत्यक्ष रूप में उमंग उत्साह दिखाई दे। ऐसे नहीं कि मैं अन्दर में तो रहती हूँ लेकिन बाहर नहीं दिखाई देता। गुप्त पुरुषार्थ और चीज है लेकिन उमंग-उत्साह छिप नहीं सकता है। चेहरे पर सदा उमंग-उत्साह की झलक स्वत: दिखाई देगी। बोले न बोले लेकिन चेहरा ही बोलेगा, झलक बोलेगी। ऐसे सेवाधारी हो?

सेवा का गोल्डन चांस यह भी श्रेष्ठ भाग्य की निशानी है। सेवाधारी बनने का भाग्य तो प्राप्त हो गया अभी सेवाधारी नम्बरवन हैं या नम्बर टू हैं, यह भी भाग्य बनाना और देखना है। सिर्फ एक भाग्य नहीं लेकिन भाग्य पर भाग्य की प्राप्ति। जितने भाग्य प्राप्त करते जाते उतना नम्बर स्वत: ही आगे बढ़ता जाता है। इसको कहते हैं पदमापदम भाग्यवान। एक सबजेक्ट में नहीं सब सबजेक्ट में सफलता स्वरूप। अच्छा!

2- सबसे ज्यादा खुशी किसको है - बाप को है या आपको? क्यों नहीं कहते हो कि मेरे को है! द्वापर से भक्ति में पुकारा और अब प्राप्त कर लिया तो कितनी खुशी होगी! 63 जन्म प्राप्त करने की इच्छा रखी और 63 जन्मों की इच्छा पूर्ण हो गई तो कितनी खुशी होगी! किसी भी चीज़ की इच्छा पूर्ण होती है तो खुशी होती है ना। यह खुशी ही विश्व को खुशी दिलाने वाली है। आप खुश होते हो तो सारी विश्व खुश हो जाती है। ऐसी खुशी मिली है ना। जब आप बदलते हो तो दुनिया भी बदल जाती है। और ऐसी बदलती है जिसमें दु:ख और अशान्ति का नाम निशान नहीं। तो सदा खुशी में नाचते रहो। सदा अपने श्रेष्ठ कर्मों का खाता जमा करते चलो। सभी को खुशी का खजाना बांटो। आज के संसार में खुशी नहीं है। सब खुशी के भिखारी हैं उन्हें खुशी से भरपूर बनाओ। सदा इसी सेवा से आगे बढ़ते रहो। जो आत्मायें दिलशिकस्त बन गई हैं उन्हों में उमंग-उत्साह लाते रहो। कुछ कर सकते नहीं, हो नहीं सकता... ऐसे दिलशिकस्त हैं और आप विजयी बन विजयी बनाने का उमंग-उत्साह बढ़ाने वाले हो। सदा विजय की स्मृति का तिलक लगा रहे। तिलकधारी भी हैं और स्वराज्य अधिकारी भी हैं - इसी स्मृति में सदा रहो।

प्रश्न:- जो समीप सितारे हैं उनके लक्षण क्या होंगे?

उत्तर:- उनमें समानता दिखाई देगी। समीप सितारों में बापदादा के गुण और कर्तव्य प्रत्यक्ष दिखाई देंगे। जितनी समीपता उतनी समानता होगी। उनका मुखड़ा बापदादा का साक्षात्कार कराने वाला दर्पण होगा। उनको देखते ही बापदादा का परिचय प्राप्त होगा। भले देखेंगे आपको लेकिन आकर्षण बापदादा की तरफ होगी। इसको कहा जाता है सन शोज़ फादर। स्नेही के हर कदम में, जिससे स्नेह है उसकी छाप देखने में आती है। जितना हर्षितमूर्त उतना आकर्षण मूर्त बन जाते हैं। अच्छा!

वरदान:-

सेवा द्वारा अनेक आत्माओं की आशीर्वाद प्राप्त कर सदा आगे बढ़ने वाले महादानी भव

महादानी बनना अर्थात् दूसरों की सेवा करना, दूसरों की सेवा करने से स्वयं की सेवा स्वत: हो जाती है। महादानी बनना अर्थात् स्वयं को मालामाल करना, जितनी आत्माओं को सुख, शक्ति व ज्ञान का दान देंगे उतनी आत्माओं के प्राप्ति की आवाज या शुक्रिया जो निकलता वह आपके लिए आशीर्वाद का रूप हो जायेगा। यह आशीर्वादें ही आगे बढ़ने का साधन हैं। जिन्हें आशीर्वादें मिलती हैं वह सदा खुश रहते हैं। तो रोज़ अमृतवेले महादानी बनने का प्रोग्राम बनाओ। कोई समय वा दिन ऐसा न हो जिसमें दान न हो।

स्लोगन:-

अभी का प्रत्यक्षफल आत्मा को उड़ती कला का बल देता है।

 

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