Articles

Biodata

Biodata

19-05-19

19-05-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 28-11-84 मधुबन


संकल्प को सफल बनाने का सहज साधन

आज विश्व रचता, विश्व कल्याणकारी बाप विश्व की परिक्रमा करने के लिए, विशेष सर्व बच्चों की रेख-देख करने के लिए चारों ओर गये। ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को भी देखा। स्नेही सहयोगी बच्चों को भी देखा। भक्त बच्चों को भी देखा, अज्ञानी बच्चों को भी देखा। भिन्न-भिन्न आत्मायें अपनी-अपनी लगन में मगन देखा। कोई कुछ कार्य करने की लगन में मगन और कोई तोड़ने के कार्य में मगन, कोई जोड़ने के कार्य में मगन, लेकिन सभी मगन जरूर हैं। सभी के मन में संकल्प यही रहा कि कुछ मिल जाए, कुछ ले लें, कुछ पा लें, इसी लक्ष्य से हरेक अपने-अपने कार्य में लगा हुआ है। चाहे हद की प्राप्ति है, फिर भी कुछ मिल जाये वा कुछ बन जायें, यही तात और लात सभी तरफ देखी। इसी के बीच ब्राह्मण बच्चों को विशेष देखा। देश में चाहे विदेश में सभी बच्चों में यही एक संकल्प देखा कि अब कुछ कर लें। बेहद के कार्य में कुछ विशेषता करके दिखायें। अपने में भी कोई विशेषता धारण कर विशेष आत्मा बन जायें। ऐसा उमंग मैजारटी बच्चों में देखा। उमंग-उत्साह का बीज स्वयं के पुरूषार्थ से, साथ-साथ समय के वातावरण से सबके अन्दर प्रत्यक्ष रूप में देखा। इसी उमंग के बीज को बार-बार निरन्तर बनाने के अटेन्शन देने का पानी और चेकिंग अर्थात् सदा वृद्धि को पाने की विधि रूपी धूप देते रहें - इसमें नम्बरवार हो जाते हैं। बीज बोना सभी को आता है लेकिन पालना कर फल स्वरूप बनाना, इसमें अन्तर हो जाता है।

बापदादा अमृत वेले से सारे दिन तक बच्चों का यह खेल कहो वा लगन का पुरूषार्थ कहो, रोज़ देखते हैं। हर एक बहुत अच्छे ते अच्छे स्व प्रति वा सेवा के प्रति उमंगों के संकल्प करते कि अभी से यह करेंगे, ऐसे करेंगे, अवश्य करेंगे। करके ही दिखायेंगे-ऐसे श्रेष्ठ संकल्प के बीज बोते रहते हैं। बापदादा से रूह-रूहाण में भी बहुत मीठी-मीठी बातें करते हैं। लेकिन जब उस संकल्प को अर्थात् बीज को प्रैक्टिकल में लाने की पालना करते तो क्या होता? कोई न कोई बातों में वृद्धि की विधि में वा फलस्वरूप बनाने की विशेषता में नम्बरवार यथा शक्ति बन जाते हैं। किसी भी संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाने का सहज साधन एक ही है, वह है-“सदा बीज रूप बाप से हर समय सर्व शक्तियों का बल उस बीज में भरते रहना”। बीज रूप द्वारा आपके संकल्प रूपी बीज सहज और स्वत: वृद्धि को पाते फलीभूत हो जायेंगे। लेकिन बीज रूप से निरन्तर कनेक्शन न होने के कारण और आत्माओं को वा साधनों को वृद्धि की विधि बना देते हैं। इस कारण ऐसे करें वैसे करें, इस जैसा करें, इस विस्तार में समय और मेहनत ज्यादा लगाते हैं क्योंकि किसी भी आत्मा और साधन को अपना आधार बना लेते हैं। सागर और सूर्य से पानी और धूप मिलने के बजाए कितने भी साधनों के पानी से आत्माओं को आधार समझ सकाश देने से बीज फलीभूत हो नहीं सकता, इसलिए मेहनत करने के बाद, समय लगाने के बाद जब प्रत्यक्ष फल की प्राप्ति नहीं होती तो चलते-चलते उत्साह कम हो जाता और स्वयं से वा साथियों से वा सेवा से निराश हो जाते हैं। कभी खुशी, कभी उदासी दोनों लहरें ब्राह्मण जीवन के नांव को कभी हिलाती कभी चलाती। आजकल कई बच्चों के जीवन की गति विधि यह दिखाई देती है। चल भी रहे हैं, कार्य कर भी रहे हैं लेकिन जैसा होना चाहिए वैसा अनुभव नहीं करते हैं इसलिए खुशी है लेकिन खुशी में नाचते रहें, वह नहीं है। चल रहे हैं लेकिन तीव्रगति की चाल नहीं है। सन्तुष्ट भी हैं कि श्रेष्ठ जीवन वाले बन गये, बाप के बन गये, सेवाधारी बन गये, दुख: दर्द की दुनिया से किनारे हो गये। लेकिन सन्तुष्टता के बीच कभी कभी असन्तुष्टता की लहर न चाहते, न समझते भी आ जाती है, क्योंकि ज्ञान सहज है, याद भी सहज है लेकिन सम्बन्ध और सम्पर्क में न्यारे और प्यारे बन कर प्रीत निभाना इसमें कहाँ सहज, कहाँ मुश्किल बन जाता।

ब्राह्मण परिवार और सेवा की प्रवृत्ति, इसको कहा जाता है सम्बन्ध सम्पर्क। इसमें किसी न किसी बात से जैसा अनुभव होना चाहिए वैसा नहीं करते। इस कारण दोनों लहरें चलती हैं। अभी समय की समीपता के कारण पुरूषार्थ की यह रफ्तार समय प्रमाण सम्पूर्ण मंजिल पर पहुँचा नहीं सकेगी। अभी समय है विघ्न विनाशक बन विश्व के विघ्नों के बीच दु:खी आत्माओं को सुख चैन की अनुभूति कराना। बहुत काल से निर्विघ्न स्थिति वाला ही विघ्न विनाशक का कार्य कर सकता है। अभी तक अपने जीवन में आये हुए विघ्नों को मिटाने में बिजी रहेंगे, उसमें ही शक्ति लगायेंगे तो दूसरों को शक्ति देने के निमित्त कैसे बन सकेंगे। निर्विघ्न बन शक्तियों का स्टाक जमा करो-तब शक्ति रूप बन विघ्न-विनाशक का कार्य कर सकेंगे। समझा!

विशेष दो बातें देखी। अज्ञानी बच्चे भारत में सीट लेने में वा सीट दिलाने में लगे हुए हैं। दिन रात स्वप्न में भी सीट ही नजर आती और ब्राह्मण बच्चे सेट होने में लगे हुए हैं। सीट मिली हुई है लेकिन सेट हो रहे हैं। विदेश में अपने ही बनाये हुए विनाशकारी शक्ति से बचने के साधन ढूँढने में लगे हुए हैं। मैजारटी की जीवन, जीवन नहीं लेकिन क्वेश्चन मार्क बन गई है। अज्ञानी बचाव में लगे हुए हैं और ज्ञानी प्रत्यक्षता का झण्डा लहराने में लगे हुए हैं। यह है विश्व का हाल-चाल। अब परेशानियों से बचाओ। भिन्न-भिन्न परेशानियों में भटकती हुई आत्माओं को शान्ति का ठिकाना दो। अच्छा-

सदा सम्पन्न स्थिति की सीट पर सेट रहने वाले, स्व के और विश्व के विघ्न-विनाशक, बीजरूप बाप के सम्बन्ध से हर श्रेष्ठ संकल्प रूपी बीज को फलीभूत बनाए प्रत्यक्ष फल खाने वाले, सदा सन्तुष्ट रहने वाले, सन्तुष्टमणी बच्चों को बाप-दादा का याद-प्यार और नमस्ते।“

हॉस्टेल की कुमारियों से बापदादा की मुलाकात

अपने भाग्य को देख हर्षित रहती हो ना? उल्टे रास्ते पर जाने से बच गई। गँवाने के बजाए कमाने वाली जीवन बना दी। लौकिक जीवन में बिना ज्ञान के गँवाना ही गँवाना है और ज्ञानी जीवन में हर सेकण्ड कमाई ही कमाई है। वैसे तकदीरवान सभी ब्राह्मण हैं लेकिन फिर भी कुमारियाँ हैं डबल तकदीरवान। और कुमारी जीवन में ब्रह्माकुमारी बनना, ब्राह्मण बनना यह बहुत महान है। कम बात नहीं है। बहुत बड़ी बात है। ऐसे नशा रहता है क्या बन गई। साधारण कुमारी से शक्ति रूप हो गई। माया का संघार करने वाली शक्तियाँ हो ना! माया से घबराने वाली नहीं, संघार करने वाली। कमजोर नहीं, बहादुर। कभी छोटी मोटी बात पर घबराती तो नहीं हो? सदा श्रेष्ठ प्राप्ति को याद रखेंगी तो छोटी-छोटी बातें कुछ नहीं लगेंगी। अभी पूरा जीवन का सौदा किया या जब तक होस्टल में है तब तक का सौदा है? कभी भी कोई श्रेष्ठ जीवन से साधारण जीवन में समझते हुए जा नहीं सकते। अगर कोई लखपति हो उसको कहो गरीब बनो, तो बनेगा? सरकमस्टाँस के कारण कोई बन भी जाता तो भी अच्छा नहीं लगता। तो यह जीवन है स्वराज्य अधिकारी जीवन। उससे साधारण जीवन में जा नहीं सकते। तो अभी समझदार बनकर अनुभव कर रही हो या एक दो के संग में चल रही हो? अपनी बुद्धि का फैसला किया है? अपने विवेक की जजमेन्ट से यह जीवन बनाई है ना! या माँ बाप ने कहा तो चली आई? अच्छा!

(2) कुमारियों ने अपने आपको आफर किया? जहाँ भी सेवा में भेजें वहाँ जायेंगी? पक्का सौदा किया है या कच्चा? पक्का सौदा है तो जहाँ बिठाओ, जो कराओ....ऐसे तैयार हो? अगर कोई भी बन्धन है तो पक्का सौदा नहीं। अगर खुद तैयार हो तो कोई रोक नहीं सकता। बकरी को बाँध कर बिठाते हैं, शेर को कोई बाँध नहीं सकता। तो शेरणी किसके बंधन में कैसे आ सकती। वह जंगल में रहते भी स्वतंत्र है। तो कौन हो? शेरणी? शेरणी माना मैदान में आने वाली। जब एक बल एक भरोसा है तो हिम्मत बच्चों की, मदद बाप की। कैसा भी कड़ा बन्धन है लेकिन हिम्मत के आधार पर वह कड़ा बन्धन भी सहज छूट जाता है। जैसे दिखाते हैं जेल के ताले भी खुल गये तो आपके बन्धन भी खुल जायेंगे। तो ऐसे बनो। अगर थोड़ा सा भी बन्धन है तो उसको योग अग्नि से भस्म कर दो। भस्म हो जायेगा तो नामनिशान गुम। तोड़ने से फिर भी गाँठ लगा सकते, इसलिए तोड़ो नहीं लेकिन भस्म करो तो सदा के लिए मुक्त हो जायेंगे। अच्छा-

चुने हुए अव्यक्त महावाक्य -सरलचित बनो तो सफलता मिलती रहेगी

ब्राह्मणों का मुख्य संस्कार है - सर्वस्व त्यागी। त्याग से ही जीवन में सरलता और सहनशीलता का गुण सहज आ जाता है। जिसमें सरलता, सहनशीलता होगी वह दूसरों को भी आकर्षण जरूर करेंगे और एक दो के स्नेही बन सकेंगे। जो स्वयं सरलचित्त रहते हैं वह दूसरों को भी सरलचित्त बना सकते हैं। सरलचित्त माना जो बात सुनी, देखी, की, वह सारयुक्त हो और सार को ही उठाये, और जो बात वा कर्म स्वयं करे उसमें भी सार भरा हुआ हो।

जो सरल पुरुषार्थी होता है वह औरों को भी सरल पुरुषार्थी बना देता है। सरल पुरुषार्थी सब बातों में आलराउन्डर होगा। उसमें कोई भी बात की कमी दिखाई नहीं देगी। कोई भी बात में हिम्मत कम नहीं होगी। मुख से ऐसा बोल नहीं निकलेगा कि यह अभी नहीं कर सकते हैं। इसी एक सरलता के गुण से वह सब बातों में सैम्पुल बन पास विद आनर बन जाता है। जैसे साकार बाप को देखा - जितना ही नॉलेजफुल उतना ही सरल स्वभाव। जिसको कहते हैं बचपन के संस्कार। बुजुर्ग का बुजुर्ग, बचपन का बचपन। ऐसे फालो फादर कर सरलचित बनो।

दूसरों के संस्कार को सरल बनाने का साधन है - हाँ जी कहना। जब आप यहाँ हाँ जी, हाँ जी करेंगे तब वहाँ सतयुग में आपकी प्रजा इतना हाँ जी, हाँ जी करेगी। अगर यहाँ ही ना जी ना जी करेंगे तो वहाँ भी प्रजा दूर से ही प्रणाम करेगी। तो ना शब्द को निकाल देना है। कोई भी बात हो पहले हाँ जी। इससे संस्कारों में सरलता आ जायेगी। सफलतामूर्त्त बनने के लिए मुख्य गुण सरलता और सहनशीलता का धारण करो। जैसे कोई धैर्यता वाला मनुष्य सोच समझकर कार्य करता है तो सफलता प्राप्त होती है। ऐसे ही जो सरल स्वभाव वाले सहनशील होते हैं वह अपनी सहनशीलता की शक्ति से कैसे भी कठोर संस्कार वाले को शीतल बना देते हैं, कठिन कार्य को सहज कर लेते हैं।

आपके यादगार देवताओं के चित्र भी जो बनाते हैं, उनकी सूरत में सरलता ज़रूर दिखाते हैं। यह विशेष गुण दिखाते हैं। फीचर्स में सरलता जिसको आप भोलापन कहते हो। जितना जो सहज पुरुषार्थी होगा वह मन्सा में भी सरल, वाचा में भी सरल, कर्म में भी सरल होगा, उसको ही फरिश्ता कहते हैं। सरलता के गुण की धारणा के साथ समाने की, सहन करने की शक्ति भी जरूर चाहिए। अगर समाने और सहन करने की शक्ति नहीं तो सरलता बहुत भोला रुप धारण कर लेती है और कहां-कहां भोलापन बहुत भारी नुकसान कर देता है। तो ऐसा सरलचित नहीं बनना है।

सरलता के गुण के कारण बाप को भी भोलानाथ कहते हो, लेकिन वह भोलानाथ के साथ-साथ आलमाइटी अथॉरिटी भी है। सिर्फ भोलानाथ नहीं है। तो आप भी सरलता के गुण को धारण करो लेकिन अपने शक्ति स्वरूप को भी सदा याद रखो। अगर शक्ति रूप भूलकर सिर्फ भोले बन जाते हो तो माया का गोला लग जाता है, इसलिए ऐसा शक्ति स्वरुप बनो जो माया सामना करने के पहले ही नमस्कार कर ले। बहुत सावधान, खबरदार-होशियार रहना है। ब्राह्मण जीवन में ऐसे विशेषता सम्पन्न बनो जो आपका स्वभाव सदा सरल हो, बोल भी सरल हों, हर कर्म भी सरलता सम्पन्न हो। सदा एक की मत पर, एक से सर्व सम्बन्ध, एक से सर्व प्राप्ति करते हुए सदा एकरस रहने के सहज अभ्यासी बनो। सदा खुश रहो और खुशी का खजाना बांटो।

सरलता के गुण को जीवन में लाने के लिए वर्तमान समय सिर्फ एक बात ध्यान पर जरूर रखनी है - आपकी स्थिति स्तुति के आधार पर न हो। यदि स्तुति के आधार पर स्थिति है तो जो कर्म करते हो उसके फल की इच्छा वा लोभ रहता है। अगर स्तुति होती है तो स्थिति भी रहती है। अगर निंदा होती है तो निधन के बन जाते हो। अपनी स्टेज को छोड़ देते हैं और धनी को भूल जाते हो। तो यह कभी नहीं सोचना कि हमारी स्तुति हो। स्तुति के आधार पर स्थिति नहीं रखना, तब कहेंगे सरलचित। सरलता को अपना निजी स्वभाव बनाने से समेटने की शक्ति भी सहज आ जाती है। जो सरल स्वभाव वाला होगा वह सभी का स्नेही होगा उनको सभी द्वारा सहयोग भी अवश्य प्राप्त होगा इसलिए वह सभी बातों का सामना वा समेटना सहज ही कर सकता है। जो जितना सरल स्वभाव वाला होगा उतना माया सामना भी कम करेगी। वह सभी का प्रिय बन जाता है।

सरल स्वभाव वाले के व्यर्थ संकल्प अधिक नहीं चलते। उनका समय भी व्यर्थ नहीं जाता। व्यर्थ संकल्प न चलने के कारण उनकी बुद्धि विशाल और दूरांदेशी रहती है इसलिए उनके आगे कोई भी समस्या सामना नहीं कर सकती। जितनी सरलता होगी उतनी स्वच्छता भी होगी। स्वच्छता सभी को अपने तरफ आकर्षित करती है। स्वच्छता अर्थात् सच्चाई और सफाई वह तब आयेगी जब अपने स्वभाव को सरल बनायेंगे। सरल स्वभाव वाला बहुरूपी बन सकता है। कोमल चीज़ को जैसे भी रूप में लाओ आ सकती है। तो अब गोल्ड बने हो लेकिन गोल्ड को अब अग्नि में गलाओ तो मोल्ड भी हो सके। इस कमी के कारण सर्विस की सफलता में कमी पड़ती है। अपने वा दूसरे की बीती को नहीं देखो तो सरलचित हो जायेंगे। जो सरलचित होते हैं उनमें मधुरता का गुण प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उनके नयनों से, मुख से, चलन से मधुरता प्रत्यक्ष रूप में देखने में आती है। जो जितना स्पष्ट होता है वह उतना ही सरल और श्रेष्ठ होता है। स्पष्टता श्रेष्ठता के नजदीक है और जितनी स्पष्टता होती है उतनी सफलता भी होती है और समानता भी आती जाती है। स्पष्टता, सरलता और श्रेष्ठता बाप समान बना देती है।

वरदान:-

किसी भी परिस्थिति में फुलस्टॉप लगाकर स्वयं को परिवर्तन करने वाले सर्व की दुआओं के पात्र भव

किसी भी परिस्थिति में फुलस्टाप तब लगा सकते हैं जब बिन्दु स्वरूप बाप और बिन्दू स्वरूप आत्मा दोनों की स्मृति हो। कन्ट्रोलिंग पावर हो। जो बच्चे किसी भी परिस्थिति में स्वयं को परिवर्तन कर फुलस्टॉप लगाने में स्वयं को पहले आफर करते हैं, वह दुआओं के पात्र बन जाते हैं। उन्हें स्वयं को स्वयं भी दुआयें अर्थात् खुशी मिलती है, बाप द्वारा और ब्राह्मण परिवार द्वारा भी दुआयें मिलती हैं।

स्लोगन:-

जो संकल्प करते हो उसे बीच-बीच में दृढ़ता का ठप्पा लगाओ तो विजयी बन जायेंगे। सूचना: आज मास का तीसरा रविवार है, सभी संगठित रूप में सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अन्तर्राष्ट्रीय योग में सम्मिलित होकर अपने डबल लाइट स्वरूप द्वारा पूरे विश्व को शान्ति और शक्ति की सकाश देने की सेवा करें। सारा दिन अन्तर्मुखता की गुफा में रह कर्मयोगी बनकर कर्म करें।

08-05-2019

08-05-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - तुम बाप से भक्ति का फल लेने आये हो, जिन्होंने जास्ती भक्ति की होगी वही ज्ञान में आगे जायेंगे”

प्रश्नः-

कलियुगी राजाई में किन दो चीज़ों की जरूरत रहती है जो सतयुगी राजाई में नहीं होगी?

उत्तर:-

कलियुगी राजाई में 1. वजीर और 2. गुरू की जरूरत रहती है। सतयुग में यह दोनों ही नहीं होंगे। वहाँ किसी की राय लेने की दरकार नहीं क्योंकि सतयुगी राजाई संगम पर बाप की श्रीमत से स्थापन होती है। ऐसी श्रीमत मिलती है जो 21 पीढ़ी तक चलती है और सब सद्गति में हैं इसलिए गुरू की भी दरकार नहीं है।

ओम् शान्ति।

ओम् शान्ति का अर्थ क्या है? स्वधर्म में बैठो या अपने को आत्मा समझ बैठो तो शान्त में बैठेंगे। इसको कहा जाता है स्वधर्म में बैठना। भगवानुवाच - स्वधर्म में बैठो। तुम्हारा बाप तुमको बैठ पढ़ाते हैं। बेहद का बाप बेहद की पढ़ाई पढ़ाते हैं क्योंकि बाप बेहद का सुख देने वाला है। पढ़ाई से सुख मिलता है ना। अब बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ बैठो। बेहद का बाप आया है तुमको हीरे जैसा बनाने। हीरे जैसे देवी-देवता ही होते हैं। वह कब बनते हैं? इतने ऊंच पुरुषोत्तम कैसे बनें? यह कोई भी बता न सके सिवाए बाप के। प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे तुम ब्राह्मण ठहरे। फिर तुमको देवता बनना है। ब्राह्मणों की होती है चोटी। तुम शूद्र से ब्राह्मण बने हो। तुम प्रजापिता ब्रह्मा के मुख वंशावली हो, कुख वंशावली तो नहीं हो। कलियुगी सब हैं कुख वंशावली। साधू, सन्त, ऋषि, मुनि आदि सब द्वापर से लेकर कुख वंशावली बने हैं। अभी सिर्फ तुम प्रजापिता ब्रह्माकुमार-कुमारियां ही मुख वंशावली बने हो। यह तुम्हारा है सर्वोत्तम कुल, देवताओं से भी उत्तम क्योंकि तुमको पढ़ाने वाला, मनुष्य से देवता बनाने वाला बाप आया है। बच्चों को बैठ समझाते हैं क्योंकि भक्ति मार्ग वाले यहाँ आते ही नहीं हैं, यहाँ आते हैं ज्ञान मार्ग वाले। तुम आते हो बेहद के बाप से भक्ति का फल लेने। अब भक्ति का फल कौन लेंगे? जिसने सबसे जास्ती भक्ति की होगी, वही पत्थर से पारसबुद्धि बनते हैं। वही आकर ज्ञान लेंगे क्योंकि भक्ति का फल भगवान् को ही आकर देना है। यह अच्छी रीति समझने की बातें हैं। अभी तुम कलियुगी से सतयुगी, विकारी से निर्विकारी बनते हो अथवा पुरुषोत्तम बनते हो। तुम आये हो ऐसा लक्ष्मी-नारायण जैसा बनने के लिए। यह भगवान् भगवती हैं तो जरूर इन्हों को भगवान् ही पढ़ायेंगे। भगवानुवाच, परन्तु भगवान् किसको कहा जाता है, भगवान् तो एक होता है। भगवान् कोई सैकड़ों-हज़ारों नहीं होते हैं। मिट्टी-पत्थर में नहीं होते हैं। बाप को न जानने कारण भारत कितना कंगाल बन पड़ा है। अब बच्चे जानते हैं भारत में इनकी (लक्ष्मी-नारायण की) राजधानी थी। इन्हों के बाल-बच्चे आदि जो भी थे, राजधानी के मालिक थे। तुम यहाँ आये ही हो राजधानी के मालिक बनने लिए। यह अभी तो नहीं हैं ना। भारत में इन्हों का राज्य था। बच्चों को समझाया जाता है, जब इन देवी-देवताओं की राजधानी थी, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी थे तब और कोई धर्म नहीं था। इस समय फिर और सब धर्म हैं। यह धर्म है नहीं। यह जो फाउन्डेशन है, जिसको थुर कहा जाता है। इस समय मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का थुर सारा जल गया है। बाकी सब खड़े हैं। अब उन सबकी आयु पूरी होती है। यह मनुष्य सृष्टि रूपी वैराइटी झाड़ है। भिन्न नाम, रूप, देश, काल, अनेकानेक हैं ना। कितना बड़ा झाड़ है। बाप समझाते हैं कल्प-कल्प यह झाड़ जड़जड़ीभूत तमोप्रधान हो जाता है तब फिर मैं आता हूँ। तुम मुझे पुकारते हो - बाबा आओ, हम पतितों को आकर पावन बनाओ। हे पतित-पावन कहते हैं तो निराकार बाप ही याद आता है। साकारी तो कभी याद नहीं आयेगा। पतित-पावन सद्गति दाता है ही एक। जब सतयुग था तो तुम्हारी सद्गति थी। अभी तुम पुरुषोत्तम संगमयुग पर बैठे हो, बाकी और सब कलियुग में हैं। तुम हो पुरुषोत्तम संगमयुग पर। उत्तम ते उत्तम पुरुष वा ऊंच ते ऊंच गाया जाता है एक भगवान्। ऊंचा तेरा नाम ऊंचा तेरा धाम। ऊंचे ते ऊंच रहते हैं ना परमधाम में। यह बड़ा सहज समझने का है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग फिर है संगमयुग। इसका किसको पता नहीं। ड्रामा में यह भक्ति मार्ग भी बना हुआ है। ऐसे नहीं कह सकते कि बाबा फिर यह भक्ति मार्ग क्यों बनाया है! यह तो अनादि है। मैं बैठ तुमको इस ड्रामा का राज़ समझाता हूँ। मैंने बनाया हो तो फिर कहेंगे कब बनाया! बाप कहते हैं यह अनादि है ही। शुरू कब हुआ, यह सवाल नहीं आ सकता। अगर कहेंगे फलाने समय शुरू हुआ तो कहेंगे बन्द कब होगा! परन्तु नहीं, यह तो चक्र चलता ही रहता है। तुम चित्र भी बनाते हो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का। यह हैं देवतायें। त्रिमूर्ति दिखाते हैं, उसमें ऊंच ते ऊंच शिव को दिखाते नहीं हैं। उनको अलग कर देते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्थापना, सो तो अब हो रही है। तुम अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हो। राजधानी में तो सब प्रकार के पद होते हैं। प्रेजीडेंट है, प्राइम मिनिस्टर है, चीफ मिनिस्टर है। यह सब होते हैं राय देने वाले। सतयुग में राय देने वाले कोई चाहिए नहीं। अभी जो तुमको राय अथवा श्रीमत मिलती है, वह अविनाशी बन जाती है। अभी देखो कितनी राय देने वाले हैं। ढेर के ढेर हैं। पैसे खर्च कर मिनिस्टर आदि बनते हैं - राय देने के लिए। खुद गवर्मेन्ट भी कहती है यह करेप्टिव हैं, बहुत खाते हैं। यह तो है ही कलियुग। वहाँ तो ऐसे होते नहीं। वज़ीर आदि की दरकार नहीं रहती। यह मत 21 जन्म चलती है। तुम्हारी सद्गति हो जाती है। वहाँ तो गुरू की भी दरकार नहीं रहती। सतयुग में न गुरू, न वज़ीर रहता है। अभी तुमको श्रीमत मिलती है अविनाशी 21 पीढ़ी के लिए, 21 बुढ़ापे के लिए। बूढ़ा बन फिर शरीर छोड़ जाए बच्चा बनेंगे। जैसे सर्प एक खाल छोड़ फिर दूसरी लेते हैं। जानवरों का मिसाल दिया जाता है। मनुष्यों में तो जरा भी अक्ल नहीं है क्योंकि पत्थरबुद्धि हैं।

बाप समझाते हैं मीठे-मीठे बच्चों, तुम ब्राह्मण-ब्राह्मणियां हो। ग्रंथ में भी पढ़ते सुनते तो सब हैं मूत पलीती कपड़ धोए... भगवान् को बुलाते हैं आकर मूत पलीती कपड़ा हम आत्माओं का धुलाई करो। हम सब आत्माओं के बाबा, आकर हमारा कपड़ा साफ करो। शरीर तो नहीं धोना है, आत्माओं को धोना है क्योंकि आत्मा ही पतित बनी है। पतित आत्माओं को आकर पावन बनाओ। तो बाप बच्चों को समझाते हैं मीठे-मीठे बच्चों, मुझे यहाँ आना पड़ता है। मैं ही ज्ञान का सागर हूँ, पवित्रता का सागर हूँ। तुम बेहद के बाप से बेहद का वर्सा लेते हो। हद के बाप से हद का वर्सा मिलता है। हद के वर्से में दु:ख बहुत है इसलिए बाप को याद करते हैं। अथाह दु:ख हैं। बाप ने कहा है यह 5 विकारों रूपी रावण तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है। यह आदि-मध्य-अन्त दु:ख देते हैं। हे मीठे बच्चों, अगर इस जन्म में ब्राह्मण बनकर काम पर जीत पहनी तो जगत जीत बनेंगे। तुम पवित्रता धारण करते हो देवता बनने के लिए। तुम आये हो आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करने। यह है पुरुषोत्तम संगमयुग। इसमें पुरुषार्थ कर पावन बनना है। कल्प पहले जितने पावन बने थे, सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी घराने के, वह जरूर बनेंगे। टाइम तो लगता है ना। बाप युक्ति बहुत सहज बताते हैं। अब बाप के बच्चे तो बने हो। यहाँ तुम किसके पास आये हो? वह तो है निराकार। उसने इस शरीर का लोन लिया है। वह खुद बताते हैं, यह है बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्त का जन्म। तो यह हुआ सबसे जास्ती पुराना तन। मैं आता ही हूँ पुरानी रावण की आसुरी दुनिया में और फिर उनके शरीर में जो अपने जन्मों को नहीं जानते हैं। यह है बहुत जन्मों के अन्त का जन्म। जबकि इनकी वानप्रस्थ अवस्था है, तब मैं प्रवेश करता हूँ। गुरू भी हमेशा वानप्रस्थ अवस्था में किया जाता है। कहते हैं ना 60 तो लगी लाठ। घर में रहेंगे तो बच्चों की लाठ लगेगी इसलिए भागो घर से। बच्चे ऐसे होते हैं जो बाप को लाठी मारने में भी देरी नहीं करते हैं। कहेंगे कहाँ मरे तो धन हमको मिले। वानप्रस्थियों के बहुत सतसंग होते हैं। तुम जानते हो - सर्व का सद्गति दाता एक है, वह संगमयुग पर ही आते हैं। सतयुग में जब तुम सद्गति पाते हो तो बाकी सब शान्तिधाम में रहते हैं। इसको कहा जाता है सर्व की सद्गति। बाप के सिवाए और तो कोई भी सद्गति दाता हो नहीं सकता। न किसको श्री कह सकते हैं, न श्री श्री। श्री अर्थात् श्रेष्ठ होते हैं देवतायें। श्री लक्ष्मी, श्री नारायण उनको कहा जाता है। उन्हों को बनाने वाला कौन? श्री श्री शिवबाबा को ही कहना चाहिए। तो बाप भूलें सिद्ध कर बताते हैं तुमने इतने गुरू किये फिर भी ऐसा ही होगा। तुम फिर वही गुरू आदि करेंगे। चक्र फिर वही रिपीट होगा। जब तुम स्वर्ग में रहते हो तो वहाँ हो सुखधाम में। पवित्रता सुख-शान्ति सब वहाँ है। वहाँ झगड़ा आदि होता नहीं। बाकी इतने सब शान्तिधाम में चले जाते हैं। भल सतयुग को लाखों वर्ष कह देते हैं। बाप कहते हैं लाखों वर्ष की बात है ही नहीं। यह तो 5 हज़ार वर्ष की बात है। कहते भी हैं मनुष्य के 84 जन्म। दिन-प्रतिदिन सीढ़ी नीचे उतरते तमोप्रधान बनते जाते हैं। तो बाप समझाते हैं - यह भी ड्रामा बना हुआ है। एक्टर्स होकर ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर, मुख्य एक्टर को न जानें तो क्या कहेंगे! बाप कहते हैं इस बेहद के ड्रामा को कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं। यह बाप आकर समझाते हैं। कहते भी हैं शरीर लेकर पार्ट बजाते हैं, तो नाटक हुआ ना। नाटक के मुख्य एक्टर्स कौन हैं? कोई बता नहीं सकेंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो यह बेहद का ड्रामा कैसे जूँ मिसल चलता है। टिक-टिक होती रहती है। मुख्य है ऊंच ते ऊंच बाबा, जो आकर समझाते भी हैं और सर्व की सद्गति भी करते हैं। सतयुग में दूसरे कोई होते नहीं। बहुत थोड़े हैं। वह थोड़े जो होंगे उन्होंने सबसे जास्ती भक्ति की होगी। तुम्हारे पास प्रदर्शनी वा म्युजियम में आयेंगे वह जिन्होंने बहुत भक्ति की है। एक शिव की भक्ति करना - इसको कहा जाता है अव्यभिचारी भक्ति। फिर बहुतों की भक्ति करते व्यभिचारी बन पड़ते हैं। अभी तो बिल्कुल ही तमोप्रधान भक्ति है। पहले सतोप्रधान भक्ति थी। फिर सीढ़ी उतरते तमोप्रधान बने हैं। ऐसी हालत जब होती है तब बाप आते हैं सबको सतोप्रधान बनाने। इस बेहद के ड्रामा को भी तुम अभी जानते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बेहद बाप से बेहद का वर्सा लेने के लिए पावन जरूर बनना है। जब अभी पवित्रता का वर्सा लो अर्थात् काम जीत बनो तब जगतजीत बन सकेंगे।

2) बेहद बाप से पढ़ाई पढ़कर स्वयं को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना है। बेहद का सुख लेना है। नशा रहे - मनुष्य से देवता बनाने वाला बाप अभी हमारे सम्मुख है, अभी है हमारा यह सर्वोत्तम ब्राह्मण कुल।

वरदान:-

अटल निश्चय द्वारा सहज विजय का अनुभव करने वाले सदा हर्षित, निश्चिंत भव

निश्चय की निशानी है सहज विजय। लेकिन निश्चय सब बातों में चाहिए। सिर्फ बाप में निश्चय नहीं, अपने आप में, ब्राह्मण परिवार में और ड्रामा के हर दृश्य में सम्पूर्ण निश्चय हो, थोड़ी सी बात में निश्चय टलने वाला न हो। सदा यह स्मृति रहे कि विजय की भावी टल नहीं सकती, ऐसे निश्चयबुद्धि बच्चे, क्या हुआ, क्यों हुआ... इन सब प्रश्नों से भी पार सदा निश्चिंत, सदा हर्षित रहते हैं।

स्लोगन:-

समय को नष्ट करने के बजाए फौरन निर्णय कर फैंसला करो।

06-05-2019

06-05-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए ऐसा ट्रस्टी बनो जो किसी भी चीज़ में आसक्ति न रहे, हमारा कुछ भी नहीं, ऐसा बेगर बन जाओ”

प्रश्नः-

तुम बच्चों के पुरूषार्थ की मंज़िल कौन-सी है?

उत्तर:-

आप मरे मर गई दुनिया - यही है तुम्हारी मंज़िल। शरीर से ममत्व टूट जाए। ऐसा बेगर बनो जो कुछ भी याद न आये। आत्मा अशरीरी बन जाये। बस, हमको वापिस जाना है। ऐसा पुरूषार्थ करने वाले बेगर टू प्रिन्स बनते हैं। तुम बच्चे ही फ़कीर से अमीर, अमीर से फ़कीर बनते हो। जब तुम अमीर हो तो एक भी गरीब नहीं होता है।

ओम् शान्ति।

बाप बच्चों से पूछते हैं कि आत्मा सुनती है या शरीर सुनता है? (आत्मा) आत्मा सुनेगी जरूर शरीर द्वारा। बच्चे लिखते भी ऐसे हैं फलाने की आत्मा बापदादा को याद करती है। फलाने की आत्मा आज फलानी जगह जाती है। यह जैसे आदत पड़ जाती है, हम आत्मा हैं क्योंकि बच्चों को आत्म-अभिमानी बनना है। जहाँ भी देखते हो, जानते हो आत्मा और शरीर है और इनमें हैं दो आत्मायें। एक को आत्मा और एक को परम आत्मा कहते हैं। परमात्मा खुद कहते हैं मै इस शरीर में, जिसमें इनकी आत्मा भी प्रवेश रहती है, मैं प्रवेश करता हूँ। शरीर बिगर तो आत्मा रह नहीं सकती। अब बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो। अपने को आत्मा समझेंगे तब बाप को याद करेंगे और पवित्र बन शान्तिधाम में जायेंगे और फिर दैवीगुण भी जितना धारण कर और करायेंगे, स्वदर्शन चक्रधारी बनकर और बनायेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। इसमें कोई मूंझते हो तो पूछ सकते हो। यह तो जरूर है मैं आत्मा हूँ, बाप बच्चों को ही कहते हैं जो ब्राह्मण बने हैं। दूसरों को नहीं कहेंगे। बच्चे ही प्रिय लगते हैं। हर एक बाप को बच्चे प्रिय लगते हैं। दूसरे को भल बाहर से प्यार करेंगे परन्तु बुद्धि में है - यह हमारे बच्चे नहीं हैं। मैं बच्चों से ही बात करता हूँ क्योंकि बच्चों को ही पढ़ाना है। बाकी बाहर वालों को पढ़ाना तुम्हारा काम है। कोई तो झट समझ जाते हैं, कोई थोड़ा समझकर चले जायेंगे। फिर जब देखेंगे यहाँ तो बहुत वृद्धि हो रही है तब आयेंगे, देखें तो सही। तुम यही समझायेंगे कि बाप सभी आत्माओं वा बच्चों को कहते हैं मुझे याद करो। सभी आत्माओं को पावन बाप ही बनाते हैं। वह कहते हैं मेरे सिवाए और कोई को याद न करो। मेरी अव्यभिचारी याद रखो तो तुम्हारी आत्मा पावन बन जायेगी। पतित-पावन मैं एक ही हूँ। मेरी याद से ही आत्मा पावन बनेगी इसलिए कहते हैं - बच्चों, मामेकम् याद करो। बाप ही पतित राज्य से पावन राज्य बनाते हैं, लिबरेट करते हैं। कहाँ ले जाते हैं? शान्तिधाम फिर सुखधाम।

मूल बात ही है पावन बनने की। 84 का चक्र समझाना भी सहज है। चित्र देखने से ही निश्चय बैठ जाता है इसलिए बाबा हमेशा कहते रहते हैं म्युज़ियम खोलो - भभके से। तो मनुष्यों को भभका खींचेगा। बहुत आयेंगे, तुम यही सुनायेंगे कि हम बाप की श्रीमत पर यह बन रहे हैं। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो और दैवीगुण धारण करो। बैज तो जरूर साथ होना चाहिए। तुम जानते हो हम बेगर टू प्रिन्स बनेंगे। पहले तो कृष्ण बनेंगे ना। जब तक कृष्ण न बनें तब तक नारायण बन न सकें। बच्चे से बड़ा हो तब नारायण नाम मिले। तो इनमें दोनों चित्र हैं। तुम यह बनते हो। अभी तुम सब बेगर बने हुए हो। यह ब्रह्माकुमार-कुमारियां भी बेगर्स हैं, इनके पास कुछ भी नहीं है। बेगर अर्थात् जिनके पास कुछ भी न हो। कोई-कोई को हम बेगर नहीं कहेंगे। यह बाबा तो है सबसे बड़ा बेगर। इसमें पूरा बेगर बनना होता है। गृहस्थ व्यवहार में रहते आसक्ति तोड़नी होती है। तुमने ड्रामा अनुसार आसक्ति तोड़ दी है। निश्चयबुद्धि ही जानते हैं, हमारा जो कुछ है वह बाबा को दे दिया। कहते भी हैं ना - हे भगवान्, आपने जो कुछ दिया है वह आपका ही है, हमारा नहीं है। वह तो होता है भक्ति मार्ग। उस समय तो बाबा दूर था। अब बाबा बहुत नज़दीक है। सामने उनका बनना होता है।

तुम कहते हो बाबा, बाबा के शरीर को नहीं देखना है। बुद्धि चली जाती है ऊपर। भल यह लोन लिया हुआ शरीर है परन्तु तुम्हारी बुद्धि में है हम शिवबाबा से बात करते हैं। यह तो किराये पर लिया हुआ रथ है। उनका थोड़ेही है। यह तो जरूर है, जितना बड़ा आदमी होगा तो किराया भी बहुत मिलेगा। मकान मालिक देखेगा - राजा मकान लेते हैं तो एक हज़ार किराये का 4 हज़ार बोल देगा क्योंकि समझते हैं यह तो धनवान है। राजे लोग कभी भी बोलेंगे नहीं कि यह तो जास्ती लेते हो। नहीं, उन्हों को पैसे आदि की परवाह ही नहीं रहती है। वह खुद कोई से बात नहीं करते हैं। प्राइवेट पोटरी ही बात करते हैं। आजकल तो रिश्वत बिगर काम नहीं चलता। बाबा तो बहुत अनुभवी है। वो लोग बड़े रॉयल होते हैं। चीज़ पसन्द की बस, फिर पोटरी को कहेंगे इनसे फैंसला कर ले आओ। ऐसे माल खोल कर रखेंगे। महाराजा-महारानी दोनों आयेंगे, जो चीज़ पसन्द होगी उन पर सिर्फ आंख से इशारा करेंगे। पोटरी बात कर, बीच में अपना हिस्सा निकाल लेते हैं। कोई-कोई राजायें साथ में पैसा ले आते, पोटरी को कहेंगे इनको पैसा दे दो। बाबा तो सबके कनेक्शन में आये हैं। जानते हैं कैसे-कैसे उन्हों की एक्ट चलती है। जैसे राजाओं के पास खजांची रहते हैं, वैसे यहाँ भी शिवबाबा का खजांची है। यह तो ट्रस्टी है। बाबा का इनमें कोई मोह नहीं है, इसने अपने पैसे में ही मोह नहीं रखा, सब कुछ शिवबाबा को दे दिया तो फिर शिवबाबा के धन में मोह कैसे रखेंगे। यह ट्रस्टी है। जिनके पास धन रहता है, आजकल तो गवर्मेन्ट कितना जांच करती है। विलायत से आते हैं तो एकदम अच्छी रीति जांच करते हैं।

अब तुम बच्चे जानते हो कैसे बेगर बनना है। कुछ भी याद न आये। आत्मा अशरीरी बन जाये। इस शरीर को भी अपना न समझे। हमारा कुछ भी न रहे। बाप समझाते हैं, अपने को आत्मा समझो, अभी तुमको वापिस जाना है। तुम जानते हो बेगर कैसे बनना होता है। शरीर से भी ममत्व टूट जाए। आप मुये मर गई दुनिया। यह मंज़िल है। समझते हो बाबा ठीक कहते हैं। अब हमको वापिस जाना है। शिवबाबा को तुम जो कुछ देते हो, उसका फिर रिटर्न में दूसरे जन्म में मिल जाता है इसलिए कहते हैं यह सब कुछ ईश्वर ने ही दिया है। आगे जन्म में ऐसा अच्छा कर्म किया है, जिसका फल मिला है। शिवबाबा रखता किसका भी नहीं है। बड़े बड़े राजायें, ज़मीदार आदि होते हैं तो उनको नज़राना भी देते हैं। फिर कोई नज़राना लेते, कोई नहीं लेते। वहाँ तो तुम कुछ भी दान-पुण्य नहीं करते हो क्योंकि वहाँ तो सबके पास पैसे बहुत हैं। दान किसको करेंगे। गरीब तो वहाँ होते नहीं। तुम ही फ़कीर से अमीर और अमीर से फ़कीर बनते हो। कहते हैं ना इनको तन्दुरूस्ती बख्शो। कृपा करो। यह करो। आगे शुरू में भी शिवबाबा से ही मांगते थे। फिर व्यभिचारी बन गये हैं तो सबके आगे जाते रहते हैं। कहते हैं झोली भर दो। कितने पत्थरबुद्धि हैं। कहते भी हैं पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाते हैं। तो तुम बच्चों को खुशी बहुत रहनी चाहिए। गायन भी है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोपी वल्लभ के गोप-गोपियों से पूछो। किसको बहुत फायदा होता है तो बहुत खुशी होती है। तो तुम बच्चों को भी बहुत खुशी रहनी चाहिए। तुमको 100 परसेन्ट खुशी थी फिर घटती गई। अब तो कुछ भी नहीं है। पहले थी बेहद की बादशाही। फिर होती है हद की राजाई, अल्पकाल के लिए। अब बिरला के पास कितनी ढेर मिलकियत है। मन्दिर बनाते हैं, उससे कुछ भी नहीं मिलता। गरीबों को थोड़ेही कुछ देते हैं। मन्दिर बनाया, जहाँ मनुष्य आकर माथा टेकेंगे। हाँ, गरीब को दान में देते हैं तो उसका रिटर्न में मिल सकता है। धर्मशाला बनाते हैं तो बहुत मनुष्य जाकर वहाँ विश्राम पाते हैं तो दूसरे जन्म में अल्पकाल के लिए सुख मिल जाता है। कोई हॉस्पिटल बनाता है तो भी अल्पकाल के लिए सुख मिलता है एक जन्म के लिए। तो बेहद का बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं, इस पुरूषोत्तम संगमयुग की बहुत महिमा है। तुम्हारी भी बहुत महिमा है जो तुम पुरूषोत्तम बनते हो। तुम ब्राह्मणों को ही भगवान् आकर पढ़ाते हैं। वही ज्ञान का सागर है। इस सारे मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष का बीजरूप है। सारे ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। तुमसे पूछेंगे क्या तुमको पढ़ाते हैं! बोलो, क्या यह भूल गये हो - गीता में भगवानुवाच है ना, मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। इसका अर्थ तुम अभी समझते हो। पतित राजायें पावन राजाओं की पूजा करते हैं इसलिए बाप कहते है तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे ना। स्वर्ग के देवताओं को द्वापर-कलियुग में सब नमन-पूजन करते हैं। इन बातों को अभी तुम समझते हो। भक्त लोग कुछ भी समझते थोड़ेही हैं। वह तो सिर्फ शास्त्रों की कहानियाँ पढ़ते-सुनते रहते हैं। बाप कहते हैं - तुम जो गीता आधाकल्प से पढ़ते सुनते आये हो, उससे कुछ प्राप्ति हुई? पेट तो कुछ भी भरा नहीं। अभी तुम्हारा पेट भर रहा है। तुम जानते हो यह पार्ट एक ही बार चलता है। खुद भगवान् कहते हैं मैं इस तन में प्रवेश करता हूँ। बाप इनके द्वारा बोलते हैं तो जरूर प्रवेश करेंगे। ऊपर से डायरेक्शन देंगे क्या! कहते हैं मैं सम्मुख आता हूँ। अभी तुम सुन रहे हो। यह ब्रह्मा भी कुछ नहीं जानते थे। अभी जानते जाते हैं। बाकी गंगा का पानी पावन करने वाला नहीं है, यह है ज्ञान की बात। तुम जानते हो बाप सम्मुख बैठे हैं, तुम्हारी बुद्धि अब ऊपर में नहीं जायेगी, यह है उनका रथ, इनको बाबा बूट भी कहते हैं, डिब्बी भी कहते हैं। इस डिब्बी में वह हीरा है। कितनी फर्स्टक्लास चीज़ है। इनको तो रखना चाहिए सोने की डिब्बी में। गोल्डन एज़ड डिब्बी बनाते हैं। बाबा कहते हैं ना - धोबी के घर से गई छू। इनको कहते हैं छू मंत्र। छू मंत्र से सेकण्ड में जीवनमुक्ति, इसलिए उनको जादूगर भी कहते हैं। सेकण्ड में निश्चय हो जाता है - हम यह बनेंगे। यह बातें अभी तुम प्रैक्टिकल में सुनते हो। पहले जब सत्य नारायण की कथा सुनते थे तो यह समझते थे क्या? उस समय तो कथा सुनते समय विलायत, स्टीमर आदि याद रहता है। सत्य नारायण की कथा सुनकर फिर मुसाफिरी पर जाते थे। वह तो फिर लौट आते थे। बाप तो कहते हैं तुमको फिर इस छी-छी दुनिया में लौटना नहीं है। भारत अमरलोक, स्वर्ग देवी-देवताओं का राज्य था। यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक हैं ना। इनके राज्य में पवित्रता, सुख, शान्ति थी। दुनिया भी यह मांगती है - विश्व में शान्ति हो, सब मिलकर एक हो जाएं। अब इतने सब धर्म मिलकर एक कैसे होंगे! हर एक का धर्म अलग, फीचर्स अलग-अलग सब एक कैसे होंगे! वह तो है ही शान्तिधाम, सुखधाम। वहाँ एक धर्म, एक राज्य होता है। दूसरा कोई धर्म ही नहीं, जो ताली बजे। उसको विश्व में शान्ति कहा जाता है। अभी तुम बच्चों को बाप पढ़ा रहे हैं। यह भी जानते हो सब बच्चे एकरस नहीं पढ़ते हैं। नम्बरवार तो होते ही हैं। यह भी राजधानी स्थापन हो रही है। बच्चों को कितना समझदार बनाया जाता है।

यह है ईश्वरीय युनिवर्सिटी। भक्त लोग समझते नहीं। अनेक बार सुना भी है - भगवानुवाच क्योंकि गीता ही भारतवासियों का धर्मशास्त्र है। गीता की तो अपरमअपार महिमा है। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी भगवत गीता है। शिरोमणी अर्थात् श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ पतित-पावन सद्गति दाता है ही एक भगवान्, जो सभी आत्माओं का बाप है। भारतवासी अर्थ को समझते नहीं हैं। बेसमझी से सिर्फ कह देते हैं सब भाई-भाई हैं। अभी तुमको बाप ने समझाया है हम भाई-भाई हैं। हम शान्तिधाम के रहने वाले हैं। यहाँ पार्ट बजाते-बजाते हम बाप को भी भूल जाते हैं, तो घर को भी भूल जाते हैं। जो बाप भारत को सारे विश्व का राज्य देते हैं, उनको सब भूल जाते हैं। यह सब राज़ बाप ही समझाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने के लिए स्मृति रहे कि यही पुरूषोत्तम संगमयुग है जबकि हमें भगवान् पढ़ाते हैं, जिससे हम राजाओं का राजा बनेंगे। अभी ही हमें ड्रामा के आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान है।

2) अब वापस घर जाना है इसलिए इस शरीर से भी पूरा बेगर बनना है। इसे भूल अपने को अशरीरी आत्मा समझना है।

वरदान:-

बाप समान रहमदिल बन सबको क्षमा कर स्नेह देने वाले मास्टर दाता भव

जैसे बाप को रहमदिल, मर्सीफुल कहते हैं, ऐसे आप बच्चे भी मास्टर रहमदिल हो। जो रहमदिल हैं वही कल्याण कर सकते हैं, अकल्याण करने वाले को भी क्षमा कर सकते हैं। वह मास्टर स्नेह के सागर होते हैं, उनके पास स्नेह के बिना और कुछ है ही नहीं। वर्तमान समय सम्पत्ति से भी ज्यादा स्नेह की आवश्यकता है इसलिए मास्टर दाता बन सबको स्नेह देते चलो। कोई भी खाली हाथ न जाये।

स्लोगन:-

तीव्र पुरुषार्थी बनने की चाहना हो तो जहाँ चाह है वहाँ राह मिल जायेगी।

07-05-2019

07-05-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - याद की यात्रा में रहो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे, क्योंकि याद है तलवार की धार, इसमें अपने आपको ठगना नहीं”

प्रश्नः-

बच्चों को कैरेक्टर सुधारने के लिए बाप कौन-सा रास्ता बताते हैं?

उत्तर:-

बच्चे, अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखो। चार्ट रखने से ही कैरेक्टर सुधरेंगे। देखना है कि सारे दिन में हमारा कैरेक्टर कैसा रहा? किसी को दु:ख तो नहीं दिया? फालतू बात तो नहीं की? आत्मा समझकर बाप को कितना समय याद किया? कितनों को आप समान बनाया? ऐसा जो पोतामेल रखते उनका कैरेक्टर सुधरता जाता है। जो करेगा सो पायेगा। नहीं करेगा तो पछतायेगा।

ओम् शान्ति।

रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ समझाते हैं क्योंकि यहाँ सम्मुख है। ऐसे नहीं कहेंगे कि सभी बच्चे अपने स्वधर्म में रहते हैं और बाप को याद करते हैं। कहाँ-कहाँ बुद्धि जरूर जाती होगी। वह तो हर एक अपने को समझ सकते हैं। मूल बात है सतोप्रधान बनने की। सो तो याद की यात्रा के सिवाए बन नहीं सकेंगे। भल बाबा सुबह में योग में बैठ बच्चों को खींचते हैं, कशिश करते हैं। नम्बरवार खींचते जाते हैं। याद में शान्ति में रहते हैं। दुनिया को भी भूल जाते हैं। परन्तु सवाल है - सारे दिन में क्या करते? वह तो हुई सुबह में घण्टा आधा घण्टा याद की यात्रा, जिससे आत्मा पवित्र बनती है, आयु बढ़ती है। परन्तु सारे दिन में कितना याद करते हैं? कितना स्वदर्शन चक्रधारी बनते हैं? ऐसे नहीं, बाबा तो सब कुछ जानते हैं। अपने दिल से पूछना है कि हमने सारा दिन क्या किया? अभी तुम बच्चे चार्ट लिखते हो। कोई राइट लिखते हैं, कोई रांग लिखते हैं। समझेंगे हम तो शिवबाबा के ही साथ थे। शिवबाबा को ही याद करते थे परन्तु सचमुच याद में थे? बिल्कुल साइलेन्स में रहने से फिर यह दुनिया भी भूल जाती है। अपने को ठगना नहीं है कि हम तो शिवबाबा की याद में हैं। देह के सब धर्म भूल जाने चाहिए। हमको शिवबाबा कशिश कर सारी दुनिया भुलाते हैं। बाप समझाते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। बाप तो कशिश करते हैं। सभी आत्मायें बाप को याद करें और कोई याद न आये। परन्तु सचमुच याद आती है वा नहीं, वह तो खुद पोतामेल निकालें। कितना हम बाबा को याद करते हैं? जैसे आशिक-माशूक का मिसाल है। यह आशिक-माशूक रूहानी हैं। बातें ही न्यारी हैं, वह जिस्मानी, यह रूहानी। देखना है - हम कितना समय दैवी गुणों में रहे? कितना समय बाप की सेवा में रहे? फिर औरों को भी याद दिलानी है। आत्मा पर जो कट चढ़ी हुई है वह याद के बिगर तो उतरेगी नहीं। भक्ति में अनेकों को याद करते हो। यहाँ याद करना है एक को। हम आत्मा छोटी बिन्दी हैं। तो बाबा भी छोटी बिन्दी बहुत-बहुत सूक्ष्म है। और नॉलेज है बड़ी। श्री लक्ष्मी वा नारायण बनना, विश्व का मालिक बनना कोई मासी का घर नहीं है। बाप कहते हैं अपने को मिया-मिट्ठू समझ ठगी नहीं करना। अपने से पूछो - सारे दिन में हमने अपने को आत्मा समझ बाप को कितना याद किया, जो कट निकले? कितनों को आपसमान बनाया? यह पोतामेल हर एक को अपना रखना है। जो करेगा वह पायेगा, नहीं करेगा तो पछतायेगा। देखना है हमारा कैरेक्टर सारे दिन में कैसा रहा? कोई को दु:ख तो नहीं दिया या फालतू बात तो नहीं की? चार्ट रखने से कैरेक्टर सुधरेगा। बाप ने रास्ता तो बताया है।

आशिक-माशूक एक-दो को याद करते हैं। याद करते ही वह सामने खड़ा हो जाता है। दो स्त्रियां (फीमेल) हैं तो भी साक्षात्कार हो सकता है, दोनों पुरुष (मेल) हैं तो भी साक्षात्कार हो सकता है। कोई-कोई मित्र भाई से भी बहुत तीखे होते हैं। मित्रों का आपस में इतना लव हो जाता है जो भाइयों से भी न हो। एक-दो को बहुत अच्छा प्यार से उठा लेते हैं। बाबा तो अनुभवी है ना। तो सवेरे में बाप जास्ती कशिश करता है। चुम्बक है, एवर प्योर, तो वह खींचता है। बाप तो बेहद का है ना। समझते हैं यह तो बहुत लवली बच्चे हैं। बहुत जोर से कशिश करते हैं। परन्तु यह याद की यात्रा बहुत जरूरी है। कहाँ भी जाते हो, मुसाफिरी करते हो, उठते, बैठते, खाते याद कर सकते हो। आशिक-माशूक कहाँ भी याद करते हैं ना। यह भी ऐसे है। बाप को याद तो करना ही है, नहीं तो विकर्म कैसे विनाश होंगे। और कोई उपाय है नहीं। यह बहुत महीन है। तलवार की धार से चलना होता है। याद है तलवार की धार। घड़ी-घड़ी कहते हैं याद भूल जाती है। तलवार क्यों कहते हैं? क्योंकि इनसे पाप कटेंगे, तुम पावन बनेंगे। यह बहुत नाज़ुक है। जैसे वो लोग आग से पार करते हैं, तुम्हारा फिर बुद्धियोग चला जाता है बाप के पास। बाप आये हैं यहाँ, हमको वर्सा देते हैं। ऊपर में नहीं हैं, यहाँ आये हैं। कहते हैं साधारण तन में आता हूँ। तुम जानते हो बाप ऊपर से नीचे आया है। चैतन्य हीरा इस डिब्बी में बैठा है। सिर्फ इसमें खुश नहीं होना है कि हम बाबा के साथ बैठे हैं। यह तो बाबा जानते हैं, बहुत कशिश करते हैं। परन्तु यह तो हुआ आधा पौना घण्टा। बाकी सारा दिन वेस्ट गँवाया तो इससे क्या फायदा। बच्चों को अपने चार्ट का ओना रखना है। ऐसे नहीं, हम तो भाषण कर सकते हैं, चार्ट रखने की हमको क्या दरकार है! यह भूल नहीं करनी है। महारथियों को भी चार्ट रखना है। महारथी बहुत नहीं हैं, गिने चुने हैं। बहुतों का नाम-रूप आदि में बहुत टाइम वेस्ट जाता है। मंज़िल बहुत ऊंची है। बाप सब कुछ समझा देते हैं, जो स्टूडेन्ट ऐसा न समझें कि बाबा ने फलानी प्वाइंट नहीं समझाई। यह है मुख्य - याद और सृष्टि चक्र की नॉलेज। इस सृष्टि चक्र के 84 जन्मों को तो कोई नहीं जानते - सिवाए तुम बच्चों के। वैराग्य भी तुमको आयेगा। तुम जानते हो अब इस मृत्युलोक में रहने का नहीं है। जाने से पहले पवित्र बनना है। दैवीगुण भी जरूर चाहिए। नम्बरवार माला में पिरोने हैं। फिर नम्बरवार राजधानी में आने हैं। फिर नम्बरवार तुम्हारी भी पूजा होती है। अनेक देवताओं की पूजा होती है। क्या-क्या नाम रखते हैं। चण्डिका देवी का भी मेला लगता है। जो रजिस्टर नहीं रखते, वह सुधरते नहीं हैं। तो कहा जाता है यह तो चण्डिका है। सुनते ही नहीं हैं, मानते ही नहीं। यह फिर है बेहद की बातें। पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो बाप कहेंगे कि यह तो बाप को भी मानने वाले नहीं हैं। पद कम हो जायेगा इसलिए बाप कहते हैं अपने पर बहुत नज़र रखनी है। बाबा सवेरे आकर कितनी मेहनत कराते हैं याद के यात्रा की। यह बहुत भारी मंज़िल है। नॉलेज को तो सस्ती सब्जेक्ट कहेंगे। 84 का चक्र याद करना बड़ी बात नहीं है। बाकी भारी माल है याद की यात्रा, जिसमें फेल भी बहुत होते हैं। तुम्हारी युद्ध भी इसमें है। तुम याद करते हो, माया पिछाड़ देती है। नॉलेज में युद्ध की बात नहीं। वह तो सोर्स ऑफ इनकम है। यह तो पवित्र बनना है, इसलिए ही बाप को बुलाते हैं कि आकर पतित से पावन बनाओ। ऐसे नहीं कि आकर पढ़ाओ। कहेंगे पावन बनाओ। तो यह सब प्वाइंट बुद्धि में रखनी है। पूरा राजयोगी बनना है।

नॉलेज तो बड़ी सिम्पल है। सिर्फ युक्ति से समझाना होता है। जबान में मिठाज़ भी चाहिए। तुमको यह ज्ञान मिलता है। वह भी कर्मों अनुसार ही कहेंगे। शुरू से लेकर भक्ति की है तो यह अच्छे कर्म किये हैं इसलिए शिवबाबा भी अच्छी तरह बैठ समझाते हैं। जितनी जास्ती भक्ति की होगी, शिवबाबा राज़ी हुआ होगा तो अभी भी ज्ञान जल्दी उठायेंगे। महारथियों की बुद्धि में प्वाइंट्स होंगी। लिखते रहें तो अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स अलग करते रहें। प्वाइंट्स का वज़न करें। परन्तु ऐसी मेहनत कोई करता ही नहीं। मुश्किल कोई नोट्स रखते होंगे और अच्छी प्वाइंट्स निकाल अलग रखते होंगे। बाबा हमेशा कहते हैं भाषण करने से पहले लिखो, फिर जांच करो। ऐसी मेहनत करते नहीं। सब प्वाइंट्स किसको याद नहीं रहती हैं। बैरिस्टर लोग भी प्वाइंट्स नोट करते हैं, डायरी में। तुमको तो बहुत जरूरी है। टॉपिक्स लिखकर फिर पढ़ना चाहिए, करेक्शन करना चाहिए। इतनी मेहनत नहीं करेंगे तो उछल नहीं खायेंगे। तुम्हारा बुद्धियोग और-और तरफ भटकता रहेगा। बहुत थोड़े हैं जो सरलता से चलते हैं। सर्विस बिगर और कुछ भी बुद्धि में रहता नहीं। माला में आना है तो मेहनत करनी चाहिए। बाप तो मत देते हैं फिर दिल से लगता है। याद नहीं तो वह खुद जानें। भल धन्धाधोरी आदि करो परन्तु डायरी तो सदा पॉकेट में होनी चाहिए नोट करने लिए। सबसे जास्ती तुमको नोट करना चाहिए। अलबेले रहेंगे, अपने को मिया मिट्ठू समझेंगे तो माया भी कोई कम नहीं। घूँसा लगाती रहेगी। लक्ष्मी-नारायण बनना मासी का घर थोड़ेही है। बड़ी राजधानी स्थापन हो रही है, कोटों में कोई निकलेंगे। बाबा भी सवेरे दो बजे उठकर लिखते थे फिर पढ़ते थे। प्वाइंट भूल जाती थी फिर बैठ देखते थे - तुमको समझाने के लिए। तो समझा जाता है कि अब तक याद की यात्रा कहाँ है। कहाँ है कर्मातीत अवस्था। मुफ्त में किसकी बड़ाई नहीं करनी होती है। बड़ी मेहनत है, कर्मभोग होता है। याद करना पड़ता है। अच्छा, समझो मुरली ब्रह्मा नहीं, शिवबाबा चलाते हैं। बच्चों को सदैव समझाते हैं कि शिवबाबा ही तुम्हें सुनाते हैं, कभी बीच में यह बच्चा भी बोल देते हैं। बाप तो बिल्कुल एक्यूरेट ही कहेंगे। इनको तो सारा दिन बहुत ख्यालात करने होते हैं। कई बच्चों की रेसपॉन्सिबिलिटी है। बच्चे नाम-रूप में फँस चलायमान हो जाते हैं। ढेर बच्चों के ख्यालात रहते हैं - बच्चों के लिए मकान बनाने हैं, यह प्रबन्ध करना है। है तो यह सब ड्रामा। बाबा का भी ड्रामा, इनका भी ड्रामा, तुम्हारा भी ड्रामा। ड्रामा बिगर कोई चीज़ होती ही नहीं। सेकण्ड-सेकण्ड ड्रामा चलता रहता है। ड्रामा को याद करने से हिलेंगे नहीं। अडोल, अचल, स्थेरियम रहेंगे। त़ूफान तो बहुत आयेंगे। कई बच्चे सच नहीं बताते हैं। स्वप्न भी ढेर आते हैं। माया है ना। जिन्हें पहले नहीं आते थे उन्हें भी आयेंगे। बाप समझ जाते हैं, बच्चों को वर्सा पाने के लिए याद में मेहनत करनी पड़ती है। कोई-कोई मेहनत करते-करते थक जाते हैं। मंज़िल बड़ी भारी है। 21 पीढ़ी विश्व का मालिक बनाते हैं, तो मेहनत भी करनी पड़े ना। लवली बाप को याद करना पड़े। दिल में रहता है बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। ऐसे बाप को तो घड़ी-घड़ी याद करना पड़े। सबसे प्यारा बाबा है। यह बाबा तो कमाल करते हैं, विश्व की नॉलेज देते हैं। बाबा, बाबा, बाबा कहकर अन्दर में महिमा गानी पड़े। जो याद करते होंगे, उनको बाप की कशिश होती होगी। यहाँ आते ही हैं बाप से रिफ्रेश होने। तो बाप समझाते हैं - मीठे बच्चे, ग़फलत नहीं करनी है। बाबा देखते हैं सभी सेन्टर्स से आते हैं। देखता हूँ, पूछता हूँ, किस प्रकार की खुशी है? बाबा जांच तो करते हैं ना। शक्ल से भी देखते हैं - बाप से कितना लव है? बाप के सामने आते हैं तो बाप कशिश भी करते हैं। यहाँ बैठे-बैठे सब भूल जाता है। बाबा बिगर कुछ भी नहीं, सारी दुनिया को भुलाना ही है। वह अवस्था बड़ी मीठी अलौकिक होती है। बाप की याद में आकर बैठते हैं तो प्रेम के आंसू भी आते हैं। भक्ति मार्ग में भी आंसू आते हैं। परन्तु भक्ति मार्ग अलग है, ज्ञान मार्ग अलग है। यह है सच्चे बाप के साथ सच्चा प्रेम। यहाँ की बात ही न्यारी है। यहाँ तुम शिवबाबा के पास आते हो, जरूर रथ पर सवार होगा। बिगर शरीर आत्मायें तो वहाँ मिल सकती, यहाँ तो सब शरीरधारी हैं। जानते हैं यह बापदादा है। तो बाप को याद करना ही पड़े। बहुत प्यार से महिमा करनी पड़े। बाबा हमको क्या देते हैं!

तुम बच्चे जानते हो बाबा आया है हमें इस जंगल से ले जाते हैं। मंगलम् भगवान् विष्णु कहा जाता है ना। सबका मंगल करने वाला है, सबका कल्याण होता है। एक ही बाप है तो उनको याद करना है। हम क्यों नहीं किसका कल्याण कर सकते! जरूर कोई खामी है। बाप कहते हैं याद का जौहर नहीं है इसलिए वाणी में भी कशिश नहीं होती है। यह भी ड्रामा। अब फिर अच्छी तरह जौहर धारण करो। याद की यात्रा ही मुश्किल है। हम भाई को ज्ञान देते हैं। बाप का परिचय देते हैं। बाप से वर्सा पाना है। बाबा फील करते हैं, घड़ी-घड़ी भूल जाते होंगे। बाप तो सबको बच्चा समझते हैं, तब तो बच्चे-बच्चे कहते हैं। यह बाप तो सबका है, वन्डरफुल पार्ट है ना इनका। बहुत थोड़े बच्चे समझते हैं कि यह अक्षर किसके हैं। बाबा तो बच्चे-बच्चे ही कहेंगे। आया ही हूँ बच्चों को वर्सा देने। बाबा सब सुना देते हैं। बच्चों से काम मुझे लेना है ना। यह बहुत वन्डरफुल चटपटी नॉलेज है। यह नॉलेज अटपटी और खटपटी भी है। वैकुण्ठ का मालिक बनने के लिए नॉलेज भी ऐसी चाहिए ना।

अच्छा, हरेक को बाप को याद करना है, दैवीगुण धारण करने हैं। मुख से कभी उल्टे-सुल्टे अक्षर नहीं बोलने हैं। प्यार से काम निकालना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सवेरे-सवेरे एकान्त में बैठ प्रेम से बाप को याद करना है। सारी दुनिया को भूल जाना है।

2) बाप समान सबका कल्याणकारी बनना है, खामियां निकाल देनी है। अपने ऊपर बहुत नज़र रखनी है। अपना रजिस्टर स्वयं ही देखना है।

वरदान:-

तीन स्मृतियों के तिलक द्वारा श्रेष्ठ स्थिति बनाने वाले अचल-अडोल भव

बापदादा ने सभी बच्चों को तीन स्मृतियों का तिलक दिया है, एक स्व की स्मृति फिर बाप की स्मृति और श्रेष्ठ कर्म के लिए ड्रामा की स्मृति। जिन्हें यह तीनों स्मृतियां सदा हैं उनकी स्थिति भी श्रेष्ठ है। आत्मा की स्मृति के साथ बाप की स्मृति और बाप के साथ ड्रामा की स्मृति अति आवश्यक है क्योंकि कर्म में अगर ड्रामा का ज्ञान है तो नीचे ऊपर नहीं होंगे। जो भी भिन्न-भिन्न परिस्थितियां आती हैं, उसमें अचल-अडोल रहेंगे।

स्लोगन:-

दृष्टि को अलौकिक, मन को शीतल और बुद्धि को रहमदिल बनाओ।

26-03-2019

26-03-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


“मीठे बच्चे - बाप की सकाश लेने के लिए खुशबूदार फूल बनो, सवेरे-सवेरे उठकर याद में बैठ प्यार से बाबा से मीठी-मीठी बातें करो''

प्रश्नः-

बाप को सब बच्चे नम्बरवार याद करते हैं लेकिन बाप किन बच्चों को याद करते हैं?

उत्तर:-

जो बच्चे बहुत मीठे हैं, जिन्हें सर्विस के बिना और कुछ सूझता ही नहीं। जो अति प्रेम से बाप को याद करते, खुशी में प्रेम के आंसू बहाते। ऐसे बच्चों को बाप भी याद करते हैं। बाप की नज़र फूलों तरफ जाती है, कहेंगे फलानी आत्मा बड़ी अच्छी है, यह आत्मा जहाँ सर्विस देखती, भागती रहती है, अनेकों का कल्याण करती है। तो बाप उसे याद करते हैं।

ओम् शान्ति।

बाप बैठकर सब आत्माओं को समझाते हैं। शरीर भी याद पड़ता तो आत्मा भी याद पड़ती है। शरीर बिगर आत्मा को नहीं याद किया जा सकता। समझा जाता है यह आत्मा अच्छी है, यह बाह्य-मुखी है, यह इस दुनिया का सैर आदि करना चाहती है। यह उस दुनिया को भूली हुई है। पहले उनका नाम-रूप सामने आता है। फलाने की आत्मा को याद किया जाता है। फलाने की आत्मा अच्छी सर्विस करती है, इनका बुद्धियोग बाबा के साथ है, इनमें यह यह गुण हैं। पहले शरीर को याद करने से फिर आत्मा याद आती है। पहले शरीर याद आयेगा क्योंकि शरीर बड़ी चीज़ है ना। फिर आत्मा जो सूक्ष्म बहुत छोटी है, वह याद आयेगी। इन बड़े शरीर की कोई महिमा नहीं की जाती है। महिमा आत्मा की ही की जाती है। इनकी आत्मा अच्छी सर्विस करती है। फलाने की आत्मा इनसे अच्छी है। पहले तो शरीर याद आता है। बाप को तो अनेक आत्माओं को याद करना पड़ता है। शरीर का नाम याद नहीं आता, सिर्फ रूप सामने आता है। फलाने की आत्मा कहने से शरीर जरूर याद पड़ता है। जैसे समझते हो इस दादा के शरीर में शिवबाबा आते हैं। जानते हैं इनके तन में बाबा है। शरीर जरूर याद पड़ेगा। पूछते हैं - हम कैसे याद करें? शिवबाबा को ब्रह्मा तन में याद करें या परमधाम में याद करें? बहुतों का प्रश्न उठता है। बाबा कहते हैं - याद तो आत्मा को ही करना है। परन्तु शरीर भी जरूर याद आता है। पहले शरीर फिर आत्मा। बाबा इनके शरीर में बैठा है तो जरूर शरीर याद आयेगा। फलाने शरीर वाली आत्मा में यह गुण हैं। बाबा भी देखते रहते हैं - कौन मुझे याद करते हैं, किसमें बहुत गुण हैं, किस-किस फूल में खुशबू है? फूलों से सबका प्यार होता है। गुलदस्ता बनाते हैं। उसमें राजा, रानी, प्रजा भिन्न-भिन्न फूल-पत्ते आदि सब बनाते हैं। बाप की नज़र फूलों की तरफ जायेगी। कहेंगे, फलाने की आत्मा बड़ी अच्छी है। बड़ी सर्विस करती है। आत्म-अभिमान में रह बाप को याद करते रहते हैं। जहाँ सर्विस देखते हैं वहाँ भागते हैं। फिर भी सवेरे उठकर याद में बैठते होंगे तो किसको याद करते होंगे? शिवबाबा परमधाम में याद आता होगा या मधुबन में याद आता होगा? बाबा याद आता होगा ना। इसमें शिवबाबा है क्योंकि बाप तो अभी नीचे आ गया। मुरली चलाने नीचे आये हैं। इनका अपने घर में तो कोई काम नहीं होगा। वहाँ जाकर क्या करेंगे? इस तन में ही प्रवेश करते हैं। तो पहले जरूर शरीर याद आयेगा फिर आत्मा। फलाने शरीर में जो आत्मा है यह अनन्य अच्छी है। इनको सर्विस बिगर कुछ सूझता नहीं है। बहुत मीठी है। बाबा बैठे रहते हैं, सबको देखते रहते हैं। फलानी बच्ची बहुत अच्छी है, बहुत याद करती है। बांधेली बच्चियों को विकार के लिए कितनी मार मिलती है! कितना प्रेम से याद करती होंगी! जब बहुत याद करती हैं तो खुशी के मारे प्रेम के आंसू भी आ जाते हैं। कभी-कभी वह आंसू गिर भी पड़ते हैं। बाबा को और धन्धा क्या है। सबको याद करते हैं। बहुत बच्चियां याद आती हैं। फलाने की आत्मा में दम नहीं है। बाप को याद नहीं करती। किसको सुख नहीं देती। यह अपना ही कल्याण नहीं करती। बाप तो यही जांच करते रहेंगे। याद करना माना सकाश देना। आत्मा का कनेक्शन परमात्मा के साथ रहता है ना। एक दिन आयेगा जबकि बच्चे योग में बहुत रहेंगे। यह भी किसको याद करेंगे तो झट साक्षात्कार होगा। आत्मा तो है छोटी बिन्दी। साक्षात्कार करें तो भी कोई समझ न सकें फिर भी शरीर ही याद आता है। आत्मा है छोटी परन्तु याद करती है तो उनकी आत्मा पावन बनती जाती है। बगीचे में वैराइटी फूल होते हैं। बाबा भी देखते हैं यह बहुत अच्छा खुशबूदार फूल है, यह इतना नहीं। तो पद भी कम होगा। बाबा के जो मददगार बनते हैं, वही ऊंच पद पाते हैं। वह भी जो बाप को याद करते रहते हैं। ब्राह्मण से ट्रॉन्सफर हो देवता बनते हैं। यह वर्णन भी संगम पर ही कर सकते हैं कि यह दैवी फूल है या आसुरी फूल है? फूल तो सब हैं परन्तु वैराइटी बहुत है। बाबा भी याद करते रहते हैं। टीचर अपने स्टूडेन्ट को याद करेंगे ना। यह कम पढ़ते हैं। दिल में तो समझेंगे ना। यह बाप भी है, टीचर भी है। बाप तो है ही। टीचरपने का जास्ती चलता है। टीचर को तो रोज़ पढ़ाना है। इस पढ़ाई की ताकत से वह पद पाते हैं। सुबह को तुम सब भाई बाप की याद में बैठते हो, वह सब्जेक्ट है याद की। फिर मुरली चलती है, वह है पढ़ाई की सब्जेक्ट। मुख्य है ही योग और पढ़ाई। उनको ज्ञान और विज्ञान भी कहा जाता है। यह ज्ञान-विज्ञान भवन है, जहाँ बाप आकर सिखलाते हैं। ज्ञान से सारे सृष्टि की नॉलेज मिल जाती है। विज्ञान माना तुम योग में रहते हो जिससे तुम पावन बन जाते हो। तुमको अर्थ का पता है। बाप बच्चों को देखते रहते हैं। देही-अभिमानी बनने से ही भूत निकलेंगे। ऐसे नहीं, सबके भूत फट से निकल जायेंगे। हिसाब-किताब जब चुक्तू हो फिर चलन अनुसार ही पद पायेंगे। क्लास ट्रांसफर होते हैं। इस दुनिया का ट्रांसफर नीचे हो रहा है और तुम्हारा ऊपर हो रहा है। कितना फ़र्क है। वह कलियुगी सीढ़ी नीचे उतरते जाते हैं और तुम पुरुषोत्तम संगमयुगी, सीढ़ी ऊपर चढ़ते जाते हो। दुनिया तो यही है, सिर्फ बुद्धि का काम है। तुम कहते हो हम संगमयुगी हैं। पुरुषोत्तम बनाने लिए बाप को आना पड़ता है। तुम्हारे लिए अब पुरुषोत्तम संगमयुग है। बाकी सब घोर अन्धियारे में हैं। भक्ति को वह बहुत अच्छा समझते हैं क्योंकि ज्ञान का उन्हों को मालूम ही नहीं है। तुमको अभी ज्ञान मिला है, तब तुम समझते हो। ज्ञान की एक चुटकी से आधाकल्प के लिए हम चढ़ जाते हैं। फिर वहाँ ज्ञान की बात भी नहीं होगी। यह सब बातें महारथी बच्चे ही सुनकर धारण कर और सुनाते रहेंगे। बाकी तो यहाँ से निकले और खलास। कर्म, अकर्म, विकर्म का राज़ भी भगवान् ही समझाते हैं। यह है कल्प का संगमयुग। जबकि पुरानी दुनिया ख़त्म हो नई दुनिया स्थापन होनी है। विनाश सामने खड़ा है। तुम संगमयुग पर खड़े हो और मनुष्यों के लिए कलियुग चल रहा है। कितना घोर अन्धियारा है। गिरते ही रहते हैं। कोई तो गिराने के निमित्त भी होगा। वह है रावण।

इस सभा में वास्तव में कोई पतित बैठ नहीं सकता। पतित वायुमण्डल को खराब करेंगे। अगर कोई छिप कर आकर बैठते हैं तो उनको चोट भी लगती है। एकदम गिर पड़ेंगे। ईश्वरीय सभा में कोई दैत्य आकर बैठते हैं तो झट पता पड़ेगा। पत्थरबुद्धि तो है ही, बाकी भी पत्थरबुद्धि हो जायेगा। सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा। अपने को नुकसान पहुँचायेंगे। कहते हैं हम देखेंगे इनको पता पड़ता है? हमको क्या पड़ी - जो करेगा, सो पायेगा। हमको जानने की जरूरत नहीं। बाप से सदैव सच्चा रहना है। कहते हैं सच तो बिठो नच। सच्चे रहेंगे तो अपनी राजधानी में भी डांस करेंगे। बाप है ही ट्रूथ (सत्य)। तो बच्चों को भी ट्रूथ बनना चाहिए। बाबा पूछते हैं - शिवबाबा कहाँ है? कहते हैं - इसमें है। परमधाम छोड़कर, दूर देश के रहने वाले आये देश पराये। उनको तो अब बहुत सर्विस करनी है। बाप कहते हैं - मुझे रात-दिन यहाँ सर्विस करनी पड़ती है। सन्देशियों को, भक्तों को साक्षात्कार कराना पड़ता है। है तो यहाँ ही। वहाँ तो कोई सर्विस नहीं। सर्विस बिगर बाबा को सुख न आये। सारी दुनिया की सर्विस करनी है। सब पुकारते हैं बाबा आओ। कहते हैं मैं इस रथ में आता हूँ। उन्होंने फिर घोड़े गाड़ी बना दी है। अब घोड़े गाड़ी में कृष्ण कैसे बैठेंगे! ऐसे भी नहीं कोई शौक होता है घोड़े-गाड़ी पर बैठने का।

देही-अभिमानी और देह-अभिमानी बनने की बातें संगमयुग पर ही होती हैं और सिवाए बाप के यह बातें और कोई समझा भी नहीं सकते हैं। तुम भी अभी जानते हो। पहले नहीं जानते थे। क्या कोई गुरू ने सिखाया? गुरू तो बहुत किये। कोई ने भी नहीं सिखाया। बहुत लोग गुरू करते हैं। समझते हैं कोई से शान्ति का रास्ता मिल जाए। बाप कहते हैं शान्ति का सागर तो एक बाप ही है, वह साथ ले जाते हैं। सुखधाम-शान्तिधाम का किसको पता ही नहीं है। कलियुग में है शूद्र वर्ण। पुरूषोत्तम संगमयुग पर है ब्राह्मण वर्ण। इन वर्णों का भी तुम्हारे सिवाए कोई को पता नहीं है। यहाँ तो सुनते हैं, बाहर निकलने से सब कुछ भूल जाते हैं। धारणा होती नहीं। बाप कहते हैं कहाँ भी जाते हो, बैज पड़ा हो। इसमें लज्जा की बात नहीं है। यह तो बाबा ने बहुत कल्याण के लिए बनाया है। किसको भी समझा कर दो। कोई सेन्सीबुल होगा तो कहेगा इस पर आपका खर्चा हुआ होगा। बोलो - खर्चा तो होता ही है। गरीबों के लिए फ्री है। वह धारणा कर लें तो ऊंच पद पा सकते हैं। गरीब के पास पैसे ही नहीं तो क्या करेंगे। कोई के पास पैसे हैं परन्तु मनहूस हैं। इसने प्रैक्टिकल करके दिखाया। सब कुछ माताओं के हवाले कर दिया। तुम बैठ सब कुछ सम्भालो क्योंकि अब तो यह ज्ञान मिला है कि पिछाड़ी में कुछ भी याद न आये। अन्तकाल जो स्त्री सिमरे....। बड़ी बिल्डिंग्स आदि होंगी तो अवश्य याद पड़ेंगी। परन्तु थोड़ा भी ज्ञान सुना तो प्रजा में जरूर आयेंगे। बाप तो है ही गरीब निवाज़। कोई-कोई के पास पैसे होते हैं तो भी मनहूस होते हैं। ऐसे नहीं समझते कि पहला वारिस तो शिवबाबा है। भगवान् वारिस तो भक्ति मार्ग में भी है। ईश्वर अर्थ देते हैं। क्या वह कंगाल है जो उनको देते हैं! समझते हैं ईश्वर के नाम पर गरीबों को देंगे तो ईश्वर एवज में देंगे। दूसरे जन्म में मिलता तो है। कहते हैं दे दान तो छूटे ग्रहण। बाप को सब कुछ दे दिया, शरीर, मित्र-सम्बन्धी आदि सब कुछ बाबा को समर्पण कर दिया। यह सब कुछ आपका है। इस समय सारी दुनिया पर ग्रहण लगा हुआ है। वह कैसे एक सेकण्ड में छूटता है, काले से गोरे कैसे बनते हैं, यह अब तुम ही जानते हो फिर औरों को समझाते हो। जो कहते हैं - हम अन्दर में समझते हैं परन्तु किसको समझा नहीं सकते हैं, वह भी कोई काम के नहीं। बाप कहते हैं - दे दान तो छूटे ग्रहण। हम तुमको अविनाशी रत्न देते हैं, वह सबको देते जाओ तो भारत पर वा सारी दुनिया पर जो राहू का ग्रहण बैठा हुआ है, वह उतर जाये और बृहस्पति की दशा हो जाये। सबसे अच्छी होती है बृहस्पति की दशा। अब तुम जानते हो भारत ख़ास और आम दुनिया पर राहू का ग्रहण लगा हुआ है। वह कैसे छूटे? यह तो बाप है ना। बाप तुम्हारे से पुराना लेकर नया देते हैं। इसको कहा जाता है बृहस्पति की दशा। मुक्तिधाम में जाने वालों के लिए बृहस्पति की दशा नहीं कहेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1. सदा खुशी में डांस करने के लिए सच्चे बाप से सदा सच्चा रहना है। कुछ भी छिपाना नहीं है।

2. बाप जो अविनाशी रत्न देते हैं, वह सबको बांटने हैं। साथ-साथ शिवबाबा को अपना वारिस बनाकर सब कुछ सफल करना है। इसमें मनहूस नहीं बनना है।

वरदान:-

गम्भीरता के गुण द्वारा फुल मार्क्स जमा करने वाले गम्भीरता की देवी वा देवता भव

वर्तमान समय गम्भीरता के गुण की बहुत-बहुत आवश्यकता है क्योंकि बोलने की आदत बहुत हो गई है, जो आता है वो बोल देते हो। किसी ने कोई अच्छा काम किया और बोल दिया तो आधा खत्म हो जाता है। आधा ही जमा होता है और जो गम्भीर होता है उसका फुल जमा होता है इसलिए गम्भीरता की देवी वा देवता बनो और अपनी फुल मार्क्स इक्ट्ठी करो। वर्णन करने से मार्क्स कम हो जायेंगी।

स्लोगन:-

बिन्दु रूप में स्थित रहो तो समस्याओं को सेकण्ड में बिन्दु लगा सकेंगे।

 

 

Subcategories