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20-10-19

20-10-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 24-02-85 मधुबन


संगम युग - सर्व श्रेष्ठ प्राप्तियों का युग

आज बापदादा चारों ओर के प्राप्ति स्वरूप विशेष आत्माओं को देख रहे थे। एक तरफ अनेक आत्मायें अल्पकाल के प्राप्ति वाली हैं जिसमें प्राप्ति के साथ-साथ अप्राप्ति भी है। आज प्राप्ति है कल अप्राप्ति है। तो एक तरफ अनेक प्राप्ति सो अप्राप्ति स्वरूप। दूसरे तरफ बहुत थोड़े सदाकाल की प्राप्ति स्वरूप विशेष आत्मायें। दोनों के महान अन्तर को देख रहे थे। बापदादा प्राप्ति स्वरूप बच्चों को देख हर्षित हो रहे थे। प्राप्ति स्वरूप बच्चे कितने पदमापदम भाग्यवान हो। इतनी प्राप्ति कर ली जो आप विशेष आत्माओं के हर कदम में पदम हैं। लौकिक में प्राप्ति स्वरूप जीवन में विशेष चार बातों की प्राप्ति आवश्यक है। (1) सुखमय सम्बन्ध। (2) स्वभाव और संस्कार सदा शीतल और स्नेही हो। (3) सच्ची कमाई की श्रेष्ठ सम्पति हो। (4) श्रेष्ठ कर्म श्रेष्ठ सम्पर्क हो। अगर यह चारों ही बातें प्राप्त हैं तो लौकिक जीवन में भी सफलता और खुशी है। लेकिन लौकिक जीवन की प्राप्तियाँ अल्पकाल की प्राप्तियाँ हैं। आज सुखमय सम्बन्ध है कल वही सम्बन्ध दु:खमय बन जाता है। आज सफलता है कल नहीं है। इसके अन्तर में आप प्राप्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को इस अलौकिक श्रेष्ठ जीवन में चारों ही बातें सदा प्राप्त हैं क्योंकि डायरेक्ट सुखदाता सर्व प्राप्तियों के दाता के साथ अवि-नाशी सम्बन्ध है। जो अविनाशी सम्बन्ध कभी भी दु:ख वा धोखा देने वाला नहीं है। विनाशी सम्बन्धों में वर्तमान समय दु:ख है वा धोखा है। अविनाशी सम्बन्ध में सच्चा स्नेह है। सुख है। तो सदा स्नेह और सुख के सर्व सम्बन्ध बाप से प्राप्त हैं। एक भी सम्बन्ध की कमी नहीं है। जो सम्बन्ध चाहो उसी सम्बन्ध से प्राप्ति का अनुभव कर लो। जिस आत्मा को जो सम्बन्ध प्यारा है उसी सम्बन्ध से भगवन प्रीत की रीति निभा रहे हैं। भगवान को सर्व सम्बन्धी बना लिया। ऐसा श्रेष्ठ सम्बन्ध सारे कल्प में प्राप्त नहीं हो सकता। तो सम्बन्ध भी प्राप्त है। साथ-साथ इस अलौकिक दिव्य जन्म में सदा श्रेष्ठ स्वभाव, ईश्वरीय संस्कार होने कारण स्वभाव संस्कार कभी दु:ख नहीं देते। जो बापदादा के संस्कार वह बच्चों के संस्कार, जो बापदादा का स्वभाव वह बच्चों का स्वभाव। स्व-भाव अर्थात् सदा हर एक के प्रति स्व अर्थात् आत्मा का भाव। स्व श्रेष्ठ को भी कहा जाता है। स्व का भाव वा श्रेष्ठ भाव यही स्वभाव हो। सदा महादानी, रहम-दिल, विश्व कल्याणकारी यह बाप के संस्कार सो आपके संस्कार हों इसलिए स्वभाव और संस्कार सदा खुशी की प्राप्ति कराते हैं। ऐसे ही सच्ची कमाई की सुखमय सम्पति है। तो अविनाशी खजाने कितने मिले हैं? हर एक खजाने की खानियों के मालिक हो। सिर्फ खजाना नहीं, अखुट अनगिनत खजाने मिले हैं। जो खर्चो खाओ और बढ़ाते रहो। जितना खर्च करो उतना बढ़ता है। अनुभवी हो ना। स्थूल सम्पति किस-लिए कमाते हैं? दाल रोटी सुख से खावें। परिवार सुखी हो। दुनिया में नाम अच्छा हो! आप अपने को देखो कितने सुख और खुशी की दाल रोटी मिल रही है। जो गायन भी है दाल रोटी खाओ भगवान के गीत गाओ। ऐसे गायन की हुई दाल रोटी खा रहे हो। और ब्राह्मण बच्चों को बापदादा की गैरन्टी है-ब्राह्मण बच्चा दाल रोटी से वंचित हो नहीं सकता। आसक्ति वाला खाना नहीं मिलेगा लेकिन दाल रोटी जरूर मिलेगी। दाल रोटी भी है, परिवार भी ठीक है और नाम कितना बाला है। इतना आपका नाम बाला है जो आज लास्ट जन्म तक आप पहुँच गये हो, लेकिन आपके जड़ चित्रों के नाम से अनेक आत्मायें अपना काम सिद्ध कर रही हैं। नाम आप देवी देवताओं का लेते हैं। काम अपना सिद्ध करते हैं। इतना नाम बाला है। एक जन्म नाम बाला नहीं होता सारा कल्प आपका नाम बाला है। तो सुखमय, सच्चे सम्पतिवान हो। बाप के सम्पर्क में आने से आपका भी श्रेष्ठ सम्पर्क बन गया है। आपका ऐसा श्रेष्ठ सम्पर्क है जो आपके जड़ चित्रों के सेकण्ड के सम्पर्क की भी प्यासी हैं। सिर्फ दर्शन के सम्पर्क के भी कितने प्यासे हैं! सारी-सारी रातें जागरण करते रहते हैं। सिर्फ सेकण्ड के दर्शन के सम्पर्क के लिए पुकारते रहते हैं। चिल्लाते रहते वा सिर्फ सामने जावें उसके लिए कितना सहन करते हैं! हैं चित्र और ऐसे चित्र घर में भी होते हैं फिर भी एक सेकण्ड के सम्मुख सम्पर्क के लिए कितने प्यासे हैं। एक बेहद के बाप के बनने के कारण सारे विश्व की आत्माओं से सम्पर्क हो गया। बेहद के परिवार के हो गये। विश्व की सर्व आत्माओं से सम्पर्क बन गया। तो चारों ही बातें अविनाशी प्राप्त हैं इसलिए सदा सुखी जीवन है। प्राप्ति स्वरूप जीवन है। अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के जीवन में। यही आपके गीत हैं। ऐसे प्राप्ति स्वरूप हो ना वा बनना है? तो सुनाया ना आज प्राप्ति स्वरूप बच्चों को देख रहे थे। जिस श्रेष्ठ जीवन के लिए दुनिया वाले कितनी मेहनत करते हैं। और आपने क्या किया? मेहनत की वा मुहब्बत की? प्यार-प्यार में ही बाप को अपना बना लिया। तो दुनिया वाले मेहनत करते हैं और आपने मुहब्बत से पा लिया। बाबा कहा और खजानों की चाबी मिली। दुनिया वालों से पूछो तो क्या कहेंगे? कमाना बड़ा मुश्किल है। इस दुनिया में चलना बड़ा मुश्किल है और आप क्या कहते हो? कदम में पदम कमाना है। और चलना कितना सहज है! उड़ती कला है तो चलने से भी बच गये। आप कहेंगे चलना क्या उड़ना है। कितना अन्तर हो गया! बापदादा आज विश्व के सभी बच्चों को देख रहे थे। सभी अपनी-अपनी प्राप्ति की लगन में लगे हुए हैं लेकिन रिजल्ट क्या है! सब खोज करने में लगे हुए हैं। साइन्स वाले देखो अपनी खोज में इतने व्यस्त हैं जो और कुछ नहीं सूझता। महान आत्मायें देखो प्रभू को पाने की खोज में लगी हुई हैं। वा छोटी सी भ्रान्ति के कारण प्राप्ति से वंचित हैं। आत्मा ही परमात्मा है वा सर्वव्यापी परमात्मा है इस भ्रान्ति के कारण खोज में ही रह गये। प्राप्ति से वंचित रह गये हैं। साइन्स वाले भी अभी और आगे है और आगे है, ऐसा करते-करते चन्द्रमा में, सितारों में दुनिया बनायेंगे, खोजते-खोजते खो गये हैं। शास्त्रवादी देखो शास्त्रार्थ के चक्कर में विस्तार में खो गये हैं। शास्त्रार्थ का लक्ष्य रख अर्थ से वंचित हो गये हैं। राजनेतायें देखो कुर्सी की भाग दौड़ में खोये हुए हैं। और दुनिया के अन्जान आत्मायें देखो विनाशी प्राप्ति के तिनके के सहारे को असली सहारा समझ बैठ गई हैं। और आपने क्या किया? वह खोये हुए हैं और आपने पा लिया। भ्रान्ति को मिटा लिया। तो प्राप्ति स्वरूप हो गये इसलिए सदा प्राप्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्मायें हो।
बापदादा विशेष डबल विदेशी बच्चों को मुबारक देते हैं कि विश्व में अनेक आत्माओं के बीच आप श्रेष्ठ आत्माओं की पहचान का नेत्र शक्तिशाली रहा। जो पहचाना और पाया। तो बापदादा डबल विदेशी बच्चों की पहचान के नेत्र को देख बच्चों के गुण गा रहे हैं कि वाह बच्चे वाह। जो दूरदेशी होते, भिन्न धर्म के होते, भिन्न रीति रसम के होते अपने असली बाप को दूर होते भी समीप से पहचान लिया। समीप के सम्बन्ध में आ गये। ब्राह्मण जीवन की रीति रसम को अपनी आदि रीति रसम समझ सहज अपने जीवन में अपना लिया है। इसको कहा जाता है विशेष लवली और लकी बच्चे। जैसे बच्चों को विशेष खुशी है बापदादा को भी विशेष खुशी है। ब्राह्मण परिवार की आत्मायें विश्व के कोने-कोने में पहुँच गई थी लेकिन कोने-कोने से बिछुड़ी हुई श्रेष्ठ आत्मायें फिर से अपने परिवार में पहुँच गई हैं। बाप ने ढूँढा आपने पहचाना इसलिए प्राप्ति के अधिकारी बन गये। अच्छा-
ऐसे अविनाशी प्राप्ति स्वरूप बच्चों को, सदा सर्व सम्बन्धों के अनु-भव करने वाले बच्चों को, सदा अविनाशी सम्पतिवान बच्चों को, सदा बाप समान श्रेष्ठ संस्कार और सदा स्व के भाव में रहने वाले सर्व प्राप्तियों के भण्डार सर्व प्राप्तियों के महान दानी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
युगलों के साथ - अव्यक्त बापदादा की मुलाकात
प्रवृत्ति में रहते सर्व बन्धनों से न्यारे और बाप के प्यारे हो ना? फंसे हुए तो नहीं हो? पिंजड़े के पंछी तो नहीं, उड़ते पंछी हो ना! जरा भी बंधन फंसा लेता है। बंधनमुक्त हैं तो सदा उड़ते रहेंगे। तो किसी भी प्रकार का बंधन नहीं। ना देह का, ना सम्बन्ध का, ना प्रवृत्ति का, ना पदार्थ का। कोई भी बन्धन ना हो इसको कहा जाता है 'न्यारा और प्यारा'। स्वतंत्र सदा उड़ती कला में होंगे और परतंत्र थोड़ा उड़ेंगे भी फिर बन्धन उसको खींच कर नीचे ले आयेगा। तो कभी नीचे, कभी ऊपर, टाइम चला जायेगा। सदा एकरस उड़ती कला की अवस्था और कभी नीचे, कभी ऊपर यह अवस्था, दोनों में रात-दिन का अन्तर है। आप कौन-सी अवस्था वाले हो? सदा निर्बन्धन, सदा स्वतंत्र पंछी? सदा बाप के साथ रहने वाले? किसी भी आकर्षण में आकर्षित होने वाले नहीं। वही जीवन प्यारी है। जो बाप के प्यारे बनते उनकी जीवन सदा प्यारी बनती। खिट-खिट वाली जीवन नहीं। आज यह हुआ, कल यह हुआ, नहीं। लेकिन सदा बाप के साथ रहने वाले, एकरस स्थिति में रहने वाले। वह है मौज की जीवन। मौज में नहीं होंगे तो मूंझेंगे जरूर। आज यह प्राब्लम आ गई, कल दूसरी आ गई, यह दु:खधाम की बातें दु:खधाम में तो आयेंगी ही लेकिन संग-मयुगी ब्राह्मण हैं तो दु:ख नीचे रह जायेगा। दु:खधाम से किनारा कर लिया तो दु:ख दिखाई देते भी आपको स्पर्श नहीं करेगा। कलियुग को छोड़ दिया, किनारा छोड़ चुके, अब संगमयुग पर पहुंचे तो संगम सदा ऊंचा दिखाते हैं। संगमयुगी आत्मायें सदा ऊंची, नीचे वाली नहीं। जब बाप उड़ाने के लिए आये हैं तो उड़ती कला से नीचे आयें ही क्यों! नीचे आना माना फंसना। अब पंख मिले हैं तो उड़ते रहो, नीचे आओ ही नहीं। अच्छा?
अधरकुमारों से:- सभी एक की लगन में मगन रहने वाले हो ना? एक बाप दूसरे हम, तीसरा न कोई। इसको कहा जाता है लगन में मगन रहने वाले। मैं और मेरा बाबा। इसके सिवाए और कोई मेरा है? मेरा बच्चा, मेरा पोत्रा... ऐसे तो नहीं। 'मेरे' में ममता रहती है। मेरा-पन समाप्त होना अर्थात ममता समाप्त होना। तो सारी ममता यानी मोह बाप में हो गया। तो बदल गया, शुद्ध मोह हो गया। बाप सदा शुद्ध है तो मोह बदलकर प्यार हो गया। एक मेरा बाबा, इस एक मेरे से सब समाप्त हो जाता और एक की याद सहज हो जाती इसलिए सदा सहजयोगी। मैं श्रेष्ठ आत्मा और मेरा बाबा बस! श्रेष्ठ आत्मा समझने से श्रेष्ठ कर्म स्वत: होंगे, श्रेष्ठ आत्मा के आगे माया आ नहीं सकती।
माताओं से:- मातायें सदा बाप के साथ खुशी के झूले में झूलने वाली हैं ना! गोप गोपियां सदा खुशी में नाचते या झूले में झूलते। तो सदा बाप के साथ रहने वाले खुशी में नाचते हैं। बाप साथ है तो सर्व-शक्तियाँ भी साथ हैं। बाप का साथ शक्तिशाली बना देता। बाप के साथ वाले सदा निर्मोही होते, उन्हें किसी का मोह सतायेगा नहीं। तो नष्टोमोहा हो? कैसी भी परिस्थिति आवे लेकिन हर परिस्थिति में 'नष्टोमोहा'। जितना नष्टोमोहा होंगी उतना याद और सेवा में आगे बढ़ती रहेंगी।
मधुबन में आये हुए सेवाधारियों से:-सेवा का खाता जमा हो गया ना। अभी भी मधुबन के वातावरण में शक्तिशाली स्थिति बनाने का चांस मिला और आगे के लिए भी जमा किया। तो डबल प्राप्ति हो गई। यज्ञ सेवा अर्थात श्रेष्ठ सेवा श्रेष्ठ स्थिति में रहकर करने से पदमगुणा फल बन जाता है। कोई भी सेवा करो, पहले यह देखो कि शक्तिशाली स्थिति में स्थित हो सेवाधारी बन सेवा कर रहे हैं? साधारण सेवाधारी नहीं, रूहानी सेवाधारी। रूहानी सेवाधारी की रूहानी झलक, रूहानी फलक सदा इमर्ज रूप में होनी चाहिए। रोटी बेलते भी 'स्वदर्शन चक्र' चलता रहे। लौकिक निमित्त स्थूल कार्य लेकिन स्थूल सूक्ष्म दोनों साथ-साथ, हाथ से स्थूल काम करो और बुद्धि से मंसा सेवा करो तो डबल हो जायेगा। हाथ द्वारा कर्म करते हुए भी याद की शक्ति से एक स्थान पर रहते भी, बहुत सेवा कर सकते हो। मधुबन तो वैसे भी लाइट हाउस है, लाइट हाउस एक स्थान पर स्थित हो, चारों ओर सेवा करता है। ऐसे सेवाधारी अपनी और दूसरों की बहुत श्रेष्ठ प्रालब्ध बना सकते हैं। अच्छा! ओम शान्ति।
आज बापदादा ने पूरी रात सभी बच्चों से मिलन मनाया और सुबह 7 बजे यादप्यार दे विदाई ली, सुबह का क्लास बापदादा ने ही कराया
रोज़ बापदादा द्वारा महावाक्य सुनते-सुनते महान आत्मायें बन गयी। तो आज के दिन का यही सार सारा दिन मन के साज़ के साथ सुनना कि महावाक्य सुनने से महान बने हैं। महान ते महान कर्तव्य करने के लिए सदा निमित हैं। हर आत्मा के प्रति मन्सा से, वाचा से, सम्पर्क से महा-दानी आत्मा हैं और सदा महान युग के आह्वान करने वाले अधिकारी आत्मा हैं। यही याद रखना। सदा ऐसे महान स्मृति में रहने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सिकीलधे बच्चों को बापदादा का यादप्यार और गुडमा-र्निंग। होवनहार और वर्तमान बादशाहों को बाप की नमस्ते। अच्छा।

वरदान:-

शुद्ध और समर्थ संकल्पों की शक्ति से व्यर्थ वायब्रेशन को समाप्त करने वाले सच्चे सेवाधारी भव

कहा जाता है संकल्प भी सृष्टि बना देता है। जब कमजोर और व्यर्थ संकल्प करते हो तो व्यर्थ वायुमण्डल की सृष्टि बन जाती है। सच्चे सेवाधारी वह हैं जो अपने शुद्ध शक्तिशाली संकल्पों से पुराने वायब्रेशन को भी समाप्त कर दें। जैसे साइंस वाले शस्त्र से शस्त्र को खत्म कर देते हैं, एक विमान से दूसरे विमान को गिरा देते हैं, ऐसे आपके शुद्ध, समर्थ संकल्प का वायब्रेशन, व्यर्थ वायब्रेशन को समाप्त कर दे, अब ऐसी सेवा करो।

स्लोगन:-

विघ्न रूपी सोने के महीन धागों से मुक्त बनो, मुक्ति वर्ष मनाओ। सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी संगठित रूप में सायं 6.30 से 7.30 बजे तक अन्तर्राष्ट्रीय योग में सम्मिलित हो, कम्बाइन्ड स्वरूप की स्मृति में रह अपनी सूक्ष्म वृत्ति द्वारा शक्तिशाली वायुमण्डल बनाने की सेवा करें।

19-10-2019

19-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - देही-अभिमानी बनने की प्रैक्टिस करो, इस प्रैक्टिस से ही तुम पुण्य आत्मा बन सकेंगे''

प्रश्नः-

किस एक नॉलेज के कारण तुम बच्चे सदा हर्षित रहते हो?

उत्तर:-

तुम्हें नॉलेज मिली है कि यह नाटक बड़ा वन्डरफुल बना हुआ है, इसमें हर एक एक्टर का अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है। सब अपना-अपना पार्ट बजा रहे हैं। इस कारण तुम सदा हर्षित रहते हो।

प्रश्नः-

कौन-सा एक हुनर बाप के पास ही है, दूसरों के पास नहीं?

उत्तर:-

देही-अभिमानी बनाने का हुनर एक बाप के पास है क्योंकि वह खुद सदा देही है, सुप्रीम है। यह हुनर किसी भी मनुष्य को आ नहीं सकता।

ओम् शान्ति।

रूहानी बच्चों अर्थात् आत्माओं प्रति बाप बैठ समझाते हैं। अपने को आत्मा तो समझना है ना। बाप ने बच्चों को समझाया है पहले-पहले यह प्रैक्टिस करो कि हम आत्मा हैं, न कि शरीर। जब अपने को आत्मा समझेंगे तब ही परमपिता को याद करेंगे। अपने को आत्मा नहीं समझेंगे तो फिर जरूर लौकिक सम्बन्धी, धन्धा आदि ही याद आता रहेगा इसलिए पहले-पहले तो यह प्रैक्टिस होनी चाहिए कि मैं आत्मा हूँ तो फिर रूहानी बाप की याद ठहरेगी। बाप यह शिक्षा देते हैं कि अपने को देह नहीं समझो। यह ज्ञान बाप एक ही बार सारे कल्प में देते हैं। फिर 5 हज़ार वर्ष बाद यह समझानी मिलेगी। अपने को आत्मा समझेंगे तो बाप भी याद आयेगा। आधाकल्प तुमने अपने को देह समझा है। अब अपने को आत्मा समझना है। जैसे तुम आत्मा हो, मैं भी आत्मा ही हूँ। परन्तु सुप्रीम हूँ। मैं हूँ ही आत्मा तो मेरे को कोई देह याद पड़ती ही नहीं। यह दादा तो शरीरधारी है ना। वह बाप है निराकार। यह प्रजापिता ब्रह्मा तो साकारी हो गया। शिवबाबा का असली नाम है ही शिव। वह है ही आत्मा सिर्फ वह ऊंच ते ऊंच अर्थात् सुप्रीम आत्मा है सिर्फ इस समय ही आकर इस शरीर में प्रवेश करता हूँ। वह कभी देह-अभिमानी हो न सके। देह-अभिमानी साकारी मनुष्य होते हैं, वह तो है ही निराकार। उनको आकर यह प्रैक्टिस करानी है। कहते हैं तुम अपने को आत्मा समझो। मैं आत्मा हूँ, आत्मा हूँ - यह पाठ बैठकर पढ़ो। मैं आत्मा शिवबाबा का बच्चा हूँ। हर बात की प्रैक्टिस चाहिए ना। बाप कोई नई बात नहीं समझाते हैं। तुम जब अपने को आत्मा पक्का-पक्का समझेंगे तब बाप भी पक्का याद रहेगा। देह-अभिमान होगा तो बाप को याद कर नहीं सकेंगे। आधाकल्प तुमको देह का अहंकार रहता है। अभी तुमको सिखाता हूँ कि अपने को आत्मा समझो। सतयुग में ऐसे कोई सिखाता नहीं है कि अपने को आत्मा समझो। शरीर पर नाम तो पड़ता ही है। नहीं तो एक-दो को बुलावें कैसे। यहाँ तुमने बाप से जो वर्सा पाया है वही प्रालब्ध वहाँ पाते हो। बाकी बुलायेंगे तो नाम से ना। कृष्ण भी शरीर का नाम है ना। नाम बिगर तो कारोबार आदि चल न सके। ऐसे नहीं कि वहाँ यह कहेंगे कि अपने को आत्मा समझो। वहाँ तो आत्म-अभि-मानी रहते ही हैं। यह प्रैक्टिस तुमको अभी कराई जाती है क्योंकि पाप बहुत चढ़े हुए हैं। आहिस्ते-आहिस्ते थोड़ा-थोड़ा पाप चढ़ते-चढ़ते अभी फुल पाप आत्मा बन पड़े हो। आधाकल्प के लिए जो कुछ किया वह खलास भी तो होगा ना। आहिस्ते-आहिस्ते कम होता जाता है। सतयुग में तुम सतोप्रधान हो, त्रेता में सतो बन जाते हो। वर्सा अभी मिलता है। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करने से ही वर्सा मिलता है। यह देही-अभिमानी बनने की शिक्षा बाप अभी देते हैं। सतयुग में यह शिक्षा नहीं मिलती। अपने-अपने नाम पर ही चलते हैं। यहाँ तुम हर एक को याद के बल से पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बनना है। सतयुग में इस शिक्षा की दरकार ही नहीं। न तुम यह शिक्षा वहाँ ले जाते हो। वहाँ न यह ज्ञान, न योग ले जाते हो। तुमको पतित से पावन अभी ही बनना है। फिर आहिस्ते-आहिस्ते कला कम होती है। जैसे चन्द्रमा की कला कम होते-होते लीक जाकर रहती है। तो इसमें मूँझो नहीं। कुछ भी न समझो तो पूछो।
पहले तो यह पक्का निश्चय करो कि हम आत्मा हैं। तुम्हारी आत्मा ही अभी तमोप्रधान बनी है। पहले सतोप्र-धान थी फिर दिन-प्रतिदिन कला कम होती जाती है। मैं आत्मा हूँ - यह पक्का न होने से ही तुम बाप को भूलते हो। पहले-पहले मूल बात ही यह है। आत्म-अभिमानी बनने से बाप याद आयेगा तो वर्सा भी याद आयेगा। वर्सा याद आयेगा तो पवित्र भी रहेंगे। दैवीगुण भी रहेंगे। एम ऑबजेक्ट तो सामने है ना। यह है गॉडली युनिवर्सिटी। भगवान् पढ़ाते हैं। देही-अभिमानी भी वही बना सकते हैं और कोई भी यह हुनर जानता ही नहीं है। एक बाप ही सिखाते हैं। यह दादा भी पुरूषार्थ करते हैं। बाप तो कभी देह लेते ही नहीं, जो उनको देही-अभिमानी बनने का पुरूषार्थ करना पड़े। वह सिर्फ इस ही समय आते हैं तुमको देही-अभिमानी बनाने। यह कहावत है जिनके माथे मामला, वह कैसे नींद करें.....। बहुत धंधा आदि टू-मच होता है तो फुर्सत नहीं मिलती और जिनको फुर्सत है वह आते हैं बाबा के सामने पुरूषार्थ करने। कोई नये भी आते हैं। समझते हैं नॉलेज तो बड़ी अच्छी है। गीता में भी यह अक्षर हैं - मुझ बाप को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाएं। तो बाप यह समझाते हैं। बाप कोई को दोष नहीं देते हैं। यह तो जानते हैं तुमको पावन से पतित बनना ही है और हमको आकर पतित से पावन बनाना ही है। यह बना-बनाया ड्रामा है, इसमें कोई के निंदा की बात नहीं। तुम बच्चे अभी ज्ञान को अच्छी रीति जानते हो और तो कोई भी ईश्वर को जानते ही नहीं इसलिए निध-नके नास्तिक कहलाये जाते हैं। अभी बाप तुम बच्चों को कितना समझदार बनाते हैं। टीचर रूप में शिक्षा देते हैं। कैसे यह सृष्टि का चक्र चलता है, यह शिक्षा मिलने से तुम भी सुधरते हो। भारत जो शिवालय था सो अब वेश्यालय है ना। इसमें ग्लानि की तो बात ही नहीं। यह खेल है, जो बाप समझाते हैं। तुम देवता से असुर कैसे बने हो, ऐसे नहीं कहते क्यों बने? बाप आये ही हैं बच्चों को अपना परिचय देने और सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, यह नॉलेज देते हैं। मनुष्य ही जानेंगे ना। अभी तुम जानकर फिर देवता बनते हो। यह पढ़ाई है मनुष्य से देवता बनने की, जो बाप ही बैठ पढ़ाते हैं। यहाँ तो सब मनुष्य ही मनुष्य हैं। देवता तो इस सृष्टि पर आ नहीं सकते जो टीचर बनकर पढ़ायें। पढ़ाने वाला बाप देखो कैसे पढ़ाने आते हैं। गायन भी है परमपिता परमात्मा कोई रथ लेते हैं, यह पूरा नहीं लिखते कि कौन-सा रथ लेते हैं। त्रिमूर्ति का राज़ भी कोई समझते नहीं। परमपिता अर्थात् परम आत्मा। वो जो है सो अपना परिचय तो देंगे ना। अहंकार की बात नहीं। न सम-झने के कारण कहते हैं इनमें अहंकार है। यह ब्रह्मा तो कहते नहीं कि मैं परमात्मा हूँ। यह तो समझ की बात है, यह तो बाप के महावाक्य हैं - सभी आत्माओं का बाप एक है। इनको दादा कहा जाता है। यह भाग्यशाली रथ है ना। नाम भी ब्रह्मा रखा है क्योंकि ब्राह्मण चाहिए ना। आदि देव प्रजापिता ब्रह्मा है। प्रजा का पिता है, अब प्रजा कौन-सी? प्रजापिता ब्रह्मा शरीरधारी है तो एडाप्ट किया ना। बच्चों को शिवबाबा समझाते हैं मैं एडाप्ट नहीं करता हूँ। तुम सब आत्मायें तो सदैव मेरे बच्चे हो ही। मैं तुमको बनाता नहीं हूँ। मैं तो तुम आत्माओं का अनादि बाप हूँ। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं फिर भी कहते हैं अपने को आत्मा समझो। तुम सारी पुरानी दुनिया का सन्यास करते हो। बुद्धि से जानते हैं सब वापिस जायेंगे इस दुनिया से। ऐसे नहीं, सन्यास कर जंगल में जाना है। सारी दुनिया का सन्यास कर हम अपने घर चले जायेंगे, इसलिए कोई भी चीज़ याद न आये सिवाए एक बाप के। 60 वर्ष की आयु हुई तो फिर वाणी से परे वानप्रस्थ में जाने का पुरू-षार्थ करना चाहिए। यह वानप्रस्थ की बात है अभी की। भक्ति मार्ग में तो वानप्रस्थ का किसको पता ही नहीं है। वानप्रस्थ का अर्थ नहीं बता सकते हैं। वाणी से परे मूलवतन को कहेंगे। वहाँ सभी आत्मायें निवास करती हैं तो सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, सबको जाना है घर।
शास्त्रों में दिखाते हैं आत्मा भ्रकुटी के बीच चमकता हुआ सितारा है। कई समझते हैं आत्मा अंगुष्ठे मिसल है। अंगुष्ठे मिसल को ही याद करते हैं। स्टार को याद कैसे करें? पूजा कैसे करें? तो बाप समझाते हैं तुम देह-अभिमान में जब आते हो तो पुजारी बन जाते हो। भक्ति का समय शुरू होता है, उसको भक्ति कल्ट कहते हैं। ज्ञान कल्ट अलग है। ज्ञान और भक्ति इकट्ठे नहीं हो सकते। दिन और रात इकट्ठे नहीं हो सकते। दिन सुख को कहा जाता और रात दु:ख अर्थात् भक्ति को कहा जाता है। कहते हैं प्रजापिता ब्रह्मा का दिन और फिर रात। तो प्रजा और ब्रह्मा जरूर दोनों ही इकट्ठे होंगे ना। तुम समझते हो हम ब्राह्मण ही आधाकल्प सुख भोगते हैं फिर आधाकल्प दु:ख। यह बुद्धि से समझने की बात है। यह भी जानते हो सब बाप को याद नहीं कर सकते हैं फिर भी बाप खुद समझाते रहते हैं अपने को आत्मा समझो और मुझे याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे। यह पैगाम सबको पहुँचाना है। सर्विस करनी है। जो सर्विस ही नहीं करते तो वह फूल नहीं ठहरे। बागवान बगीचे में आयेंगे तो उनको फूल ही सामने चाहिए, जो सर्विसएबुल हैं बहुतों का कल्याण करते हैं। जिनको देह-अभिमान है वह खुद भी समझेंगे हम फूल तो हैं नहीं। बाबा के सामने तो अच्छे-अच्छे फूल बैठे हैं। तो बाप की उन पर नज़र जायेगी। डांस भी अच्छा चलेगा। (डांसिंग गर्ल का मिसाल) स्कूल में भी टीचर तो जानते हैं ना - कौन नम्बरवन, कौन नम्बर दो, तीन में हैं। बाप का भी अटेन्शन सर्विस करने वालों तरफ ही जायेगा। दिल पर भी वह चढ़ते हैं। डिससर्विस करने वाले थोड़ेही दिल पर चढ़ते। बाप पहली-पहली मुख्य बात समझाते हैं अपने को आत्मा निश्चय करो तब बाप की याद ठहरेगी। देह-अभिमान होगा तो बाप की याद ठहरेगी नहीं। लौकिक सम्बन्धियों तरफ, धन्धे धोरी तरफ बुद्धि चली जायेगी। देही-अभिमानी होने से पारलौकिक बाप ही याद आयेगा। बाप को तो बहुत प्यार से याद करना चाहिए। अपने को आत्मा सम-झना - इसमें मेहनत है। एकान्त चाहिए। 7 रोज़ की भट्ठी का कोर्स बहुत कड़ा है। कोई की याद न आये। किसको पत्र भी नहीं लिख सकते। यह भट्ठी तुम्हारी शुरू की थी। यहाँ तो सबको रख नहीं सकते इसलिए कहा जाता है घर में रहकर प्रैक्टिस करो। भक्त लोग भी भक्ति के लिए अलग कोठी बना देते हैं। अन्दर कोठरी में बैठ माला सिमरते हैं, तो इस याद की यात्रा में भी एकान्त चाहिए। एक बाप को ही याद करना है। इसमें कुछ जबान चलाने की भी बात नहीं है। इस याद के अभ्यास में फुर्सत चाहिए।
तुम जानते हो लौकिक बाप है हद का क्रियेटर, यह है बेहद का। प्रजापिता ब्रह्मा तो बेहद का ठहरा ना। बच्चों को एडाप्ट करते हैं। शिवबाबा एडाप्ट नहीं करते हैं। उनके तो बच्चे सदैव हैं ही। तुम कहेंगे शिवबाबा के हम बच्चे आत्मायें अनादि हैं ही। ब्रह्मा ने तुमको एडाप्ट किया है। हर एक बात अच्छी रीति समझने की है। बाप रोज़-रोज़ बच्चों को समझाते हैं, कहते हैं बाबा याद नहीं रहती। बाप कहते हैं इसमें थोड़ा समय निकालना चाहिए। कोई-कोई ऐसे होते हैं जो बिल्कुल समय दे नहीं सकते। बुद्धि में काम बहुत रहता है। फिर याद की यात्रा कैसे हो। बाप समझाते हैं मूल बात ही यह है - अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे। मैं आत्मा हूँ, शिवबाबा का बच्चा हूँ - यह मनमनाभव हुआ ना। इसमें मेहनत चाहिए। आशीर्वाद की बात नहीं। यह तो पढ़ाई है इसमें कृपा वा आशीर्वाद नहीं चलती। मैं कभी तुम्हारे ऊपर हाथ रखता हूँ क्या! तुम जानते हो बेहद के बाप से हम वर्सा ले रहे हैं। अमर भव, आयुश्वान भव..... इसमें सब आ जाता है। तुम फुल एज (आयु) पाते हो। वहाँ कभी अकाले मृत्यु नहीं होती। यह वर्सा कोई साधू-सन्त आदि दे नहीं सकते। वह कहते हैं पुत्रवान भव..... तो मनुष्य समझते उनकी कृपा से बच्चा हुआ है। बस जिनको बच्चा नहीं होगा वह जाकर उनका शिष्य बनेंगे। ज्ञान तो एक ही बार मिलता है। यह है अव्यभिचारी ज्ञान, जिसकी आधाकल्प प्रालब्ध चलती है। फिर है अज्ञान। भक्ति को अज्ञान कहा जाता है। हर एक बात कितना अच्छी रीति समझाई जाती है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अभी वानप्रस्थ अवस्था है इसलिए बुद्धि से सब कुछ सन्यास कर एक बाप की याद में रहना है। एकान्त में बैठ अभ्यास करना है - हम आत्मा हैं... आत्मा हैं।

2) सर्विसएबुल फूल बनना है। देह-अभिमान वश ऐसा कोई कर्म नहीं करना है जो डिससर्विस हो जाए। बहुतों के कल्याण के निमित्त बनना है। थोड़ा समय याद के लिए अवश्य निकालना है।

वरदान:-

पवित्रता के वरदान को निजी संस्कार बनाकर पवित्र जीवन बनाने वाले मेहनत मुक्त भव

कई बच्चों को पवित्रता में मेहनत लगती है, इससे सिद्ध है वरदाता बाप से जन्म का वरदान नहीं लिया है। वरदान में मेहनत नहीं होती। हर ब्राह्मण आत्मा को जन्म का पहला वरदान है "पवित्र भव, योगी भव''। जैसे जन्म के संस्कार बहुत पक्के होते हैं, तो पवित्रता ब्राह्मण जन्म का आदि संस्कार, निजी संस्कार है। इसी स्मृति से पवित्र जीवन बनाओ। मेहनत से मुक्त बनो।

स्लोगन:-

ट्रस्टी वह है जिसमें सेवा की शुद्ध भावना है।

17-10-2019

17-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - बाप की याद के साथ-साथ ज्ञान धन से सम्पन्न बनो, बुद्धि में सारा ज्ञान घूमता रहे तब अपार खुशी रहेगी, सृष्टि चक्र के ज्ञान से तुम चक्रवर्ती राजा बनेंगे''

प्रश्नः-

किन बच्चों (मनुष्यों) की प्रीत बाप से नहीं हो सकती है?

उत्तर:-

जो रौरव नर्क में रहने वाले विकारों से प्रीत करते हैं, ऐसे मनुष्यों की प्रीत बाप से नहीं हो सकती। तुम बच्चों ने बाप को पहचाना है इसलिए तुम्हारी बाप से प्रीत है।

प्रश्नः-

किसे सतयुग में आने का हुक्म ही नहीं है?

उत्तर:-

बाप को भी सतयुग में आना नहीं है तो वहाँ काल भी नहीं आ सकता है। जैसे रावण को सतयुग में आने का हुक्म नहीं, ऐसे बाबा कहते बच्चे मुझे भी सतयुग में आने का हुक्म नहीं। बाबा तो तुम्हें सुखधाम का लायक बनाकर घर चले जाते हैं, उन्हें भी लिमिट मिली हुई है।

ओम् शान्ति।

रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। रूहानी बच्चे याद की यात्रा में बैठे हुए हो? अन्दर में यह ज्ञान है ना कि हम आत्मायें याद की यात्रा पर हैं। यात्रा अक्षर तो जरूर दिल में आना चाहिए। जैसे वह यात्रा करते हैं हरिद्वार, अमरनाथ जाने की। यात्रा पूरी की फिर लौट आते हैं। यहाँ फिर तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हम जाते हैं शान्तिधाम। बाप ने आकर हाथ पकड़ा है। हाथ पकड़कर पार ले जाना होता है ना। कहते भी हैं हाथ पकड़ लो क्योंकि विषय सागर में पड़े हैं। अब तुम शिवबाबा को याद करो और घर को याद करो। अन्दर में यह आना चाहिए कि हम जा रहे हैं। इसमें मुख से कुछ बोलना भी नहीं है। अन्दर में सिर्फ याद रहे - बाबा आया हुआ है लेने लिए। याद की यात्रा पर जरूर रहना है। इस याद की यात्रा से ही तुम्हारे पाप कटने हैं, तब ही फिर उस मंजिल पर पहुँचेंगे। कितना क्लीयर बाप समझाते हैं। जैसे छोटे बच्चों को पढ़ाया जाता है ना। सदैव बुद्धि में हो कि हम बाबा को याद करते जा रहे हैं। बाप का काम ही है पावन बनाकर पावन दुनिया में ले जाना। बच्चों को ले जाते हैं। आत्मा को ही यात्रा करनी है। हम आत्माओं को बाप को याद कर घर जाना है। घर पहुँचेंगे फिर बाप का काम पूरा हुआ। बाप आते ही हैं पतित से पावन बनाकर घर ले जाने। पढ़ाई तो यहाँ ही पढ़ते हैं। भल घूमो फिरो, कोई भी काम-काज करो, बुद्धि में यह याद रहे। योग अक्षर में यात्रा सिद्ध नहीं होती है। योग सन्यासियों का है। वह तो सब है मनुष्यों की मत। आधा-कल्प तुम मनुष्य मत पर चले हो। आधाकल्प दैवी मत पर चले थे। अभी तुमको मिलती है ईश्वरीय मत।
योग अक्षर नहीं कहो, याद की यात्रा कहो। आत्मा को यह यात्रा करनी है। वह होती है जिस्मानी यात्रा, शरीर के साथ जाते हैं। इसमें तो शरीर का काम ही नहीं। आत्मा जानती है, हम आत्माओं का वह स्वीट घर है। बाप हमको शिक्षा दे रहे हैं जिससे हम पावन बनेंगे। याद करते-करते तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। यह है यात्रा। हम बाप की याद में बैठते हैं क्योंकि बाबा के पास ही घर जाना है। बाप आते ही हैं पावन बनाने। सो तो पावन दुनिया में जाना ही है। बाप पावन बनाते हैं फिर नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार तुम पावन दुनिया में जायेंगे। यह ज्ञान बुद्धि में रहना चाहिए। हम याद की यात्रा पर हैं। हमको इस मृत्युलोक में लौटकर नहीं आना है। बाबा का काम है हमको घर तक पहुँचाना। बाबा रास्ता बता देते हैं अभी तुम तो मृत्युलोक में हो फिर अमर-लोक नई दुनिया में होंगे। बाप लायक बनाकर ही छोड़ते हैं। सुखधाम में बाप नहीं ले जायेंगे। इनकी लिमिट हो जाती है घर तक पहुँचाना। यह सारा ज्ञान बुद्धि में रहना चाहिए। सिर्फ बाप को याद नहीं करना चाहिए, साथ में ज्ञान भी चाहिए। ज्ञान से तुम धन कमाते हो ना। इस सृष्टि चक्र की नॉलेज से तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो। बुद्धि में यह ज्ञान है, इसमें चक्र लगाया है। फिर हम घर जायेंगे फिर नयेसिर चक्र शुरू होगा। यह सारा ज्ञान बुद्धि में रहे तब खुशी का पारा चढ़े। बाप को भी याद करना है, शान्तिधाम, सुखधाम को भी याद करना है। 84 का चक्र अगर याद नहीं करेंगे तो चक्रवर्ती राजा कैसे बनेंगे। सिर्फ एक को याद करना तो सन्यासियों का काम है क्योंकि वह इनको जानते नहीं हैं। ब्रह्म को ही याद करते हैं। बाप तो अच्छी रीति बच्चों को सम-झाते हैं। याद करते-करते ही तुम्हारे पाप कट जाने हैं। पहले तो घर जाना है, यह है रूहानी यात्रा। गायन भी है चारों तरफ लगाये फेरे फिर भी हरदम दूर रहे अर्थात् बाप से दूर रहे। जिस बाप से बेहद का वर्सा मिलना है उनको तो जानते ही नहीं। कितने चक्र लगाये हैं। हर वर्ष भी कई यात्रा करते हैं। पैसे बहुत होते हैं तो यात्रा का शौक रहता है। यह तो तुम्हारी है रूहानी यात्रा। तुम्हारे लिए नई दुनिया बन जायेगी फिर तो नई दुनिया में ही आने वाले हो, जिसको अमरलोक कहा जाता है। वहाँ काल होता नहीं जो किसको ले जाये। काल को हुक्म ही नहीं है नई दुनिया में आने का। रावण की तो यह पुरानी दुनिया है ना। तुम बुलाते भी यहाँ हो। बाप कहते हैं मैं पुरानी दुनिया में पुराने शरीर में आता हूँ। मुझे भी नई दुनिया में आने का हुक्म नहीं। मैं तो पतितों को ही पावन बनाने आता हूँ। तुम पावन बन फिर औरों को भी पावन बनाते हो। सन्यासी तो भाग जाते हैं। एकदम गुम हो जाते हैं। पता ही नहीं पड़ता है, कहाँ चला गया क्योंकि वह ड्रेस ही बदल लेते हैं। जैसे एक्टर्स रूप बदलते हैं। कभी मेल से फीमेल बन जाते हैं, कभी फीमेल से मेल बन जाते हैं। यह भी रूप बदलते हैं। सतयुग में थोड़ेही ऐसी बातें होंगी।
बाप कहते हैं हम आते हैं नई दुनिया बनाने। आधाकल्प तुम बच्चे राज्य करते हो फिर ड्रामा प्लैन अनुसार द्वापर शुरू होता है, देवतायें वाम मार्ग में चले जाते हैं, उन्हों के बहुत गन्दे चित्र भी जगन्नाथपुरी में हैं। जग-न्नाथ का मन्दिर है। यूँ तो उनकी राजधानी थी जो खुद विश्व के मालिक थे। वह फिर मन्दिर में जाकर बन्द हुआ, उनको काला दिखाते हैं। इस जगत नाथ के मन्दिर पर तुम बहुत समझा सकते हो। और कोई इनका अर्थ समझा नहीं सकते। देवता ही पूज्य से पुजारी बनते हैं। वह लोग तो हर बात में भगवान के लिए कह देते आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। आप ही सुख देते हो, आप ही दु:ख देते हो। बाप कहते हैं मैं तो किसको दु:ख देता ही नहीं हूँ। यह तो समझ की बात है। बच्चा जन्मा तो खुशी होगी, बच्चा मरा तो रोने लग पड़ेंगे। कहेंगे भगवान ने दु:ख दिया। अरे, यह अल्पकाल का सुख-दु:ख तुमको रावण राज्य में ही मिलता है। मेरे राज्य में दु:ख की बात नहीं होती। सतयुग को कहा जाता है अमरलोक। इनका नाम ही है मृत्युलोक। अकाले मर पड़ते हैं। वहाँ तो बहुत खुशियाँ मनाते हैं, आयु भी बड़ी रहती है। बड़ी में बड़ी आयु 150 वर्ष की होती है। यहाँ भी कभी-कभी ऐसे कोई की होती है परन्तु यहाँ तो स्वर्ग नहीं है ना। कोई शरीर को बहुत सम्भाल से रखते हैं तो आयु बड़ी भी हो जाती है फिर बच्चे भी कितने हो जाते हैं। परिवार बढ़ता जाता है, वृद्धि जल्दी होती है। जैसे झाड़ से टाल-टालियां निकलती हैं - 50 टालियां और उनसे और 50 निकलेंगी, कितना वृद्धि को पाते हैं। यहाँ भी ऐसे है इसलिए इनका मिसाल बड़ के झाड़ से देते हैं। सारा झाड़ खड़ा है, फाउण्डेशन है नहीं। यहाँ भी आदि सनातन देवी-देवता धर्म का फाउन्डेशन है नहीं। कोई को पता ही नहीं देवतायें कब थे, वह तो लाखों वर्ष कह देते हैं। आगे तुम कभी ख्याल भी नहीं करते थे। बाप ही आकर यह सब बातें समझाते हैं। तुम अभी बाप को भी जान गये हो और सारे ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त, ड्युरेशन आदि सबको जान गये हो। नई दुनिया से पुरानी, पुरानी से नई कैसे बनती है, यह कोई नहीं जानते। अभी तुम बच्चे याद की यात्रा में बैठते हो। यह यात्रा तो तुम्हारी नित्य चलनी है। घूमो फिरो परन्तु इस याद की यात्रा में रहो। यह है रूहानी यात्रा। तुम जानते हो भक्ति मार्ग में हम भी उन यात्राओं पर जाते थे। बहुत बार यात्रा की होगी जो पक्के भक्त होंगे। बाबा ने समझाया है एक शिव की भक्ति करना, वह है अव्यभिचारी भक्ति। फिर देवताओं की होती है, फिर 5 तत्वों की भक्ति करते हैं। देवताओं की भक्ति फिर भी अच्छी है क्योंकि उन्हों का शरीर फिर भी सतोप्रधान है, मनुष्यों का शरीर तो पतित है ना। वह तो पावन हैं फिर द्वापर से लेकर सब पतित बन पड़े हैं। नीचे गिरते आते हैं। सीढ़ी का चित्र तुम्हारे लिए बहुत अच्छा है समझाने का। जिन्न की भी कहानी बताते हैं ना। यह सब दृष्टान्त आदि इस समय के ही हैं। सब तुम्हारे ऊपर ही बने हुए हैं। भ्रमरी का मिसाल भी तुम्हारा है जो कीड़ों को आपसमान ब्राह्मण बनाते हो। यहाँ के ही सब दृष्टान्त हैं।
तुम बच्चे पहले जिस्मानी यात्रा करते थे। अभी फिर बाप द्वारा रूहानी यात्रा सीखते हो। यह तो पढ़ाई है ना। भक्ति में देखो क्या-क्या करते हैं। सबके आगे माथा टेकते रहते हैं, एक के भी आक्यूपेशन को नही जानते। हिसाब किया जाता है ना। सबसे जास्ती जन्म कौन लेते हैं फिर कम होते जाते हैं। यह ज्ञान भी अभी तुमको मिलता है। तुम समझते हो बरोबर स्वर्ग था। भारतवासी तो इतने पत्थर बुद्धि बने हैं, उनसे पूछो स्वर्ग कब था तो लाखों वर्ष कह देंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो हम विश्व के मालिक थे, कितने सुखी थे अब फिर हमको बेगर टू प्रिन्स बनना है। दुनिया नई से पुरानी होती है ना। तो बाप कहते हैं - मेहनत करो। यह भी जानते हैं माया घड़ी-घड़ी भुला देती है।
बाप समझाते हैं बुद्धि में सदैव यह याद रखो हम जा रहे हैं, हमारा इस पुरानी दुनिया से लंगर उठा हुआ है। नईया उस पार जानी है। गाते हैं ना नईया हमारी पार ले जाओ। कब पार जानी है, वह जानते नहीं हैं। तो मुख्य है याद की यात्रा। बाप के साथ वर्सा भी याद आना चाहिए। बच्चे बालिग होते हैं तो बाप का वर्सा ही बुद्धि में रहता है। तुम तो बड़े हो ही। आत्मा झट जान लेती है, यह बात तो बरोबर है। बेहद के बाप का वर्सा है ही स्वर्ग। बाबा स्वर्ग की स्थापना करते हैं तो बाप की श्रीमत पर चलना पड़े। बाप कहते हैं पवित्र जरूर बनना है। पवित्रता के कारण ही झगड़े होते हैं। वह तो बिल्कुल ही जैसे रौरव नर्क में पड़े हैं। और ही जास्ती विकारों में गिरने लग पड़ते हैं इसलिए बाप से प्रीत रख नहीं सकते हैं। विनाश काले विपरीत बुद्धि हैं ना। बाप आते ही हैं प्रीत बुद्धि बनाने। बहुत हैं जिनकी रिंचक भी प्रीत बुद्धि नहीं है। कभी बाप को याद भी नहीं करते हैं। शिवबाबा को जानते ही नहीं हैं, मानते ही नहीं हैं। माया का पूरा ग्रहण लगा हुआ है। याद की यात्रा बिल्कुल ही नहीं। बाप मेहनत तो कराते हैं, यह भी जानते हो सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी यहाँ स्थापन हो रही है। सतयुग-त्रेता में कोई भी धर्म स्थापन होते नहीं। राम कोई धर्म स्थापन नहीं करते। यह तो स्थापना करने वाले बाप द्वारा यह बनते हैं। और धर्म स्थापक और बाप के धर्म स्थापना में रात-दिन का फर्क है। बाप आते ही हैं संगम पर जबकि दुनिया को बदलना है। बाप कहते हैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ, उन्होंने फिर युगे-युगे अक्षर रांग लिख दिया है। आधाकल्प भक्तिमार्ग भी चलना ही है। तो बाप कहते हैं बच्चे इन बातों को भूलो मत। यह कहते हैं बाबा हम आपको भूल जाते हैं। अरे, बाप को तो जानवर भी नहीं भूलते हैं। तुम क्यों भूलते हो? अपने को आत्मा नहीं समझते हो! देह-अभिमानी बनने से ही तुम बाप को भूलते हो। अब जैसे बाप समझाते हैं, वैसे तुम बच्चों को भी टेव (आदत) रखनी चाहिए। भभके से बात करनी चाहिए। ऐसे नहीं, बड़े आदमी के आगे तुम फंक हो जाओ। तुम कुमारियाँ ही बड़े-बड़े विद्वान, पण्डितों के आगे जाती हो तो तुम्हें निडर हो समझाना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि में सदैव याद रहे कि हम जा रहे हैं, हमारी नईया का लंगर इस पुरानी दुनिया से उठ चुका है। हम हैं रूहानी यात्रा पर। यही यात्रा करनी और करानी है।

2) किसी भी बड़े आदमी के सामने निर्भयता (भभके) से बात करनी है, फंक नहीं होना है। देही-अभिमानी बनकर समझाने की आदत डालनी है।

वरदान:-

सदा हल्के बन बाप के नयनों में समाने वाले सहजयोगी भव

संगमयुग पर जो खुशियों की खान मिलती है वह और किसी युग में नहीं मिल सकती। इस समय बाप और बच्चों का मिलन है, वर्सा है, वरदान है। वर्सा अथवा वरदान दोनों में मेहनत नहीं होती इसलिए आपका टाइटल ही है सहजयोगी। बापदादा बच्चों की मेहनत देख नहीं सकते, कहते हैं बच्चे अपने सब बोझ बाप को देकर खुद हल्के हो जाओ। इतने हल्के बनो जो बाप अपने नयनों पर बिठाकर साथ ले जाये। बाप से स्नेह की निशानी है - सदा हल्के बन बाप की नजरों में समा जाना।

स्लोगन:-

निगेटिव सोचने का रास्ता बंद कर दो तो सफलता स्वरूप बन जायेंगे।

18-10-2019

18-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - ऑर्डर करो कि हे भूतों तुम हमारे पास आ नहीं सकते, तुम उनको डराओ तो वह भाग जायेंगे''

प्रश्नः-

ईश्वरीय नशे में रहने वाले बच्चों के जीवन की शोभा क्या है?

उत्तर:-

सर्विस ही उनके जीवन की शोभा है। जब नशा है कि हमें ईश्वरीय लॉटरी मिली है तो सर्विस का शौक होना चाहिए। परन्तु तीर तब लगेगा जब अन्दर कोई भी भूत नहीं होगा।

प्रश्नः-

शिवबाबा का बच्चा कहलाने के हकदार कौन हैं?

उत्तर:-

जिन्हें निश्चय है कि भगवान हमारा बाप है, हम ऐसे ऊंचे ते ऊंचे बाप के बच्चे हैं, ऐसे नशे में रहने वाले लायक बच्चे ही शिवबाबा का बच्चा कहलाने के हकदार हैं। अगर कैरेक्टर ठीक नहीं, चलन रॉयल्टी की नहीं तो वह शिवबाबा का बच्चा नहीं कहला सकते।

ओम् शान्ति।

शिवबाबा याद है? स्वर्ग की बादशाही याद है? यहाँ जब बैठते हो तो दिमाग में आना चाहिए - हम बेहद के बाप के बच्चे हैं और नित्य बाप को याद करते हैं। याद करने बिगर हम वर्सा ले नहीं सकते। काहे का वर्सा? पवित्रता का। तो उसके लिए ऐसा पुरूषार्थ करना चाहिए। कभी भी कोई विकार की बात हमारे आगे आ नहीं सकती, सिर्फ विकार की भी बात नहीं। एक भूत नहीं परन्तु कोई भी भूत आ नहीं सकता। ऐसा शुद्ध अहंकार रहना चाहिए। बहुत ऊंच ते ऊंच भगवान के हम बच्चे भी ऊंच ते ऊंच ठहरे ना। बातचीत, चलन कैसी रॉयल होनी चाहिए। बाप चलन से समझते हैं यह तो बिल्कुल ही वर्थ नाट ए पेनी है। मेरा बच्चा कहलाने का भी हकदार नहीं। लौकिक बाप को भी न लायक बच्चे को देख अन्दर में ऐसे होता है। यह भी बाप है। बच्चे जानते हैं बाप हमको शिक्षा दे रहे हैं परन्तु कोई-कोई ऐसे हैं जो बिल्कुल समझते नहीं। बेहद का बाप हमको समझा रहे हैं वह निश्चय नहीं, नशा नहीं। तुम बच्चों का दिमाग कितना ऊंच होना चाहिए। हम कितने ऊंच बाप के बच्चे हैं। बाप कितना समझाते हैं। अन्दर में सोचो हम कितने ऊंच ते ऊंच बाप के बच्चे हैं, हमारा कैरेक्टर कितना ऊंच होना चाहिए। जो इन देवी-देवताओं की महिमा है, वह हमारी होनी चाहिए। प्रजा की थोड़ेही महिमा है। एक लक्ष्मी-नारायण को ही दिखाया है। तो बच्चों को कितनी अच्छी सर्विस करनी चाहिए। इन लक्ष्मी-नारायण दोनों ने यह सर्विस की है ना। दिमाग कितना ऊंचा चाहिए। कई बच्चों में तो कोई फ़र्क ही नहीं। माया से हार खा लेते हैं तो और ही जास्ती बिगड़ जाते हैं। नहीं तो अन्दर में कितना नशा रहना चाहिए। हम बेहद के बाप के बच्चे हैं। बाप कहते हैं सबको मेरा परिचय देते रहो। सर्विस से ही शोभा पायेंगे, तब ही बाप की दिल पर चढ़ेंगे। बच्चा वह जो बाप की दिल पर चढ़ा हुआ हो। बाप का बच्चों पर कितना लव होता है। बच्चों को सिर पर चढ़ाते हैं। इतना मोह होता है परन्तु वह तो है हद का मायावी मोह। यह तो है बेहद का। ऐसा कोई बाप होगा जो बच्चों को देख खुश न हो। माँ-बाप को तो अथाह खुशी होती है। यहाँ जब बैठते हो तो समझना चाहिए बाबा हमको पढ़ाते हैं। बाबा हमारा ओबीडियेन्ट टीचर है। बेहद के बाप ने जरूर कोई सर्विस की होगी तब तो गायन है ना। कितनी वन्डरफुल बात है। कितनी उनकी महिमा की जाती है। यहाँ बैठे हो तो बुद्धि में नशा रहना चाहिए। सन्यासी तो हैं ही निवृत्ति मार्ग वाले। उन्हों का धर्म ही अलग है। यह भी अब बाप समझाते हैं। तुम थोड़ेही जानते थे सन्यास मार्ग को। तुम तो गृहस्थ आश्रम में रहते भक्ति आदि करते थे, तुमको फिर ज्ञान मिलता है, उनको तो ज्ञान मिलने का है नहीं। तुम कितना ऊंच पढ़ते हो और बैठे कितने साधारण हो, नीचे। देलवाड़ा मन्दिर में भी तुम नीचे तपस्या में बैठे हो, ऊपर में वैकुण्ठ खड़ा है। ऊपर वैकुण्ठ को देख मनुष्य समझते हैं स्वर्ग ऊपर ही होता है।
तो तुम बच्चों के अन्दर में यह सब बातें आनी चाहिए कि यह स्कूल है। हम पढ़ रहे हैं। कहाँ चक्र लगाने जाते हो तो भी बुद्धि में यह ख्यालात चलें तो बहुत मजा आयेगा। बेहद के बाप को तो दुनिया में कोई नहीं जानते। बाप के बच्चे बनकर और बाप की बायोग्राफी को न जाने, ऐसा भुट्टू कभी देखा। न जानने के कारण कह देते वह सर्वव्यापी है। भगवान को ही कह देते आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। तुम बच्चों को अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए - हम कितने ऊंच पूज्य थे। फिर हम ही पुजारी बने हैं। जो शिवबाबा तुमको इतना ऊंच बनाते हैं फिर ड्रामा अनुसार तुम ही उनकी पूजा शुरू करते हो। इन बातों को दुनिया थोड़ेही जानती है कि भक्ति कब शुरू होती है। बाप तुम बच्चों को रोज़-रोज़ समझाते रहते हैं, यहाँ बैठे हो तो अन्दर में खुशी होनी चाहिए ना। हमको कौन पढ़ाते हैं! भगवान आकर पढ़ाते हैं - यह तो कभी सुना भी नहीं होगा। वह तो समझते हैं गीता का भगवान कृष्ण है तो कृष्ण ही पढ़ाता होगा। अच्छा, कृष्ण भी समझो तो भी कितनी ऊंच अवस्था होनी चाहिए। एक किताब भी है मनुष्य मत और ईश्वरीय मत का। देवताओं को तो मत लेने की दर-कार ही नहीं है। मनुष्य चाहते हैं ईश्वर की मत। देवताओं को तो मत अगले जन्म में मिली थी जिससे ऊंच पद पाया। अभी तुम बच्चों को श्रीमत मिल रही है श्रेष्ठ बनने के लिए। ईश्वरीय मत और मनुष्य मत में कितना फर्क है। मनुष्य मत क्या कहती है, ईश्वरीय मत क्या कहती है। तो जरूर ईश्वरीय मत पर चलना पड़े। कोई से मिलने जाते हैं तो कुछ भी ले नहीं जाते। याद नहीं रहता किसको क्या सौगात देनी चाहिए। यह मनुष्य मत और ईश्वरीय मत का कान्ट्रास्ट बहुत जरूरी है। तुम मनुष्य थे तो आसुरी मत थी और अभी ईश्वरीय मत मिलती है। उनमें कितना फर्क है। यह शास्त्र आदि सब मनुष्यों के ही बनाये हुए हैं। बाप कोई शास्त्र पढ़कर आते हैं क्या? बाप कहते हैं मैं कोई बाप का बच्चा हूँ क्या? मैं कोई गुरू का शिष्य हूँ क्या, जिससे सीखा हूँ? तो यह भी सब बातें समझानी चाहिए। भल यह जानते हैं कि बन्दरबुद्धि हैं परन्तु मन्दिर लायक बनने वाले भी हैं ना। ऐसे बहुत मनुष्य मत पर चलते हैं फिर तुम सुनाते हो कि हम ईश्वरीय मत पर क्या बनते हैं, वह हमको पढ़ाते हैं। भगवानुवाच - हम उनसे पढ़ने जाते हैं। हम रोज़ एक घण्टा, पौना घण्टा जाते हैं। क्लास में जास्ती टाइम भी लेना नहीं चाहिए। याद की यात्रा तो चलते-फिरते हो सकती है। ज्ञान और योग दोनों ही बहुत सहज हैं। अल्फ का है ही एक अक्षर। भक्ति मार्ग के तो ढेर शास्त्र हैं, इकट्ठा करो तो सारा घर शास्त्रों से भर जाए। कितना इन पर खर्चा हुआ होगा। अब बाप तो बहुत सहज बताते हैं, सिर्फ बाप को याद करो। तो बाप का वर्सा है ही स्वर्ग की बादशाही। तुम विश्व के मालिक थे ना। भारत हेविन था ना। क्या तुम भूल गये हो? यह भी ड्रामा की भावी कहा जाता है। अब बाप आया हुआ है। हर 5 हजार वर्ष बाद आते हैं पढ़ाने। बेहद के बाप का वर्सा जरूर स्वर्ग नई दुनिया का होगा ना। यह तो बिल्कुल सिम्पुल बात है। लाखों वर्ष कह देने से बुद्धि को जैसे ताला लग गया है। ताला खुलता ही नहीं। ऐसा ताला लगा हुआ है जो इतनी सहज बात भी समझते नहीं हैं। बाप समझाते हैं एक ही बात बस है। जास्ती कुछ भी पढ़ाना नहीं चाहिए। यहाँ तुम एक सेकण्ड में किसको भी स्वर्गवासी बना सकते हो। परन्तु यह स्कूल है, इसलिए तुम्हारी पढ़ाई चलती रहती है। ज्ञान सागर बाप तुम्हें ज्ञान तो इतना देते हैं जो सागर को स्याही बनाओ, सारा जंगल कलम बनाओ तो भी अन्त नहीं हो सकता। ज्ञान को धारण करते कितना समय हुआ है। भक्ति को तो आधाकल्प हुआ है। ज्ञान तो तुमको एक ही जन्म में मिलता है। बाप तुमको पढ़ा रहे हैं नई दुनिया के लिए। उस जिस्मानी स्कूल में तो तुम कितना समय पढ़ते हो। 5 वर्ष से लेकर 20-22 वर्ष तक पढ़ते रहते हो। कमाई थोड़ी और खर्चा बहुत करेंगे तो घाटा पड़ जायेगा ना।
बाप कितना सालवेन्ट बनाते हैं, फिर इनसालवेन्ट बन जाते हैं। अभी भारत का हाल देखो क्या है। फलक से समझाना चाहिए। माताओं को खड़ा होना चाहिए। तुम्हारा ही गायन हैं वन्दे मातरम्। धरती को वन्दे मातरम् नहीं कहा जाता है। वन्दे मातरम् मनुष्य को किया जाता है। बच्चे जो बन्धनमुक्त हैं वही यह सर्विस करते हैं। वह भी जैसे कल्प पहले बन्धनमुक्त हुए थे, वैसे होते रहते हैं। अबलाओं पर कितने अत्याचार होते हैं। जानते हैं हमको बाप मिला है, तो समझते हैं बस अब तो बाप की सर्विस करनी है। बन्धन है, ऐसे कहने वाले रिढ़ बकरियां हैं। गवर्मेन्ट कभी कह न सके कि तुम ईश्वरीय सर्विस न करो। बात करने की हिम्मत चाहिए ना। जिसमें ज्ञान है वह तो इतने में सहज बन्धनमुक्त हो सकते हैं। जज को भी समझा सकते हो - हम रूहानी सेवा करना चाहते हैं। रूहानी बाप हमको पढ़ा रहे हैं। क्रिश्चियन लोग फिर भी कहते हैं लिबरेट करो, गाइड बनो। भारतवासियों से फिर भी उन्हों की समझ अच्छी है। तुम बच्चों में जो अच्छे समझदार हैं उनको सर्विस का बहुत शौक रहता है। समझते हैं ईश्वरीय सर्विस से बहुत लॉटरी मिलनी है। कई तो लॉटरी आदि को समझते ही नहीं। वहाँ भी जाकर दास-दासियां बनेंगे। दिल में समझते हैं अच्छा दासी ही सही, चण्डाल ही सही। स्वर्ग में तो होंगे ना! उन्हों की चलन भी ऐसी देखने में आती है। तुम समझते हो बेहद का बाप हमको समझा रहे हैं। यह दादा भी समझाते हैं, बाप इन द्वारा बच्चों को पढ़ा रहे हैं। कोई तो इतना भी समझते नहीं। यहाँ से बाहर निकले खलास। यहाँ पर बैठे भी जैसे कुछ समझते नहीं। बुद्धि बाहर भटकती धक्का खाती रहती है। एक भी भूत निकलता नहीं है। पढ़ाने वाला कौन और बनते क्या हैं! साहूकारों के भी दास-दासियां बनेंगे ना। अभी भी साहूकारों के पास कितने नौकर-चाकर रहते हैं। सर्विस पर तो एकदम उड़ना चाहिए। तुम बच्चे शान्ति स्थापन अर्थ निमित्त बने हो, विश्व में सुख-शान्ति स्थापन कर रहे हो। प्रैक्टिकल में तुम जानते हो हम श्रीमत पर स्थापन कर रहे हैं, इसमें अशान्ति कोई होनी नहीं चाहिए। बाबा ने यहाँ भी बहुत ऐसे अच्छे-अच्छे घर देखे हुए हैं। एक घर में 6-7 बहुएं इकट्ठी इतना प्यार से रहती हैं, बिल्कुल शान्ति लगी रहती है। बोलते थे - हमारे पास तो स्वर्ग लगा पड़ा है। कोई खिट-खिट की बात नहीं। सब आज्ञाकारी हैं, उस समय बाबा को भी सन्यासी ख्यालात थे। दुनिया से वैराग्य रहता था। अभी तो यह है बेहद का वैराग्य। कुछ भी याद न रहे। बाबा तो नाम सब भूल जाते हैं। बच्चे कहते हैं बाबा आप हमको याद करते हैं? बाबा कहते हमको तो सबको भूलना है। न विसरो, न याद रहो। बेहद का वैराग्य है ना। सबको भूलना है। हम यहाँ के रहने वाले थोड़ेही हैं। बाप आया हुआ है - अपना स्वर्ग का वर्सा देने। बेहद का बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम विश्व के मालिक बन जायेंगे। यह बैज़ बहुत अच्छा है समझाने के लिए। कोई मांगे तो बोलो समझकर लो। इस बैज को समझने से तुमको विश्व की बादशाही मिल सकती है। शिवबाबा इस ब्रह्मा द्वारा डायरेक्शन देते हैं मुझे याद करो तो तुम यह बनेंगे। गीता वाले जो हैं वह अच्छी रीति समझ लेंगे। जो देवता धर्म के होंगे। कोई-कोई प्रश्न पूछते हैं - देवतायें गिरते क्यों हैं? अरे, यह चक्र फिरता रहता है। पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे तो उतरेंगे ना! चक्र तो फिरना ही है। हर एक की दिल में यह आता जरूर है हम सर्विस क्यों नहीं कर सकते हैं। जरूर मेरे में कोई खामी है। माया के भूतों ने नाक से पकड़ा हुआ है।
अब तुम बच्चे समझते हो हमको अब घर जाना है फिर नई दुनिया में आकर राज्य करेंगे। तुम मुसाफिर हो ना। दूर देश से यहाँ आकर पार्ट बजाते हो। अभी तुम्हारी बुद्धि में है हमको अमरलोक जाना है। यह मृत्यु-लोक खलास हो जाना है। बाप समझाते तो बहुत हैं। अच्छी रीति धारण करना है। इसको फिर उगारते रहना चाहिए। यह भी बाप ने समझाया है कर्मभोग की बीमारी उथल खायेगी। माया सतायेगी परन्तु मूँझना नहीं चाहिए। थोड़ा कुछ होता है तो हैरान हो जाते हैं। बीमारी में मनुष्य और भी भगवान को जास्ती याद करते हैं। बंगाल में जब कोई बहुत बीमार होता है तो उनको कहते हैं राम बोलो... राम बोलो...। देखते हैं अब मरने पर है तो गंगा पर ले जाकर हरी बोल, हरी बोल करते हैं फिर उनको ले आकर जलाने की क्या दरकार है। गंगा में अन्दर डाल दो ना। कच्छ-मच्छ आदि का शिकार हो जायेगा। काम में आ जायेगा। पारसी लोग रख देते हैं तो वह हड्डियाँ भी काम में आती हैं। बाप कहते हैं तुम और सब बातें भूल मुझे याद करो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बन्धनमुक्त बनकर भारत की सच्ची सेवा करनी है। फ़लक से समझाना है कि हमें रूहानी बाप पढ़ा रहे हैं, हम रूहानी सेवा पर हैं। ईश्वरीय सेवा की उछल आती रहे।

2) कर्मभोग की बीमारी वा माया के तूफानों में मूँझना वा हैरान नहीं होना है। बाप ने जो ज्ञान दिया है उसे उगारते बाप की याद में हर्षित रहना है।

वरदान:-

सर्व संबंधों की अनुभूति के साथ प्राप्तियों की खुशी का अनुभव करने वाले तृप्त आत्मा भव

जो सच्चे आशिक हैं वह हर परिस्थिति में, हर कर्म में सदा प्राप्ति की खुशी में रहते हैं। कई बच्चे अनुभूति करते हैं कि हाँ वह मेरा बाप है, साजन है, बच्चा है...लेकिन प्राप्ति जितनी चाहते हैं उतनी नहीं होती। तो अनुभूति के साथ सर्व संबंधों द्वारा प्राप्ति की महसूसता हो। ऐसे प्राप्ति और अनुभूति करने वाले सदा तृप्त रहते हैं। उन्हें कोई भी चीज़ की अप्राप्ति नहीं लगती। जहाँ प्राप्ति है वहाँ तृप्ति जरूर है।

स्लोगन:-

निमित्त बनो तो सेवा की सफलता का शेयर मिल जायेगा।

16-10-2019

16-10-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - आत्मा से विकारों का किचड़ा निकाल शुद्ध फूल बनो। बाप की याद से ही सारा किचड़ा निकलेगा''

प्रश्नः-

पवित्र बनने वाले बच्चों को किस एक बात में बाप को फालो करना है?

उत्तर:-

जैसे बाप परम-पवित्र है वह कभी अपवित्र किचड़े वालों के साथ मिक्सअप नहीं होता, बहुत-बहुत पोड (पवित्र) है। ऐसे आप पवित्र बनने वाले बच्चे बाप को फालो करो, सी नो ईविल।

ओम् शान्ति।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। हैं तो यह दोनों बाप। एक को रूहानी, दूसरे को जिस्मानी बाप कहेंगे। शरीर तो दोनों का एक ही है तो जैसेकि दोनों बाप समझाते हैं। भल एक समझाते हैं, दूसरा समझते हैं फिर भी कहेंगे दोनों समझाते हैं। यह जो इतनी छोटी-सी आत्मा है उन पर कितना मैल चढ़ा हुआ है। मैल चढ़ने से कितना घाटा पड़ जाता है। यह फायदा और घाटा तब देखने में आता है जबकि शरीर के साथ है। तुम जानते हो हम आत्मा जब पवित्र बनेंगी तब इन लक्ष्मी-नारायण जैसा पवित्र शरीर मिलेगा। अभी आत्मा में कितना मैल चढ़ा हुआ है। जब मधु (शहद) निकालते हैं तो उनको छानते हैं। तो कितनी मैल निकलती है फिर मधु शुद्ध अलग हो जाती है। आत्मा भी बहुत मैली हो जाती है। आत्मा ही कंचन थी, बिल्कुल पवित्र थी। शरीर कैसा सुन्दर था। इन लक्ष्मी-नारायण का शरीर देखो कितना सुन्दर है। मनुष्य तो शरीर को ही पूजते हैं ना। आत्मा की तरफ नहीं देखते। आत्मा की तो पहचान भी नहीं है। पहले आत्मा सुन्दर थी, चोला भी सुन्दर मिलता है। तुम भी अभी यह बनना चाहते हो। तो आत्मा कितनी शुद्ध होनी चाहिए। आत्मा को ही तमोप्रधान कहा जाता है क्योंकि उनमें फुल किचड़ा है। एक तो देह-अभिमान का किचड़ा और फिर काम-क्रोध का किचड़ा। किचड़ा निकालने के लिए छाना जाता है ना। छानने से रंग ही बदल जाता है। तुम अच्छी रीति बैठ विचार करेंगे तो फील होगा बहुत किचड़ा भरा हुआ है। आत्मा में रावण की प्रवेशता है। अभी बाप की याद में रहने से ही किचड़ा निकलता है। इसमें भी टाइम लगता है। बाप समझाते हैं देह-अभिमान होने के कारण विकारों का कितना किचड़ा है। क्रोध का किचड़ा भी कोई कम नहीं। क्रोधी अन्दर में जैसे जलता रहता है। कोई न कोई बात पर दिल जलती रहती है। शक्ल भी ताम्बे जैसी रहती है। अभी तुम समझते हो हमारी आत्मा जली हुई है। आत्मा में कितनी मैल है - अभी पता पड़ा है। यह बातें समझने वाले बहुत थोड़े हैं, इसमें तो फर्स्टक्लास फूल चाहिए ना। अभी तो बहुत खामियाँ हैं। तुमको तो सब खामियां निकाल बिल्कुल पवित्र बनना है ना। यह लक्ष्मी-नारायण कितने पवित्र हैं। वास्तव में उन्हों को हाथ लगाने का भी हुक्म नहीं है। पतित जाकर इतने ऊंच पवित्र देवताओं को हाथ लगा न सकें। हाथ लगाने लायक ही नहीं। शिव को तो हाथ लगा नहीं सकते। वह है ही निराकार, उनको हाथ लग ही नहीं सकता। वह तो मोस्ट पवित्र है। भल उनकी प्रतिमा बड़ी रख दी है क्योंकि इतनी छोटी बिन्दी उनको तो कोई हाथ लगा न सके। आत्मा शरीर में प्रवेश करती है तो शरीर बड़ा होता है। आत्मा तो बड़ी-छोटी नहीं होती है। यह तो है ही किचड़े की दुनिया। आत्मा में कितना किचड़ा है। शिवबाबा बहुत पोड (पवित्र) है। बहुत पवित्र है। यहाँ तो सबको एक समान बना देते हैं। एक-दो को कह भी देते हैं तुम तो जानवर हो। सतयुग में ऐसी भाषा होती नहीं। अभी तुम फील करते हो हमारी आत्मा में बड़ी मैल चढ़ी हुई है। आत्मा लायक ही नहीं है जो बाप को याद करे। ना-लायक समझ माया भी एकदम उनको हटा देती है।
बाप कितना पोड (पवित्र-शुद्ध) है। हम आत्मायें भी क्या से क्या बन जाती हैं। अब बाप समझाते हैं तुमने मुझे बुलाया ही है आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए। बहुत किचड़ा भरा हुआ है। बगीचे में कोई सब फर्स्टक्लास फूल नहीं होते हैं। नम्बरवार हैं। बाप बागवान है। आत्मा कितनी पवित्र बनती है फिर कितनी मैली एकदम कांटा बन जाती है। आत्मा में ही देह-अभिमान का, काम, क्रोध का किचड़ा भरता है। क्रोध भी मनुष्य में कितना है। तुम पवित्र बन जायेंगे तो फिर कोई की शक्ल देखने की भी दिल नहीं होगी। सी नो ईविल। अप-वित्र को देखना ही नहीं है। आत्मा पवित्र बन, पवित्र नया चोला लेती है तो फिर किचड़ा देखती ही नहीं। किचड़े की दुनिया ही खत्म हो जाती है। बाप समझाते हैं तुम देह-अभिमान में आकर कितना किचड़ा बन पड़े हो। पतित बन पड़े हो। बच्चे बुलाते भी हैं - बाबा हमारे में क्रोध का भूत है। बाबा हम आपके पास आये हैं, पवित्र बनने। जानते हैं बाप तो है ही एवरप्योर। ऐसे हाइएस्ट अथॉरिटी को सर्वव्यापी कहकर कितना डिफेम करते हैं। अपने पर भी बड़ी ऩफरत आती है - हम क्या थे फिर क्या से क्या बन जाते हैं। यह बातें तुम बच्चे ही समझते हो, और कोई भी सतसंग वा युनिवर्सिटी आदि में कहाँ भी ऐसी एम ऑबजेक्ट कोई समझा न सके। अभी तुम बच्चे जानते हो हमारी आत्मा में कैसे किचड़ा भरता गया है। 2 कला कम हुई फिर 4 कला कम हुई, किचड़ा भरता गया इसलिए कहा ही जाता है तमोप्रधान। कोई लोभ में, कोई मोह में जल मरते हैं, इस अवस्था में ही जल-जलकर मर जाना है। अभी तुम बच्चों को तो शिवबाबा की याद में ही शरीर छोड़ना है जो शिवबाबा ऐसा बनाते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण को ऐसा बाप ने बनाया ना। तो अपने को कितनी खबरदारी रखनी चाहिए। तूफान तो बहुत आयेंगे। तूफान माया के ही आते हैं, और कोई तूफान नहीं हैं। जैसे शास्त्रों में कहानी लिख दी है हनूमान आदि की। कहते हैं भगवान ने शास्त्र बनाये हैं। भगवान तो सब वेद-शास्त्रों का सार सुनाते हैं। भगवान ने तो सद्गति कर दी, उनको शास्त्र बनाने की क्या दरकार। अब बाप कहते हैं हियर नो ईविल। इन शास्त्रों आदि से तुम ऊंच नहीं बन सकते हो। मैं तो इन सबसे अलग हूँ। कोई भी पहचानते नहीं। बाप क्या है, किसको पता नहीं। बाप जानते हैं कौन-कौन मेरी सर्विस करते हैं अर्थात् कल्याणकारी बन औरों का भी कल्याण करते हैं, वही दिल पर चढ़ते हैं। कोई तो ऐसे भी हैं जिनको सर्विस का पता ही नहीं। तुम बच्चों को ज्ञान तो मिला है कि अपने को आत्मा समझो और बाप को याद करो। भल आत्मा शुद्ध बनती है, शरीर तो फिर भी यह पतित है ना। जिनकी आत्मा शुद्ध होती जाती है उनकी एक्टिविटी में रात-दिन का फर्क रहता है। चलन से भी मालूम पड़ता है। नाम कोई का नहीं लिया जाता है, अगर नाम लें तो कहीं और ही बदतर न हो जाएं।
अभी तुम फ़र्क देख सकते हो - तुम क्या थे, क्या बनना है! तो श्रीमत पर चलना चाहिए ना। अन्दर गन्द जो भरा हुआ है उसको निकालना है। लौकिक सम्बन्ध में भी कोई-कोई बहुत गन्दे बच्चे होते हैं तो उनसे बाप भी तंग हो जाते हैं। कहते हैं ऐसा बच्चा तो न होता तो अच्छा था। फूलों के बगीचे की खुशबू होती है। परन्तु ड्रामा अनुसार किचड़ा भी है। अक को तो बिल्कुल देखने भी दिल नहीं होती। परन्तु बगीचे में जाने से नज़र तो सब पर पड़ेगी ना। आत्मा कहेगी यह फलाना फूल है। खुशबू भी अच्छे फूल की लेंगे ना। बाप भी देखते हैं इनकी आत्मा कितना याद की यात्रा में रहती है, कितना पवित्र बनी है और फिर औरों को भी आपसमान बनाते हैं। ज्ञान सुनाते हैं! मूल बात ही है मनमनाभव। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो पवित्र फूल बनो। यह लक्ष्मी-नारायण कितने पवित्र फूल थे। इनसे भी शिवबाबा बहुत पोड है। मनुष्यों को थोड़ेही पता है कि इन लक्ष्मी-नारायण को भी ऐसा शिवबाबा ने बनाया है। तुम जानते हो इस पुरूषार्थ से यह बने हैं। राम ने कम पुरूषार्थ किया तो चन्द्रवंशी बनें। बाप समझाते तो बहुत हैं। एक तो याद की यात्रा में रहना है, जिससे गंद निकले, आत्मा पवित्र बनें। तुम्हारे पास म्युज़ियम आदि में बहुत आते हैं। बच्चों को सर्विस का बहुत शौक रखना है। सर्विस को छोड़ कभी नींद नहीं करनी होती है। सर्विस पर बड़ा एक्यूरेट रहना चाहिए। म्युज़ियम में भी तुम लोग रेस्ट का टाइम छोड़ते हो। गला थक जाता है, भोजन आदि भी खाना है परन्तु अन्दर में दिन-रात उछल आनी चाहिए। कोई आये तो उनको रास्ता बतायें। भोजन के टाइम कोई आ जाते हैं तो पहले उनको अटेन्ड कर फिर भोजन खाना चाहिए। ऐसी सर्विस वाला हो। कोई-कोई को बड़ा देह-अभिमान आ जाता है, आराम-पसन्द, नवाब बन जाते हैं। बाप को समझानी तो देनी पड़े ना। यह नवाबी छोड़ो। फिर बाप साक्षात्कार भी करायेंगे - अपना पद देखो। देह-अभिमान का कुल्हाड़ा आपेही अपने पांव पर लगाया है। बहुत बच्चे बाबा से भी रीस करते हैं। अरे, यह तो शिवबाबा का रथ है, इनकी सम्भाल करनी पड़ती है। यहाँ तो ऐसे हैं जो ढेर दवाइयाँ लेते रहते, डॉक्टरों की दवाई करते रहते। भल बाबा कहते हैं शरीर को तन्दुरुस्त रखना है परन्तु अपनी अवस्था को भी देखना है ना। तुम बाबा की याद में रहकर खाओ तो कभी कोई चीज़ नुकसान नहीं करेगी। याद से ताकत भर जायेगी। भोजन बड़ा शुद्ध हो जायेगा। परन्तु वह अवस्था है नहीं। बाबा तो कहते हैं ब्राह्मणों का बनाया हुआ भोजन उत्तम ते उत्तम है परन्तु वह तब जबकि याद में रहकर बनावें। याद में रह बनाने से उनको भी फायदा, खाने वाले को भी फायदा होगा।
अक भी तो बहुत हैं ना। यह बिचारे क्या पद पायेंगे। बाप को तो रहम पड़ता है। परन्तु दास-दासियां बनने की भी नूँध है, इसमें खुश नहीं होना चाहिए। विचार भी नहीं करते हैं - हमको ऐसा बनना है। दास-दासियां बनने से फिर साहूकार बनें तो अच्छा है, दास-दासियां रख सकेंगे। बाप तो कहते हैं निरन्तर मुझ एक को याद करो, सिमर-सिमर सुख पाओ। भक्तों ने फिर सिमरणी माला बैठ बनाई है। वह भक्तों का काम है। बाप तो सिर्फ कहते हैं अपने को आत्मा समझो, बाप को याद करो। बस। बाकी कोई जाप न करो। न माला फेरो। बाप को जानना है, उनको याद करना है। मुख से बाबा-बाबा भी कहना थोड़ेही है। तुम जानते हो वह हम आत्माओं का बेहद का बाप है, उनको याद करने से हम सतोप्रधान बन जायेंगे अर्थात् आत्मा कंचन बन जायेगी। कितना सहज है। परन्तु युद्ध का मैदान है ना। तुम्हारी है ही माया से लड़ाई। वह घड़ी-घड़ी तुम्हारा बुद्धि का योग तोड़ती है। जितने-जितने विनाश काले प्रीत बुद्धि हैं उतना पद होता है। सिवाए एक के और कोई भी याद न पड़े। कल्प पहले भी ऐसे निकले हैं जो विजय माला के दाने बने हैं। तुम जो ब्राह्मण कुल के हो, ब्राह्मणों की रुण्ड माला बनती है, जिन्होंने बहुत गुप्त मेहनत की है। ज्ञान भी गुप्त है ना। बाप तो हर एक को अच्छी रीति जानते हैं। अच्छे-अच्छे नम्बरवन जिनको महारथी समझते थे, वह आज हैं नहीं। देह-अभिमान बहुत है। बाप की याद रह नहीं सकती। माया बड़ा ज़ोर से थप्पड़ मारती है। बहुत थोड़े हैं जिनकी माला बन सकेगी। तो बाप फिर भी बच्चों को समझाते हैं - अपने को देखते रहो हम कितने पवित्र देवता थे फिर हम क्या से क्या, किचड़ा बन गये हैं। अब शिवबाबा मिला है तो उनकी मत पर चलना चाहिए ना। कोई भी देहधारी को याद नहीं करना है। कोई की भी याद न आये। चित्र भी कोई का नहीं रखना है। एक शिव-बाबा की ही याद रहे। शिवबाबा को शरीर तो है नहीं। यह भी टैप्रेरी लोन लेता हूँ। तुमको ऐसा देवी-देवता लक्ष्मी-नारायण बनाने के लिए कितनी मेहनत करते हैं। बाप कहते हैं तुम हमको पतित दुनिया में बुलाते हो। तुमको पावन बनाता हूँ फिर तुम पावन दुनिया में मुझे बुलाते ही नहीं हो। वहाँ आकर क्या करेंगे! उनकी सर्विस ही पावन बनाने की है। बाप जानते हैं कि एकदम जलकर काले कोयले बन गये हैं। बाप आये हैं तुम्हें गोरा बनाने। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सर्विस में बड़ा एक्यूरेट रहना है। दिन-रात सर्विस की उछल आती रहे। सर्विस को छोड़ कभी भी आराम नहीं करना है। बाप समान कल्याणकारी बनना है।

2) एक की याद से प्रीत बुद्धि बन अन्दर का किचड़ा निकाल देना है। खुशबूदार फूल बनना है। इस किचड़े की दुनिया से दिल नहीं लगानी है।

वरदान:-

"पहले आप'' के मंत्र द्वारा सर्व का स्वमान प्राप्त करने वाले निर्माण सो महान भव

यही महामंत्र सदा याद रहे कि "निर्माण ही सर्व महान है''। "पहले आप'' करना ही सर्व से स्वमान प्राप्त करने का आधार है। महान बनने का यह मंत्र वरदान रूप में सदा साथ रखना। वरदानों से ही पलते, उड़ते मंजिल पर पहुंचना। मेहनत तब करते हो जब वरदानों को कार्य में नहीं लगाते। अगर वरदानों से पलते रहो, वरदानों को कार्य में लगाते रहो तो मेहनत समाप्त हो जायेगी। सदा सफलता और सन्तुष्टता का अनुभव करते रहेंगे।

स्लोगन:-

सूरत द्वारा सेवा करने के लिए अपना मुस्कराता हुआ रमणीक और गम्भीर स्वरूप इमर्ज करो।

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