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22-08-2019

22-08-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अब विकर्म करना बन्द करो क्योंकि अब तुम्हें विकर्माजीत संवत शुरू करना है''

प्रश्नः-

हर एक ब्राह्मण बच्चे को किस एक बात में बाप को फॉलो अवश्य करना है?

उत्तर:-

जैसे बाप स्वयं टीचर बनकर तुम्हें पढ़ाते हैं, ऐसे बाप के समान हर एक को टीचर बनना है। जो पढ़ते हो उसे दूसरों को पढ़ाना है। तुम टीचर के बच्चे टीचर, सतगुरू के बच्चे सतगुरू भी हो। तुम्हें सच-खण्ड स्थापन करना है। तुम सच की नैया पर हो, तुम्हारी नैया हिलेगी डुलेगी लेकिन डूब नहीं सकती।

ओम् शान्ति।

रूहानी बाप बैठ बच्चों के साथ रूहरिहान करते हैं। रूहों से पूछते हैं क्योंकि यह नई नॉलेज है ना। मनुष्य से देवता बनने की यह है नई नॉलेज अथवा पढ़ाई। यह तुमको कौन पढ़ाते हैं? बच्चे जानते हैं रूहानी बाप हम बच्चों को ब्रह्मा द्वारा पढ़ाते हैं। यह भूलना नहीं चाहिए। वह बाप है फिर पढ़ाते हैं तो टीचर भी हो गया। यह भी तुम जानते हो हम पढ़ते ही हैं नई दुनिया के लिए। हर एक बात में निश्चय होना चाहिए। नई दुनिया के लिए पढ़ाने वाला बाप ही होता है। मूल बात ही बाप की हुई। बाप हमको यह शिक्षा देते हैं ब्रह्मा द्वारा। कोई द्वारा तो देंगे ना। गाया हुआ भी है भगवान ब्रह्मा द्वारा राजयोग सिखलाते हैं। ब्रह्मा द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं, जो देवी-देवता धर्म अभी नहीं है। अब तो है ही कलियुग। तो सिद्ध होता है स्वर्ग की स्थापना हो रही है। स्वर्ग में सिर्फ देवी-देवता धर्म वाले हैं, बाकी इतने सब धर्म होंगे ही नहीं अर्थात् विनाश हो जायेंगे क्योंकि सतयुग में और कोई धर्म था ही नहीं। यह बातें तुम बच्चों की बुद्धि में हैं, अब तो अनेक धर्म हैं। अब फिर बाप हमको मनुष्य से देवता बनाते हैं क्योंकि अब संगमयुग है। यह तो बहुत सहज बात समझाने की है। त्रिमूर्ति में भी दिखाते हैं - ब्रह्मा द्वारा स्थापना। किसकी? स्थापना जरूर नई दुनिया की होगी, पुरानी की तो नहीं होगी। बच्चों को यह निश्चय है कि नई दुनिया में रहते ही हैं दैवी गुण वाले देवतायें। तो अब हमको भी गृहस्थ व्यवहार में रहते दैवी गुण धारण करने हैं। पहले-पहले काम पर जीत पाकर निर्विकारी बनना है। कल इन देवी-देवताओं के आगे जाकर कहते भी थे कि आप सम्पूर्ण निर्विकारी हो, हम विकारी हैं। अपने को विकारी फील करते थे क्योंकि विकार में जाते थे। अब बाप कहते हैं तुमको भी ऐसे निर्विकारी बनना है। दैवी गुण धारण करने हैं। यह विकार काम-क्रोध आदि अगर हैं तो दैवी गुण नहीं कहेंगे। विकार में जाना, क्रोध करना यह आसुरी गुण है। देवताओं में लोभ होगा क्या? वहाँ 5 विकार होते नहीं। यह है ही रावण की दुनिया। रावण का जन्म होता है त्रेता और द्वापर के संगम पर। जैसे यह पुरानी दुनिया और नई दुनिया का संगम है ना, ऐसे वह भी संगम हो जाता है। अभी रावण राज्य में बहुत दु:ख है, बीमारी है, इसको कहा ही जाता है रावण राज्य। रावण को हर वर्ष जलाते हैं। वाम मार्ग में जाने से विकारी बन जाते हैं। अब तुमको निर्विकारी बनना है। यहाँ ही दैवीगुण धारण करने हैं। जैसा जो कर्म करता है ऐसा ही फल पाता है। बच्चों से अब कोई विकर्म नहीं होना चाहिए।
एक होता है राजा विकर्माजीत, दूसरा होता है राजा विक्रम। यह है ही विक्रम संवत यानी रावण विकारियों का संवत। यह कोई समझते नहीं। न कल्प की आयु का ही किसको पता है। वास्तव में विकर्माजीत होते हैं देवतायें। 5 हजार वर्ष में 2500 वर्ष हुए राजा विक्रम के, 2500 वर्ष राजा विकर्माजीत के। आधा है विक्रम का। वह लोग भल कहते हैं परन्तु कुछ भी पता नहीं है। तुम कहेंगे विकर्माजीत का संवत एक वर्ष से शुरू होता है फिर 2500 वर्ष बाद विक्रम संवत शुरू होता है। अभी विक्रम संवत पूरा होगा फिर तुम विकर्माजीत महाराजा-महारानी बन रहे हो, जब बन जायेंगे तो विकर्माजीत संवत शुरू हो जायेगा। यह सब तुम ही जानते हो। तुमको कहते हैं ब्रह्मा को क्यों बिठाया है? अरे, तुम्हारी इनसे क्यों आकर पड़ी है। हमको पढ़ाने वाला कोई यह थोड़ेही है। हम तो शिवबाबा से पढ़ते हैं। यह भी उनसे पढ़ता है। पढ़ाने वाला तो ज्ञान का सागर है, वह है विचित्र, उनको चित्र अर्थात् शरीर होता नहीं। उनको कहा ही जाता है निराकार। वहाँ सब निराकारी आत्मायें रहती हैं। फिर यहाँ आकर साकारी बनती हैं। परमपिता परमात्मा को सब याद करते हैं, वह है आत्माओं का पिता। लौकिक बाप को परम अक्षर नहीं कहेंगे। यह समझ की बात है ना। स्कूल के स्टूडेन्ट पढ़ाई पर अटेन्शन देते हैं। जब कोई मर्तबा पा लेते, बैरिस्टर आदि बन जाते तो फिर पढ़ाई बन्द। ऐसे थोड़ेही बैरिस्टर बनकर फिर पढ़ेगा। नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाती है। तुम भी देवता बन गये फिर तुमको पढ़ाई की दरकार नहीं रहती। 2500 वर्ष देवताओं का राज्य चलता है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो तुमको फिर औरों को समझाना पड़े। यह भी ख्याल रखना चाहिए। पढ़ाते नहीं तो टीचर कैसे ठहरे! तुम सब टीचर्स हो, टीचर की औलाद हो ना तो तुमको भी टीचर ही बनना है। तो कितने टीचर्स चाहिए पढ़ाने लिए? जैसे बाप, टीचर, सतगुरू है, वैसे तुम भी टीचर हो। सतगुरू के बच्चे सतगुरू हो। वह कोई सतगुरू नहीं हैं। वह गुरू के बच्चे गुरू। सत माना सच। सचखण्ड भी भारत को कहा जाता था, यह झूठ खण्ड है। सच खण्ड बाबा ही स्थापन करते हैं, वह है सच्चा सांई बाबा। जब रीयल बाप आते हैं तो झूठे भी बहुत निकल पड़ते हैं। गायन भी है ना - नैया डोलेगी, त़ूफान आयेंगे, परन्तु डूबेगी नहीं। बच्चों को समझाया जाता है, माया के तूफान बहुत आयेंगे। उनसे डरना नहीं है। सन्यासी लोग तुमको ऐसे कभी नहीं कहेंगे कि माया के तूफान आयेंगे। उनको पता ही नहीं है, नैया को पार कहाँ ले जायेंगे।
तुम बच्चे जानते हो भक्ति से सद्गति नहीं होती है। नीचे ही उतरते जाते हैं। भल कहते हैं भगवान् आकर भक्तों को भक्ति का फल देते हैं। भक्ति तो जरूर करनी चाहिए। अच्छा, भक्ति का फल भगवान क्या आकर देंगे? जरूर सद्गति देंगे। कहते हैं परन्तु कब और कैसे देंगे - यह पता नहीं है। तुम कोई से पूछो तो कह देंगे यह तो अनादि चलती आ रही है। परम्परा से चली आई है। रावण को कब से जलाना शुरू किया है? कहेंगे परम्परा से। तुम समझाते हो तो कहते है इन्हों का ज्ञान तो कोई नया है। जिन्होंने कल्प पहले समझा है, वह झट समझ जाते हैं। ब्रह्मा की तो बात ही छोड़ दो। शिवबाबा का जन्म तो है ना, जिसको शिवरात्रि भी कहते हैं। बाप समझाते हैं मेरा जन्म दिव्य और अलौकिक है। प्राकृतिक मनुष्यों सदृश्य जन्म नहीं मिलता है क्योंकि वह सब गर्भ से जन्म लेते हैं, शरीरधारी बनते हैं। मैं तो गर्भ में प्रवेश नहीं करता हूँ। यह नॉलेज सिवाए परमपिता परमात्मा, ज्ञान सागर के और कोई दे न सके। ज्ञान सागर कोई मनुष्य को नहीं कहा जाता है। यह उपमा है ही निराकार की। निराकार बाप आत्माओं को पढ़ाते हैं, समझाते हैं। तुम बच्चे इस रावण के राज्य में पार्ट बजाते-बजाते देह-अभिमानी बन पड़े हो। आत्मा सब कुछ करती है। यह ज्ञान उड़ गया है। यह तो आरगन्स हैं ना। मैं आत्मा हूँ, चाहे इनसे कर्म कराऊं, चाहे न कराऊं। निराकारी दुनिया में तो शरीर रहित बैठे रहते हैं। अभी तुम अपने घर को भी जान गये हो। वो लोग फिर घर को ईश्वर मान लेते हैं। ब्रह्म ज्ञानी, तत्व ज्ञानी हैं ना। कहते हैं ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। अगर कहें ब्रह्म में निवास करेंगे तो ईश्वर अलग हो जाये। यह तो ब्रह्म को ही ईश्वर कह देते हैं। यह भी ड्रामा में नूंध है। बाप को भी भूल जाते हैं। जो बाप विश्व का मालिक बनाते हैं, उनको तो याद करना चाहिए ना क्योंकि वही स्वर्ग बनाने वाला है। अभी तुम हो पुरूषोत्तम संगमयुगी ब्राह्मण। तुम उत्तम पुरूष बनते हो। कनिष्ट पुरूष उत्तम के आगे माथा टेकते हैं। देवताओं के मन्दिर में जाकर कितनी महिमा गाते हैं। अभी तुम जानते हो हम सो देवता बनते हैं। यह तो बहुत सिम्पुल बात है। विराट रूप के बारे में भी बतलाया है। विराट चक्र है ना। वह तो सिर्फ गाते हैं ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय.......। लक्ष्मी-नारायण आदि के चित्र तो हैं ना। बाप आकर सबको करेक्ट करते हैं। तुमको भी करेक्ट कर रहे हैं क्योंकि भक्ति मार्ग में जन्म-जन्मान्तर तुम जो कुछ करते आये हो वह है रांग इसलिए तुम तमोप्रधान बने हो। अभी है ही अनराइटियस वर्ल्ड। इसमें दु:ख ही दु:ख है क्योंकि रावण का राज्य है, सब विकारी हैं। रावण का राज्य है अनराइटियस, राम का राज्य है राइटियस। यह है कलियुग, वह है सतयुग। यह तो समझ की बात है ना। इनको शास्त्र उठाते कभी देखा है क्या। अपना भी नॉलेज दिया, रचना की भी समझानी दी है। शास्त्र बुद्धि में उन्हों के होते जो पढ़कर औरों को सुनाते हैं। तो सबका सुख दाता एक शिवबाबा है। वही ऊंच ते ऊंच बाप है, उनको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। बेहद का बाप जरूर बेहद का वर्सा देते हैं। 5 हजार वर्ष पहले तुम स्वर्गवासी थे, अब नर्कवासी हो। राम कहा जाता है बाप को। वह राम नहीं, जिसकी सीता चुराई गई। वह कोई सद्गति दाता थोड़ेही है, वह राम राजा था। महाराजा भी नहीं था। महाराजा और राजा का भी राज़ समझाया है - वह 16 कला, वह 14 कला। रावण राज्य में भी राजायें, महाराजायें होते हैं। वह बहुत साहूकार, वह कम साहूकार। उनको कोई सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी नहीं कहेंगे। इनमें साहूकार को महाराजा का लकब मिलता है। कम साहूकार को राजा का। अभी तो है ही प्रजा का प्रजा पर राज्य। धनी धोणी कोई है नहीं। राजा को प्रजा अन्न दाता समझती थी। अभी तो वह भी गये, बाकी प्रजा का देखो क्या हाल है! लड़ाई-झगड़ा आदि कितना है। अभी तुम्हारी बुद्धि में आदि से अन्त तक सारी नॉलेज है। रचयिता बाप अब प्रैक्टिकल में है, जिसकी फिर भक्ति मार्ग में कहानी बनेगी। अभी तुम भी प्रैक्टिकल में हो। आधाकल्प तुम राज्य करेंगे फिर बाद में कहानी हो जायेगी। चित्र तो रहते हैं। कोई से पूछो यह कब राज्य करते थे? तो लाखों वर्ष कह देंगे। सन्यासी हैं निवृत्ति मार्ग वाले, तुम हो पवित्र गृहस्थ आश्रम वाले। फिर अपवित्र गृहस्थ आश्रम में जाना है। स्वर्ग के सुखों को कोई जानता नहीं। निवृत्ति मार्ग वाले तो कभी प्रवृत्ति मार्ग सिखला न सकें। आगे तो जंगल में रहते थे, उनमें ताकत थी। जंगल में ही उन्हों को भोजन पहुँचाते थे, अभी वह ताकत ही नहीं रही है। जैसे तुम्हारे में भी वहाँ राज्य करने की ताकत थी, अभी कहाँ है। हो तो वही ना। अभी वह ताकत नहीं रही है। भारतवासियों का असुल जो धर्म था वह अभी नहीं है। अधर्म हो गया है। बाप कहते हैं मैं आकर धर्म की स्थापना, अधर्म का विनाश करता हूँ। अधर्मियों को धर्म में ले आता हूँ। बाकी जो बचते हैं, वह विनाश हो जायेंगे। फिर भी बाप बच्चों को समझाते हैं कि सबको बाप का परिचय दो। बाप को ही दु:ख हर्ता सुख कर्ता कहा जाता है। जब बहुत दु:खी होते हैं तब ही बाप आकर सुखी बनाते हैं। यह भी अनादि बना-बनाया खेल है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस पुरूषोत्तम संगमयुग पर उत्तम पुरूष बनने के लिए आत्म-अभिमानी बनने का पुरूषार्थ करना है। सत् बाप मिला है तो कोई भी असत्य, अनराइटियस काम नहीं करना है।

2) माया के तूफानों से डरना नहीं है। सदा याद रहे सत की नैया हिलेगी डुलेगी लेकिन डूबेगी नहीं। सतगुरू के बच्चे सतगुरू बन सबकी नैया पार लगानी है।

वरदान:-

समय प्रमाण अपने भाग्य का सिमरण कर खुशी और प्राप्तियों से भरपूर बनने वाले स्मृति स्वरूप भव

भक्ति में आप स्मृति स्वरूप आत्माओं के यादगार रूप में भक्त अभी तक आपके हर कर्म की विशेषता का सिमरण करते अलौकिक अनुभवों में खो जाते हैं तो आपने प्रैक्टिकल जीवन में कितने अनुभव प्राप्त किये होंगे! सिर्फ जैसा समय, जैसा कर्म वैसे स्वरूप की स्मृति इमर्ज रूप में अनुभव करो तो बहुत विचित्र खुशी, विचित्र प्राप्तियों का भण्डार बन जायेंगे और दिल से यही अनहद गीत निकलेगा कि पाना था सो पा लिया।

स्लोगन:-

नम्बरवन में आना है तो सिर्फ ब्रह्मा बाप के कदम पर कदम रखते चलो।

19-08-2019

19-08-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हारे निज़ी संस्कार पवित्रता के हैं, तुम रावण के संग में आकर पतित बनें, अब फिर पावन बन पावन दुनिया का मालिक बनना है''

प्रश्नः-

अशान्ति का कारण और उसका निवारण क्या है?

उत्तर:-

अशान्ति का कारण है अपवित्रता। अब भगवान् बाप से वायदा करो कि हम पवित्र बन पवित्र दुनिया बनायेंगे, अपनी सिविल आई रखेंगे, क्रिमिनल नहीं बनेंगे तो अशान्ति दूर हो सकती है। तुम शान्ति स्थापन करने के निमित्त बने हुए बच्चे कभी अशान्ति नहीं फैला सकते। तुम्हें शान्त रहना है, माया के गुलाम नहीं बनना है।

ओम् शान्ति।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं कि गीता के भगवान् ने गीता सुनाई। एक बार सुनाकर फिर तो चले जायेंगे। अभी तुम बच्चे गीता के भगवान से वही गीता का ज्ञान सुन रहे हो और राजयोग भी सीख रहे हो। वे लोग तो लिखी हुई गीता पढ़कर कण्ठ कर लेते हैं फिर मनुष्यों को सुनाते रहते हैं। वह भी फिर शरीर छोड़ जाए दूसरा जन्म बच्चे बने फिर तो सुना न सकें। अब बाप तुमको गीता सुनाते रहते हैं, जब तक तुम राजाई प्राप्त करो। लौकिक टीचर भी पाठ पढ़ाते ही रहते हैं। जब तक पाठ पूरा हो सिखाते रहते हैं। पाठ पूरा हो जाता फिर हद की कमाई में लग जाते। टीचर से पढ़े, कमाई की, बूढ़े हुए, शरीर छोड़ा, फिर दूसरा शरीर जाकर लेते हैं। वो लोग गीता सुनाते हैं, अब इससे प्राप्ति क्या होती है? यह तो कोई को पता नहीं। गीता सुनाकर फिर दूसरे जन्म में बच्चा बना तो सुना न सके। जब बड़े हों, बुजुर्ग बनें, गीतापाठी हों तब फिर सुनावें। यहाँ बाप तो एक ही बार शान्तिधाम से आकर पढ़ाते हैं फिर चले जाते हैं। बाप कहते हैं तुमको राजयोग सिखाकर हम अपने घर चले जाते हैं। जिनको पढ़ाता हूँ वह फिर आकर अपनी प्रालब्ध भोगते हैं। अपनी कमाई करते हैं, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार धारणा कर फिर चले जाते हैं। कहाँ? नई दुनिया में। यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। मनुष्य तो यह नहीं जानते कि पुरानी दुनिया खत्म हो फिर नई स्थापन होनी है। तुम जानते हो हम राजयोग सीखते ही हैं नई दुनिया के लिए। फिर न यह पुरानी दुनिया, न पुराना शरीर होगा। आत्मा तो अविनाशी है। आत्मायें पवित्र बन फिर पवित्र दुनिया में आती हैं। नई दुनिया थी, जिसमें देवी-देवताओं का राज्य था जिसको स्वर्ग कहा जाता है। वह नई दुनिया बनाने वाला भगवान् ही है। वह एक धर्म की स्थापना कराते हैं। कोई देवता द्वारा नहीं कराते। देवता तो यहाँ हैं नहीं। तो जरूर कोई मनुष्य द्वारा ही ज्ञान देंगे जो फिर देवता बनेंगे। फिर वही देवतायें पुनर्जन्म लेते-लेते अभी ब्राह्मण बने हैं। यह राज़ तुम बच्चे ही जानते हो - भगवान् तो है निराकार जो नई दुनिया रचते हैं। अभी तो रावण राज्य है। तुम पूछते हो कलियुगी पतित हो या सतयुगी पावन हो? परन्तु समझते नहीं। अब बाप बच्चों को कहते हैं - हमने 5 हज़ार वर्ष पहले भी तुमको समझाया था। हम आते ही हैं तुम बच्चों को आधाकल्प सुखी बनाने। फिर रावण आकर तुमको दु:खी बनाता है। यह सुख-दु:ख का खेल है। कल्प की आयु 5 हज़ार वर्ष है, तो आधा-आधा करना पड़े ना। रावण राज्य में सब देह-अभिमानी विकारी बन जाते हैं। यह बातें भी तुम अब समझते हो, आगे नहीं समझते थे। कल्प-कल्प जो समझते हैं वही समझ लेते हैं। जो देवता बनने वाले नहीं, वह आयेंगे ही नहीं। तुम देवता धर्म की कलम लगाते हो। जब वह आसुरी तमोप्रधान बन जाते हैं तो उनको दैवी झाड़ का नहीं कहेंगे। झाड़ भी जब नया था तो सतोप्रधान था। हम उसके पत्ते देवी-देवता थे फिर रजो, तमो में आये, पुराने पतित शूद्र हो गये। पुरानी दुनिया में पुराने मनुष्य ही रहेंगे। पुराने को फिर से नया बनाना पड़े। अब देवी-देवता धर्म ही प्राय: लोप हो गया है। बाप भी कहते हैं जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तो पूछा जायेगा किस धर्म की ग्लानि होती है? जरूर कहेंगे आदि सनातन देवी-देवता धर्म की, जो मैंने स्थापन किया था। वह धर्म ही प्राय: लोप हो गया। उसके बदले अधर्म हो गया है। तो जब धर्म से अधर्म की वृद्धि होती जाती, तब बाप आते हैं। ऐसे नहीं कहेंगे धर्म की वृद्धि, धर्म तो प्राय: लोप हो गया। बाकी अधर्म की वृद्धि हुई। वृद्धि तो सब धर्मों की होती है। एक क्राइस्ट से कितनी क्रिश्चियन धर्म की वृद्धि होती है। बाकी देवी-देवता धर्म प्राय: लोप हो गया। पतित बनने कारण आपेही ग्लानि करते हैं। धर्म से अधर्म भी एक ही होता है। और तो सब ठीक चल रहे हैं। सब अपने-अपने धर्म पर कायम रहते हैं। जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाइसलेस था, वह विशश बन पड़े हैं। हमने पावन दुनिया स्थापन की फिर वही पतित, शूद्र बन जाते हैं अर्थात् उस धर्म की ग्लानि हो जाती है। अपवित्र बनते तो अपनी ग्लानि कराते हैं। विकार में जाने से पतित बन जाते हैं, अपने को देवता कहला नहीं सकते हैं। स्वर्ग से बदल नर्क हो गया है। तो कोई भी वाह-वाह (पावन) है नहीं। तुम कितने छी-छी पतित बन गये हो। बाप कहते हैं तुमको वाह-वाह फूल बनाया फिर रावण ने तुमको कांटा बना दिया। पावन से पतित बन गये हो। अपने धर्म की ही हालत देखनी है। पुकारते भी हैं कि हमारी हालत आकर देखो, हम कितने पतित बने हैं। फिर हमको पावन बनाओ। पतित से पावन बनाने बाप आते हैं तो फिर पावन बनना चाहिए। औरों को भी बनाना चाहिए।
तुम बच्चे अपने को देखते रहो कि हम सर्वगुण सम्पन्न बने हैं? हमारी चलन देवताओं मिसल है? देवताओं के राज्य में तो विश्व में शान्ति थी। अब फिर तुमको सिखलाने आया हूँ - विश्व में शान्ति कैसे स्थापन हो। तो तुमको भी शान्ति में रहना पड़े। शान्त होने की युक्ति बताता हूँ कि मेरे को याद करो तो तुम शान्त हो, शान्तिधाम में चले जायेंगे। कोई बच्चे तो शान्त रहकर औरों को भी शान्ति में रहना सिखलाते हैं। कोई अशान्ति कर देते हैं। खुद अशान्त रहते हैं तो औरों को भी अशान्त बना देते हैं। शान्ति का अर्थ नहीं समझते। यहाँ आते हैं शान्ति सीखने फिर यहाँ से जाते हैं तो अशान्त हो जाते हैं। अशान्ति होती ही है अपवित्रता से। यहाँ आकर प्रतिज्ञा करते हैं - बाबा, हम आपका ही हूँ। आपसे विश्व की बादशाही लेनी है। हम पवित्र रहकर फिर विश्व के मालिक जरूर बनेंगे। फिर घर में जाते हैं तो माया त़ूफान में ले आती है। युद्ध होती है ना। फिर माया के गुलाम बन पतित बनना चाहते हैं। अबलाओं पर अत्याचार वही करते हैं जो प्रतिज्ञा भी करते हैं हम पवित्र रहेंगे फिर माया का वार होने से प्रतिज्ञा भूल जाते हैं। भगवान् से प्रतिज्ञा की है कि हम पवित्र बन पवित्र दुनिया का वर्सा लेंगे, हम सिविल आई रखेंगे अपनी कुदृष्टि नहीं रखेंगे, विकार में नहीं जायेंगे, क्रिमिनल दृष्टि छोड़ देंगे। फिर भी माया रावण से हार खा लेते हैं। तो जो निर्विकारी बनना चाहते हैं, उनको तंग करते हैं इसलिए कहा जाता है अबलाओं पर अत्याचार होते हैं। पुरूष तो बलवान होते हैं, स्त्री निर्बल होती है। लड़ाई आदि में भी पुरूष जाते हैं क्योंकि बलवान हैं। स्त्री नाज़ुक होती है। उनका कर्तव्य ही अलग है, वह घर सम्भालती है, बच्चे पैदा कर उनकी पालना करती है। यह भी बाप समझाते हैं वहाँ होता ही है एक बच्चा सो भी विकार का नाम नहीं। यहाँ तो सन्यासी भी कभी-कभी कह देते हैं कि एक बच्चा तो जरूर होना चाहिए - क्रिमिनल आई वाले ठग ऐसी शिक्षा देते हैं। अब बाप कहते हैं इस समय के बच्चे क्या काम के होंगे, जबकि विनाश सामने खड़ा है, सब खत्म हो जायेंगे। मैं आया ही हूँ पुरानी दुनिया का विनाश करने। वह हुई सन्यासियों की बात, उन्हों को तो विनाश की बात का मालूम ही नहीं। तुमको बेहद का बाप समझाते हैं अब विनाश होना है। तुम्हारे बच्चे वारिस बन नहीं सकेंगे। तुम समझते हो हमारे कुल की निशानी रहे परन्तु पतित दुनिया की कोई निशानी रहेगी नहीं। तुम समझते हो पावन दुनिया के थे, मनुष्य भी याद करते हैं क्योंकि पावन दुनिया होकर गई है, जिसको स्वर्ग कहा जाता है। परन्तु अब तमोप्रधान होने कारण समझ नहीं सकते हैं। उन्हों की दृष्टि ही क्रिमिनल है। इसको कहा जाता है धर्म की ग्लानि। आदि सनातन धर्म में ऐसी बातें होती नहीं। पुकारते हैं पतित-पावन आओ, हम पतित दु:खी हैं। बाप समझाते हैं हमने तुमको पावन बनाया फिर माया रावण के कारण तुम पतित बने हो। अब फिर पावन बनो। पावन बनते हो फिर माया की युद्ध चलती है। बाप से वर्सा लेने का पुरूषार्थ कर रहा था परन्तु फिर काला मुंह कर दिया तो वर्सा कैसे पायेंगे। बाप आते हैं गोरा बनाने। देवतायें जो गोरे थे, वही काले बने हैं। देवताओं के ही काले शरीर बनाते हैं, क्राइस्ट, बुद्ध आदि को कभी काला देखा? देवी-देवताओं के चित्र काले बनाते हैं। जो सर्व का सद्गति दाता परमपिता परमात्मा सर्व का बाप है, जिसको कहते हैं परमपिता परमात्मा आकर लिबरेट करो, वह कोई काला थोड़ेही हो सकता है, वह तो सदैव गोरा एवर प्योर है। कृष्ण तो दूसरा शरीर लेते हैं तो भी पवित्र तो हैं ना। महान आत्मा देवताओं को ही कहा जाता है। कृष्ण तो देवता हुआ। अब तो कलियुग है, कलियुग में महान् आत्मा कहाँ से आये। श्रीकृष्ण तो सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स था। उनमें दैवी गुण थे। अभी तो देवता आदि कोई है नहीं। साधू सन्त पवित्र बनते हैं फिर भी पुनर्जन्म विकार से लेते हैं। फिर सन्यास धारण करना पड़ता है। देवतायें तो सदैव पवित्र हैं। यहाँ रावण राज्य है। रावण को 10 शीश दिखाते हैं - 5 स्त्री के, 5 पुरूष के। यह भी समझते हैं 5 विकार हर एक में हैं, देवताओं में तो नहीं कहेंगे ना। वह तो है ही सुखधाम। वहाँ भी रावण होता तो फिर दु:खधाम हो जाता। मनुष्य समझते हैं देवतायें भी तो बच्चे पैदा करते हैं, वह भी तो विकारी ठहरे। उन्हों को यह पता ही नहीं हैं - देवताओं को गाया ही जाता है सम्पूर्ण निर्विकारी, तब तो उन्हों को पूजा जाता है। सन्यासियों की भी मिशन है। सिर्फ पुरूषों को सन्यास कराए मिशन बढ़ाते हैं। बाप फिर प्रवृत्ति मार्ग की नई मिशन बनाते हैं। जोड़ी को ही पवित्र बनाते हैं। फिर तुम जाकर देवता बनेंगे। तुम यहाँ सन्यासी बनने के लिए नहीं आये हो। तुम तो आये हो विश्व का मालिक बनने। वह तो फिर गृहस्थ में जन्म लेते हैं। फिर निकल जाते हैं। तुम्हारे संस्कार हैं ही पवित्रता के। अब अपवित्र बने हो फिर पवित्र बनना है। बाप पवित्र गृहस्थ आश्रम बनाते हैं। पावन दुनिया को सतयुग, पतित दुनिया को कलियुग कहा जाता है। यहाँ कितनी पाप आत्मायें हैं। सतयुग में यह बातें होती नहीं। बाप कहते हैं जब-जब भारत में धर्म की ग्लानि होती है अर्थात् देवी-देवता धर्म वाले पतित बन जाते हैं तो अपनी ग्लानि कराते हैं। बाप कहते हैं हमने तुमको पावन बनाया फिर तुम पतित बने, कोई काम के नहीं रहे। जब ऐसे पतित बन जाते हो तब फिर पावन बनाने हमको आना पड़ता है। यह ड्रामा का चक्र है जो फिरता रहता है। हेविन में जाने के लिए फिर दैवी गुण भी चाहिए। क्रोध नहीं होना चहिए। क्रोध है तो वह भी जैसे असुर कहलायेंगे। बड़ी शान्तचित्त अवस्था चाहिए। क्रोध करते हैं तो कहेंगे इनमें क्रोध का भूत है। जिनमें कोई भी भूत है वह देवता बन न सकें। नर से नारायण बन न सकें। देवता तो हैं ही निर्विकारी यथा राजा-रानी तथा प्रजा निर्विकारी हैं। भगवान् बाप ही आकर सम्पूर्ण निर्विकारी बनाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप से पवित्रता की प्रतिज्ञा की है तो अपने को माया के वार से बचाते रहना है। कभी माया का गुलाम नहीं बनना है। इस प्रतिज्ञा को भूलना नहीं है क्योंकि अब पावन दुनिया में चलना है।

2) देवता बनने के लिए अवस्था को बहुत-बहुत शान्तचित बनाना है। कोई भी भूत प्रवेश होने नहीं देना है। दैवीगुण धारण करने हैं।

वरदान:-

चेहरे द्वारा सर्व श्रेष्ठ प्राप्तियों का अनुभव कराने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव

संगमयुग पर आप ब्राह्मण आत्माओं को वरदान है "सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव''। ऐसी वरदानी आत्मा को मेहनत नहीं करनी पड़ती। उनके चेहरे की चमक बताती है कि इन्होंने कुछ पाया है, यह प्राप्ति स्वरूप आत्मायें हैं। कोई-कोई बच्चों के चेहरे को देख लोग कहते हैं कि ऊंची मंजिल है, इन्होंने त्याग बहुत ऊंचा किया है। त्याग दिखाई देता है लेकिन भाग्य नहीं। जब सर्व प्राप्तियों के नशे में रह अपना भाग्य दिखाओ तो सहज आकर्षित होकर आयेंगे।

स्लोगन:-

जहाँ उमंग-उत्साह और एकमत का संगठन है, वहाँ सफलता समाई हुई है।

17-08-2019

17-08-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - याद के साथ-साथ पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देना है, याद से पावन बनेंगे और पढ़ाई से विश्व का मलिक बनेंगे''

प्रश्नः-

स्कॉलरशिप लेने के लिए कौन-सा पुरूषार्थ ज़रूरी है?

उत्तर:-

स्कॉलरशिप लेनी है तो सब चीज़ों से ममत्व निकाल दो। धन, बच्चे, घर आदि कुछ भी याद न आये। शिवबाबा ही याद हो, पूरा स्वाहा, तब ऊंच पद की प्राप्ति होगी। बुद्धि में यह नशा रहना चाहिए कि हम कितना बड़ा इम्तहान पास करते हैं। हमारी कितनी बड़ी पढ़ाई है और पढ़ाने वाला स्वयं दु:ख हर्ता सुख कर्ता बाप है, वह मोस्ट बिलवेड बाबा हमें पढ़ा रहे हैं।

ओम् शान्ति।

रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं, पढ़ाते हैं तो बच्चों को कितना फखुर होना चाहिए। पढ़ती तो आत्मा है ना। आत्मा संस्कार ले जाती है, शरीर तो राख हो जाता है। तो बाप बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं। आत्मायें समझती हैं हम पढ़ते हैं, योग सीखते हैं। बाप ने कहा है याद में रहो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे। पतित-पावन तो एक ही बाप है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को पतित-पावन थोड़ेही कहेंगे। लक्ष्मी-नारायण को कहेंगे? नहीं। पतित-पावन तो है ही एक। सारी दुनिया को पावन बनाने वाला है ही एक। वह तुम्हारा बाप है। बच्चे जानते हैं मोस्ट बिलवेड बेहद का बाप है, जिसको भक्ति मार्ग में याद करते आये हैं कि बाबा आओ, आकर हमारे दु:ख हरो, सुख दो। सृष्टि तो वही है। इस चक्र में तो सबको आना ही है। 84 का चक्र भी बाप ने समझाया है। आत्मा ही संस्कार ले जाती है। आत्मा जानती है इस मृत्युलोक से अमरलोक में अथवा नर्क से स्वर्ग में जाने के लिए हम पढ़ते हैं। बाप आते हैं तुम बच्चों को फिर से विश्व का मालिक बनाने। तुम कितना बड़ा इम्तहान पास कर रहे हो। बड़े ते बड़ा बाप पढ़ा रहे हैं। जिस समय बाबा बैठ पढ़ाते हैं तो नशा चढ़ता है। बाबा बहुत जोर शोर से नशा चढ़ाते हैं। बाप आते ही हैं अमरलोक के लिए लायक बनाने। यहाँ तो कोई लायक है नहीं। तुम भी जानते हो हम लायक देवताओं के आगे माथा टेकते आये हैं। अब फिर बाबा हमें सारे विश्व का मालिक बनाते हैं। तो वह नशा चढ़ा रहना चाहिए। ऐसे नहीं, यहाँ नशा चढ़े फिर बाहर जाने से नशा ही कम हो जाये। बच्चे कहते हैं - बाबा, हम आपको भूल जाते हैं। आप पतित दुनिया में, पतित शरीर में आकर हमको पढ़ाते हैं, विश्व का मालिक बनाते हैं। तुम बच्चे विश्व के बादशाही की बहुत बड़ी लॉटरी लेते हो। परन्तु तुम हो गुप्त। तो ऐसी ऊंच पढ़ाई पर अच्छी रीति ध्यान देना चाहिए। सिर्फ याद की यात्रा से काम नहीं चलेगा, पढ़ाई भी जरूरी है। 84 का चक्र कैसे लगाते हैं, यह भी बुद्धि में फिरना चाहिए।
तुम समझते हो बाबा बड़े जोर से नशा चढ़ाते हैं। तुम्हारे जितना बड़ा आदमी कोई बन न सकें, तुम मनुष्य से देवता बन जाते हो। विश्व का मालिक तुम्हारे सिवाए और कोई बना है क्या? क्रिश्चियन लोगों ने कोशिश की वर्ल्ड के मालिक बनें, परन्तु लॉ नहीं कहता जो तुम्हारे सिवाए विश्व का मालिक कोई बनें। बनाने वाला बाप ही चाहिए और कोई की ताकत नहीं। तुम बच्चों का बहुत अच्छा दिमाग होना चाहिए। ज्ञान अमृत का डोज़ चढ़ाते रहते हैं। सिर्फ इस पर नहीं ठहरना है कि हम बाबा को बहुत याद करते हैं। याद से ही पावन हो जायेंगे परन्तु पद भी पाना है। पावन तो मोचरा खाकर भी सबको होना ही है। परन्तु बाप आये हैं विश्व का मालिक बनाने, जायेंगे तो सब शान्तिधाम में। जाकर सबको सिर्फ बैठ जाना है क्या? वह तो कोई काम के न रहे। काम के वह हैं जो फिर आकर स्वर्ग में राज्य करते हैं। तुम यहाँ आये ही हो स्वर्ग की बादशाही लेने। तुमको बादशाही थी, फिर माया ने छीन ली। अब फिर माया रावण पर जीत पानी है, विश्व का मालिक तुमको ही बनना है। अभी तुमको रावण पर जीत पहनाते हैं क्योंकि तुम रावण राज्य में विकारी बन गये हो इसलिए मनुष्य की बन्दर से भेंट की जाती है। बन्दर जास्ती विकारी होते हैं। देवतायें तो सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। यह देवतायें ही 84 जन्मों के बाद पतित बने हैं। बाप कहते हैं कि तुम्हारे हाथ में जो धन, बच्चे, शरीर आदि है, सबसे ममत्व निकालना है। साहूकार तो धन के पिछाड़ी मरते हैं। मुट्ठी में पैसे हैं, वह छूटते नहीं। रावण की जेल में पड़े रहेंगे। कोटों में कोई निकलेंगे जो सब चीज़ों से ममत्व निकाल बन्दर से देवता बन जायेंगे। जो भी साहूकार लोग बड़े-बड़े लखपति हैं, मुट्ठी में पैसे पकड़े हुए हैं, उनके पिछाड़ी प्राण हैं। सारा दिन महल, माड़ियां, बच्चे आदि ही याद आते रहेंगे। उनकी याद में ही मर जायेंगे। बाप कहते हैं कि पिछाड़ी में और कोई चीज़ याद न आये। सिर्फ मामेकम् याद करो तो जन्म जन्मान्तर के पाप नाश हो जायें। साहूकार के पैसे तो सब मिट्टी में मिल जाने हैं क्योंकि पाप के पैसे हैं ना। काम में नहीं आते। बाप कहते हैं हम गरीब निवाज़, गरीबों को साहूकार, साहूकारों को गरीब बना देंगे। यह दुनिया बदलनी होती है ना। कितना पैसे का नशा रहता है - हमको इतना धन माल है, एरोप्लेन हैं, मोटरे हैं, महल हैं.......! फिर कितना भी माथा मारें कि बाप को याद करें, परन्तु याद ठहरेगी नहीं। लॉ नहीं कहता है, कोटो में कोई ही निकलेंगे। बाकी तो पैसा ही याद करते रहेंगे। बाप कहते हैं देह सहित जो कुछ देखते हो उन सबको भूल जाओ, इसमें ही अटक पड़े तो ऊंच पद पा नहीं सकोगे। बाबा पुरूषार्थ तो करायेंगे ना। तुम यहाँ आये हो नर से नारायण बनने, तो इसमें योग भी पूरा चाहिए। कोई भी चीज़, न धन, न बच्चे आदि कुछ भी याद न आये, सिवाए एक शिवबाबा के, तब तुम ऊंच ते ऊंच स्कॉलरशिप ले सकते हो, ऊंच प्राइज़ पा सकते हो। वो लोग विश्व में शान्ति की राय देते हैं तो पाई-पैसे का मैडल मिल जाता है। उसमें ही खुश हो जाते हैं। अभी तुमको क्या प्राइज़ मिलती है? तुम विश्व के मालिक बनते हो। ऐसे नहीं, हम 5-6 घण्टा याद में रहते हैं तो बस यह लक्ष्मी-नारायण बन जायेंगे। नहीं, बड़ी मेहनत करनी है। एक शिवबाबा की ही याद रहे और कुछ भी पिछाड़ी में याद न आये। तुम बहुत-बहुत बड़े देवता बन रहे हो।
बाप ने समझाया है तुम ही पूज्य थे फिर माया ने पुजारी पतित बना दिया है। तुमको लोग कहते हैं तुम ब्रह्मा को देवता मानते हो या भगवान् मानते हो? बोलो, हम तो कहते नहीं हैं कि ब्रह्मा भगवान् है। तुम आकर समझो। तुम्हारे पास अच्छे ते अच्छे चित्र हैं। त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ का चित्र सबसे नम्बरवन है। शुरूआत के यही दो चित्र हैं, यही तुम्हारे बहुत काम में आने के हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र तुम विलायत में ले जाओ, उनसे तो ज्ञान उठा नहीं सकेंगे। सबसे मुख्य चित्र है - त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ का। इसमें दिखाया गया है - कौन-कौन कब आते हैं, आदि सनातन देवी-देवता धर्म कब खत्म होता है, फिर एक धर्म की स्थापना कौन करते हैं? और सब धर्म खलास हो जाते हैं। सबसे ऊपर में है शिवबाबा फिर ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा। यह समझानी है ना। उसके लिए ही चित्र बनाये हैं, बाकी सूक्ष्मवतन तो सिर्फ साक्षात्कार के लिए माना जाता है। बाप रचयिता है, पहले सूक्ष्मवतन का फिर स्थूल वतन का। ब्रह्मा देवता थोड़ेही है, विष्णु देवता है। तुमको साक्षात्कार होता है समझाने के लिए। प्रजापिता ब्रह्मा तो यहाँ है ना। ब्रह्मा के साथ हैं ब्राह्मण सो फिर देवता बनने वाले हैं। देवतायें तो सजे हुए रहते हैं, इनको फरिश्ता कहा जाता है। फरिश्ता बनकर फिर आकर देवता पद पायेंगे। गर्भ महल में जन्म लेंगे। दुनिया बदलती रहती है। आगे चलकर तुम सब देखते रहेंगे। अच्छे मजबूत हो जायेंगे। बाकी थोड़ा समय है। तुम आये हो नर से नारायण बनने के लिए। फेल होते हैं तो प्रजा बन जाते हैं। सन्यासी आदि यह बातें समझा न सकें। राम की तो आबरू ही चट कर दी है। जबकि गाते हैं राम राजा.......। फिर वहाँ ऐसे अधर्म की बात हो कैसे सकती। यह सब भक्ति मार्ग की बातें है इसलिए गाया जाता है झूठी माया, झूठी काया....... माया 5 विकारों को कहा जाता है, न कि धन को। धन को सम्पत्ति कहा जाता है। मनुष्यों को यह भी पता नहीं है कि माया किसको कहा जाता है। यह बाप मीठे-मीठे बच्चों को समझाते हैं।
बाप कहते हैं मैं परम आत्मा तुमको अपने से भी ऊंच विश्व का मालिक बनाता हूँ। तुम पढ़ रहे हो। कितनी ऊंची पढ़ाई है। मनुष्य से देवता किये करत न लागी वार। देवतायें होते हैं सतयुग में, मनुष्य होते हैं कलियुग में। तुम अभी संगम पर बैठ मनुष्य से देवता बन रहे हो। कितना सहज बताते हैं। पवित्र जरूर बनना है, तो प्रजा भी बहुत बनानी है। कल्प-कल्प तुम इतनी प्रजा बनाते हो, जितनी सतयुग में थी। सतयुग था, अब नहीं है फिर होगा। यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक होंगे। चित्र तो हैं ना। बाप कहते हैं - यह ज्ञान तुमको अभी देता हूँ फिर प्राय: लोप हो जाता फिर द्वापर से भक्ति शुरू होती है, रावण राज्य आ जाता है। तुम विलायत में भी यह समझा सकते हो कि सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। लक्ष्मी-नारायण के चित्र से और धर्म वालों का तो कनेक्शन है नहीं इसलिए बाबा कहते हैं यह त्रिमूर्ति और झाड़ हैं मुख्य चित्र। यह बहुत फर्स्ट क्लास हैं। झाड़ और गोले से समझ जायेंगे यह-यह धर्म कब आयेंगे, क्राइस्ट कब आयेगा। आधा में हैं वह सब धर्म, बाकी आधा में हो तुम सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी। 5 हजार वर्ष का खेल है। ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। ज्ञान है दिन, भक्ति है रात। फिर बेहद का वैराग्य होता है। तुम जानते हो यह पुरानी दुनिया खलास हो जानी है। तो इनको भूल जाना है। पतित-पावन कौन है, यह भी सिद्ध करना है। दिन-रात गाते रहते हैं - पतित-पावन सीता राम। गांधी भी गीता पढ़ते थे, वह भी ऐसे गाते थे - हे पतित-पावन, सीताओं के राम क्योंकि तुम सब सीतायें ब्राइड्स हो ना। बाप है ब्राइडग्रूम। फिर कह देते रघुपति राघव राजा राम। अब वह त्रेता का राजा है। सारी बात ही मुंझा दी है। सब ताली बजाते गाते रहते हैं। हम भी गाते थे, एक वर्ष खादी का कपड़ा आदि पहना। बाप बैठ समझाते हैं कि यह भी गांधी का फालोअर बना था, इसने तो सब कुछ अनुभव किया है। फर्स्ट सो लास्ट बन गया है। अब फिर फर्स्ट बनेगा। तुमको कहते हैं जहाँ-तहाँ ब्रह्मा को बिठाया है। यह भी समझाना चाहिए - अरे, झाड़ के ऊपर खड़ा है। कितना क्लीयर है, यह तो पतित दुनिया के अन्त में खड़ा है। श्रीकृष्ण को भी ऊपर में दिखाया है। दो बिल्ले लड़ते हैं, मक्खन श्रीकृष्ण खा लेते हैं। माताओं को साक्षात्कार होता है, वह समझती हैं उनके मुख में माखन है अथवा चन्द्रमा है। वास्तव में है विश्व की बादशाही मुख में। दो बिल्ले आपस में लड़ते हैं, माखन तुम देवताओं को मिल जाता है। यह है विश्व की बादशाही रूपी माखन। बाम्ब्स आदि बनाने की भी बहुत इप्रूवमेंट कर रहे हैं, ऐसी चीज़ डालते हैं जो फट से मनुष्य मर जायें। ऐसा न हो चिल्लाते रहें। जैसे हिरोशिमा का है, अभी तक मरीज पड़े हैं। तो बाप समझाते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, आधाकल्प तक तुम सुखी रहते हो। कोई भी प्रकार की लड़ाई आदि का नाम नहीं रहता, यह सब पीछे शुरू हुई हैं। यह सब नहीं थे, न रहेंगे। चक्र रिपीट होता है ना। बाप सब अच्छी रीति समझाते हैं। जो बच्चों को पूरी रीति धारण करना है और ईश्वरीय सेवा में लग जाना है। यह तो छी-छी दुनिया है, इनको विषय वैतरणी नदी कहा जाता है। तो बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं - तुम अपने को इतना ऊंच नहीं समझते हो, जितना बाप तुमको ऊंच समझते हैं। तुम बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए क्योंकि तुम बहुत ऊंच कुल के हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने दिमाग को अच्छा बनाने के लिए रोज़ ज्ञान अमृत का डोज़ चढ़ाना है। याद के साथ-साथ पढ़ाई पर भी पूरा-पूरा ध्यान अवश्य देना है क्योंकि पढ़ाई से ही ऊंच पद मिलता है।

2) हम ऊंचे ते ऊंचे कुल के हैं, स्वयं भगवान् हमें पढ़ाता है, इसी नशे में रहना है। ज्ञान धारण कर ईश्वरीय सेवा में लग जाना है।

वरदान:-

सेवा के साथ-साथ बेहद के वैराग्य वृत्ति की साधना को इमर्ज करने वाले सफलता मूर्त भव

सेवा से खुशी वा शक्ति मिलती है लेकिन सेवा में ही वैराग्य वृत्ति भी खत्म हो जाती है इसलिए अपने अन्दर वैराग्य वृत्ति को जगाओ। जैसे सेवा के प्लैन को प्रैक्टिकल में इमर्ज करते हो तब सफलता मिलती है। ऐसे अभी बेहद के वैराग्य वृत्ति को इमर्ज करो। चाहे कितने भी साधन प्राप्त हों लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की साधना मर्ज नहीं हो। साधन और साधना का बैलेन्स हो तब सफलता मूर्त बनेंगे।

स्लोगन:-

असम्भव को सम्भव बनाना ही परमात्म प्यार की निशानी है।

18-08-19

18-08-19 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 16-01-85 मधुबन


भाग्यवान युग में भगवान द्वारा वर्से और वरदानों की प्राप्ति

आज सृष्टि वृक्ष के बीजरूप बाप अपने वृक्ष के फाउन्डेशन बच्चों को देख रहे हैं। जिस फाउन्डेशन द्वारा सारे वृक्ष का विस्तार होता है। विस्तार करने वाले सार स्वरूप विशेष आत्माओं को देख रहे हैं अर्थात् वृक्ष के आधार मूर्त आत्माओं को देख रहे हैं। डायरेक्ट बीजरूप द्वारा प्राप्त की हुई सर्व शक्तियों को धारण करने वाली विशेष आत्माओं को देख रहे हैं। सारे विश्व की सर्व आत्माओं में से सिर्फ थोड़ी-सी आत्माओं को यह विशेष पार्ट मिला हुआ है। कितनी थोड़ी आत्मायें हैं जिन्हों को बीज के साथ सम्बन्ध द्वारा श्रेष्ठ प्राप्ति का पार्ट मिला हुआ है।
आज बापदादा ऐसे श्रेष्ठ भाग्यवान बच्चों के भाग्य को देख रहे हैं। सिर्फ बच्चों को यह दो शब्द याद रहें "भगवान और भाग्य'। भाग्य अपने कर्मों के हिसाब से सभी को मिलता है। द्वापर से अब तक आप आत्माओं को भी कर्म और भाग्य इस हिसाब किताब में आना पड़ता है लेकिन वर्तमान भाग्यवान युग में भगवान भाग्य देता है। भाग्य के श्रेष्ठ लकीर खींचने की विधि "श्रेष्ठ कर्म रूपी कलम'' आप बच्चों को दे देते हैं, जिससे जितनी श्रेष्ठ, स्पष्ट, जन्म-जन्मान्तर के भाग्य की लकीर खींचने चाहो उतनी खींच सकते हो। और कोई समय को यह वरदान नहीं है। इसी समय को यह वरदान है जो चाहो जितना चाहो उतना पा सकते हो। क्यों? भगवान भाग्य का भण्डारा बच्चों के लिए फराखदिली से, बिना मेहनत के दे रहा है। खुला भण्डार है, ताला चाबी नहीं है। और इतना भरपूर, अखुट है जो जितने चाहें, जितना चाहें ले सकते हैं। बेहद का भरपूर भण्डारा है। बापदादा सभी बच्चों को रोज़ यही स्मृति दिलाते रहते हैं कि जितना लेने चाहो उतना ले लो। यथाशक्ति नहीं, लो बड़ी दिल से लो। लेकिन खुले भण्डार से, भरपूर भण्डार से लो। अगर कोई यथाशक्ति लेते हैं तो बाप क्या कहेंगे? बाप भी साक्षी हो देख-देख हर्षाते रहते कि कैसे भोले-भाले बच्चे थोड़े में ही खुश हो जाते हैं। क्यों? 63 जन्म भक्तपन के संस्कार थोड़े में ही खुश होने के कारण अभी भी सम्पन्न प्राप्ति के बजाए थोड़े को ही बहुत समझ उसी में राज़ी हो जाते हैं।
इस समय अविनाशी बाप द्वारा सर्व प्राप्ति का समय है, यह भूल जाते हैं। बापदादा फिर भी बच्चों को स्मृति दिलाते, समर्थ बनो। अब भी टूलेट नहीं हुआ है। लेट आये हो लेकिन टूलेट का समय अभी नहीं है इसलिए अभी भी दोनों रूप से बाप रूप से वर्सा, सतगुरू के रूप से वरदान मिलने का समय है। तो वरदान और वर्से के रूप में सहज श्रेष्ठ भाग्य बना लो। फिर यह नहीं सोचना पड़े कि भाग्य विधाता ने भाग्य बाँटा लेकिन मैंने इतना ही लिया। सर्व शक्तिवान बाप के बच्चे यथाशक्ति नहीं हो सकता। अभी वरदान है जो चाहो वह बाप के खजाने से अधिकार के रूप से ले सकते हो। कमजोर हो तो भी बाप की मदद से, हिम्मते बच्चे मददे बाप, वर्तमान और भविष्य श्रेष्ठ बना सकते हो। बाकी थोड़ा समय है, बाप के सहयोग और भाग्य के खुले भण्डार मिलने का।
अभी स्नेह के कारण बाप के रूप में हर समय, हर परिस्थिति में साथी है लेकिन इस थोड़े से समय के बाद साथी के बजाए साक्षी हो देखने का पार्ट चलेगा। चाहे सर्वशक्ति सम्पन्न बनो, चाहे यथाशक्ति बनो - दोनों को साक्षी हो देखेंगे इसलिए इस श्रेष्ठ समय में बापदादा द्वारा वर्सा, वरदान सहयोग, साथ इस भाग्य की जो प्राप्ति हो रही है उसको प्राप्त कर लो। प्राप्ति में कभी भी अलबेले नहीं बनना। अभी इतने वर्ष पड़े हैं, सृष्टि परिवर्तन के समय और प्राप्ति के समय दोनों को मिलाओ मत। इस अलबेले पन के संकल्प से सोचते नहीं रह जाना। सदा ब्राह्मण जीवन में सर्व प्राप्ति का, बहुतकाल की प्राप्ति का यही बोल याद रखो ‘अब नहीं तो कब नहीं' इसलिए कहा कि सिर्फ दो शब्द भी याद रखो "भगवान और भाग्य''। तो सदा पदमापदम भाग्यवान रहेंगे। बापदादा आपस में भी रूहरूहान करते हैं कि ऐसे पुरानी आदत से मजबूर क्यों हो जाते हैं। बाप मजबूत बनाते, फिर भी बच्चे मजबूर हो जाते हैं। हिम्मत की टाँगे भी देते हैं, पंख भी देते हैं, साथ-साथ भी उड़ाते फिर भी नीचे ऊपर नीचे ऊपर क्यों होते हैं। मौजों के युग में भी मूंझते रहते हैं, इसको कहते हैं पुरानी आदत से मजबूर। मजबूत हो या मजबूर हो? बाप डबल लाइट बनाते, सब बोझ स्वयं उठाने के लिए साथ देते फिर भी बोझ उठाने की आदत, बोझ उठा लेते हैं। फिर कौन सा गीत गाते हैं, जानते हो? क्या, क्यों, कैसे यह "के के'' का गीत गाते हैं। दूसरा भी गीत गाते हैं "गे गे'' का। यह तो भक्ति के गीत हैं। अधिकारीपन का गीत है "पा लिया''। तो कौन-सा गीत गाते हो? सारे दिन में चेक करो कि आज का गीत कौन सा था? बापदादा का बच्चों से स्नेह है इसलिए स्नेह के कारण सदा यही सोचते कि हर बच्चा सदा सम्पन्न हो, समर्थ हो। सदा पदमापदम भाग्यवान हो। समझा। अच्छा!
सदा समय प्रमाण वर्से और वरदान के अधिकारी, सदा भाग्य के खुले भण्डार से सम्पूर्ण भाग्य बनाने वाले, यथाशक्ति को सर्व शक्ति सम्पन्न में परिवर्तन करने वाले, श्रेष्ठ कर्मों की कलम द्वारा सम्पन्न तकदीर की लकीर खींचने वाले, समय के महत्व को जान सर्व प्राप्ति स्वरूप श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का सम्पन्न बनाने का याद-प्यार और नमस्ते।

पार्टियों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1. सदा अपना अलौकिक जन्म, अलौकिक जीवन, अलौकिक बाप, अलौकिक वर्सा याद रहता है? जैसे बाप अलौकिक है तो वर्सा भी अलौकिक है। लौकिक बाप हद का वर्सा देता, अलौकिक बाप बेहद का वर्सा देता। तो सदा अलौकिक बाप और वर्से की स्मृति रहे। कभी लौकिक जीवन के स्मृति में तो नहीं चले जाते। मरजीवा बन गये ना। जैसे शरीर से मरने वाले कभी भी पिछले जन्म को याद नहीं करते, ऐसे अलौकिक जीवन वाले, जन्म वाले, लौकिक जन्म को याद नहीं कर सकते। अभी तो युग ही बदल गया। दुनिया कलियुगी है, आप संगमयुगी हो, सब बदल गया। कभी कलियुग में तो नहीं चले जाते? यह भी बार्डर है। बार्डर क्रास किया और दुश्मन के हवाले हो गये। तो बार्डर क्रास तो नहीं करते? सदा संगमयुगी अलौकिक जीवन वाली श्रेष्ठ आत्मा हैं, इसी स्मृति में रहो। अभी क्या करेंगे? बड़े से बड़ा बिजनेस मैन बनो। ऐसा बिजनेस मैन जो एक कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाले। सदा बेहद के बाप के हैं, तो बेहद की सेवा में, बेहद के उमंग-उत्साह से आगे बढ़ते रहो।
2. सदा डबल लाइट स्थिति का अनुभव करते हो? डबल लाइट स्थिति की निशानी है सदा उड़ती कला। उड़ती कला वाले कभी भी माया के आकर्षण में नहीं आ सकते। उड़ती कला वाले सदा विजयी? उड़ती कला वाले सदा निश्चय बुद्धि निश्चिन्त। उड़ती कला क्या है? उड़ती कला अर्थात् ऊंचे से ऊंची स्थिति। उड़ते हैं तो ऊंचा जाते हैं ना। ऊंचे ते ऊंची स्थिति में स्थित रहने वाली ऊंची आत्मायें समझ आगे बढ़ते चलो। उड़ती कला वाले अर्थात् बुद्धि रूपी पाँव धरनी पर नहीं। धरनी अर्थात् देह भान से ऊपर। जो देह भान की धरनी से ऊपर रहते वह सदा फरिश्ते हैं, जिसका धरनी से कोई रिश्ता नहीं। देह भान को भी जान लिया, देही-अभिमानी स्थिति को भी जान लिया। जब दोनों के अन्तर को जान गये तो देह-अभिमान में आ नहीं सकते। जो अच्छा लगता है वही किया जाता है ना। तो सदा इसी स्मृति में रहो कि मैं हूँ ही फरिश्ता। फरिश्ते की स्मृति से सदा उड़ते रहेंगे। उड़ती कला में चले गये तो नीचे की धरनी आकर्षित नहीं कर सकती है, जैसे स्पेस में जाते हैं तो धरनी आकर्षित नहीं करती, ऐसे फरिश्ता बन गये तो देह रूपी धरनी आकर्षित नहीं कर सकती।
3. सदा सहयोगी, कर्मयोगी, स्वत: योगी, निरन्तर योगी ऐसी स्थिति का अनुभव करते हो? जहाँ सहज है वहाँ निरंतर है। सहज नहीं तो निरन्तर नहीं। तो निरन्तर योगी हो या अन्तर पड़ जाता है? योगी अर्थात् सदा याद में मगन रहने वाले। जब सर्व सम्बन्ध बाप से हो गये तो जहाँ सर्व सम्बन्ध हैं वहाँ याद स्वत: होगी और सर्व सम्बन्ध हैं तो एक की ही याद होगी। है ही एक तो सदा याद रहेगी ना। तो सदा सर्व सम्बन्ध से एक बाप दूसरा न कोई। सर्व सम्बन्ध से एक बाप... यही सहज विधि है, निरन्तर योगी बनने की। जब दूसरा सम्बन्ध ही नहीं तो याद कहाँ जायेगी। सर्व सम्बन्धों से सहजयोगी आत्मायें यह सदा स्मृति रखो। सदा बाप समान हर कदम में स्नेह और शक्ति दोनों का बैलेंस रखने से सफलता स्वत: ही सामने आती है। सफलता जन्म सिद्ध अधिकार है। बिजी रहने के लिए काम तो करना ही है लेकिन एक है मेहनत का काम, दूसरा है खेल के समान। जब बाप द्वारा शक्तियों का वरदान मिला है तो जहाँ शक्ति है वहाँ सब सहज है। सिर्फ परिवार और बाप का बैलेंस हो तो स्वत: ही ब्लैसिंग प्राप्त हो जाती है। जहाँ ब्लैसिंग है वहाँ उड़ती कला है। न चाहते हुए भी सहज सफलता है।
4. सदा बाप और वर्सा दोनों की स्मृति रहती है? बाप कौन और वर्सा क्या मिला है यह स्मृति स्वत: समर्थ बना देती है। ऐसा अविनाशी वर्सा जो एक जन्म में अनेक जन्मों की प्रालब्ध बनाने वाला है, ऐसा वर्सा कभी मिला है? अभी मिला है, सारे कल्प में नहीं। तो सदा बाप और वर्सा इसी स्मृति से आगे बढ़ते चलो। वर्से को याद करने से सदा खुशी रहेगी और बाप को याद करने से सदा शक्तिशाली रहेंगे। शक्तिशाली आत्मा सदा मायाजीत रहेगी और खुशी है तो जीवन है। अगर खुशी नहीं तो जीवन क्या? जीवन होते भी ना के बराबर है। जीते हुए भी मृत्यु के समान है। जितना वर्सा याद रहेगा उतनी खुशी रहेगी। तो सदा खुशी रहती है? ऐसा वर्सा कोटों में कोई को मिलता है और हमें मिला है। यह स्मृति कभी भी भूलना नहीं। जितनी याद उतनी प्राप्ति। सदा याद और सदा प्राप्ति की खुशी।

कुमारों से - कुमार जीवन शक्तिशाली जीवन है। तो ब्रह्माकुमार अर्थात् रूहानी शक्तिशाली, जिस्मानी शक्तिशाली नहीं, रूहानी शक्तिशाली। कुमार जीवन में जो चाहे वह कर सकते हो। तो आप सब कुमारों ने अपने इस कुमार जीवन में अपना वर्तमान और भविष्य बना लिया, क्या बनाया? रूहानी बनाया। ईश्वरीय जीवन वाले ब्रह्माकुमार बने तो कितने श्रेष्ठ जीवन वाले हो गये। ऐसी श्रेष्ठ जीवन बन गई जो सदा के लिए दुख से और धोखे से, भटकने से किनारा हो गया। नहीं तो जिस्मानी शक्ति वाले कुमार भटकते रहते हैं। लड़ना, झगड़ना दु:ख देना, धोखा देना....यही करते हैं ना। तो कितनी बातों से बच गये। जैसे स्वयं बचे हो वैसे औरों को भी बचाने का उमंग आता है। सदा हमजिन्स को बचाने वाले। जो शक्तियाँ मिली हैं वह औरों को भी दो। अखुट शक्तियाँ मिली है ना। तो सबको शक्तिशाली बनाओ। निमित्त समझकर सेवा करो। मैं सेवाधारी हूँ, नहीं। बाबा कराता है मैं निमित्त हूँ। निमित्त समझकर सेवा करो। मैं सेवाधारी हूँ नहीं। बाबा कराता है मैं निमित्त हूँ। मैं पन वाले नहीं। जिसमें मैं पन नहीं है वह सच्चे सेवाधारी हैं।
युगलों से - सदा स्वराज्य अधिकारी आत्मायें हो? स्व का राज्य अर्थात् सदा अधिकारी। अधिकारी कभी अधीन नहीं हो सकते। अधीन हैं तो अधिकार नहीं। जैसे रात है तो दिन नहीं। दिन है तो रात नहीं। ऐसे अधिकारी आत्मायें किसी भी कर्मेन्द्रियों के, व्यक्ति के, वैभव के अधीन नहीं हो सकते। ऐसे अधिकारी हो? जब मास्टर सर्वशक्तिवान बन गये तो क्या हुए? अधिकारी। तो सदा स्वराज्य अधिकारी आत्मायें हैं, इस समर्थ स्मृति से सदा सहज विजयी बनते रहेंगे। स्वप्न में भी हार का संकल्प मात्र न हो। इसको कहा जाता है - सदा के विजयी। माया भाग गई कि भगा रहे हो? इतना भगाया है जो वापस न आये। किसको वापस नहीं लाना होता है तो उसको बहुत-बहुत दूर छोड़कर आते हैं। तो इतना दूर भगाया है। अच्छा

वरदान:-

ब्राह्मण जीवन में एक बाप को अपना संसार बनाने वाले स्वत: और सहजयोगी भव

ब्राह्मण जीवन में सभी बच्चों का वायदा है - "एक बाप दूसरा न कोई''। जब संसार ही बाप है, दूसरा कोई है ही नहीं तो स्वत: और सहजयोगी स्थिति सदा रहेगी। अगर दूसरा कोई है तो मेहनत करनी पड़ती है। यहाँ बुद्धि न जाए, वहाँ जाए। लेकिन एक बाप ही सब कुछ है तो बुद्धि कहाँ जा नहीं सकती। ऐसे सहजयोगी, सहज स्वराज्य अधिकारी बन जाते हैं। उनके चेहरे पर रूहानियत की चमक एकरस एक जैसी रहती है।

स्लोगन:-

बाप समान अव्यक्त वा विदेही बनना - यही अव्यक्त पालना का प्रत्यक्ष सबूत है। सूचना:- आज मास का तीसरा रविवार है। सभी भाई बहिनें संगठित रूप में सायं 6.30 से 7.30 बजे तक प्रकृति सहित सर्व आत्माओं को शान्ति और शक्ति की सकाश देने की सेवा करें।

16-08-2019

16-08-2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हें खुशी होनी चाहिए कि दु:ख हरने वाला बाबा हमें सुखधाम में ले जाने आया है, हम स्वर्ग के परीज़ादे बनने वाले हैं''

प्रश्नः-

बच्चों की किस स्थिति को देखते हुए बाप को चिन्ता नहीं होती - क्यों?

उत्तर:-

कोई-कोई बच्चे फर्स्ट क्लास खुशबूदार फूल हैं, कोई में ज़रा भी खुशबू नहीं है। कोई की अवस्था बहुत अच्छी रहती, कोई माया के तूफानों से हार खा लेते, यह सब देखते हुए भी बाप को चिंता नहीं होती क्योंकि बाप जानते हैं यह सतयुग की राजधानी स्थापन हो रही है। फिर भी बाप शिक्षा देते हैं - बच्चे, जितना हो सके याद में रहो। माया के तूफानों से डरो नहीं।

ओम् शान्ति।

मीठे ते मीठा बेहद का बाप मीठे-मीठे बच्चों को बैठ समझाते हैं। यह तो समझते हो ना बहुत मीठा-मीठा बाप है। फिर शिक्षा देने वाला टीचर भी बहुत मीठा-मीठा है। यहाँ तुम जब बैठते हो तो यह याद होना चाहिए बहुत मीठा-मीठा बाबा है, उनसे स्वर्ग का वर्सा मिलना है। यहाँ तो वेश्यालय में बैठे हो। कितना मीठा बाप है। वह खुशी दिल में होनी चाहिए। बाप हमको आधाकल्प सुखधाम में ले जाने वाला है। दु:ख हरने वाला है। एक तो ऐसा बाबा है, फिर बाबा टीचर भी बनते हैं। हमको सारे सृष्टि चक्र का राज़ समझाते हैं, जो और कोई नहीं समझा सकते। यह चक्र कैसे फिरता है, 84 जन्म कैसे पास होते हैं - यह सारा चपटी में समझाते हैं। फिर साथ में भी ले जायेंगे। यहाँ तो रहना नहीं है। सभी आत्माओं को साथ ले जायेंगे। बाकी थोड़े रोज़ हैं। कहा जाता है बहुत गई थोड़ी रही.......। बाकी थोड़ा समय है इसलिए जल्दी-जल्दी मुझे याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा जो जमा है, वह खलास हो। भल माया की युद्ध चलती है। तुम मुझे याद करेंगे, वह याद करने से हटायेगी, यह भी बाबा बता देते हैं, इसलिए कभी विचार नही करना। कितने भी संकल्प, विकल्प, तूफान आयें, सारी रात संकल्पों में नींद फिट जाये तो भी डरना नहीं है। बहादुर रहना है। बाबा कह देते हैं यह आयेंगे जरूर। स्वप्न भी आयेंगे, इन सब बातों में डरना नहीं है। युद्ध का मैदान है ना। यह सब विनाश हो जाने हैं। तुम युद्ध करते हो माया को जीतने के लिए, बाकी इसमें कोई श्वास आदि बन्द नहीं करना है। आत्मा जब शरीर में होती है तो श्वास चलता है। इसमें श्वास आदि बन्द करने की भी कोशिश नहीं करनी है। हठयोग आदि में कितनी तकलीफ करते हैं। बाबा को अनुभव है। थोड़ा-थोड़ा सीखते थे, परन्तु फुर्सत भी हो ना। जैसे आजकल तुमको कहते हैं ज्ञान तो अच्छा है परन्तु फुसर्त कहाँ, इतने कारखाने हैं, यह है.......। तुमको बाप कहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों, एक तो बाप को याद करो और चक्र याद करो, बस। क्या यह डिफीकल्ट है?
सतयुग-त्रेता में इन्हों का राज्य था फिर इस्लामी, बौद्धी आदि की वृद्धि होती गई। वह अपने धर्म को भूल गये। अपने को देवी-देवता कह न सकें क्योंकि अपवित्र बन पड़े। देवतायें तो पवित्र थे। ड्रामा के प्लैन अनुसार फिर वह हिन्दु कहलाने लग पड़ते हैं। वास्तव में हिन्दु धर्म तो है नहीं। हिन्दुस्तान तो नाम बाद में पड़ा है। असली नाम भारत है। कहते हैं भारत माताओं की जय। हिन्दुस्तान की मातायें थोड़ेही कहते हैं। भारत में ही इन देवताओं का राज्य था। भारत की ही महिमा करते हैं। तो बाप बच्चों को सिखला रहे हैं, बाप को कैसे याद करना है। बाप आये ही हैं घर ले चलने के लिए। किसको? आत्माओं को। तुम जितना बाप को याद करते हो, उतना तुम पवित्र बनते हो। पवित्र बनते जायेंगे तो फिर सजा भी नहीं खायेंगे। अगर सजायें खाई तो पद कम हो जायेगा इसलिए जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होते रहेंगे। बहुत बच्चे हैं जो याद कर नहीं सकते। तंग होकर छोड़ देते हैं, युद्ध करते नहीं हैं। ऐसे भी हैं। समझा जाता है राजधानी स्थापन होनी है। नापास भी बहुत होंगे। गरीब प्रजा भी चाहिए ना। भल वहाँ दु:ख नहीं होता है, परन्तु गरीब और साहूकार तो हर हालत में होंगे। यह है कलियुग, यहाँ साहूकार वा गरीब दोनों दु:ख भोगते हैं। वहाँ दोनों सुखी रहते हैं। परन्तु गरीब साहूकार की भासना तो रहेगी। दु:ख का नाम नहीं होगा। बाकी नम्बरवार तो होते ही हैं। कोई रोग नहीं, आयु भी बड़ी होती है। इस दु:खधाम को भूल जाते हैं। सतयुग में तुमको दु:ख याद भी नहीं होगा। दु:खधाम और सुखधाम की याद अभी बाप दिलाते हैं। मनुष्य कहते हैं स्वर्ग था परन्तु कब था, कैसा था? कुछ नहीं जानते। लाखों वर्ष की बात तो कोई को भी याद आ न सके। बाप कहते हैं कल तुमको सुख था, कल फिर होगा। तो यहाँ बैठ फूलों को देखते हैं। यह अच्छा फूल है, यह इस प्रकार की मेहनत करते हैं। यह स्थेरियम नहीं है, यह पत्थरबुद्धि है। बाप को कोई बात की चिंता नहीं रहती। हाँ, समझते हैं बच्चे जल्दी पढ़कर साहूकार हो जायें, पढ़ाना भी है। बच्चे तो बने हैं परन्तु जल्दी पढ़कर होशियार हों और वह भी कहाँ तक पढ़ते और पढ़ाते हैं, कैसे फूल हैं - यह बाप बैठ देखते हैं क्योंकि यह है चैतन्य फूलों का बगीचा। फूलों को देखते भी कितनी खुशी होती है। बच्चे खुद भी समझते हैं बाबा स्वर्ग का वर्सा देते हैं। बाप को याद करते रहेंगे तो पाप कटते जायेंगे। नहीं तो सज़ा खाकर फिर पद पायेंगे। उसको कहा जाता है - मानी और मोचरा। बाप को ऐसा याद करो जो जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायें। चक्र को जानना भी है। चक्र फिरता रहता, कब बन्द नहीं होता। जूं मिसल चलता रहता है, जूँ सबसे आहिस्ते चलती है। यह बेहद का ड्रामा भी बहुत आहिस्ते चलता है। टिक-टिक होती रहती है। 5 हजार वर्ष में सेकेण्ड्स, मिनट कितने होते, वह हिसाब भी बच्चों ने निकाल कर भेजा है। लाखों वर्ष की बात होती तो कोई भी हिसाब निकाल न सके। यहाँ बाप और बच्चे बैठे हैं। बाबा एक-एक को बैठ देखते हैं - यह बाबा को कितना याद करते हैं, कितना ज्ञान उठाया है, औरों को कितना समझाते हैं। है बहुत सहज, सिर्फ बाप का परिचय दो। बैज तो बच्चों के पास है ही। बोलो, यह है शिवबाबा। काशी में जाओ तो भी शिवबाबा-शिवबाबा कह याद करते, रड़ी मारते हैं। तुम हो सालिग्राम। आत्मा बिल्कुल छोटा सितारा है, उसमें कितना पार्ट भरा हुआ है। आत्मा घटती-बढ़ती नहीं, विनाश नहीं होती। आत्मा तो अविनाशी है, उसमें ड्रामा का पार्ट भरा हुआ है। हीरा सबसे मजबूत होता है, उस जैसा सख्त पत्थर कोई होता नहीं। जौहरी लोग जानते हैं। आत्मा का विचार करो, कितनी छोटी है, उनमें कितना पार्ट भरा हुआ है! जो कभी भी घिसता नहीं है। दूसरी आत्मा होती नहीं। इस दुनिया में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसको हम बाप, टीचर, सतगुरू कहें। यह एक बेहद का बाप है, शिक्षक है सबको शिक्षा देते हैं, मनमनाभव। तुमको भी कहते हैं कि कोई धर्म वाले मिलें, उनको कहो अल्लाह को याद करते हो ना। आत्मायें सब भाई-भाई हैं। अब बाप शिक्षा देते हैं कि मामेकम् याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। बाप ही पतित-पावन है। यह किसने कहा? आत्मा ने। मनुष्य भल गाते हैं परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं।
बाप कहते हैं - तुम सब सीतायें हो। मैं हूँ राम। सब भक्तों का सद्गति दाता मैं हूँ। सबकी सद्गति कर देते हैं। बाकी सब मुक्तिधाम में चले जाते हैं। सतयुग में दूसरा धर्म कोई होता नहीं, सिर्फ हम ही होते हैं क्योंकि हम ही बाप से वर्सा लेते हैं। यहाँ तो देखो कितने ढेर के ढेर मन्दिर हैं। कितनी बड़ी दुनिया है, क्या-क्या चीजें हैं। वहाँ यह कुछ भी नहीं होगा। सिर्फ भारत ही होगा। यह रेल आदि भी नहीं होगी। यह सब खत्म हो जायेंगे। वहाँ रेल की दरकार ही नहीं। छोटा शहर होगा। रेल तो चाहिए दूर-दूर गांव में जाने के लिए। बाबा रिफ्रेश कर रहे हैं, भिन्न-भिन्न प्वाइंट्स समझाते रहते हैं बच्चों के लिए। यहाँ बैठे हो, बुद्धि में सारा ज्ञान है। जैसे परमपिता परमात्मा में सारा ज्ञान भरा हुआ है, जो तुमको समझाते रहते हैं। ऊंच ते ऊंच शान्तिधाम में रहने वाला शान्ति का सागर बाप है। हम आत्मायें भी सब वहाँ स्वीट होम में रहने वाली हैं। शान्ति के लिए मनुष्य कितना माथा मारते हैं। साधू लोग भी कहते मन को शान्ति कैसे मिले। क्या-क्या युक्ति रचते हैं। गाया जाता है - आत्मा तो मन बुद्धि सहित है, उनका स्वधर्म है ही शान्त। मुख ही नहीं, कर्मेन्द्रियां ही नहीं तो जरूर शान्त ही होगी। हम आत्माओं का निवास स्थान है स्वीट होम, जहाँ बिल्कुल शान्ति रहती है। फिर वहाँ से पहले हम आते हैं सुखधाम में। अभी तो इस दु:खधाम से ट्रांसफर होते हैं सुखधाम में। बाप पावन बना रहे हैं। कितनी बड़ी दुनिया है। इतने जंगल आदि कुछ भी वहाँ नहीं होंगे। इतनी पहाड़ियाँ आदि कुछ नहीं होंगी। हमारी राजधानी होगी। जैसे स्वर्ग का छोटा-सा मॉडल बनाते हैं वैसे छोटा-सा स्वर्ग होगा। क्या होना है। वन्डर देखो! कितना बड़ी सृष्टि है, यहाँ तो सब आपस में लड़ते रहते हैं। फिर इतनी सारी दुनिया खत्म हो जायेगी, बाकी हमारा राज्य रहेगा। इतना सब कुछ खत्म हो, यह सब कहाँ जायेंगे। समुद्र धरती आदि में चले जायेंगे। इनका नाम-निशान भी नहीं रहेगा। समुद्र में जो चीज़ जाती है, वह अन्दर ही खत्म हो जाती है। सागर हप कर लेता है। तत्व तत्व में, मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है। फिर दुनिया ही सतोप्रधान होती है, उस समय कहा जाता है नई सतोप्रधान प्रकृति। तुम्हारी वहाँ नेचुरल ब्युटी रहती है। लिपिस्टिक आदि कुछ भी नहीं लगाते। तो तुम बच्चों को खुश होना चाहिए। तुम स्वर्ग के परीज़ादे बनते हो।
ज्ञान स्नान नहीं करेंगे तो तुम देवता बनेंगे नहीं। और कोई उपाय है नहीं। बाप तो है सदा खूबसूरत, तुम आत्मायें सांवरी बन गई हो। माशूक तो बड़ा सुन्दर मुसाफिर है जो आकर तुमको सुन्दर बनाते हैं। बाप कहते हैं मैंने इसमें प्रवेश किया है। मैं तो कभी सांवरा नहीं बनता हूँ। तुम सांवरे से सुन्दर बनते हो। सदा सुन्दर तो एक ही मुसाफिर है। यह बाबा सांवरा और सुन्दर बनते हैं। तुम सबको सुन्दर बनाकर साथ में ले जाते हैं। तुम बच्चों को सुन्दर बन फिर और सबको सुन्दर बनाना है। बाप तो श्याम-सुन्दर बनते नहीं। गीता में भूल कर दी है, जो बाप के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है, इसको ही कहा जाता है - एकज़ भूल। सारे विश्व को सुन्दर बनाने वाला शिवबाबा उनके बदले जो स्वर्ग का पहला नम्बर सुन्दर बनता है, उनका नाम डाल दिया है, यह कोई समझते थोड़ेही हैं। भारत फिर सुन्दर बनने का है। वह तो समझते हैं 40 हजार वर्ष बाद स्वर्ग बनेगा और तुम बताते हो सारा कल्प ही 5 हज़ार वर्ष का है। तो बाप आत्माओं से बात करते हैं। कहते हैं मैं आधाकल्प का माशूक हूँ। तुम मुझे पुकारते आये हो - हे पतित-पावन आओ, आकर हम आत्माओं, आशिकों को पावन बनाओ। तो उनकी मत पर चलना चाहिए। मेहनत करनी चाहिए। बाबा ऐसे नहीं कहते कि तुम धन्धा आदि नहीं करो। नहीं, वह सब कुछ करना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते, बाल बच्चों आदि को सम्भालते सिर्फ अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो क्योंकि मैं पतित-पावन हूँ। बच्चों की सम्भाल भल करो बाकी अभी और बच्चे पैदा नहीं करो। नहीं तो वह याद आते रहेंगे। इन सबके होते हुए भी इनको भूल जाना है। जो कुछ तुम देखते हो यह सब खत्म हो जाने वाले हैं। शरीर खत्म हो जायेगा। बाप की याद से आत्मा पवित्र बन जायेगी तो फिर शरीर भी नया मिलेगा। यह है बेहद का सन्यास। बाप नया घर बनाते हैं, तो फिर पुराने घर से दिल हट जाती है। स्वर्ग में क्या नहीं होगा, अपार सुख हैं। स्वर्ग तो यहाँ होता है। देलवाड़ा मन्दिर भी पूरा यादगार है। नीचे तपस्या कर रहे हैं, फिर स्वर्ग कहाँ दिखावें? वह फिर छत में रख दिया है। नीचे राजयोग की तपस्या कर रहे हैं, ऊपर राज्य पद खड़ा है। कितना अच्छा मन्दिर है। ऊपर है अचलघर, सोने की मूर्तियां हैं। उनसे ऊपर है फिर गुरू शिखर। गुरू सबसे ऊपर बैठा है। ऊंच ते ऊंच है सतगुरू। फिर बीच में दिखाया है स्वर्ग। तो यह देलवाड़ा मन्दिर पूरा यादगार है, राजयोग तुम सीखते हो फिर स्वर्ग यहाँ होगा। देवतायें यहाँ थे ना। परन्तु उनके लिए पावन दुनिया अब बन रही है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इन आंखों से सब कुछ देखते हुए इसे भूलने का अभ्यास करना है। पुराने घर से, दुनिया से दिल हटा लेनी है। नये घर को याद करना है।

2) ज्ञान स्नान कर सुन्दर परीज़ादा बनना है। जैसे बाप सुन्दर गोरा मुसाफिर है, ऐसे उनकी याद से आत्मा को सांवरे से गोरा बनाना है। माया की युद्ध से डरना नहीं है, विजयी बनकर दिखाना है।

वरदान:-

बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा पुराने संस्कारों के वार से सेफ रहने वाले मास्टर नॉलेजफुल भव

पुराने संस्कारों के कारण सेवा में वा सम्बन्ध-सम्पर्क में विघ्न पड़ते हैं। संस्कार ही भिन्न-भिन्न रूप से अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। जहाँ किसी भी तरफ आकर्षण है वहाँ वैराग्य नहीं हो सकता। संस्कारों का छिपा हुआ अंश भी है तो समय प्रमाण वंश का रूप ले लेता है, परवश कर देता है इसलिए नॉलेजफुल बन, बेहद की वैराग्य वृत्ति द्वारा पुराने संस्कारों, संबंधों, पदार्थों के वार से मुक्त बनो तो सेफ रहेंगे।

स्लोगन:-

माया से निर्भय बनो और आपसी संबंधों में निर्माण बनो।

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