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10-07-2020

10-07-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम इस पढ़ाई से अपने सुखधाम जाते हो वाया शान्तिधाम, यही तुम्हारी एम आब्जेक्ट है, यह कभी नहीं भूलनी चाहिए''

प्रश्नः-

तुम बच्चे साक्षी होकर इस समय ड्रामा की कौन-सी सीन देख रहे हो?

उत्तर:-

इस समय ड्रामा में टोटल दु:ख की सीन है। अगर किसी को सुख है भी तो अल्पकाल काग विष्टा समान। बाकी दु:ख ही दु:ख है। तुम बच्चे अभी रोशनी में आये हो। जानते हो सेकण्ड बाई सेकण्ड बेहद सृष्टि का चक्र फिरता रहता है, एक दिन न मिले दूसरे से। सारी दुनिया की एक्ट बदलती रहती है। नई सीन चलती रहती है।

डबल ओम् शान्ति। एक - बाप स्वधर्म में टिके हुए हैं, दूसरा - बच्चों को भी कहते हैं अपने स्वधर्म में टिको और बाप को याद करो। और कोई ऐसे कह न सके कि स्वधर्म में टिको। तुम बच्चों की बुद्धि में निश्चय है। निश्चयबुद्धि विजयन्ती। वही विजय पायेंगे। काहे की विजय पायेंगे? बाप के वर्से की। स्वर्ग में जाना - यह है बाप के वर्से की विजय पाना। बाकी है पद के लिए पुरुषार्थ। स्वर्ग में जाना तो जरूर है। बच्चे जानते हैं यह छी-छी दुनिया है। बहुत अथाह दु:ख आने वाले हैं। ड्रामा के चक्र को भी तुम जानते हो। अनेक बार बाबा आया हुआ है पावन बनाए सभी आत्माओं को मच्छरों सदृश्य ले जाने, फिर खुद भी निर्वाणधाम में जाकर निवास करेंगे। बच्चे भी जायेंगे! तुम बच्चों को यह तो खुशी रहनी चाहिए - इस पढ़ाई से हम अपने सुखधाम जायेंगे वाया शान्तिधाम। यह है तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट। यह भूलनी नहीं चाहिए। रोज़-रोज़ सुनते हो, समझते हो हमको पतित से पावन बनाने के लिए बाप पढ़ाते हैं। पावन बनने का सहज उपाय बताते हैं याद का। यह भी नई बात नहीं। लिखा हुआ है भगवान ने राजयोग सिखाया। सिर्फ भूल यह कर दी है जो कृष्ण का नाम डाल दिया है। ऐसे भी नहीं है बच्चों को जो नॉलेज मिल रही है, वह गीता के सिवाए और कोई शास्त्र में होगी। बच्चे जानते हैं कोई भी मनुष्य की महिमा है नहीं, जैसे बाप की है। बाप न आये तो सृष्टि का चक्र ही न फिरे। दु:खधाम से सुखधाम कैसे बनें? सृष्टि का चक्र तो फिरना ही है। बाप को भी जरूर आना ही है। बाप आते हैं सबको ले जाने फिर चक्र फिरता है। बाप न आये तो कलियुग से सतयुग कैसे बनें? बाकी यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। राजयोग है ही गीता में। अगर समझें भगवान आबू में आया है तो एकदम भागे मिलने के लिए। संन्यासी भी चाहते तो हैं ना कि भगवान से मिलें। पतित-पावन को याद करते हैं वापिस जाने के लिए। अभी तुम बच्चे पद्मापद्म भाग्यशाली बन रहे हो। वहाँ अथाह सुख होते हैं। नई दुनिया में जो देवी-देवता धर्म था, वह अभी नहीं है। बाप दैवी राज्य की स्थापना करते ही हैं ब्रह्मा द्वारा। यह तो क्लीयर है। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही यह है। इसमें संशय की बात ही नहीं। आगे चलकर समझ ही जायेंगे, राजधानी जरूर स्थापन होती है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म है। जब तुम स्वर्ग में रहते हो तो इनका नाम ही भारत रहता है फिर जब तुम नर्क में आते हो तब हिन्दुस्तान नाम पड़ता है। यहाँ कितना दु:ख ही दु:ख है। फिर यह सृष्टि बदलती है फिर स्वर्ग में है ही सुखधाम। यह नॉलेज तुम बच्चों को है। दुनिया में मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। बाप खुद कहते हैं अभी है अन्धियारी रात। रात में मनुष्य धक्के खाते रहते हैं। तुम बच्चे रोशनी में हो। यह भी साक्षी हो बुद्धि में धारण करना है। सेकण्ड बाई सेकण्ड बेहद सृष्टि का चक्र फिरता रहता है। एक दिन न मिले दूसरे से। सारी दुनिया की एक्ट बदलती रहती है। नई सीन चलती रहती है। इस समय टोटल है ही दु:ख की सीन। अगर सुख है तो भी काग विष्टा समान। बाकी दु:ख ही दु:ख है। इस जन्म में करके सुख होगा फिर दूसरे जन्म में दु:ख। अब तुम बच्चों की बुद्धि में यह रहता है - अभी हम जाते हैं अपने घर। इसमें मेहनत करनी है पावन बनने की। श्री-श्री ने श्रीमत दी है श्री लक्ष्मी-नारायण बनने की। बैरिस्टर मत देंगे - बैरिस्टर भव। अब बाप भी कहते हैं श्रीमत से यह बनो।

अपने से पूछना चाहिए - मेरे में कोई अवगुण तो नहीं है? इस समय गाते भी हैं मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही, आपेही तरस परोई। तरस अर्थात् रहम। बाबा कहते - बच्चे मैं तो किसी पर रहम करता ही नहीं हूँ। रहम तो हर एक को अपने पर करना है। यह ड्रामा बना हुआ है। बेरहमी रावण तुमको दु:ख में ले आते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। इसमें रावण का भी कोई दोष नहीं। बाप आकर सिर्फ राय देते हैं। यही उनका रहम है। बाकी यह रावणराज्य तो फिर भी चलेगा। ड्रामा अनादि है। न रावण का दोष है, न मनुष्यों का दोष है। चक्र को फिरना ही है। रावण से छुड़ाने के लिए बाप युक्तियां बताते रहते हैं। रावण मत पर तुम कितना पाप आत्मा बने हो। अभी पुरानी दुनिया है। फिर जरूर नई दुनिया आयेगी। चक्र तो फिरेगा ना। सतयुग को फिर जरूर आना है। अभी है संगमयुग। महाभारत लड़ाई भी इस समय की है। विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती। यह होने का है। और हम विजयन्ती स्वर्ग के मालिक होंगे। बाकी सब होंगे ही नहीं। यह भी समझते हो - पवित्र होने बिगर देवता बनना मुश्किल है। अब बाप से श्रीमत मिलती है श्रेष्ठ देवता बनने की। ऐसी मत कभी मिल न सके। श्रीमत देने का उनका पार्ट है भी संगम पर। और कोई में तो यह ज्ञान ही नहीं है। भक्ति माना भक्ति। उनको ज्ञान नहीं कहेंगे। रूहानी ज्ञान, ज्ञान-सागर रूह ही देते हैं। उनकी ही महिमा है ज्ञान का सागर, सुख का सागर। बाप पुरुषार्थ की युक्तियाँ भी बताते हैं। यह ख्याल रखना चाहिए कि अभी फेल हुए तो कल्प-कल्पान्तर फेल होंगे, बहुत चोट लग जायेगी। श्रीमत पर न चलने से चोट लग जाती है। ब्राह्मणों का झाड़ बढ़ना भी जरूर है। इतना ही बढ़ेगा जितना देवताओं का झाड़ है। तुमको पुरुषार्थ करना और कराना है। सैपलिंग लगती रहेगी। झाड़ बड़ा हो जायेगा। तुम जानते हो अभी हमारा कल्याण हो रहा है। पतित दुनिया से पावन दुनिया में जाने का कल्याण होता है। तुम बच्चों की बुद्धि का ताला अभी खुला है। बाप बुद्धिवानों की बुद्धि है ना। अभी तुम समझ रहे हो फिर आगे चल देखना किस-किस का ताला खुलता है। यह भी ड्रामा चलता है। फिर सतयुग से रिपीट होगा। लक्ष्मी-नारायण जब तख्त पर बैठते हैं तब संवत शुरू होता है। तुम लिखते भी हो वन से 1250 वर्ष तक स्वर्ग, कितना क्लीयर है। कहानी है सत्य नारायण की। कथा अमरनाथ की है ना। तुम अभी सच्ची-सच्ची अमरनाथ की कथा सुनते हो उसका फिर गायन चलता है। त्योहार आदि सब इस समय के हैं। नम्बरवन पर्व है शिवबाबा की जयन्ती। कलियुग के बाद जरूर बाप को आना पड़े दुनिया को चेंज करने। चित्रों को कोई अच्छी रीति से देखे, कितना पूरा हिसाब बना हुआ है। तुमको यह खातिरी है, जितना कल्प पहले पुरुषार्थ किया है उतना करेंगे जरूर। साक्षी हो औरों का भी देखेंगे। अपने पुरुषार्थ को भी जानते हैं। तुम भी जानते हो। स्टूडेन्ट अपनी पढ़ाई को नहीं जानते होंगे? दिल खायेगी जरूर कि हम इस सब्जेक्ट में बहुत कच्चे हैं। फिर नापास हो जाते हैं। इम्तहान के टाइम जो कच्चे होंगे उनकी दिल धड़कती रहेगी। तुम बच्चे भी साक्षात्कार करेंगे। परन्तु नापास तो हो ही गये, कर क्या सकते हैं! स्कूल में नापास होते हैं तो संबंधी भी नाराज़, टीचर भी नाराज़ होता है। कहेंगे हमारे स्कूल से कम पास हुए तो समझा जायेगा कि टीचर इतना अच्छा नहीं इसलिए कम पास हुए। बाबा भी जानते हैं सेन्टर्स पर कौन-कौन अच्छी टीचर है, कैसे पढ़ाती है। कौन-कौन अच्छी रीति पढ़ाकर ले आती है। सब मालूम पड़ता है। बाबा कहते - बादलों को लाना है। छोटे बच्चों को ले आयेंगे तो उनमें मोह रहेगा। अकेला निकलकर आना चाहिए तो बुद्धि अच्छी रीति लगी रहे। बच्चों को तो वहाँ भी देखते रहते हैं।

बाप कहते हैं यह पुरानी दुनिया तो कब्रिस्तान होनी है। नया मकान बनाते हैं तो बुद्धि में रहता है ना - हमारा नया मकान बन रहा है। धंधा आदि तो करते रहते हैं। परन्तु बुद्धि नये मकान तरफ रहती है। चुपकर तो नहीं बैठ जाते। वह है हद की बात, यह है बेहद की बात। हर कार्य करते हुए स्मृति रहे कि अभी हम घर जाकर फिर अपनी राजधानी में जायेंगे तो अपार खुशी रहेगी। बाप कहते हैं - बच्चे, अपने बच्चों आदि की सम्भाल भी करनी है। परन्तु बुद्धि वहाँ लगी रहे। याद न करने से फिर पवित्र भी नहीं बन सकते। याद से पवित्र, ज्ञान से कमाई। यहाँ तो सब हैं पतित। दो किनारे हैं। बाबा को खिवैया कहते हैं, परन्तु अर्थ नहीं समझते। तुम जानते हो बाप उस किनारे ले जाते हैं। आत्मा जानती है हम अब बाप को याद कर बहुत नजदीक जा रहे हैं। खिवैया नाम भी अर्थ सहित रखा है ना। यह सब महिमा करते हैं - नईया मेरी पार लगाओ। सतयुग में ऐसे कहेंगे क्या? कलियुग में ही पुकारते हैं। तुम बच्चे समझते हो बेसमझ को तो यहाँ आना नहीं है। बाप की सख्त मना है। निश्चय नहीं तो कभी नहीं ले आना चाहिए। कुछ भी समझेंगे नहीं। पहले तो 7 रोज़ का कोर्स दो। कोई को तो 2 रोज़ में भी तीर लग जाता है। अच्छा लग गया तो फिर छोड़ेंगे थोड़ेही। कहेंगे हम 7 रोज़ और भी सीखेंगे। तुम झट समझ जायेंगे यह इस कुल का है। तेज बुद्धि जो होंगे वह कोई बात की परवाह नहीं करेंगे। अच्छा, एक नौकरी छूट जायेगी दूसरी मिलेगी, बच्चे दिल वाले जो होते हैं उनकी नौकरी आदि छूटती ही नहीं है। खुद ही वन्डर खाते हैं। बच्चियाँ कहती हैं हमारे पति की बुद्धि फेरो। बाबा कहते हैं मुझे मत कहो। तुम योगबल में रह फिर बैठ ज्ञान समझाओ। बाबा थोड़ेही बुद्धि को फेरेंगे। फिर तो सभी ऐसे धन्धे करते रहेंगे। जो रसम निकलती है उनको पकड़ लेते हैं। कोई गुरू से किसको फायदा हुआ, सुना, तो बस उनके पीछे पड़ जाते हैं। नई आत्मा आती है तो उनकी महिमा तो निकलेगी ना। फिर बहुत फालोअर्स बन पड़ते हैं इसलिए इन सब बातों को देखना नहीं है। तुमको देखना है अपने को - हम कहाँ तक पढ़ते हैं? यह तो बाबा डीटेल में जैसे चिटचैट करते हैं। बाकी सिर्फ कह देना बाप को याद करो यह तो घर में भी रह कर सकते हो। लेकिन ज्ञान का सागर है तो जरूर ज्ञान भी देंगे ना। यह है मुख्य बात - मनमनाभव। साथ में सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ भी समझाते हैं। चित्र भी तो इस समय बहुत अच्छे-अच्छे निकले हैं। उनका भी अर्थ बाप समझाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा को दिखाया है। त्रिमूर्ति भी है फिर विष्णु की नाभी से ब्रह्मा यह फिर क्या है? बाप बैठ समझाते हैं - यह राइट है या रांग है? मनोमय चित्र भी ढेर बनाते हैं ना। कोई-कोई शास्त्रों में चक्र भी दिखाया है। परन्तु कोई ने कितनी आयु लिख दी है, कोई ने कितनी। अनेक मत हैं ना। शास्त्रों में हद की बातें लिख दी हैं, बाप बेहद की बात समझाते हैं कि सारी दुनिया में है रावणराज्य। यह तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान है - हम कैसे पतित बने फिर पावन कैसे बनते हैं। पीछे फिर और धर्म आते हैं। अनेक वैरायटी है। एक न मिले दूसरे से। एक जैसे फीचर्स वाले दो हो न सकें। यह बना-बनाया खेल है जो रिपीट होता रहता है। बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं। टाइम थोड़ा होता जाता है। अपनी जांच करो - हम कहाँ तक खुशी में रहते हैं? हमको कोई विकर्म नहीं करना है। तूफान तो आयेंगे। बाप समझाते हैं - बच्चे, अन्तर्मुख होकर अपना चार्ट रखो तो जो भूलें होती हैं उनका पश्चाताप् कर सकेंगे। यह जैसे योगबल से अपने को माफ करते हो। बाबा कोई क्षमा या माफ नहीं करते। ड्रामा में क्षमा अक्षर ही नहीं है। तुमको अपनी मेहनत करनी है। पापों का दण्ड मनुष्य खुद ही भोगते हैं। क्षमा की बात ही नहीं। बाप कहते हैं हर बात में मेहनत करो। बाप बैठ युक्ति बताते हैं आत्माओं को। बाप को बुलाते हो पुराने रावण के देश में आओ, हम पतितों को आकर पावन बनाओ। परन्तु मनुष्य समझते नहीं। वह है आसुरी सम्प्रदाय। तुम हो ब्राह्मण सम्प्रदाय, दैवी सम्प्रदाय बन रहे हो। पुरुषार्थ भी बच्चे नम्बरवार करते हैं। फिर कह देते इनकी तकदीर में इतना ही है। अपना टाइम वेस्ट करते हैं। जन्म-जन्मान्तर, कल्प-कल्पान्तर ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। अपने को घाटा नहीं डालना चाहिए क्योंकि अभी जमा होता है फिर घाटे में चले जाते हो। रावण राज्य में कितना घाटा होता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अन्तर्मुखी बन अपनी जांच करनी है, जो भी भूलें होती हैं उनका दिल से पश्चाताप् कर योगबल से माफ करना है। अपनी मेहनत करनी है।

2) बाप की जो राय मिलती है उस पर पूरा चलकर अपने ऊपर आपेही रहम करना है। साक्षी हो अपने वा दूसरों के पुरुषार्थ को देखना है। कभी भी अपने आपको घाटा नहीं डालना है।

वरदान:-

निरन्तर याद द्वारा अविनाशी कमाई जमा करने वाले सर्व खजानों के अधिकारी भव

निरन्तर याद द्वारा हर कदम में कमाई जमा करते रहो तो सुख, शान्ति, आनंद, प्रेम...इन सब खजानों के अधिकार का अनुभव करते रहेंगे। कोई कष्ट, कष्ट अनुभव नहीं होंगे। संगम पर ब्राह्मणों को कोई कष्ट हो नहीं सकता। यदि कोई कष्ट आता भी है तो बाप की याद दिलाने के लिए, जैसे गुलाब के पुष्प के साथ कांटा उनके बचाव का साधन होता है। वैसे यह तकलीफें और ही बाप की याद दिलाने के निमित्त बनती हैं।

स्लोगन:-

स्नेह रूप का अनुभव तो सुनाते हो अब शक्ति रूप का अनुभव सुनाओ।

09-07-2020

09-07-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - जब समय मिले तो एकान्त में बैठ विचार सागर मंथन करो, जो प्वाइंट्स सुनते हो उसको रिवाइज़ करो''

प्रश्नः-

तुम्हारी याद की यात्रा पूरी कब होगी?

उत्तर:-

जब तुम्हारी कोई भी कर्मेद्रियाँ धोखा न दें, कर्मातीत अवस्था हो जाए तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी तुमको पूरा पुरुषार्थ करना है, नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस पर तत्पर रहना है।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? बच्चे समझते हैं आधाकल्प हम देह-अभिमानी रहे हैं। अब देही-अभिमानी हो रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। बाप आकर समझाते हैं अपने को आत्मा समझकर बैठो तब ही बाप याद आयेगा। नहीं तो भूल जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो यात्रा कैसे कर सकेंगे! पाप कैसे कटेंगे! घाटा पड़ जायेगा। यह तो घड़ी-घड़ी याद करो। यह है मुख्य बात। बाकी तो बाप अनेक प्रकार की युक्तियां बतलाते हैं। रांग क्या है, राइट क्या है - वह भी समझाया है। बाप तो ज्ञान का सागर है। भक्ति को भी जानते हैं। बच्चों को भक्ति में क्या-क्या करना पड़ता है। समझाते हैं यह यज्ञ तप आदि करना, यह सब है भक्ति मार्ग। भल बाप की महिमा करते हैं, परन्तु उल्टी। वास्तव में कृष्ण की महिमा भी पूरी नहीं जानते। हर एक बात को समझना चाहिए ना। जैसे कृष्ण को वैकुण्ठ नाथ कहा जाता है। अच्छा, बाबा पूछते हैं, कृष्ण को त्रिलोकीनाथ कहा जा सकता है? गाया जाता है ना - त्रिलोकीनाथ। अब त्रिलोकी के नाथ अर्थात् तीन लोक मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन। तुम बच्चों को समझाया जाता है तुम ब्रह्माण्ड के भी मालिक हो। कृष्ण ऐसे समझते होंगे कि हम ब्रह्माण्ड के मालिक हैं? नहीं। वह तो वैकुण्ठ में थे। वैकुण्ठ कहा जाता है स्वर्ग नई दुनिया को। तो वास्तव में त्रिलोकीनाथ कोई भी है नहीं। बाप राईट बात समझाते हैं। तीन लोक तो हैं। ब्रह्माण्ड का मालिक शिवबाबा भी है, तुम भी हो। सूक्ष्मवतन की तो बात ही नहीं। स्थूल वतन में भी वह मालिक नहीं है, न स्वर्ग का, न नर्क का मालिक है। कृष्ण है स्वर्ग का मालिक। नर्क का मालिक है रावण। इनको रावण राज्य, आसुरी राज्य कहा जाता है। मनुष्य कहते भी हैं परन्तु समझते नहीं हैं। तुम बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं। रावण को 10 शीश देते हैं। 5 विकार स्त्री के, 5 विकार पुरूष के। अब 5 विकार तो सबके लिए हैं। सब हैं ही रावण राज्य में। अभी तुम श्रेष्ठाचारी बन रहे हो। बाप आकर श्रेष्ठाचारी दुनिया बनाते हैं। एकान्त में बैठने से ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन चलेगा। उस पढ़ाई के लिए भी स्टूडेण्ट एकान्त में किताब ले जाकर पढ़ते हैं। तुमको किताब तो पढ़ने की दरकार नहीं। हाँ, तुम प्वाइंट्स नोट करते हो। इसको फिर रिवाइज़ करना चाहिए। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। बाप कहते हैं ना - आज तुमको गुह्य ते गुह्य नई-नई प्वाइंट्स समझाता हूँ। पारसपुरी के मालिक तो लक्ष्मी-नारायण हैं। ऐसे भी नहीं कहेंगे कि विष्णु हैं। विष्णु को भी समझते नहीं हैं कि यही लक्ष्मी-नारायण है। अभी तुम शॉर्ट में एम आबजेक्ट समझाते हो। ब्रह्मा-सरस्वती कोई आपस में मेल-फीमेल नहीं हैं। यह तो प्रजापिता ब्रह्मा है ना। प्रजापिता ब्रह्मा को ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर कह सकते हैं, शिवबाबा को सिर्फ बाबा ही कहेंगे। बाकी सब हैं ब्रदर्स। इतने सब ब्रह्मा के बच्चे हैं। सबको मालूम है - हम भगवान के बच्चे ब्रदर्स हो गये। परन्तु वह है निराकारी दुनिया में। अभी तुम ब्राह्मण बने हो। नई दुनिया सतयुग को कहा जाता है। इनका नाम फिर पुरुषोत्तम संगमयुग रखा है। सतयुग में होते ही हैं पुरुषोत्तम। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। तुम नई दुनिया के लिए तैयार हो रहे हो। इस संगमयुग पर ही तुम पुरुषोत्तम बनते हो। कहते भी हैं हम लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। यह हैं सबसे उत्तम पुरुष। उन्हों को फिर देवता कहा जाता है। उत्तम से उत्तम नम्बरवन हैं लक्ष्मी-नारायण फिर नम्बरवार तुम बच्चे बनेंगे। सूर्यवंशी घराने को उत्तम कहेंगे। नम्बरवन तो हैं ना। आहिस्ते-आहिस्ते कला कम होती है।

अभी तुम बच्चे नई दुनिया का मुहूर्त करते हो। जैसे नया घर तैयार होता है तो बच्चे खुश होते हैं। मुहूर्त करते हैं। तुम बच्चे भी नई दुनिया को देख खुश होते हो। मुहूर्त करते हो। लिखा हुआ भी है सोने के फूलों की वर्षा होती है। तुम बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। तुमको सुख और शान्ति दोनों मिलते हैं। दूसरा कोई नहीं जिनको इतना सुख और शान्ति मिले। दूसरे धर्म आते हैं तो द्वैत हो जाता है। तुम बच्चों को अपार खुशी है - हम पुरुषार्थ कर ऊंच पद पायें। ऐसे नहीं कि जो तकदीर में होगा सो मिलेगा, पास होने होंगे तो होंगे। नहीं, हर बात में पुरुषार्थ जरूर करना है। पुरुषार्थ नहीं पहुँचता है तो कह देते जो नसीब में होगा। फिर पुरुषार्थ करना ही बन्द हो जाता है। बाप कहते हैं तुम माताओं को कितना ऊंच बनाता हूँ। फीमेल का मान सब जगह है। विलायत में भी मान है। यहाँ बच्ची पैदा होती है तो उल्टा मंझा (उल्टी चारपाई) कर देते। दुनिया बिल्कुल ही डर्टी है। इस समय तुम बच्चे जानते हो भारत क्या था, अब क्या है। मनुष्य भूल गये हैं सिर्फ शान्ति-शान्ति मांगते रहते हैं। विश्व में शान्ति चाहते हैं। तुम यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र दिखाओ। इन्हों का राज्य था तो पवित्रता-सुख-शान्ति भी थी। तुमको ऐसा राज्य चाहिए ना। मूलवतन में तो विश्व की शान्ति नहीं कहेंगे। विश्व में शान्ति तो यहाँ होगी ना। देवताओं का राज्य सारे विश्व में था। मूलवतन तो है आत्माओं की दुनिया। मनुष्य तो यह भी नहीं जानते कि आत्माओं की दुनिया होती है। बाप कहते हैं हम तुमको कितना ऊंच पुरुषोत्तम बनाता हूँ। यह समझाने की बात है। ऐसे नहीं, रड़ियाँ मारेंगे - भगवान आया है, तो कोई मानेगा नहीं। और ही गाली खायेंगे और खिलायेंगे। कहेंगे बी.के. अपने बाबा को भगवान कहती हैं। ऐसे सर्विस नहीं होती है। बाबा युक्ति बताते रहते हैं। कमरे में 8-10 चित्र दीवाल में अच्छी रीति लगा दो और बाहर में लिख दो - बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेना है अथवा मनुष्य से देवता बनना है, तो आओ हम आपको समझायें। ऐसे बहुत आने लग पड़ेंगे। आपेही आते रहेंगे। विश्व में शान्ति तो थी ना। अभी इतने ढेर धर्म हैं। तमोप्रधान दुनिया में शान्ति कैसे हो सकती है। विश्व में शान्ति वह तो भगवान ही कर सकता है। शिवबाबा आते हैं जरूर कुछ सौगात लाते होंगे। एक ही बाप है जो इतना दूर से आते हैं और यह बाबा एक ही बार आते हैं। इतना बड़ा बाबा 5 हज़ार वर्ष के बाद आते हैं। मुसाफिरी से लौटते हैं तो बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं ना। स्त्री का पति भी, बच्चों का बाप तो बनते हैं ना। फिर दादा, परदादा, तरदादा बनते हैं। इनको तुम बाबा कहते हो फिर ग्रैन्ड फादर भी होगा। ग्रेट ग्रैन्ड फादर भी होगा। बिरादरियां हैं ना। एडम, आदि देव नाम है परन्तु मनुष्य समझते नहीं हैं। तुम बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं। बाप द्वारा सृष्टि चक्र की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तुम जानकर चक्रवर्ती राजा बन रहे हो। बाबा कितना प्यार और रूचि से पढ़ाते हैं तो इतना पढ़ना चाहिए ना। सवेरे का टाइम तो सब फ्री होते हैं। सुबह का क्लास होता है - आधा पौना घण्टा, मुरली सुनकर फिर चले जाओ। याद तो कहाँ भी रहते कर सकते हो। इतवार का दिन तो छुट्टी है। सवेरे 2-3 घण्टा बैठ जाओ। दिन की कमाई को मेकप कर लो। पूरी झोली भर दो। टाइम तो मिलता है ना। माया के तूफान आने से याद नहीं कर सकते हैं। बाबा बिल्कुल सहज समझाते हैं। भक्ति मार्ग में कितने सतसंगों में जाते हैं। कृष्ण के मन्दिर में, फिर श्रीनाथ के मन्दिर में, फिर और किसके मन्दिर में जायेंगे। यात्रा में भी कितने व्यभिचारी बनते हैं। इतनी तकलीफ भी लेते, फायदा कुछ नहीं। ड्रामा में यह भी नूँध है फिर भी होगा। तुम्हारी आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। सतयुग त्रेता में जो पार्ट कल्प पहले बजाया है वही बजायेंगे। मोटी बुद्धि यह भी नहीं समझते हैं। जो महीन बुद्धि हैं वही अच्छी रीति समझ कर समझा सकते हैं। उन्हें अन्दर भासना आती है कि यह अनादि नाटक बना हुआ है। दुनिया में कोई नहीं समझते यह बेहद का नाटक है। इनको समझने में भी टाइम लगता है। हर एक बात डीटेल में समझाकर फिर कहा जाता है - मुख्य है याद की यात्रा। सेकण्ड में जीवनमुक्ति भी गाया हुआ है। और फिर यह भी गायन है कि ज्ञान का सागर है। सारा सागर स्याही बनाओ, जंगल को कलम बनाओ, धरती को कागज़ बनाओ.... तो भी अन्त नहीं आ सकती। शुरू से लेकर तुम कितना लिखते आये हो। ढेर कागज हो जाएं। तुमको कोई धक्का नहीं खाना है। मुख्य है ही अल्फ। बाप को याद करना है। यहाँ भी तुम आते हो शिवबाबा के पास। शिवबाबा इनमें प्रवेश कर तुमको कितना प्यार से पढ़ाते हैं। कोई भी बड़ाई नहीं है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ पुराने शरीर में। कैसे साधारण रीति शिवबाबा आकर पढ़ाते हैं। कोई अहंकार नहीं। बाप कहते हैं तुम मुझे कहते ही हो बाबा पतित दुनिया, पतित शरीर में आओ, आकर हमको शिक्षा दो। सतयुग में नहीं बुलाते हो कि आकर हीरे-जवाहरातों के महल में बैठो, भोजन आदि पाओ..... शिवबाबा भोजन पाते ही नहीं। आगे बुलाते थे कि आकर भोजन खाओ। 36 प्रकार का भोजन खिलाते थे, यह फिर भी होगा। यह भी चरित्र ही कहें। कृष्ण के चरित्र क्या हैं? वह तो सतयुग का प्रिन्स है। उनको पतित-पावन नहीं कहा जाता। सतयुग में यह विश्व के मालिक कैसे बने हैं - यह भी अभी तुम जानते हो। मनुष्य तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं। अभी तुम घोर रोशनी में हो। बाप आकर रात को दिन बना देते हैं। आधाकल्प तुम राज्य करते हो तो कितनी खुशी होनी चाहिए।

तुम्हारी याद की यात्रा पूरी तब होगी जब तुम्हारी कोई भी कर्मेन्द्रियां धोखा न दें। कर्मातीत अवस्था हो जाए तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी पूरी नहीं हुई है। अभी तुमको पूरा पुरूषार्थ करना है। नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस और सर्विस। बाप भी आकर बूढ़े तन से सर्विस कर रहे हैं ना। बाप करनकरावनहार है। बच्चों के लिए कितना फिकर रहता है - यह बनाना है, मकान बनाना है। जैसे लौकिक बाप को हद के ख्यालात रहते हैं, वैसे पारलौकिक बाप को बेहद का ख्याल रहता है। तुम बच्चों को ही सर्विस करनी है। दिन-प्रतिदिन बहुत सहज होता जाता है। जितना विनाश के नजदीक आते जायेंगे उतना ताकत आती जायेगी। गाया हुआ भी है भीष्मपितामह आदि को पिछाड़ी में तीर लगे। अभी तीर लग जाए तो बहुत हंगामा हो जाए। इतनी भीड़ हो जाए जो बात मत पूछो। कहते हैं ना - माथा खुजलाने की फुर्सत नहीं। ऐसे कोई है नहीं। परन्तु भीड़ हो जाती है तो फिर ऐसे कहा जाता है। जब इन्हों को तीर लग जाए तो फिर तुम्हारा प्रभाव निकलेगा। सब बच्चों को बाप का परिचय मिलना तो है।

तुम 3 पैर पृथ्वी में भी यह अविनाशी हॉस्पिटल और गॉडली युनिवर्सिटी खोल सकते हो। पैसा नहीं है तो भी हर्जा नहीं है। चित्र तुमको मिल जायेंगे। सर्विस में मान-अपमान, दु:ख-सुख, ठण्डी-गर्मी, सब सहन करनी है। किसको हीरे जैसा बनाना कम बात है क्या! बाप कभी थकता है क्या? तुम क्यों थकते हो? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सवेरे के समय आधा पौना घण्टा बहुत प्यार वा रूचि से पढ़ाई पढ़नी है। बाप की याद में रहना है। याद का ऐसा पुरूषार्थ हो जो सब कर्मेन्द्रियाँ वश में हो जाएं।

2) सर्विस में दु:ख-सुख, मान-अपमान, गर्मी-ठण्डी सब कुछ सहन करना है। कभी भी सर्विस में थकना नहीं है। 3 पैर पृथ्वी में भी हॉस्पिटल कम युनिवर्सिटी खोल हीरे जैसा बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:-

सर्व शक्तियों की लाइट द्वारा आत्माओं को रास्ता दिखाने वाले चैतन्य लाइट हाउस भव

यदि सदा इस स्मृति में रहो कि मैं आत्मा विश्व कल्याण की सेवा के लिए परमधाम से अवतरित हुई हूँ तो जो भी संकल्प करेंगे, बोल बोलेंगे उसमें विश्व कल्याण समाया हुआ होगा। और यही स्मृति लाइट हाउस का कार्य करेगी। जैसे उस लाइट हाउस से एक रंग की लाइट निकलती है ऐसे आप चैतन्य लाइट हाउस द्वारा सर्व शक्तियों की लाइट आत्माओं को हर कदम में रास्ता दिखाने का कार्य करती रहेगी।

स्लोगन:-

स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बनो तो राजधानी में नम्बर आगे मिल जायेगा।

07-07-2020

07-07-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - पुरूषार्थ कर दैवी गुण अच्छी रीति धारण करने हैं, किसी को भी दु:ख नहीं देना है, तुम्हारी कोई भी आसुरी एक्टिविटी नहीं चाहिए''

प्रश्नः-

कौन से आसुरी गुण तुम्हारे श्रृंगार को बिगाड़ देते हैं?

उत्तर:-

आपस में लड़ना-झगड़ना, रूठना, सेन्टर पर धमपा मचाना, दु:ख देना - यह आसुरी गुण हैं, जो तुम्हारे श्रृंगार को बिगाड़ देते हैं। जो बच्चे बाप का बन करके भी इन आसुरी गुणों का त्याग नहीं करते हैं, उल्टे कर्म करते हैं, उन्हें बहुत घाटा पड़ जाता है। हिसाब ही हिसाब है। बाप के साथ धर्मराज भी है।

गीत:-

भोलेनाथ से निराला.........

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे यह तो जान चुके हैं कि ऊंच ते ऊंच भगवान है। मनुष्य गाते हैं और तुम देखते हो दिव्य दृष्टि से। तुम बुद्धि से भी जानते हो कि हमको वह पढ़ा रहे हैं। आत्मा ही पढ़ती है शरीर से। सब कुछ आत्मा ही करती है शरीर से। शरीर विनाशी है, जिसको आत्मा धारण कर पार्ट बजाती है। आत्मा में ही सारे पार्ट की नूँध है। 84 जन्मों की भी आत्मा में ही नूँध है। पहले-पहले तो अपने को आत्मा समझना है। बाप है सर्वशक्तिमान्। उनसे तुम बच्चों को शक्ति मिलती है। योग से शक्ति जास्ती मिलती है, जिससे तुम पावन बनते हो। बाप तुमको शक्ति देते हैं विश्व पर राज्य करने की। इतनी महान शक्ति देते हैं, वह साइंस घमन्डी आदि इतना सब बनाते हैं विनाश के लिए। उनकी बुद्धि है विनाश के लिए, तुम्हारी बुद्धि है अविनाशी पद पाने के लिए। तुमको बहुत शक्ति मिलती है जिससे तुम विश्व पर राज्य पाते हो। वहाँ प्रजा का प्रजा पर राज्य नहीं होता है। वहाँ है ही राजा-रानी का राज्य। ऊंच ते ऊंच है भगवान। याद भी उनको करते हैं। लक्ष्मी-नारायण का सिर्फ मन्दिर बनाकर पूजते हैं। फिर भी ऊंच ते ऊंच भगवान गाया जाता है। अभी तुम समझते हो यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक थे। ऊंच ते ऊंच विश्व की बादशाही मिलती है बेहद के बाप से। तुमको कितना ऊंच पद मिलता है। तो बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। जिससे कुछ मिलता है उनको याद किया जाता है ना। कन्या का पति से कितना लॅव रहता है, कितना पति के पिछाड़ी प्राण देती है। पति मरता है तो या-हुसैन मचा देती है। यह तो पतियों का पति है, तुमको कितना श्रृंगार रहे हैं - यह ऊंच ते ऊंच पद प्राप्त कराने के लिए। तो तुम बच्चों में कितना नशा होना चाहिए। दैवीगुण भी तुमको यहाँ धारण करने हैं। बहुतों में अभी तक आसुरी अवगुण हैं, लड़ना-झगड़ना, रूठना, सेन्टर पर धमपा मचाना..... बाबा जानते हैं बहुत रिपोर्टस आती हैं। काम महाशत्रु है तो क्रोध भी कोई कम शत्रु नहीं है। फलाने के ऊपर प्यार, मेरे ऊपर क्यों नहीं! फलानी बात इनसे पूछी, मेरे से क्यों नहीं पूछा! ऐसे-ऐसे बोलने वाले संशय बुद्धि बहुत हैं। राजधानी स्थापन होती है ना। ऐसे-ऐसे क्या पद पायेंगे। मर्तबे में तो फ़र्क बहुत रहता है। मेहतर भी देखो अच्छे-अच्छे महलों में रहते, कोई कहाँ रहते। हर एक को अपना पुरूषार्थ कर दैवीगुण अच्छे धारण करने हैं। देह-अभिमान में आने से आसुरी एक्टिविटी होती है। जब देही-अभिमानी बन अच्छी रीति धारणा करते रहो तब ऊंच पद पाओ। पुरूषार्थ ऐसा करना है, दैवीगुण धारण करने का, किसको दु:ख नहीं देना है। तुम बच्चे दु:ख हर्ता, सुख कर्ता बाप के बच्चे हो। कोई को भी दु:ख नहीं देना चाहिए। जो सेन्टर सम्भालते हैं उन पर बहुत रेसपान्सिबिलिटी है। जैसे बाप कहते हैं - बच्चे, अगर कोई भूल करता है तो सौगुणा दण्ड पड़ जाता है। देह-अभिमान होने से बड़ा घाटा होता है क्योंकि तुम ब्राह्मण सुधारने के लिए निमित्त बने हुए हो। अगर खुद ही नहीं सुधरे तो औरों को क्या सुधारेंगे। बहुत नुकसान हो पड़ता है। पाण्डव गवर्मेन्ट है ना। ऊंच ते ऊंच बाप है उनके साथ धर्मराज भी है। धर्मराज द्वारा बहुत बड़ी सज़ा खाते हैं। ऐसे कुछ कर्म करते हैं तो बहुत घाटा पड़ जाता है। हिसाब ही हिसाब है, बाबा के पास पूरा हिसाब रहता है। भक्ति मार्ग में भी हिसाब ही हिसाब है। कहते भी हैं भगवान तुम्हारा हिसाब लेगा। यहाँ बाप खुद कहते हैं धर्मराज बहुत हिसाब लेंगे। फिर उस समय क्या कर सकेंगे! साक्षात्कार होगा - हमने यह-यह किया। वहाँ तो थोड़ी मार पड़ती है, यहाँ तो बहुत मार खानी पड़ेगी। तुम बच्चों को सतयुग में गर्भ जेल में नहीं आना है। वहाँ तो गर्भ महल है। कोई पाप आदि करते नहीं। तो ऐसा राज्य-भाग्य पाने के लिए बच्चों को बहुत खबरदार होना है। कई बच्चे ब्राह्मणी (टीचर) से भी तीखे हो जाते हैं। तकदीर ब्राह्मणी से भी ऊंची हो जाती है। यह भी बाप ने समझाया है - अच्छी सर्विस नहीं करेंगे तो जन्म-जन्मान्तर दास-दासियाँ बनेंगे।

बाप सम्मुख आते ही बच्चों से पूछते हैं - बच्चे, देही-अभिमानी होकर बैठे हो? बाप के बच्चों प्रति महावाक्य हैं - बच्चे, आत्म-अभिमानी बनने का बहुत पुरूषार्थ करना है। घूमते फिरते भी विचार सागर मंथन करते रहना है। बहुत बच्चे हैं जो समझते हैं हम जल्दी-जल्दी इस नर्क की छी-छी दुनिया से जायें सुखधाम। बाप कहते हैं अच्छे-अच्छे महारथी योग में बहुत फेल हैं। उन्हों को भी पुरूषार्थ कराया जाता है। योग नहीं होगा तो एकदम गिर पड़ेंगे। नॉलेज तो बहुत सहज है। हिस्ट्री-जॉग्राफी सारी बुद्धि में आ जाती है। बहुत अच्छी-अच्छी बच्चियां हैं जो प्रदर्शनी समझाने में बड़ी तीखी हैं। परन्तु योग है नहीं, दैवीगुण भी नहीं हैं। कभी-कभी ख्याल होता है, अजुन क्या-क्या अवस्थायें हैं बच्चों की। दुनिया में कितना दु:ख है। जल्दी-जल्दी यह खत्म हो जाए। इन्तज़ार में बैठे हैं, जल्दी चलें सुखधाम। तड़फते रहते हैं। जैसे बाप से मिलने लिए तड़फते हैं, क्योंकि बाबा हमको स्वर्ग का रास्ता बताते हैं। ऐसे बाप को देखने लिए तड़फते हैं। समझते हैं ऐसे बाप के सम्मुख जाकर रोज़ मुरली सुनें। अभी तो समझते हो यहाँ कोई झंझट की बात नहीं रहती है। बाहर में रहने से तो सबसे तोड़ निभाना पड़ता है। नहीं तो खिटपिट हो जाए इसलिए सबको धीरज देते हैं। इसमें बड़ी गुप्त मेहनत है। याद की मेहनत कोई से पहुँचती नहीं। गुप्त याद में रहें तो बाप के डायरेक्शन पर भी चलें। देह-अभिमान के कारण बाप के डायरेक्शन पर चलते ही नहीं। कहता हूँ चार्ट बनाओ तो बहुत उन्नति होगी। यह किसने कहा? शिवबाबा ने। टीचर काम देते हैं तो करके आते हैं ना। यहाँ अच्छे-अच्छे बच्चों को भी माया करने नहीं देती। अच्छे-अच्छे बच्चों का चार्ट बाबा के पास आये तो बाबा बतायें देखो कैसे याद में रहते हो। समझते हैं हम आत्मायें आशिक, एक माशूक की हैं। वह जिस्मानी आशिक-माशूक तो अनेक प्रकार के होते हैं। तुम बहुत पुराने आशिक हो। अभी तुमको देही-अभिमानी बनना है। कुछ न कुछ सहन करना ही पड़ेगा। मिया मिट्ठू नहीं बनना है। बाबा ऐसे थोड़ेही कहते हड्डी दे दो। बाबा तो कहते हैं तन्दुरूस्ती अच्छी रखो तो सर्विस भी अच्छी रीति कर सकेंगे। बीमार होंगे तो पड़े रहेंगे। कोई-कोई हॉस्पिटल में भी समझाने की सर्विस करते हैं तो डॉक्टर लोग कहते हैं यह तो फ़रिश्ते हैं। चित्र साथ में ले जाते हैं। जो ऐसी-ऐसी सर्विस करते हैं उनको रहमदिल कहेंगे। सर्विस करते हैं तो कोई-कोई निकल पड़ते हैं। जितना-जितना याद बल में रहेंगे उतना मनुष्यों को तुम खीचेंगे, इसमें ही ताकत है। प्योरिटी फर्स्ट। कहा भी जाता है पहले प्योरिटी, पीस, पीछे प्रासपर्टी। याद के बल से ही तुम पवित्र होते हो। फिर है ज्ञान बल। याद में कमजोर मत बनो। याद में ही विघ्न पड़ेंगे। याद में रहने से तुम पवित्र भी बनेंगे और दैवीगुण भी आयेंगे। बाप की महिमा तो जानते हो ना। बाप कितना सुख देते हैं। 21 जन्मों के लिए तुमको सुख के लायक बनाते हैं। कभी भी किसको दु:ख नहीं देना चाहिए।

कई बच्चे डिससर्विस कर अपने आपको जैसे श्रापित करते हैं, दूसरों को बहुत तंग करते हैं। कपूत बच्चा बनते हैं तो अपने आपको आपेही श्रापित कर देते हैं। डिससर्विस करने से एकदम पट पड़ जाते हैं। बहुत बच्चे हैं जो विकार में गिर पड़ते हैं या क्रोध में आकर पढ़ाई छोड़ देते हैं। अनेक प्रकार के बच्चे यहाँ बैठे हैं। यहाँ से रिफ्रेश होकर जाते हैं तो भूल का पश्चाताप् करते हैं। फिर भी पश्चाताप् से कोई माफ नहीं हो सकता है। बाप कहते हैं क्षमा अपने पर आपेही करो। याद में रहो। बाप किसको क्षमा नहीं करते हैं। यह तो पढ़ाई है। बाप पढ़ाते हैं, बच्चों को अपने पर कृपा कर पढ़ना है। मैनर्स अच्छे रखने हैं। बाबा ब्राह्मणी को कहते हैं, रजिस्टर ले आओ। एक-एक का समाचार सुनकर समझानी दी जाती है। तो समझते हैं ब्राह्मणी ने रिपोर्ट दी है और ही जास्ती डिससर्विस करने लग पड़ते हैं। बड़ी मेहनत लगती है। माया बड़ी दुश्मन है। बन्दर से मन्दिर बनने नहीं देती है। ऊंच पद पाने के बदले और ही बिल्कुल नीचे गिर पड़ते हैं। फिर कभी उठ न सकें, मर पड़ते हैं। बाप बच्चों को बार-बार समझाते हैं यह बड़ी ऊंच मंजिल है, विश्व का मालिक बनना है। बड़े आदमी के बच्चे बड़ी रायॅल्टी से चलते हैं। कहाँ बाप की इज्जत न जाये। कहेंगे तुम्हारा बाप कितना अच्छा है, तुम कितने कपूत हो। तुम अपने बाप की इज्जत गँवा रहे हो! यहाँ तो हर एक अपनी इज्जत गँवाते हैं। बहुत सज़ायें खानी पड़ती हैं। बाबा वारनिंग देते हैं, बड़े खबरदार हो चलो। जेल बर्डस न बनो। जेल बर्डस भी यहाँ होते हैं, सतयुग में तो कोई भी जेल नहीं होता। फिर भी पढ़कर ऊंच पद पाना चाहिए। ग़फलत नहीं करो। किसको भी दु:ख मत दो। याद की यात्रा पर रहो। याद ही काम में आयेगी। प्रदर्शनी में भी मुख्य बात यही बताओ। बाप की याद से ही पावन बनेंगे। पावन बनने तो सब चाहते हैं। यह है ही पतित दुनिया। सर्व की सद्गति करने तो एक ही बाप आते हैं। क्राइस्ट, बुद्ध आदि कोई की सद्गति नहीं कर सकते। फिर ब्रह्मा का भी नाम लेते हैं। ब्रह्मा को भी सद्गति दाता नहीं कह सकते। जो देवी-देवता धर्म का निमित्त है। भल देवी-देवता धर्म की स्थापना तो शिवबाबा करते हैं फिर भी नाम तो है ना - ब्रह्मा-विष्णु-शंकर....। त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते। बाप कहते हैं यह भी गुरू नहीं। गुरू तो एक ही है, उनके द्वारा तुम रूहानी गुरू बनते हो। बाकी वह है धर्म स्थापक। धर्म स्थापक को सद्गति दाता कैसे कह सकते, यह बड़ी डीप बातें हैं समझने की। अन्य धर्म स्थापक तो सिर्फ धर्म स्थापन करते हैं, जिसके पिछाड़ी सब आ जाते हैं, वह कोई सबको वापिस नहीं ले जा सकते। उनको तो पुनर्जन्म में आना ही है, सबके लिए यह समझानी है। एक भी गुरू सद्गति के लिए नहीं है। बाप समझाते हैं गुरू पतित-पावन एक ही है, वही सर्व के सद्गति दाता, लिबरेटर हैं, बताना चाहिए हमारा गुरू एक ही है, जो सद्गति देते हैं, शान्तिधाम, सुखधाम ले जाते हैं। सतयुग आदि में बहुत थोड़े होते हैं। वहाँ किसका राज्य था, चित्र तो दिखायेंगे ना। भारतवासी ही मानेंगे, देवताओं के पुजारी झट मानेंगे कि बरोबर यह तो स्वर्ग के मालिक हैं। स्वर्ग में इनका राज्य था। बाकी सब आत्मायें कहाँ थी? जरूर कहेंगे निराकारी दुनिया में थे। यह भी तुम अभी समझते हो। पहले कुछ भी पता नहीं था। अभी तुम्हारी बुद्धि में चक्र फिरता रहता है। बरोबर 5 हज़ार वर्ष पहले भारत में इनका राज्य था, जब ज्ञान की प्रालब्ध पूरी होती है तो फिर भक्ति मार्ग शुरू होता है फिर चाहिए पुरानी दुनिया से वैराग्य। बस अभी हम नई दुनिया में जायेंगे। पुरानी दुनिया से दिल उठ जाता है। वहाँ पति बच्चे आदि सब ऐसे मिलेंगे। बेहद का बाप तो हमको विश्व का मालिक बनाते हैं।

जो विश्व का मालिक बनने वाले बच्चे हैं, उनके ख्यालात बहुत ऊंचे और चलन बड़ी रॉयल होगी। भोजन भी बहुत कम, जास्ती हबच नहीं होनी चाहिए। याद में रहने वाले का भोजन भी बहुत सूक्ष्म होगा। बहुतों की खाने में भी बुद्धि चली जाती है। तुम बच्चों को तो खुशी है विश्व का मालिक बनने की। कहा जाता है खुशी जैसी खुराक नहीं। ऐसी खुशी में सदैव रहो तो खान-पान भी बहुत थोड़ा हो जाए। बहुत खाने से भारी हो जाते हैं फिर झुटका आदि खाते हैं। फिर कहते बाबा नींद आती है। भोजन सदैव एकरस होना चाहिए, ऐसे नहीं कि अच्छा भोजन है तो बहुत खाना चाहिए! अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हम दु:ख हर्ता सुख कर्ता बाप के बच्चे हैं, हमें किसी को दु:ख नहीं देना है। डिससर्विस कर अपने आपको श्रापित नहीं करना है।

2) अपने ख्यालात बड़े ऊंचे और रॉयल रखने हैं। रहमदिल बन सर्विस पर तत्पर रहना है। खाने-पीने की हबच (लालच) को छोड़ देना है।

वरदान:-

ड्रामा की नॉलेज से अचल स्थिति बनाने वाले प्रकृति वा मायाजीत भव

प्रकृति वा माया द्वारा कैसा भी पेपर आये लेकिन जरा भी हलचल न हो। यह क्या, यह क्यों, यह क्वेश्चन भी उठा, जरा भी कोई समस्या वार करने वाली बन गई तो फेल हो जायेंगे इसलिए कुछ भी हो लेकिन अन्दर से यह आवाज निकले कि वाह मीठा ड्रामा वाह! हाय क्या हुआ - यह संकल्प भी न आये। ऐसी स्थिति हो जो कोई संकल्प में भी हलचल न हो। सदा अचल, अडोल स्थिति रहे तब प्रकृतिजीत व मायाजीत का वरदान प्राप्त होगा।

स्लोगन:-

खुशखबरी सुनाकर खुशी दिलाना यही सबसे श्रेष्ठ कर्तव्य है।

08-07-2020

08-07-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - तुम्हारी पढ़ाई का फाउन्डेशन है प्योरिटी, प्योरिटी है तब योग का जौहर भर सकेगा, योग का जौहर है तो वाणी में शक्ति होगी''

प्रश्नः-

तुम बच्चों को अभी कौन-सा प्रयत्न पूरा-पूरा करना है?

उत्तर:-

सिर पर जो विकर्मों का बोझा है उसे उतारने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना है। बाप का बनकर कोई विकर्म किया तो बहुत ज़ोर से गिर पड़ेंगे। बी.के. की अगर निंदा कराई, कोई तकलीफ दी तो बहुत पाप हो जायेगा। फिर ज्ञान सुनने-सुनाने से कोई फायदा नहीं।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बच्चों को समझा रहे हैं कि तुम पतित से पावन बन पावन दुनिया का मालिक कैसे बन सकते हो! पावन दुनिया को स्वर्ग अथवा विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहा जाता है। विष्णु अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का कम्बाइन्ड चित्र ऐसा बनाया है, इसलिए समझाया जाता है। बाकी विष्णु की जब पूजा करते हैं तो समझ नहीं सकते कि यह कौन हैं? महालक्ष्मी की पूजा करते हैं परन्तु समझते नहीं कि यह कौन है? बाबा अभी तुम बच्चों को भिन्न-भिन्न रीति से समझाते हैं। अच्छी रीति धारण करो। कोई-कोई की बुद्धि में रहता है कि परमात्मा तो सब कुछ जानते हैं। हम जो कुछ अच्छा वा बुरा करते हैं वह सब जानते हैं। अब इसको अन्धश्रद्धा का भाव कहा जाता है। भगवान इन बातों को जानते ही नहीं। तुम बच्चे जानते हो भगवान तो है पतितों को पावन बनाने वाला। पावन बनाकर स्वर्ग का मालिक बनाते हैं फिर जो अच्छी रीति पढ़ेंगे वह ऊंच पद पायेंगे। बाकी ऐसे नहीं समझना है कि बाप सबके दिलों को जानते हैं। यह फिर बेसमझी कही जायेगी। मनुष्य जो कर्म करते हैं उनका फिर अच्छा या बुरा ड्रामा अनुसार उनको मिलता ही है। इसमें बाप का कोई कनेक्शन ही नहीं। यह ख्याल कभी नहीं करना है कि बाबा तो सब कुछ जानते ही हैं। बहुत हैं जो विकार में जाते, पाप करते रहते हैं और फिर यहाँ अथवा सेन्टर्स पर आ जाते हैं। समझते हैं बाबा तो जानते हैं। परन्तु बाबा कहते हम यह धंधा ही नहीं करते। जानी जाननहार अक्षर भी रांग है। तुम बाप को बुलाते हो कि आकर पतित से पावन बनाओ, स्वर्ग का मालिक बनाओ क्योंकि जन्म-जन्मान्तर के पाप सिर पर बहुत हैं। इस जन्म के भी हैं। इस जन्म के पाप बतलाते भी हैं। बहुतों ने ऐसे पाप किये हैं जो पावन बनना बड़ा मुश्किल लगता है। मुख्य बात है ही पावन बनने की। पढ़ाई तो बहुत सहज है, परन्तु विकर्मों का बोझा कैसे उतरे उसका प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे बहुत हैं अथाह पाप करते हैं, बहुत डिससर्विस करते हैं। बी.के. आश्रम को तकलीफ देने की कोशिश करते हैं। इसका बहुत पाप चढ़ता है। वह पाप आदि कोई ज्ञान देने से नहीं मिट सकेंगे। पाप मिटेंगे फिर भी योग से। पहले तो योग का पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए, तब किसको तीर भी लग सकेगा। पहले पवित्र बनें, योग हो तब वाणी में भी जौहर भरेगा। नहीं तो भल किसको कितना भी समझायेंगे, किसको बुद्धि में जँचेगा नहीं, तीर लगेगा नहीं। जन्म-जन्मान्तर के पाप हैं ना। अभी जो पाप करते हैं, वह तो जन्म-जन्मान्तर से भी बहुत हो जाते हैं इसलिए गाया जाता है सतगुरू के निंदक... यह सत बाबा, सत टीचर, सतगुरू है। बाप कहते हैं बी.के. की निंदा कराने वाले का भी पाप बहुत भारी है। पहले खुद तो पावन बनें। किसको समझाने का बहुत शौक रखते हैं। योग पाई का भी नहीं, इससे फायदा क्या? बाप कहते हैं मुख्य बात है ही याद से पावन बनने की। पुकारते भी पावन बनने के लिए हैं। भक्ति मार्ग में एक आदत पड़ गई है, धक्के खाने की, फालतू आवाज़ करने की। प्रार्थना करते हैं परन्तु भगवान को कान कहाँ हैं, बिगर कान, बिगर मुख, सुनेंगे, बोलेंगे कैसे? वह तो अव्यक्त है। यह सब है अन्धश्रद्धा।

तुम बाप को जितना याद करेंगे उतना पाप नाश होंगे। ऐसे नहीं कि बाप जानते हैं - यह बहुत याद करता है, यह कम याद करता है, यह तो अपना चार्ट खुद को ही देखना है। बाप ने कहा है याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाबा भी तुमसे ही पूछते हैं कि कितना याद करते हो? चलन से भी मालूम पड़ता है। सिवाए याद के पाप कट नहीं सकते। ऐसे नहीं, किसको ज्ञान सुनाते हो तो तुम्हारे वा उनके पाप कट जायेंगे। नहीं, जब खुद याद करें तब पाप कटें। मूल बात है पावन बनने की। बाप कहते हैं मेरे बने हो तो कोई पाप नहीं करो। नहीं तो बहुत ज़ोर से गिर पड़ेंगे। उम्मीद भी नहीं रखनी है कि हम अच्छा पद पा सकेंगे। प्रदर्शनी में बहुतों को समझाते हैं तो बस खुश हो जाते हैं, हमने बहुत सर्विस की। परन्तु बाप कहते हैं पहले तुम तो पावन बनो। बाप को याद करो। याद में बहुत फेल होते हैं। ज्ञान तो बहुत सहज है, सिर्फ 84 के चक्र को जानना है, उस पढ़ाई में कितने हिसाब-किताब पढ़ते हैं, मेहनत करते हैं। कमायेंगे क्या? पढ़ते-पढ़ते मर जाएं तो पढ़ाई खत्म। तुम बच्चे तो जितना याद में रहेंगे उतना धारणा होगी। पवित्र नहीं बनेंगे, पाप नहीं मिटायेंगे तो बहुत सज़ा खानी पड़ेगी। ऐसे नहीं, हमारी याद तो बाबा को पहुँचती ही है। बाबा क्या करेंगे! तुम याद करेंगे तो तुम पावन बनेंगे, बाबा उसमें क्या करेंगे, क्या शाबास देंगे। बहुत बच्चे हैं जो कहते हैं हम तो सदैव बाप को याद करते ही रहते हैं, उनके बिगर हमारा है ही कौन? यह भी गपोड़ा मारते रहते हैं। याद में तो बड़ी मेहनत है। हम याद करते हैं वा नहीं, यह भी समझ नहीं सकते। अनजाने से कह देते हम तो याद करते ही हैं। मेहनत बिगर कोई विश्व का मालिक थोड़ेही बन सकते। ऊंच पद पा न सकें। याद का जौहर जब भरे तब सर्विस कर सकें। फिर देखा जाए कितनी सर्विस कर प्रजा बनाई। हिसाब चाहिए ना। हम कितने को आपसमान बनाते हैं। प्रजा बनानी पड़े ना, तब राजाई पद पा सकते। वह तो अभी कुछ है नहीं। योग में रहें, जौहर भरे तब किसको पूरा तीर लगे। शास्त्रों में भी है ना - पिछाड़ी में भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य आदि को ज्ञान दिया। जब तुम्हारा पतितपना निकल सतोप्रधान तक आत्मा आ जाती है तब जौहर भरता है तो झट तीर लग जाता है। यह कभी ख्याल नहीं करो कि बाबा तो सब कुछ जानते हैं। बाबा को जानने की क्या दरकार है, जो करेंगे सो पायेंगे। बाबा साक्षी हो देखते रहते हैं। बाबा को लिखते हैं हमने फलानी जगह जाकर सर्विस की, बाबा पूछेंगे पहले तुम याद की यात्रा पर तत्पर हो? पहली बात ही यह है - और संग तोड़ एक बाप संग जोड़ो। देही-अभिमानी बनना पड़े। घर में रहते भी समझना है यह तो पुरानी दुनिया, पुरानी देह है। यह सब खलास होना है। हमारा काम है बाप और वर्से से। बाबा ऐसे नहीं कहते कि गृहस्थ व्यवहार में नहीं रहो, कोई से बात न करो। बाबा से पूछते हैं शादी पर जायें? बाबा कहेंगे भल जाओ। वहाँ भी जाकर सर्विस करो। बुद्धि का योग शिवबाबा से हो। जन्म-जन्मान्तर के विकर्म याद बल से ही भस्म होंगे। यहाँ भी अगर विकर्म करते हैं तो बहुत सज़ायें भोगनी पड़ें। पावन बनते-बनते विकार में गिरा तो मरा। एकदम पुर्जा-पुर्जा हो जाते। श्रीमत पर न चल बहुत नुकसान करते हैं। कदम-कदम पर श्रीमत चाहिए। ऐसे-ऐसे पाप करते हैं जो योग लग न सके। याद कर न सकें। कोई को जाकर कहेंगे - भगवान आया है, उनसे वर्सा लो, तो वह मानेंगे नहीं। तीर लगेगा नहीं। बाबा ने कहा है भक्तों को ज्ञान सुनाओ, व्यर्थ किसको न दो, नहीं तो और ही निंदा करायेंगे।

कई बच्चे बाबा से पूछते हैं - बाबा हमको दान करने की आदत है, अब तो ज्ञान में आ गये हैं, अब क्या करें? बाबा राय देते हैं - बच्चे, गरीबों को दान देने वाले तो बहुत हैं। गरीब कोई भूख नहीं मरते हैं, फ़कीरों के पास बहुत पैसे पड़े रहते हैं इसलिए इन सब बातों से तुम्हारी बुद्धि हट जानी चाहिए। दान आदि में भी बहुत खबरदारी चाहिए। बहुत ऐसे-ऐसे काम करते हैं, बात मत पूछो और फिर खुद समझते नहीं कि हमारे सिर पर बोझा बहुत भारी होता जाता है। ज्ञान मार्ग कोई हंसीकुडी का मार्ग नहीं है। बाप के साथ तो फिर धर्मराज भी है। धर्मराज के बड़े-बड़े डन्डे खाने पड़ते हैं। कहते हैं ना जब पिछाड़ी में धर्मराज लेखा लेंगे तब पता पड़ेगा। जन्म-जन्मान्तर की सज़ायें खाने में कोई टाइम नहीं लगता है। बाबा ने काशी कलवट का भी मिसाल समझाया है। वह है भक्ति मार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्यों की भी बलि चढ़ाते हैं, यह भी ड्रामा में नूँध है। इन सब बातों को समझना है, ऐसे नहीं कि यह ड्रामा बनाया ही क्यों? चक्र में लाया ही क्यों? चक्र में तो आते ही रहेंगे। यह तो अनादि ड्रामा है ना। चक्र में न आओ तो फिर दुनिया ही न रहे। मोक्ष तो होता नहीं। मुख्य का भी मोक्ष नहीं हो सकता। 5 हज़ार वर्ष के बाद फिर ऐसे ही चक्र लगायेंगे। यह तो ड्रामा है ना। सिर्फ कोई को समझाने, वाणी चलाने से पद नहीं मिल जायेगा, पहले तो पतित से पावन बनना है। ऐसे नहीं बाबा तो सब जानते हैं। बाबा जान करके भी क्या करेंगे, पहले तो तुम्हारी आत्मा जानती है श्रीमत पर हम क्या करते हैं, कहाँ तक बाबा को याद करते हैं? बाकी बाबा यह बैठकर जाने, इससे फायदा ही क्या? तुम जो कुछ करते हो सो तुम पायेंगे। बाबा तुम्हारी एक्ट और सर्विस से जानते हैं - यह बच्चा अच्छी सर्विस करते हैं। फलाने ने बाबा का बनकर बहुत विकर्म किये हैं तो उसकी मुरली में जौहर भर न सके। यह ज्ञान तलवार है। उसमें याद बल का जौहर चाहिए। योगबल से तुम विश्व पर विजय प्राप्त करते हो, बाकी ज्ञान से नई दुनिया में ऊंच पद पायेंगे। पहले तो पवित्र बनना है, पवित्र बनने बिगर ऊंच पद मिल न सके। यहाँ आते हैं नर से नारायण बनने के लिए। पतित थोड़ेही नर से नारायण बनेंगे। पावन बनने की पूरी युक्ति चाहिए। अनन्य बच्चे जो सेन्टर्स सम्भालते हैं उनको भी बड़ी मेहनत करनी पड़े, इतनी मेहनत नहीं करते हैं इसलिए वह जौहर नहीं भरता, तीर नहीं लगता, याद की यात्रा कहाँ! सिर्फ प्रदर्शनी में बहुतों को समझाते हैं, पहले याद से पवित्र बनना है फिर है ज्ञान। पावन होंगे तो ज्ञान की धारणा होगी। पतित को धारणा होगी नहीं। मुख्य सब्जेक्ट है याद की। उस पढ़ाई में भी सब्जेक्ट होती हैं ना। तुम्हारे पास भी भल बी.के. बनते हैं परन्तु ब्रह्माकुमार-कुमारी, भाई-बहन बनना मासी का घर नहीं है। सिर्फ कहने मात्र नहीं बनना है। देवता बनने के लिए पहले पवित्र जरूर बनना है। फिर है पढ़ाई। सिर्फ पढ़ाई होगी पवित्र नहीं होंगे तो ऊंच पद नहीं पा सकेंगे। आत्मा पवित्र चाहिए। पवित्र हो तब पवित्र दुनिया में ऊंच पद पा सके। पवित्रता पर ही बाबा ज़ोर देते हैं। बिगर पवित्रता किसको ज्ञान दे न सके। बाकी बाबा देखते कुछ भी नहीं है। खुद बैठे हैं ना, सब बातें समझाते हैं। भक्ति मार्ग में भावना का भाड़ा मिल जाता है। वह भी ड्रामा में नूँध है, शरीर बिगर बाप बात कैसे करेंगे? सुनेंगे कैसे? आत्मा को शरीर है तब सुनती बोलती है। बाबा कहते हैं मुझे आरगन्स ही नहीं तो सुनूँ, जानूँ कैसे? समझते हैं बाबा तो जानते हैं हम विकार में जाते हैं। अगर नहीं जानते हैं तो भगवान ही नहीं मानेंगे। ऐसे भी बहुत होते हैं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुमको पावन बनाने का रास्ता बताने। साक्षी हो देखता हूँ। बच्चों की चलन से मालूम पड़ जाता है - यह कपूत है वा सपूत है? सर्विस का भी सबूत चाहिए ना। यह भी जानते हैं जो करता है सो पाता है। श्रीमत पर चलेगा तो श्रेष्ठ बनेगा। नहीं चलेगा तो खुद ही गंदा बनकर गिरेगा। कोई भी बात है तो क्लीयर पूछो। अन्धश्रद्धा की बात नहीं। बाबा सिर्फ कहते हैं याद का जौहर नहीं होगा तो पावन कैसे बनेंगे? इस जन्म में भी पाप ऐसे-ऐसे करते हैं बात मत पूछो। यह है ही पाप आत्माओं की दुनिया, सतयुग है पुण्य आत्माओं की दुनिया। यह है संगम। कोई तो डलहेड हैं तो धारणा कर नहीं सकते। बाबा को याद नहीं कर सकते। फिर टू लेट हो जायेंगे, भंभोर को आग लग जायेगी फिर योग में भी रह नहीं सकेंगे। उस समय तो हाहाकार मच जाती है। बहुत दु:ख के पहाड़ गिरने वाले हैं। यही फुरना रहना चाहिए कि हम अपना राज्य-भाग्य तो बाप से ले लेवें। देह-अभिमान छोड़ सर्विस में लग जाना चाहिए। कल्याणकारी बनना है। धन व्यर्थ नहीं गँवाना है। जो लायक ही नहीं ऐसे पतित को कभी दान नहीं देना चाहिए, नहीं तो दान देने वाले पर भी आ जाता है। ऐसे नहीं कि ढिंढोरा पीटना है कि भगवान आया है। ऐसे भगवान कहलाने वाले भारत में बहुत हैं। कोई मानेंगे नहीं। यह तुम जानते हो तुमको रोशनी मिली है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पढ़ाई के साथ-साथ पवित्र जरूर बनना है। ऐसा लायक वा सपूत बच्चा बन सर्विस का सबूत देना है। श्रीमत पर स्वयं को श्रेष्ठ बनाना है।

2) स्थूल धन भी व्यर्थ नहीं गँवाना है। पतितों को दान नहीं करना है। ज्ञान धन भी पात्र को देखकर देना है।

वरदान:-

सदा मोल्ड होने की विशेषता से सम्पर्क और सेवा में सफल होने वाले सफलतामूर्त भव

जिन बच्चों में स्वयं को मोल्ड करने की विशेषता है वह सहज ही गोल्डन एज की स्टेज तक पहुंच सकते हैं। जैसा समय, जैसे सरकमस्टांश हो उसी प्रमाण अपनी धारणाओं को प्रत्यक्ष करने के लिए मोल्ड होना पड़ता है। मोल्ड होने वाले ही रीयल गोल्ड हैं। जैसे साकार बाप की विशेषता देखी - जैसा समय, जैसा व्यक्ति वैसा रूप - ऐसे फालो फादर करो तो सेवा और सम्पर्क सबमें सहज ही सफलतामूर्त बन जायेंगे।

स्लोगन:-

जहाँ सर्वशक्तियां हैं वहाँ निर्वि5घ्न सफलता साथ है।

06-07-2020

06-07-2020 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - सदैव खुशी में रहो कि हमें कौन पढ़ाता है, तो यह भी मनमना-भव है, तुम्हें खुशी है कि कल हम पत्थर बुद्धि थे, आज पारस बुद्धि बने हैं''

प्रश्नः-

तकदीर खुलने का आधार क्या है?

उत्तर:-

निश्चय। अगर तकदीर खुलने में देरी होगी तो लंगड़ाते रहेंगे। निश्चय बुद्धि अच्छी रीति पढ़कर गैलप करते रहेंगे। कोई भी बात में संशय है तो पीछे रह जायेंगे। जो निश्चय बुद्धि बन अपनी बुद्धि को बाप तक दौड़ाते रहते हैं वह सतोप्रधान बन जाते हैं।

ओम् शान्ति। स्टूडेन्ट सब स्कूल में पढ़ते हैं तो उनको यह मालूम रहता है कि हमको पढ़कर क्या बनने का है। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों की बुद्धि में आना चाहिए कि हम सतयुग पारसपुरी के मालिक बनते हैं। इस देह के सम्बन्ध आदि सब छोड़ने हैं। अब हमको पारसपुरी का मालिक पारसनाथ बनना है, सारा दिन यह खुशी रहनी चाहिए। समझते हो - पारसपुरी किसको कहा जाता है? वहाँ मकान आदि सब सोने-चांदी के होते हैं। यहाँ तो पत्थरों ईटों के मकान हैं। अब फिर तुम पत्थर बुद्धि से पारस बुद्धि बनते हो। पत्थर बुद्धि को पारस बुद्धि जब पारसनाथ बनाने वाला बाप आये तब बनाये ना! तुम यहाँ बैठे हो, जानते हो हमारा स्कूल ऊंच ते ऊंच है। इससे बड़ा स्कूल कोई होता नहीं। इस स्कूल से तुम करोड़ पद्म भाग्यशाली विश्व के मालिक बनते हो, तो तुम बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए। इस पत्थरपुरी से पारसपुरी में जाने का यह पुरुषोत्तम संगमयुग है। कल पत्थर बुद्धि थे, आज पारस बुद्धि बन रहे हैं। यह बात सदैव बुद्धि में रहे तो भी मनमनाभव ही है। स्कूल में टीचर आते हैं पढ़ाने लिए। स्टूडेण्ट को दिल में रहता है अभी टीचर आया कि आया। तुम बच्चे भी समझते हो - हमारा टीचर तो स्वयं भगवान है। वह हमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं तो जरूर संगम पर आयेंगे। अभी तुम जानते हो मनुष्य पुकारते रहते हैं और वह यहाँ आ गये हैं। कल्प पहले भी ऐसा हुआ था तब तो लिखा हुआ है विनाशकाले विपरीत बुद्धि क्योंकि वह हैं पत्थर बुद्धि। तुम्हारी है विनाश काले प्रीत बुद्धि। तुम पारस बुद्धि बन रहे हो। तो ऐसी कोई युक्ति निकालनी चाहिए जो मनुष्य जल्दी समझें। यहाँ भी बहुतों को ले आते हैं, तो भी कहते हैं शिवबाबा ब्रह्मा तन में कैसे पढ़ाते होंगे! कैसे आते होंगे! कुछ भी समझते नहीं हैं। इतने सब सेन्टर्स पर आते हैं। निश्चय बुद्धि हैं ना। सब कहते हैं शिव भगवानुवाच, शिव ही सभी का बाप है। कृष्ण को थोड़ेही सबका बाप कहेंगे। इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं। परन्तु तकदीर देरी से खुलने की है तो फिर लंगड़ाते रहते हैं। कम पढ़ने वाले को कहा जाता है - यह लंगड़ाते हैं। संशय बुद्धि पीछे रह जायेंगे। निश्चय बुद्धि अच्छी रीति पढ़ने वाले आगे गैलप करते रहेंगे। कितना सिम्पुल समझाया जाता है। जैसे बच्चे दौड़ी लगाकर निशान तक जाकर फिर लौट आते हैं। बाप भी कहते हैं बुद्धि को जल्दी शिवबाबा पास दौड़ायेंगे तो सतोप्रधान बन जायेंगे। यहाँ समझते भी अच्छा हैं। तीर लगता है फिर भी बाहर जाने से खलास हो जाते। बाबा ज्ञान इन्जेक्शन लगाते हैं तो उसका नशा चढ़ना चाहिए ना। लेकिन चढ़ता ही नहीं है। यहाँ ज्ञान अमृत का प्याला पीते हैं तो असर होता है। बाहर जाने से ही भूल जाते हैं। बच्चे जानते हैं - ज्ञान सागर, पतित-पावन सद्गति दाता लिबरेटर एक ही बाप है। वही हर बात का वर्सा देते हैं। कहते हैं बच्चे तुम भी पूरे सागर बनो। जितना मेरे में ज्ञान है उतना तुम भी धारण करो।

शिवबाबा को देह का नशा नहीं है। बाप कहते हैं बच्चे हम तो सदैव शान्त रहते हैं। तुमको भी जब देह नहीं थी तो नशा नहीं था। शिवबाबा थोड़ेही कहते हैं यह हमारी चीज़ है। यह तन लोन लिया है, लोन ली हुई चीज़ अपनी थोड़ेही हुई। हमने इनमें प्रवेश किया है, थोड़े टाइम के लिए सर्विस करने अर्थ। अभी तुम बच्चों को वापस घर चलना है, दौड़ी लगानी है भगवान से मिलने के लिए। इतने यज्ञ-तप आदि करते रहते हैं, समझते थोड़ेही हैं वह मिलेगा कैसे। समझते हैं कोई न कोई रूप में भगवान आ जायेगा। बाप समझाते तो बहुत सहज हैं, प्रदर्शनी में भी तुम समझाओ। सतयुग-त्रेता की आयु भी लिखी हुई है। उसमें 2500 वर्ष तक बिल्कुल एक्यूरेट है। सूर्यवंशी के बाद होते हैं चन्द्रवंशी फिर दिखाओ रावण का राज्य शुरू हुआ और भारत पतित होने लगा। द्वापर-कलियुग में रावण राज्य हुआ, तिथि-तारीख लगी हुई है। बीच में रखो संगमयुग। रथी भी जरूर चाहिए ना। इस रथ में प्रवेश हो बाप राजयोग सिखलाते हैं, जिससे यह लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। किसको भी समझाना तो बहुत सहज है। लक्ष्मी-नारायण की डिनॉयस्टी कितना समय चलती है। और सब घराने हैं हद के, यह है बेहद का। इस बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानना चाहिए ना। अभी है संगमयुग। फिर दैवी राज्य स्थापन हो रहा है। इस पत्थरपुरी, पुरानी दुनिया का विनाश होना है। विनाश न हो तो नई दुनिया कैसे बनेंगी! अब कहते हैं न्यु देहली। अभी तुम बच्चे जानते हो न्यु देहली कब होगी। नई दुनिया में नई दिल्ली होती है। गाते भी हैं जमुना के कण्ठे पर महल होते हैं। जब इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य है तब कहेंगे न्यु दिल्ली, पारसपुरी। नया राज्य तो सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का ही होता है। मनुष्य तो यह भी भूल गये हैं कि ड्रामा कैसे शुरू होता है। कौन-कौन मुख्य एक्टर्स हैं, वह जानना चाहिए ना। एक्टर्स तो बहुत हैं इसलिए मुख्य एक्टर्स को तुम जानते हो। तुम भी मुख्य एक्टर्स बन रहे हो। सबसे मुख्य पार्ट तुम बजा रहे हो। तुम रूहानी सोशल वर्कर्स हो। बाकी सब सोशल वर्कर्स हैं जिस्मानी। तुम रूहों को समझाते हो, पढ़ती रूह है। मनुष्य समझते हैं जिस्म पढ़ता है। यह किसको भी पता नहीं है कि आत्मा इन आरगन्स द्वारा पढ़ती है। हम आत्मा बैरिस्टर आदि बनता हूँ। बाबा हमको पढ़ाते हैं। संस्कार भी आत्मा में रहते हैं। संस्कार ले जायेंगे फिर आकर नई दुनिया में राज्य करेंगे। जैसे सतयुग में राजधानी चली थी वैसे ही शुरू हो जायेगी। इसमें कुछ पूछने की दरकार नहीं रहती। मुख्य बात है - देह-अभिमान में कभी नहीं आओ। अपने को आत्मा समझो। कोई भी विकर्म नहीं करो। याद में रहो, नहीं तो एक विकर्म का बोझ सौ गुणा हो जायेगा। हडगुड एकदम टूट जाते हैं। उसमें भी मुख्य विकार है काम। कई कहते हैं - बच्चे तंग करते हैं फिर मारना पड़ता है। अब यह कोई पूछने का नहीं रहता है। यह तो छोटा पाई-पैसे का पाप कहेंगे। तुम्हारे सिर पर तो जन्म-जन्मान्तर के पाप हैं, पहले उनको तो भस्म करो। बाप पावन होने का बहुत सहज उपाय बतलाते हैं। तुम एक बाप की याद से पावन बन जायेंगे। भगवानुवाच - बच्चों प्रति, तुम आत्माओं से बात करता हूँ। और कोई मनुष्य ऐसे समझ न सकें। वह तो अपने को शरीर ही समझते हैं। बाप कहते हैं मैं आत्माओं को समझाता हूँ। गाया भी जाता है, आत्माओं और परमात्मा का मेला लगता है, इसमें कोई आवाज़ आदि नहीं करनी है। यह तो पढ़ाई है। दूर-दूर से आते हैं बाबा के पास। निश्चय बुद्धि जो होंगे उनको जोर से कशिश होगी आगे चलकर। अभी इतनी कशिश कोई को होती नहीं है क्योंकि याद नहीं करते हैं। मुसाफिरी से जब लौटते हैं, घर के नजदीक आते हैं तो मकान याद आयेगा, बच्चे याद आयेंगे, घर पहुँचते ही खुशी में आकर मिलेंगे। खुशी बढ़ती जायेगी। पहले-पहले स्त्री याद आयेगी फिर बाल-बच्चे आदि याद आयेंगे। तुमको याद आयेगा कि हम घर जाते हैं वहाँ बाप और बच्चे ही होते हैं। डबल खुशी होती है। शान्तिधाम घर जायेंगे फिर आयेंगे राजधानी में। बस याद ही करना है, बाप कहते हैं मनमनाभव। अपने को आत्मा समझ बाप और वर्से को याद करो। बाबा तुम बच्चों को गुल-गुल बनाकर, नयनों पर बिठाकर साथ ले जाते हैं। ज़रा भी तकलीफ नहीं। जैसे मच्छरों का झुण्ड जाता है ना। तुम आत्मायें भी ऐसे जायेंगी बाप के साथ। पावन बनने के लिए तुम बाप को याद करते हो, घर को नहीं।

बाबा की नज़र पहले-पहले गरीब बच्चों पर जाती है। बाबा गरीब निवाज़ है ना। तुम भी गांव में सर्विस करने जाते हो। बाप कहते हैं मैं भी तुम्हारे गांव को आकर पारसपुरी बनाता हूँ। अभी तो यह नर्क पुरानी दुनिया है। इनको जरूर तोड़ना पड़े। नई दुनिया में नई दिल्ली, वह सतयुग में ही होगी। वहाँ राज्य भी तुम्हारा होगा। तुमको नशा चढ़ता है हम फिर से अपनी राजधानी स्थापन करेंगे। जैसे कल्प पहले की थी। यह थोड़ेही कहेंगे हम ऐसे-ऐसे मकान बनायेंगे। नहीं, तुम जायेंगे वहाँ तो ऑटोमेटिक तुम वह बनाने लग पड़ेंगे क्योंकि वह आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। यहाँ पार्ट है सिर्फ पढ़ने का। वहाँ तुम्हारी बुद्धि में आपेही आयेगा कि ऐसे-ऐसे हम महल बनायें। जैसे कल्प पहले बनाया था, वह बनाने लग पड़ेंगे। आत्मा में भी पहले से ही नूँध है। तुम वही महल बनायेंगे जिन महलों में तुम कल्प-कल्प रहते हो। इन बातों को नया कोई समझ न सके। तुम समझते हो हम आते हैं, नई-नई प्वाइंट्स सुन रिफ्रेश होकर जाते हैं। नई-नई प्वाइंट्स निकलती हैं, वह भी ड्रामा में नूँध है।

बाबा कहते हैं बच्चे, मैं इस बैल पर (रथ पर) सदैव सवारी करूँ, इसमें मुझे सुख नहीं भासता है। मैं तो तुम बच्चों को पढ़ाने आता हूँ। ऐसे नहीं, बैल पर सवारी कर बैठे ही हैं। रात-दिन बैल पर सवारी होती है क्या? उनका तो सेकण्ड में आना-जाना होता है। सदैव बैठने का कायदा ही नहीं। बाबा कितना दूर से आते हैं पढ़ाने के लिए, घर तो उनका वह है ना। सारा दिन शरीर में थोड़ेही बैठेगा, उनको सुख ही नहीं आयेगा। जैसे पिंजड़े में तोता फँस जाता है। मैं तो यह लोन लेता हूँ तुमको समझाने के लिए। तुम कहेंगे ज्ञान का सागर बाबा आते हैं हमको पढ़ाने के लिए। खुशी में रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। वह खुशी फिर कम थोड़ेही होनी चाहिए। यह धनी तो स्थाई बैठे हैं। एक बैल पर दो की सवारी सदैव होगी क्या? शिवबाबा रहता है अपने धाम में। यहाँ आते हैं, आने में देरी थोड़ेही लगती है। रॉकेट देखो कितने तीखे होते हैं। आवाज़ से भी तीखे। आत्मा भी बहुत छोटा रॉकेट है। आत्मा भागती कैसे है, यहाँ से झट गई लण्डन। एक सेकण्ड में जीवनमुक्ति गाई है। बाबा खुद भी रॉकेट है। कहते हैं मैं तुमको पढ़ाने के लिए आता हूँ। फिर जाता हूँ अपने घर। इस समय बहुत बिजी रहता हूँ। दिव्य दृष्टि दाता हूँ, तो भक्तों को राज़ी करना होता है। तुमको पढ़ाता हूँ। भक्तों की दिल होती है साक्षात्कार हो या कुछ न कुछ भीख मांगते हैं। सबसे जास्ती भीख जगत अम्बा से मांगते हैं। तुम जगत अम्बा हो ना। तुम विश्व की बादशाही की भीख देती हो। गरीबों को भीख मिलती है ना। हम भी गरीब हैं तो शिवबाबा स्वर्ग की बादशाही भीख में देते हैं। भीख कुछ और नहीं, सिर्फ कहते हैं बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। शान्तिधाम में चले जायेंगे। मुझे याद करो तो मैं गैरन्टी करता हूँ तुम्हारी आयु भी बड़ी हो जायेगी। सतयुग में मृत्यु का नाम नहीं होता। वह है अमरलोक, वहाँ मृत्यु का नाम नहीं होता। सिर्फ एक खाल छोड़ दूसरी लेते हैं, इसको मृत्यु कहेंगे क्या! वह है अमरपुरी। साक्षात्कार होता है हमको बच्चा बनना है। खुशी की बात है। बाबा की दिल होती है अब जाकर बच्चा बनूँ। जानते हैं गोल्डन स्पून इन माउथ होगा। एक ही सिकीलधा बाप का बच्चा हूँ। बाप ने एडाप्ट किया है। मैं सिकीलधा बच्चा हूँ तो बाबा कितना प्यार करते हैं। एकदम प्रवेश कर लेते हैं। यह भी खेल है ना। खेल में हमेशा खुशी होती है। यह भी जानते हैं जरूर बहुत-बहुत भाग्यशाली रथ होगा। जिसके लिए गायन है ज्ञान सागर, इनमें प्रवेश कर तुमको ज्ञान देते हैं। तुम बच्चों के लिए एक ही खुशी बहुत है - भगवान आकर पढ़ाते हैं। भगवान स्वर्ग की राजाई स्थापन करते हैं। हम उनके बच्चे हैं तो फिर हम नर्क में क्यों हैं! यह किसकी भी बुद्धि में नहीं आता। तुम तो भाग्यशाली हो जो विश्व का मालिक बनने के लिए पढ़ते हो। ऐसी पढ़ाई पर कितना अटेन्शन देना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इसी डबल खुशी में रहना है कि अब मुसाफिरी पूरी हुई, पहले हम अपने घर शान्तिधाम में जायेंगे फिर अपनी राजधानी में आयेंगे।

2) सिर पर जो जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझ है उसे भस्म करना है, देह-अभिमान में आकर कोई भी विकर्म नहीं करना है।

वरदान:-

मन की स्वतंत्रता द्वारा सर्व आत्माओं को शान्ति का दान देने वाले मन्सा महादानी भव

बांधेलियां तन से भल परतंत्र हैं लेकिन मन से यदि स्वतंत्र हैं तो अपनी वृत्ति द्वारा, शुद्ध संकल्प द्वारा विश्व के वायुमण्डल को बदलने की सेवा कर सकती हैं। आजकल विश्व को आवश्यकता है मन के शान्ति की। तो मन से स्वतंत्र आत्मा मन्सा द्वारा शान्ति के वायब्रेशन फैला सकती है। शान्ति के सागर बाप की याद में रहने से आटोमेटिक शान्ति की किरणें फैलती हैं। ऐसे शान्ति का दान देने वाले ही मन्सा महादानी हैं।

स्लोगन:-

स्नेह रूप का अनुभव तो सुनाते हो अब शक्ति रूप का अनुभव सुनाओ।

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