Articles

09-05-2018

09-05-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - भारत को स्वर्ग बनाने के लिए विनाश काले प्रीत बुद्धि बन पवित्र रहने की प्रतिज्ञा करो, यही बाप की मदद है।"

प्रश्नः

योगबल की रूहानी ड्रिल सीखने का मुख्य आधार क्या है?

उत्तर:-

इस ड्रिल के लिए और सबसे बुद्धि का योग तोड़ना पड़ता है और सब संग तोड़ एक बाप संग जोड़ो। एक से सच्ची प्रीत हो तब ही यह रूहानी ड्रिल कर सकते हो। यही योगबल है जिससे 21 जन्मों के लिए विश्व की राजाई प्राप्त होती है।

गीत:-

भोलेनाथ से निराला...  

ओम् शान्ति।

बच्चों ने यह गीत सुना। किसकी महिमा की? भोलेनाथ शिवबाबा की। परमपिता परमात्मा को भोलानाथ भी कहते हैं। नॉलेजफुल भी कहते हैं, पतित-पावन भी कहते हैं। उनको कहा जाता है परमपिता परमात्मा। लौकिक बाप को परमपिता नहीं कहेंगे। परमपिता सदैव एक परमात्मा को ही कहा जाता है। आत्मा अपने परमपिता परमात्मा की महिमा करती है। कहती है - भक्तों का रखवाला अर्थात् भक्तों को फिर से भक्ति का फल देने वाला। भक्तों को भगवान क्या फल देंगे? भगवान आकर फल देते हैं गति और सद्गति का। गति अथवा मुक्ति मिलती है निर्वाणधाम में। उनको निराकारी दुनिया कहा जाता है। आत्मा भी निराकार है। निराकार आत्मा को मिला है यह साकार शरीर। किसलिए? कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने के लिए। अब कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाते-बजाते भारत जो हीरे जैसा था, स्वर्ग था, ऊंचे ते ऊंचा पवित्र खण्ड था। अब कौड़ी जैसा अपवित्र खण्ड बन गया है।

बाप तुम बच्चों को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। आदि में देवी-देवताओं का राज्य था। मध्य में रावण का राज्य शुरू होता है। देवी-देवतायें वाम मार्ग में चले जाते हैं। भारत पावन था, अब पतित है। यह भी समझाना चाहिए। इस पतित दुनिया को पावन बनाने वाला एक ही परमपिता परमात्मा है जिसको भक्त याद करते हैं। भक्त पतित हैं। जब बाप आकर पावन बनाते हैं तो फिर भक्त कोई रहते नहीं। न कोई पुकारते हैं। सतयुग में जब देवी-देवताओं का राज्य था तो भगवान को कोई याद नहीं करते थे। भारत सुखधाम था। ऐसे नहीं इस्लामी खण्ड वा बौद्धी खण्ड स्वर्ग था। भारत ही स्वर्ग था, जहाँ आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य था। जब देवताओं का राज्य था तब क्षत्रिय राज्य नहीं था। यह कौन बैठ समझाते हैं? नॉलेजफुल गॉड फादर। वह सत है, चैतन्य है। आत्मा भी सत है, चैतन्य है। यह शरीर है जड़, इनको आत्मा चलाती है। सतयुग में एक ही देवता धर्म था तो बहुत थोड़े थे, फिर झाड़ वृद्धि को पाता है। यह सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान कोई शास्त्रों में नहीं है। वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। कहते भी हैं - हे पतित-पावन आओ। बापू गाँधी जी भी चाहते थे राम राज्य हो। हाथ में गीता थी क्योंकि गीता ज्ञान द्वारा परमपिता परमात्मा ने भारत को स्वर्ग बनाया। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी का राज्य था। विश्व के मालिक थे तो जरूर विश्व के रचयिता ने विश्व का मालिक बनाया। शिवबाबा कहते हैं - हम आये थे, तुम शिव जयन्ती मनाते हो ना। 5 हज़ार वर्ष की बात है। गीता में ही भगवानुवाच लिखा हुआ है ना। भारतवासी तमोप्रधान होने कारण भगवान को नहीं जानते। भगवान है ऊंच ते ऊंच। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को भी रचने वाला वह है। निराकार शिव भगवान को अपना शरीर नहीं है। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को भी सूक्ष्म शरीर होने के कारण देवता कहा जाता है। परमपिता परमात्मा खुद कहते हैं - मैं रचयिता हूँ। यह सब मेरे बच्चे हैं। आत्मा के रूप में तुम सब भाई-भाई हो। ऐसे नहीं तुम सब फादर हो। जैसे सन्यासी कहते हैं - आत्मा सो परमात्मा। नहीं। परमात्मा सो परम आत्मा है। ड्रामा में परमात्मा का पार्ट अलग है। वह क्रियेटर, डायरेक्टर है, करनकरावहार है। ब्रह्मा द्वारा फिर से आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कराते हैं। ब्रह्माकुमार कुमारियों को एडाप्ट करते हैं। मुख वंशावली को एडाप्शन कहा जाता है। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली। ब्रह्माकुमार कुमारियों को परमपिता परमात्मा ने आकर पढ़ाया है। अब राजयोग सीख रहे हैं। ऐसे नहीं आत्मा सो परमात्मा। इतनी करोड़ आत्मायें सब इमार्टल हैं। यह बड़ा ड्रामा है। ड्रामा के राज़ का किसको पता नहीं है। बाप बैठ समझाते हैं - कल्प-कल्प संगमयुगे आता हूँ। मैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। यह अपने जन्मों को नहीं जानता था। मैं सुनाता हूँ - मैं इसमें आता हूँ। इनका नाम मैंने प्रजापिता ब्रह्मा रखा है। मुझे आना है पतित दुनिया में। इनका यह अन्तिम जन्म है, 84 जन्म पूरे किये। यह ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। सरस्वती कौन है, मनुष्य नहीं जानते हैं। सरस्वती को भगवती नहीं कहेंगे। यह ब्रह्मा की मुख वंशावली बेटी का नाम जगत अम्बा सरस्वती है। संगम-युग पर जगत अम्बा कामधेनु कहते हैं। इनको (ब्रह्मा को) आदि देव महावीर भी कहते हैं। दिलवाला भी कहते हैं। वास्तव में दिलवाला शिवबाबा है। वही बच्चों की दिल लेने लिए, स्वराज्य देने लिए आते हैं।

बच्चे कहते हैं - बाबा, हमको फिर से सदा सुखी बनाओ। तो शिवबाबा आकर ब्रह्मा तन से तुम्हारी दिल ले रहे हैं। तुमको पढ़ा रहे हैं इसलिए दिलवाला मन्दिर सुन्दर यादगार बना है। वह है जड़ मन्दिर। तुमने 5 हजार वर्ष पहले भारत को स्वर्ग बनाया था, इसका ही यादगार मन्दिर है। तुम फिर से सर्विस कर रहे हो, फिर यह जड़ मन्दिर टूट-फूट जायेंगे। बाप कहते हैं - कल्प-कल्प मैं पुराने पतित तन में आता हूँ पावन बनाने। यहाँ कोई पावन नहीं है। अभी अनेक धर्म हैं। बाकी आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं। देवी-देवता धर्म वाले अपने को हिन्दू कह देते हैं। देवता धर्म प्राय:लोप हो गया है। देवी-देवतायें बिल्कुल पवित्र थे। वह जब से वाम मार्ग में गये हैं तो देवी-देवता कहलाना बन्द हो गया। देवता धर्म को प्राय:लोप तो होना ही है। तब मैं पहले-पहले डीटी धर्म ही स्थापन करता हूँ। इस्लामी, बौद्धी पीछे आते हैं। हिन्दू धर्म कब स्थापन हुआ? आदि सनातन तो यह देवी-देवता थे। तो भोलानाथ शिवबाबा समझा रहे हैं भोली-भोली जो बच्चियाँ हैं उनकी झोली भर उनको स्वर्ग का मालिक बना रहे हैं। बड़ा भोला सौदागर है। जैसे कोई मरता है तो पुरानी चीजें करनीघोर को देते हैं। बाप कहते हैं मैं तुम्हारी पुरानी किचड़पट्टी लेकर तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तुम शिवालय में रहने वाले थे। शिव ने सतयुग स्थापन किया था, अब वेश्यालय बन गया है। इसको फिर शिवालय मैं बनाता हूँ। वर्णों का राज़ भी बच्चों को मैं समझाता हूँ। पुनर्जन्म लेते आये हैं। वर्ण बदलते जाते हैं। मनुष्य कह देते हैं - 84 लाख जन्म। बाप उल्हना देते हैं - तुमने अपने लिए 84 जन्मों के बदले 84 लाख जन्म लगा दिया है और मेरे लिए कह देते सर्वव्यापी, तू ही तू है। मैं सर्वव्यापी तो हूँ नहीं। इस समय तो सर्वव्यापी 5 विकार हैं। सतयुग में यह नहीं थे। वहाँ तो देवी-देवतायें थे। अब असुर बने हैं। फिर असुर से देवता बनाया जाता है सो बाप समझाते हैं ऊंचे ते ऊंच भगवान फिर उनकी रचना ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। यह है स्थूलवतन जिसमें पहले है देवी-देवताओं का राज्य, फिर है क्षत्रियों का राज्य फिर वैश्य, शूद्रों का राज्य। अभी तो नो राज्य। यह है प्रजा का प्रजा पर राज्य। सतयुग में राइटियस रिलीजन था। कभी एक दो को दु:ख नहीं देते थे। भारत की बड़ी महिमा है परन्तु शास्त्रों में उल्टा-सुल्टा लिख महिमा उड़ा दी है। प्राचीन भारत का योग और ज्ञान बड़ा नामीग्रामी है। किसने सिखाया? श्रीमत भगवानुवाच। कृष्ण ने नहीं। तो बाप बैठ समझाते हैं मेरा भी यहाँ आने का पार्ट है। मैं जन्म-मरण में नहीं आता हूँ। मैं ज्ञान का सागर, सुख का सागर हूँ। यह महिमा और कोई की नहीं है। देवताओं की महिमा अलग है। हरेक एक्टर का अपना-अपना पार्ट है। उस पार्ट अनुसार महिमा होती है। तुम जानते हो ऊंच ते ऊंच इनकारपोरियल गॉड फादर है। लौकिक फादर को गॉड फादर नहीं कहेंगे। वह है हद का बाप, यह है बेहद का बाप। पुकारते तो सब हैं परमपिता परमात्मा। समझते हैं बाप आयेंगे तो हमको सुखधाम ले जायेंगे।

बाप कहते हैं मैं अजामिल जैसे पापियों, साधुओं आदि सबका उद्धार करता हूँ इन माताओं द्वारा। यह हैं शिव शक्ति भारत मातायें। योगबल से काम ले रही हैं। वह कन्यायें-मातायें वायोलेन्स ड्रिल सीखती हैं। यहाँ यह योगबल की ड्रिल है। तुम हो श्रीमत पर, और संग पुरानी दुनिया से प्रीत तोड़ एक बाप से जोड़ते हो। कौरव हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि और तुम पाण्डव हो विनाश काले प्रीत बुद्धि। तुम भारत को स्वर्ग बनाते हो। बाप से प्रतिज्ञा करते हो - बाबा, हम पवित्र रह भारत को पावन बनाने में मदद करेंगे क्योंकि अब मृत्युलोक मुर्दाबाद हो अमरलोक ज़िन्दाबाद होना है। बाप अमरकथा सुना रहे हैं। तुम पार्वतियाँ हो, सजनियाँ हो। बाप से वर्सा ले रहे हो। सजनी के रूप में कहते हैं गुल-गुल बन जाओ। तुम महाराजा-महारानी बनते हो। यह सब राज़ बाप बैठ समझाते हैं। बाप ही नॉलेजफुल, क्रियेटर, डायरेक्टर हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर हैं रचना, इसलिए त्रिमूर्ति शिव कहा जाता है। वो लोग फिर त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहते हैं। त्रिमूर्ति शिव, जो तीनों को रचने वाला है, उनको भूल जाते हैं। शिवबाबा को भूल नास्तिक बन पड़े हैं। ओ गॉड फादर कहते हैं परन्तु उनके आक्यूपेशन को नहीं जानते हैं। माया सबको नास्तिक बनाती है, मैं फिर आस्तिक बनाता हूँ। बाप को भूल जाने के कारण आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं।

बाप समझाते हैं - यह भारत विश्व का मालिक था, कोई पार्टीशन नहीं था। आकाश, धरती, वायु आदि सबके मालिक थे। अब तो कितने पार्टीशन हो गये हैं। फलानी हद में यह न जाये, कितना झगड़ा है। भारत बेहद का मालिक हीरे जैसा था। अब हद का मालिक कौड़ी जैसा बन गया है। यह ड्रामा है, हरेक आत्मा को अपना पार्ट मिला हुआ है। कोई को 84 जन्मों का पार्ट है, कोई को दो तीन जन्मों का पार्ट है। यह इमार्टल ड्रामा है जो रिपीट होता रहता है। भारत जैसा पवित्र खण्ड कोई होता नहीं। घर पुराना होता है तो रिपेयरिंग कराया जाता है। भारत ही वाम मार्ग में जाता है तो उन्हों को कुछ थमाने के लिए सन्यास मार्ग है। अभी तो वह भी तमोप्रधान बन गया है। सब पुराने बन पड़े हैं फिर नये बनेंगे। पुराने घर में मजा नहीं होता है। बाप कहते हैं मुझे सतोप्रधान बनाने आना पड़ता है। मैं ही आकर भारत को जीवनमुक्त बनाता हूँ। बाकी आत्माओं को मुक्ति देता हूँ। बाप समझाते हैं - बच्चे, यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। अभी तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। कितनी भारी प्राप्ति है। तुम 21 जन्म पवित्र दुनिया के मालिक बनते हो। तुम ऊंच आत्मा थे, स्वर्ग के मालिक थे। पाप आत्मा माया ने बनाया है। फिर बाबा आकर पुण्य आत्मा बनाते हैं। हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस ले जायेंगे। भोलानाथ बाबा लिबरेटर भी ठहरा ना। कहते हैं मैं तुमको जीवनमुक्तिधाम ले जाता हूँ। परमपिता परमात्मा है ही सबसे मीठा, इसलिए सब उनको याद करते हैं।

भोलानाथ बाप तुम माताओं के द्वारा भारत को स्वर्ग बनाते हैं जिसका यादगार देलवाड़ा मन्दिर है। तुम हरेक के आक्यूपेशन को जानते हो। ड्रामा में हरेक का पार्ट चलता है। कितने पुनर्जन्म लेते हैं। पाण्डव थे गुप्त, यादव कौरव थे प्रत्यक्ष। तुम इनकागनीटो, नानवायोलेन्स शक्ति सेना 21 जन्म विश्व का मालिक बनते हो। तो जरूर मेहनत भी करनी पड़े। कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाबा की याद भूली तो लगा माया का गोला इसलिए अपने बाप को याद करना है, अपने को आत्मा निश्चय करना है। मौत सामने खड़ा है। पापों का बोझा बहुत भारी है। जहाँ तक जीना है, पुरुषार्थ में रहना है और कुछ भी याद न रहे। इस मृत्युलोक में आना नहीं है। दुनिया बदल रही है। यादवों और कौरवों ने अपने कुल का विनाश किया। बाकी पाण्डवों ने अपना राज्य पाया। परन्तु अब हम पाण्डव बाप के बने हैं, रक्त की नदियाँ यहाँ बहेगी। नहीं तो पुरानी दुनिया का विनाश कैसे हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योगबल की ड्रिल करते नानवायोलेंस (अहिंसक) बन सभी का उद्धार करने के निमित्त बनना है।

2) भोलानाथ बाप से सच्चा सौदा करना है। पुरानी किचड़पट्टी दे स्वर्ग का राज्य-भाग्य लेना है। पुरानी दुनिया से प्रीत तोड़ एक बाप से जोड़नी है।

वरदान:-

अविनाशी अतीन्द्रिय सुख में रह सबको सुख देने और सुख लेने वाले मास्टर सुख-दाता भव

अतीन्द्रिय सुख अर्थात् आत्मिक सुख अविनाशी है। इन्द्रियां खुद ही विनाशी हैं तो उनसे प्राप्त सुख भी विनाशी होगा इसलिए सदा अतीन्द्रिय सुख में रहो तो दु:ख का नाम-निशान आ नहीं सकता। अगर दूसरा कोई आपको दु:ख देता है तो आप नहीं लो। आपका स्लोगन है - सुख दो, सुख लो। न दु:ख दो, न दु:ख लो। कोई दु:ख दे तो उसे परिवर्तन कर आप सुख दे दो, उसको भी सुखी बना दो तब कहेंगे मास्टर सुखदाता।

स्लोगन:-

अधिक बोलकर एनर्जी गंवाने के बजाए अन्तर्मुखता के रस के अनुभवी बनो।