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नया मलयालम टीवी चैनल

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आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र

मध्यप्रदेश के राज्य कैबिनेट मंत्री ने आपदा प्रबंधन के लिए ब्रह्माकुमारीज को प्रशंसा पत्र प्रदान किया मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश सरकार ने आपदा प्रबंधन में ब्रह्मा कुमारिस संगठन के प्रयासों की सराहना की। मध्य प्रदेश सरकार में पशुपालन और मत्स्यपालन मंत्री और प्रभारी मंत्री श्री लखन सिंह यादव, मुरैना जिला कलेक्टर, प्रियंका दास के साथ, प्रशासन की ओर से इस…

निःशुल्क चिकित्सा परामर्श एवं नि:शुल्क दवाइयां वितरण शिविर

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19 मई (आबूरोड) आध्यात्मिकता और भौतिकता के संगम से होगा विश्व परीवर्तन.

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युवा शिविर का सफल आयोजन.

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16-04-2021 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन


"मीठे बच्चे - अल्फ और बे को याद करो तो रमणीक बन जायेंगे, बाप भी रमणीक है तो उनके बच्चे भी रमणीक होने चाहिए''

प्रश्नः-

देवताओं के चित्रों की कशिश सभी को क्यों होती है? उनमें कौन सा विशेष गुण है?

उत्तर:-

देवतायें बहुत रमणीक और पवित्र हैं। रमणीकता के कारण उनके चित्रों की भी कशिश होती है। देवताओं में पवित्रता का विशेष गुण है, जिस गुण के कारण ही अपवित्र मनुष्य झुकते रहते हैं। रमणीक वही बनते जिनमें सर्व दैवी गुण हैं, जो सदा खुश रहते हैं।

ओम् शान्ति। आत्मायें और परमात्मा का मेला कितना वन्डरफुल है। ऐसे बेहद के बाप के तुम सब बच्चे हो तो बच्चे भी कितने रमणीक होने चाहिए। देवतायें भी रमणीक हैं ना। परन्तु राजधानी है बहुत बड़ी। सब एकरस रमणीक हो नहीं सकते। फिर भी कोई-कोई बच्चे बहुत रमणीक हैं जरूर। रमणीक कौन होते हैं? जो सदैव खुशी में रहते हैं, जिनमें दैवीगुण हैं। यह राधे-कृष्ण आदि रमणीक हैं ना। उन्हों में बहुत-बहुत कशिश है। कौन सी कशिश है? पवित्रता की क्योंकि इन्हों की आत्मा भी पवित्र है तो शरीर भी पवित्र है। तो पवित्र आत्मायें अपवित्र को कशिश करती हैं। उन्हों के चरणों में गिरती हैं। कितनी उनमें ताकत है। भल संन्यासी हैं, परन्तु वह देवताओं के आगे जरूर झुकते हैं। भल कोई-कोई बहुत घमण्डी होते हैं, फिर भी देवताओं के आगे अथवा शिव के आगे झुकेंगे जरूर। देवियों के चित्रों के आगे भी झुकते हैं क्योंकि बाप भी रमणीक है तो बाप के बनाये हुए देवी देवतायें भी रमणीक हैं। उनमें कशिश है पवित्रता की। वह कशिश उन्हों की अभी तक भी चल रही है। तो जितनी इनमें कशिश है उतनी तुम्हारे में भी कशिश होनी चाहिए, जो समझते हैं हम यह लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। तुम्हारी इस समय की कशिश फिर अविनाशी हो जाती है। सबकी नहीं होती। नम्बरवार तो हैं ना। भविष्य में जो ऊंच पद पाने वाले होंगे, उनमें यहाँ ही कशिश होगी क्योंकि आत्मा पवित्र बन जाती है। तुम्हारे में जास्ती कशिश उनमें है जो खास याद की यात्रा में रहते हैं। यात्रा में पवित्रता जरूर रहती है। पवित्रता में ही कशिश है। पवित्रता की कशिश फिर पढ़ाई में भी कशिश ले आती है। यह तुमको अभी पता पड़ा है। तुम उनके (लक्ष्मी नारायण के) आक्यूपेशन को जानते हो। उन्होंने भी कितना बाप को याद किया होगा। यह जो उन्होंने इतनी राजाई पाई है, वह जरूर राजयोग से ही पाई है। इस समय तुम यह पद पाने के लिए आये हो। बाप बैठ तुमको राजयोग सिखाते हैं। यह तो पक्का निश्चय कर यहाँ आये हो ना। बाप भी वही है, पढ़ाने वाला भी वही है। साथ भी वही ले जाने वाला है। तो यह गुण सदैव रहने चाहिए। सदैव हर्षित मुख रहो। सदैव हर्षित तब रहेंगे जब बाप अल्फ की याद में रहेंगे। तब बे की भी याद रहेगी और इससे रमणीक भी बहुत होंगे। तुम बच्चे जानते हो - हम यहाँ रमणीक बन फिर भविष्य में ऐसा रमणीक बनेंगे। यहाँ की पढ़ाई ही अमरपुरी में ले जाती है। यह सच्चा बाबा तुमको सच्ची कमाई करा रहे हैं। यह सच्ची कमाई ही साथ चलती है - 21 जन्म के लिए। फिर भक्ति मार्ग में जो कमाई करते हो वह तो है ही अल्प-काल सुख के लिए। वह कोई सदैव साथ नहीं देती। तो इस पढ़ाई में बच्चों को बड़ा खबरदार रहना चाहिए। तुम हो साधारण, तुमको पढ़ाने वाला भी बिल्कुल साधारण रूप में है। तो पढ़ने वाले भी साधारण ही रहेंगे। नहीं तो लज्जा आयेगी। हम ऊंचे कपड़े कैसे पहनें। हमारे मम्मा बाबा कितने साधारण हैं तो हम भी साधारण हैं। यह क्यों साधारण रहते हैं? क्योंकि वनवाह में हैं ना। अभी तुमको जाना है, यहाँ कोई शादी नहीं करनी है। वो लोग जब शादी करते हैं तो कुमारी वनवाह में रहती है। मैले कपड़े पहनती, तेल आदि लगाती है क्योंकि ससुरघर जाती है। ब्राह्मण द्वारा सगाई होती है। तुमको भी जाना है ससुरघर। रावणपुरी से रामपुरी अथवा विष्णुपुरी में जाना है। तो यह वनवाह का रिवाज इसलिए रखा है कि कोई भी अभिमान देह का वा कपड़ों आदि का न आये। किसको हल्की साड़ी है, दूसरे को देखते हैं कि इनके पास तो ऊंची साड़ी है तो ख्याल चलता है। सोचते हैं कि यह तो वनवाह में है नहीं। लेकिन तुम वनवाह में ऐसे साधारण रहते हुए कोई को इतना ऊंचा ज्ञान दो, इतना नशा चढ़ा हुआ हो तो उसे भी तीर लग जाए। भल बर्तन मांजते रहो वा कपड़ा साफ करते रहो, तुम्हारे सामने कोई आये तो तुम झट उनको अल्फ की याद दिलाओ। तुमको वह नशा चढ़ा हुआ हो और सादे कपड़ो में बैठ किसको नॉलेज देंगे तो वह भी वन्डर खायेंगे, इनमें कितना ऊंच ज्ञान है! यह ज्ञान तो गीता का है और भगवान का दिया हुआ है। राजयोग तो गीता का ज्ञान ही है। तो ऐसा नशा चढ़ता है? जैसे बाबा अपना मिसाल बताते हैं। समझो हम बच्चों के साथ कोई खेल कर रहा हूँ। कोई जिज्ञासू सामने आ जाता है तो झट उनको बाप का परिचय देता हूँ। योग की ताकत, योगबल होने के कारण वह भी वहाँ ही खड़ा हो जायेगा तो वन्डर खायेगा कि यह इतना साधारण, इसमें इतनी ताकत! फिर वह कुछ भी बोल नहीं सकेगा। मुख से कोई बात निकलेगी नहीं। जैसे तुम वाणी से परे हो वैसे वह भी वाणी से परे हो जायेंगे। यह नशा अन्दर में होना चाहिए। कोई भी भाई अथवा बहन आये तो उनको एकदम खड़ा करके विश्व का मालिक बनाने की मत दे सकते हैं। अन्दर में इतना नशा होना चाहिए। अपनी लगन में खड़ा हो जाना चाहिए। बाबा सदैव कहते हैं - तुम्हारे पास ज्ञान तो है परन्तु योग का जौहर नहीं है। प्योरिटी और याद में रहने से ही जौहर आता है। याद की यात्रा से तुम पवित्र बनते हो। ताकत मिलती है। ज्ञान तो है धन की बात। जैसे स्कूल में पढ़कर एम.ए., बी.ए. आदि करते हैं तो इतना फिर पैसा मिलता है। यहाँ की दूसरी बात है। भारत का प्राचीन योग तो मशहूर है। यह है याद। बाप सर्वशक्तिमान् है तो बच्चों को बाप से शक्ति मिलती है। बच्चों को अन्दर में रहना चाहिए - हम आत्मायें बाबा की सन्तान हैं, परन्तु बाबा जितने हम पवित्र नहीं हैं। अब बनना है। अभी है एम-ऑबजेक्ट। योग से ही तुम पवित्र बनते हो। जो अनन्य बच्चे हैं वह सारा दिन यही ख्यालात करते रहेंगे। कोई भी आये तो उनको हम रास्ता बतायें, तरस आना चाहिए, बिचारे अन्धे हैं। अन्धे को लाठी पकड़ाकर ले जाते हैं ना। यह सब अन्धे हैं, ज्ञान चक्षु हैं नहीं।

अभी तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तो सब कुछ जान गये हो। सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को हम अभी जानते हैं। यह सब भक्ति मार्ग की बातें हैं। तुमको पहले भी पता था क्या कि हियर नो ईविल, सी नो ईविल... यह चित्र क्यों बना है? दुनिया में कोई भी इनका अर्थ नहीं समझते, तुम अभी जानते हो। जैसे बाप नॉलेजफुल है, तुम उनके बच्चे भी अब नॉलेजफुल बन रहे हो, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। कोई-कोई को तो बहुत नशा चढ़ता है। वाह! बाबा का बच्चा बनकर और बाबा से पूरा वर्सा नहीं लिया तो बच्चा बनकर ही क्या किया! रोज़ रात को अपना पोतामेल देखना है। बाबा व्यापारी है ना। व्यापारियों को पोतामेल निकालना सहज होता है। गवर्मेन्ट सर्वेन्ट को पोतामेल निकालना नहीं आता है, न वह सौदागर होते हैं। व्यापारी लोग अच्छा समझेंगे। तुम व्यापारी हो। तुम अपने ऩफे नुकसान को समझते हो, रोज़ खाता देखो। मुरादी सम्भालो। घाटा है वा फायदा है? सौदागर हो ना। गायन है ना - बाबा सौदागर, रत्नागर है। अविनाशी ज्ञान रत्नों का सौदा देते हैं। यह भी तुम जानते हो - नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। सब कोई शुरूड बुद्धि नहीं हैं, एक कान से सुनते हैं फिर दूसरे से निकल जाता है। झोली में छेद से निकल जाता है। झोली भरती नहीं है। बाप कहते हैं धन दिये धन ना खुटे। अविनाशी ज्ञान रत्न हैं ना। बाप है रूप-बसन्त। आत्मा तो है, उनमें ज्ञान है। तुम उनके बच्चे भी रूप-बसन्त हो। आत्मा में नॉलेज भरी जाती है। उनका रूप है, भल आत्मा छोटी है। रूप तो है ना। उनको जाना जाता है, परमात्मा को भी जाना जाता है। सोमनाथ की भक्ति करते हैं तो इतने छोटे स्टार की क्या पूजा करेंगे। पूजा के लिए कितने लिंग बनाते हैं। शिवलिंग छत जितना बड़ा-बड़ा भी बनाते हैं। यूँ तो है छोटा परन्तु मर्तबा तो ऊंच है ना।

बाप ने कल्प पहले भी कहा था कि इन जप, तप आदि से कोई प्राप्ति नहीं होती है। यह सब करते नीचे ही गिरते जाते हैं। सीढ़ी नीचे ही उतरते हैं। तुम्हारी तो अब चढ़ती कला है। तुम ब्राह्मण पहले नम्बर के जिन्न हो। कहानी है ना - जिन्न ने कहा, हमको काम नहीं देंगे तो खा जायेंगे। तो उनको काम दिया - सीढ़ी चढ़ो और उतरो। तो उनको काम मिल गया। बाबा ने भी कहा है कि यह बेहद की सीढ़ी तुम उतरते हो फिर चढ़ते हो। तुम ही फुल सीढ़ी उतरते और चढ़ते हो। जिन्न तुम हो। दूसरे कोई फुल सीढ़ी नहीं चढ़ते हैं। फुल सीढ़ी का ज्ञान पाने से तुम कितना ऊंच पद पाते हो। फिर उतरते हो, चढ़ते हो। बाप कहते हैं - मैं तुम्हारा बाप हूँ। तुम मुझे पतित-पावन कहते हो ना, मैं सर्वशक्तिमान् आलमाइटी हूँ क्योंकि मेरी आत्मा सदैव 100 परसेन्ट पवित्र रहती है। मैं बिन्दी रूप अथॉरिटी हूँ। सब शास्त्रों का राज़ जानता हूँ। यह कितना वन्डर है। यह सब वन्डरफुल ज्ञान है। ऐसे कभी सुना नहीं होगा कि आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट है। वह कभी घिसता नहीं है। चलता ही आता है। 84 जन्मों का चक्र फिरता आता है। 84 जन्मों का रिकार्ड भरा हुआ है। इतनी छोटी आत्मा में इतना ज्ञान है। बाबा में भी है तो तुम बच्चों में भी है। कितना पार्ट बजाते हैं। यह पार्ट कभी मिटने का नहीं है। आत्मा इन ऑखों से देखने में नहीं आती है। है बिन्दी, बाबा भी कहते हैं मैं ऐसा बिन्दी हूँ। यह भी तुम बच्चे अब समझते हो। तुम हो बेहद के त्यागी और राजऋषि। कितना नशा चढ़ना चाहिए। राजऋषि बिल्कुल पवित्र रहते हैं। राजऋषि होते हैं - सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, जो यहाँ राजाई प्राप्त करते हैं। जैसे अब तुम कर रहे हो। यह तो बच्चे समझते हैं कि हम जा रहे हैं। खिवैया के स्टीमर में बैठे हैं। और यह भी जानते हैं यह पुरूषोत्तम संगमयुग है। जाना भी जरूर है, पुरानी दुनिया से नई दुनिया में, वाया शान्तिधाम। यह सदैव बच्चों की बुद्धि में रहना चाहिए। जब हम सतयुग में थे तो कोई खण्ड नहीं था। हमारा ही राज्य था। अब फिर से योगबल से अपना राज्य ले रहे हैं क्योंकि समझाया है योगबल से ही विश्व की राजाई पा सकते हैं। बाहुबल से कोई नहीं पा सकते। यह बेहद का ड्रामा है। खेल बना हुआ है। इस खेल की समझानी बाप ही देते हैं। शुरू से लेकर सारी दुनिया की हिस्ट्री-जॉग्राफी सुनाते हैं। तुम सूक्ष्मवतन, मूलवतन के राज़ को भी अच्छी रीति जानते हो। स्थूल वतन में इनका राज्य था अर्थात् हमारा राज्य था। तुम कैसे सीढ़ी उतरते हो, वह भी याद आ गया। सीढ़ी चढ़ना और उतरना यह खेल बच्चों की बुद्धि में बैठ गया है। अब बुद्धि में है कि कैसे यह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है, इसमें हमारा हीरो, हीरोइन का पार्ट है। हम ही हार खाते हैं और फिर जीत पाते हैं इसलिए नाम रखा है हीरो, हीरोइन। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अभी हम वनवाह में हैं - इसलिए बहुत-बहुत साधारण रहना है। कोई भी अभिमान देह का वा कपड़ों आदि का नहीं रखना है। कोई भी कर्म करते बाप की याद का नशा चढ़ा रहे।

2) हम बेहद के त्यागी और राजऋषि हैं - इसी नशे में रह पवित्र बनना है। ज्ञान धन से भरपूर बन दान करना है। सच्चा-सच्चा सौदागर बन अपना पोतामेल रखना है।

वरदान:-

याद की सर्चलाइट द्वारा वायुमण्डल बनाने वाले विजयी रत्न भव

सर्विसएबुल आत्माओं के मस्तक पर विजय का तिलक लगा हुआ है ही लेकिन जिस स्थान की सर्विस करनी है, उस स्थान पर पहले से ही सर्च लाइट की रोशनी डालनी चाहिए। याद की सर्चलाइट से ऐसा वायुमण्डल बन जायेगा जो अनेक आत्मायें सहज समीप आ जायेंगी। फिर कम समय में सफलता हजार गुणा होगी। इसके लिए दृढ़ संकल्प करो कि हम विजयी रत्न हैं तो हर कर्म में विजय समाई हुई है।

स्लोगन:-

जो सेवा स्वयं को वा दूसरे को डिस्टर्ब करे वो सेवा, सेवा नहीं बोझ है।

 


 

बोध कथा-

विचार की पवित्रता

एक राजा और नगर सेठ में गहरी मित्रता थी। वे रोज एक दूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे। नगर सेठ चंदन की लकड़ी का व्यापार करता था। एक दिन उसके मुनीम ने बताया कि लकड़ी की बिक्री कम हो गई है। तत्काल सेठ के मन में यह विचार कौंधा कि अगर राजा की मृत्यु हो जाए, तो मंत्रिगण चंदन की लकडि़यां उसी से खरीदेंगे। उसे कुछ तो मुनाफा होगा। शाम को सेठ हमेशा की तरह राजा से मिलने गया। उसे देख राजा ने सोचा कि इस नगर सेठ ने उससे दोस्ती करके न जाने कितनी दौलत जमा कर ली है, ऐसा कोई नियम बनाना होगा जिससे इसका सारा धन राज खजाने में जमा हो जाए।
दोनों इसी तरह मिलते रहे, लेकिन पहले वाली गर्मजोशी नहीं रही। एक दिन नगर सेठ ने पूछ ही लिया, ‘पिछले कुछ दिनों से हमारे रिश्तों में एक ठंडापन आ गया है। ऐसा क्यों?’ राजा ने कहा, ‘मुझे भी ऐसा लग रहा है। चलो, नगर के बाहर जो महात्मा रहते हैं, उनसे इसका हल पूछा जाए।’ उन्होंने महात्मा को सब कुछ बताया। महात्मा ने कहा, ‘सीधी सी बात है। आप दोनों पहले शुद्ध भाव से मिलते रहे होंगे, पर अब संभवत: एक दूसरे के प्रति आप लोगों के मन में कुछ बुरे विचार आ गए हैं इसलिए मित्रता में पहले जैसा सुख नहीं रह गया।’ नगर सेठ और राजा ने अपने-अपने मन की बातें कह सुनाईं। महात्मा ने सेठ से कहा,’ तुमने ऐसा क्यों नहीं सोचा कि राजा के मन में चंदन की लकड़ी का आलीशान महल बनवाने की बात आ जाए? इससे तुम्हारा चंदन भी बिक जाता। विचार की पवित्रता से ही संबंधों में मिठास आती है। तुमने राजा के लिए गलत सोचा इसलिए राजा के मन में भी तुम्हारे लिए अनुचित विचार आया। गलत सोच ने दोनों के बीच दूरी बढ़ा दी। अब तुम दोनों प्रायश्चित करके अपना मन शुद्ध कर लो, तो पहले जैसा सुख फिर से मिलने लगेगा।’ 5  

 

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07-03-20 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा”मधुबन


“मीठे बच्चे-तुम्हें अपने योगबल से सारी सृष्टि को पावन बनाना है, तुम योगबल से ही माया पर जीत पाकर जगतजीत बन सकते हो"

प्रश्न:

बाप का पार्ट क्या है, उस पार्ट को तुम बच्चों ने किस आधार पर जाना है

उत्तर:

बाप का पार्ट है-सबके दु:ख हरकर सुख देना, रावण की जंजीरों से छुड़ाना। जब बाप आते हैं तो भक्ति की रात पूरी होती है। बाप तुम्हें स्वयं अपना और अपनी जायदाद का परिचय देते हैं। तुम एक बाप को जानने से ही सब कुछ जान जाते हो।

गीत:-

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो......

ओम् शान्ति।

बच्चों ने ओम् शान्ति का अर्थ समझा है, बाप ने समझाया है हम आत्मा हैं, इस सृष्टि ड्रामा के अन्दर हमारा मुख्य पार्ट है। किसका पार्ट है? आत्मा शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। तो बच्चों को अब आत्म-अभिमानी बना रहे हैं। इतना समय देह-अभिमानी थे। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। हमारा बाबा आया हुआ है ड्रामा प्लैन अनुसार। बाप आते भी हैं रात्रि में। कब आते हैं-उसकी तिथि-तारीख कोई नहीं है। तिथि-तारीख उनकी होती है जो लौकिक जन्म लेते हैं। यह तो है पारलौकिक बाप। इनका लौकिक जन्म नहीं है। कृष्ण की तिथि, तारीख, समय आदि सब देते हैं। इनका तो कहा जाता है दिव्य जन्म। बाप इनमें प्रवेश कर बताते हैं कि यह बेहद का ड्रामा है। उसमें आधाकल्प है रात। जब रात अर्थात् घोर अन्धियारा होता है तब मैं आता हूँ। तिथि-तारीख कोई नहीं। इस समय भक्ति भी तमोप्रधान है। आधा कल्प है बेहद का दिन । बाप खुद कहते हैं मैंने इनमें प्रवेश किया है। गीता में है भगवानुवाच, परन्तु भगवान मनुष्य हो नहीं सकता। कृष्ण भी दैवी गुणों वाला है। यह मनुष्य लोक है। यह देव लोक नहीं है। गाते भी हैं ब्रह्मा देवताए नमः...... वह है सूक्ष्मवतनवासी। बच्चे जानते हैं वहाँ हड्डी-मास नहीं होता है। वह है सूक्ष्म सफेद छाया। जब मूलवतन में है तो आत्मा को न सूक्ष्म शरीर छाया वाला है, न हड्डी वाला है। इन बातों को कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते हैं। बाप ही आकर सुनाते हैं, ब्राह्मण ही सुनते हैं, और कोई नहीं सुनते। ब्राह्मण वर्ण होता ही है भारत में, वह भी तब होता है जब परमपिता परमात्मा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना करते हैं। अब इनको रचता भी नहीं कहेंगे। नई रचना कोई रचते नहीं हैं। सिर्फ रिज्युवनेट करते हैं। बुलाते भी हैं - हे बाबा, पतित दुनिया में आकर हमको पावन बनाओ। अभी तुमको पावन बना रहे हैं। तुम फिर योगबल से इस सृष्टि को पावन बना रहे हो। माया पर तुम जीत पाकर जगत जीत बनते हो। योगबल को साइंस बल भी कहा जाता है। ऋषि-मुनि आदि सब शान्ति चाहते हैं परन्तु शान्ति का अर्थ तो जानते नहीं। यहाँ तो जरूर पार्ट बजाना है ना। शान्तिधाम है स्वीट साइलेन्स होम। तुम आत्माओं को अब यह मालूम है कि हमारा घर शान्तिधाम है। यहाँ हम पार्ट बजाने आये हैं। बाप को भी बुलाते हैं-हे पतित-पावन, दु:ख हर्ता, सुख कर्ता आओ, हमको इस रावण की जंजीरों से छुड़ाओ। भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। रात मुर्दाबाद होती है फिर ज्ञान जिंदाबाद होता है। यह खेल है सुख और दुःख का। तुम जानते हो पहले हम स्वर्ग में थे फिर उतरते-उतरते आकर नीचे हेल में पड़े हैं। कलियुग कब खलास होगा फिर सतयुग कब आयेगा, यह कोई नहीं जानते। तुम बाप को जानने से बाप द्वारा सब कुछ जान गये हो। मनुष्य भगवान को ढूँढने के लिए कितना धक्का खाते हैं। बाप को जानते ही नहीं। जानें तब जब बाप आकर अपना और जायदाद का परिचय दें। वर्सा बाप से ही मिलता है, माँ से नहीं। इनको मम्मा भी कहते हैं, परन्तु इनसे वर्सा नहीं मिलता है, इनको याद भी नहीं करना है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी शिव के बच्चे हैं - यह भी कोई नहीं जानते। बेहद की सारी दुनिया का रचयिता एक ही बाप है। बाकी सब हैं उनकी रचना या हद के रचयिता। अब तुम बच्चों को बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश हों। मनुष्य बाप को नहीं जानते हैं तो किसको याद करें? इसलिए बाप कहते हैं कितने निधनके बन पड़े हैं। यह भी ड्रामा में गूंध है। भक्ति और ज्ञान दोनों में सबसे श्रेष्ठ कर्म है-दान करना। भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ दान करते हैं। किसलिए? कोई कामना तो जरूर रहती है। समझते हैं जैसा कर्म करेंगे वैसा फल दूसरे जन्म में पायेंगे, इस जन्म में जो करेंगे उसका फल दूसरे जन्म में पायेंगे। जन्म-जन्मान्तर नहीं पायेंगे। एक जन्म के लिए फल मिलता है। सबसे अच्छे ते अच्छा कर्म होता है दान। दानी को पुण्यात्मा कहा जाता है। भारत को महादानी कहा जाता है। भारत में जितना दान होता है उतना और कोई खण्ड में नहीं। बाप भी आकर बच्चों को दान करते हैं, बच्चे फिर बाप को दान करते हैं। कहते हैं बाबा आप आयेंगे तो हम अपना तन-मन-धन सब आपके हवाले कर देंगे। आप बिगर हमारा कोई नहीं। बाप भी कहते हैं मेरे लिए तुम बच्चे ही हो। मुझे कहते ही हैं हेविनली गॉड फादर अर्थात् स्वर्ग की स्थापना करने वाला। मैं आकर तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। बच्चे मेरे अर्थ सब कुछ दे देते हैं - बाबा सब कुछ आपका है। भक्ति मार्ग में भी कहते थे-बाबा, यह सब कुछ आपका दिया हुआ है। फिर वह चला जाता है तो दुःखी हो जाते हैं। वह है भक्ति का अल्पकाल का सुख। बाप समझाते हैं भक्ति मार्ग में तुम मुझे दान-पुण्य करते हो इनडायरेक्ट । उसका फल तो तुमको मिलता रहता है। अब इस समय मैं तुमको कर्मअकर्म-विकर्म का राज़ बैठ समझाता हूँ। भक्ति मार्ग में तुम जैसे कर्म करते हो उसका अल्पकाल सुख भी मेरे द्वारा तुमको मिलता है। इन बातों का दुनिया में किसको पता नहीं है। बाप ही आकर कर्मों की गति समझाते हैं। सतयुग में कभी कोई बुरा कर्म करते ही नहीं। सदैव सुख ही सुख है। याद भी करते हैं सुखधाम, स्वर्ग को। अभी बैठे हैं नर्क में। फिर भी कह देते–फलाना स्वर्ग पधारा। आत्मा को स्वर्ग कितना अच्छा लगता है। आत्मा ही कहती है ना–फलाना स्वर्ग पधारा। परन्तु तमोप्रधान होने के कारण उनको कुछ पता नहीं पड़ता है कि स्वर्ग क्या, नर्क क्या है? बेहद का बाप कहते हैं तुम सब कितने तमोप्रधान बन गये हो। ड्रामा को तो जानते नहीं। समझते भी हैं कि सृष्टि का चक्र फिरता है तो जरूर हूबहू फिरेगा ना। वह सिर्फ कहने मात्र कह देते हैं। अभी यह है संगमयुग। इस एक ही संगमयुग का गायन है। आधाकल्प देवताओं का राज्य चलता है फिर वह राज्य कहाँ चला जाता, कौन जीत लेते हैं? यह भी किसको पता नहीं। बाप कहते हैं रावण जीत लेता है। उन्होंने फिर देवताओं और असुरों की लड़ाई बैठ दिखाई है। अब बाप समझाते हैं-5 विकारों रूपी रावण से हारते हैं फिर जीत भी पाते हैं रावण पर। तुम तो पूज्य थे फिर पुजारी पतित बन जाते हो तो रावण से हारे ना। यह तुम्हारा दुश्मन होने के कारण तुम सदैव जलाते आये हो। परन्तु तुमको पता नहीं है। अब बाप समझाते हैं रावण के कारण तुम पतित बने हो। इन विकारों को ही माया कहा जाता है। माया जीत, जगत जीत। यह रावण सबसे पुराना दुश्मन है। अभी श्रीमत से तुम इन 5 विकारों पर जीत पाते हो। बाप आये हैं जीत पहनाने। यह खेल है ना। माया ते हारे हार, माया ते जीते जीत। जीत बाप ही पहनाते हैं इसलिए इनको सर्वशक्तिमान कहा जाता है। रावण भी कम शक्तिमान नहीं है। परन्तु वह दुःख देते हैं इसलिए गायन नहीं है। रावण है बहुत दुश्तर। तुम्हारी राजाई ही छीन लेते हैं। अभी तुम समझ गये हो– हम कैसे हारते हैं फिर कैसे जीत पाते हैं? आत्मा चाहती भी है हमको शान्ति चाहिए। हम अपने घर जावें। भक्त भगवान को याद करते हैं परन्तु पत्थरबुद्धि होने कारण समझते नहीं हैं। भगवान बाबा है, तो बाप से जरूर वर्सा मिलता होगा। मिलता भी जरूर है परन्तु कब मिलता है फिर कैसे गँवाते हैं, यह नहीं जानते हैं। बाप कहते हैं मैं इस ब्रह्मा तन द्वारा तुमको बैठ समझाता हूँ। मुझे भी आरगन्स चाहिए ना। मुझे अपनी कर्मेन्द्रियां तो हैं नहीं। सूक्ष्मवतन में भी कर्मेन्द्रियां हैं। चलते फिरते जैसे मूवी बाइसकोप होता है, यह मूवी टॉकी बाइसकोप निकले हैं तो बाप को भी समझाने में सहज होता है। उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। वह दो भाई भी अगर आपस में मिल जाएं तो विश्व पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु अभी तो फूट पड़ी हुई है। तुम बच्चों को साइलेन्स का शुद्ध घमण्ड रहना चाहिए। तुम मनमनाभव के आधार से साइलेन्स द्वारा जगतजीत बन जाते हो। वह है साइंस घमण्डी। तुम साइलेन्स घमण्डी अपने को
आत्मा समझ बाप को याद करते हो। याद से तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। बहुत सहज उपाय बताते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा आये हैं हम बच्चों को फिर से स्वर्ग का वर्सा देने। तुम्हारा जो भी कलियुगी कर्मबन्धन है, बाप कहते हैं उनको भूल जाओ। 5 विकार भी मुझे दान में दे दो। तुम जो मेरा-मेरा करते आये हो, मेरा पति, मेरा फलाना, यह सब भूलते जाओ। सब देखते हुए भी उनसे ममत्व मिटा दो। यह बात बच्चों को ही समझाते हैं। जो बाप को जानते ही नहीं, वह तो इस भाषा को भी समझ न सकें। बाप आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं। देवतायें होते ही सतयुग में हैं। कलियुग में होते हैं मनुष्य। अभी तक उनकी निशानियां हैं अर्थात् चित्र हैं। मुझे कहते ही हैं पतित-पावन । मैं तो डिग्रेड होता नहीं हूँ। तुम कहते हो हम पावन थे फिर डिग्रेड हो पतित बने हैं। अब आप आकर पावन बनाओ तो हम अपने घर में जायें। यह है स्पीचूअल नॉलेज। अविनाशी ज्ञान रत्न हैं ना। यह है नई नॉलेज। अभी तुमको यह नॉलेज सिखाता हूँ। रचयिता और रचना के आदि, मध्य, अन्त का राज़ बताता हूँ। अभी यह तो है पुरानी दुनिया। इसमें तुम्हारे जो भी मित्र सम्बन्धी आदि हैं, देह सहित सबसे ममत्व निकाल दो। अभी तुम बच्चे अपना सब कुछ बाप हवाले करते हो। बाप फिर स्वर्ग की बादशाही 21 जन्मों के लिए तुम्हारे हवाले कर देते हैं। लेन-देन तो होती है ना। बाप तुमको 21 जन्मों के लिए राज्य-भाग्य देते हैं। 21 जन्म, 21 पीढ़ी गाये जाते हैं ना अर्थात् 21 जन्म पूरी लाइफ चलती है। बीच में कभी शरीर छूट नहीं सकता। अकाले मृत्यु नहीं होती। तुम अमर बन और अमरपुरी के मालिक बनते हो। तुमको कभी काल खा न सके। अभी तुम मरने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। बाप कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्ध छोड़ एक बाप से सम्बन्ध रखना है। अब जाना ही है सुख के सम्बन्ध में। दु:ख के बन्धनों को भूलते जायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो, साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो। इन देवताओं जैसा बनना है। यह है एम ऑबजेक्ट। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, इन्हों ने कैसे राज्य पाया, फिर कहाँ गये, यह किसको पता नहीं है। अभी तुम बच्चों को दैवी गुण धारण करने हैं। किसको भी दु:ख नहीं देना है। बाप है ही दुःख हर्ता, सुख कर्ता। तो तुमको भी सुख का रास्ता सबको बताना है अर्थात् अन्धों की लाठी बनना है। अभी बाप ने तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है। तुम जानते हो बाप कैसे पार्ट बजाते हैं। अभी बाप जो तुमको पढ़ा रहे हैं फिर यह पढ़ाई प्राय:लोप हो जायेगी। देवताओं में यह नॉलेज रहती नहीं। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही रचता और रचना के ज्ञान को जानते हो। और कोई जान नहीं सकते। इन लक्ष्मी-नारायण आदि में भी अगर यह ज्ञान होता तो परम्परा चला आता। वहाँ ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती क्योंकि वहाँ है ही सद्गति। अभी तुम सब कुछ बाप को दान देते हो तो फिर बाप तुमको 21 जन्मों के लिए सब कुछ दे देते हैं। ऐसा दान कभी होता नहीं। तुम जानते हो हम सर्वन्श देते हैं – बाबा यह सब कुछ आपका है, आप ही हमारे सब कुछ हो। त्वमेव माताश्च पिता... पार्ट तो बजाते हैं ना। बच्चों को एडाप्ट भी करते हैं फिर खुद ही पढ़ाते हैं। फिर खुद ही गुरू बन सबको ले जाते हैं। कहते हैं तुम मुझे याद करो तो पावन बन जायेंगे फिर तुमको साथ ले जाऊंगा। यह यज्ञ रचा हुआ है। यह है शिव ज्ञान यज्ञ, इसमें तुम तन-मन-धन सब स्वाहा कर देते हो। खुशी से सब अर्पण हो जाता है। बाकी आत्मा रह जाती है। बाबा, बस अब हम आपकी श्रीमत पर ही चलेंगे। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनना है। 60 वर्ष की आयु जब होती है तो वानप्रस्थ अवस्था में जाने की तैयारी करते हैं परन्तु वह कोई वापिस जाने के लिए थोड़ेही तैयारी करते हैं। अभी तुम सतगुरू का मन्त्र लेते हो मनमनाभव। भगवानुवाच - तुम मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। सबको कहो आप सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। शिवबाबा को याद करो, अब जाना है अपने घर। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1. कलियुगी सर्व कर्मबन्धनों को बुद्धि से भूल 5 विकारों का दान कर आत्मा को सतोप्रधान बनाना है।

2. इस रूद्र यज्ञ में खुशी से अपना तन-मन-धन सब अर्पण कर सफल करना है। इस समय सब कुछ बाप हवाले कर 21 जन्मों की बादशाही बाप से ले लेनी है।

वरदान:

निमित्त भाव की स्मृति से हलचल को समाप्त करने वाले सदा अचल-अडोल भव

निमित्त भाव से अनेक प्रकार का मैं पन, मेरा पन सहज ही खत्म हो जाता है। यह स्मृति सर्व प्रकार की हलचल से छुड़ाकर अचल-अडोल स्थिति का अनुभव कराती है। सेवा में भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। क्योंकि निमित्त बनने वालों की बुद्धि में सदा याद रहता है कि जो हम करेंगे हमें देख सब करेंगे। सेवा के निमित्त बनना अर्थात् स्टेज पर आना। स्टेज तरफ स्वत: सबकी नजर जाती है। तो यह स्मृति भी सेफ्टी का साधन बन जाती है।

स्लोगन:

सर्व बातों में न्यारे बनो तो परमात्म बाप के सहारे का अनुभव होगा।

 

महाशिवरात्री संदेश दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 रात 12 बजे तक 7 दिनमें 

7 करोंड व्हाटसएप युजर्स को दिया जायेगा महाशिवरात्री का आध्यात्मिक रहस्य

ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का संयुक्त उपक्रम

वंडर बुक ऑफ रिकार्ड इंटरनॅशनल, लंदन में दर्ज होगा विश्व किर्तीमान

 

अहमदनगर (प्रतिनिधी) हम प्रतिवर्ष भक्तिभाव से महाशिवरात्री महोत्सव मनाते है, किन्तू यह उत्सव क्या मनाते ? इसके पिछे छिपा आध्यात्मिक क्या है ? इसकी जानकारी कुछ ही लोगो के पास है ? महाशिवरात्री के आध्यात्मिक रहस्य को हम अपने जीवन में समझकर अपने जीवनमें प्रतिपल खुश रहने हेतू महाशिवरात्री संदेश देना आवश्यक है  दि. 22 से 28 फरवरी, 2017 की रात 12 से 7 करोड व्हॉटसअॅप युजर्सको महाशिवरात्रीका आध्यात्मिक संदेश प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की ओरसे पहूंचाया जायेगा. ओमशान्ति मीडिया पत्रिका, www.bkvarta.com बीकवार्ता वेबपोर्टल तथा डॉ. दिपक हरके का यह संयुक्त उपक्रम है.

 

इसके पूर्व का विश्व विक्रम डॉ. दिपक हरके इनके नाम पर है, दिपावली का आध्यात्मिक रहस्य का ऑडिओ मॅसेज 1 करोड 352 व्हॉटस्अॅप युजर्स को 29 अक्तुबर 2016 को रात 12 बजे से 20 अक्तुबर, 2016 के रात बजे बजे तक भेजकर उन्होने यह उपलब्ध हासिल की थी. महाशिवरात्री का विश्वविक्रमी संदेश प्राप्त करने के लिए 9422288888 इस व्हॉटसअॅप मैसेज पर WR एैसा मॅसेज भेजकर आप यह संदेश प्राप्त कर सकतें है. विश्वविक्रम में सहभागीता पत्र प्राप्त करने के लिए हरएक सहभागी व्यक्ति निर्धारीत राशी जमा कर वंडर बुक ऑफ रिकार्डमें सहभाग प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकतें है . इस विश्वविक्रम का उदघाटन भारतीय क्रीकेट टिम के उपकप्तान अजिंक्य रहणे इनके शुभहस्तोंसे मुंबई के बीकेसीस्थित एमसीए क्लब में सपन्न हूआ. इस उपक्रम के बारें में रहाने ने डॉ. दिपक हरके को बधाई दी तथा ब्रह्माकुमारीज् के मानवसेवा के कार्य की सराहना की. 

 

 

१३ मार्च (पालक्कड:केरला) ध्यान महोत्सव का आयोजन. विभीन्य मान्यवारोंने किया राजयोग ध्यान अभ्यास.

 

31 जनवरी (भूवनेश्वर) वार्षिकोत्सव मनाया गया. सेवाकेंद्र के एक वर्ष पूर्ती पर भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

 


 

30 जनवरी (विलेपार्ले:मुंबई) सफल सारथी अवार्ड. ट्रान्सपोर्ट एण्ड ट्रॅव्हल्स प्रभागद्वारा यह अवार्ड प्राप्त ड्रायव्हर भाईयों को सम्मानित किया गया.

 


 

29 जनवरी (हैद्राबाद) मुख्यमंत्री महोदय शान्तिसरोवर में. भ्राता एम. चंद्राबाबू नायडूजीने शांती सरोवर भेट की. शांतीसरांेवर के दसवें वर्धापन दिन कार्यक्रम का उदघाटन उन्होंने किया.


 

28 जनवरी (जयपूर:राज.) अंतरराष्ट्रीय खेल सम्मेलन मंें ईश्वरीय संदेश. स्पोटर्स एण्ड फिजिकल एज्युकेशन विषयपर आयोजित इस मम्मेलन में बीके जगबीरभाईने दिया संदेश.


 

27 जनवरी (मडिकेरी:कर्ना.) कर्म की गती गुह्य है. - भगवानभाई सेंट्रल जेल में ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश


 

26 जनवरी (मंगलौर:कर्ना.) सेंट्रल जेल में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु भगवानभाई, माऊंट आबू ने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

25 जनवरी (मालाड:मुंबई)फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उदघाटन. प्रसिध्द फिल्म निर्देशक तथा निर्माता भ्राता सुभाष घई ने विशअलींग फिल्म इन्स्टि. में मेडिटेशन रुम का उघाटन किया

 


 

24 जनवरी (कटघोरा) आध्यात्मिक समागम एवं सम्मान समारोह संपन्न. नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधीयों का सम्मान समारोह आयोजित किया गया.


 

23 जनवरी (लातूर:महा.) उर्जा छात्र-क्लब स्थापित. गणतंत्र दिवस के अवसरपर विवेकानंद विद्यालय, सीबीएससी लातूर में महाराष्ट्र उर्जा छात्र क्लब की स्थापना की गई


 

22 जनवरी (बिलासपूर:छ.ग.) आरके नगर में सरस्वती झाँकी. राजकिशोर नगर, बीके रुपा बहनने माँ सरस्वती की महिमा का प्रवचन किया.


21 जनवरी (शान्तिवन) रेडिओ मधुबन वर्धापन दिन. ब्रहमाकुमारीज कम्युनिटी रेडिओ मधुबन का 4 था वर्धापन दिवस मनाया गया.

 


 

20 जनवरी (मालाड:मुंबई) सुरक्षीत रास्ता सप्ताह. एसटी डिपो में हुआ कार्यक्रम.


 

19 जनवारी (केशोद:गुज) यात्रा खुशनुमा जीवन की और कार्यक्रम संपन्न. ब्र.कु.डा. सविता, माऊंट आबूने किया मार्गदर्शन.


 

18 जनवरी (आबूपर्वत:पाण्डवभवन) पिताश्रीजी का स्मृतिदिवस. विश्वशांती दिवस के रुप में समूचे विश्व में मनाया गया.


 

17 जनवरी (विशाखापट्टणम) विधायक महोदय को दिया संदेश. नये वर्ष का संदेश भ्राता विष्णु कुमार राजू जी को बीके शशीकला बहनने दिया 


 

16 जनवरी (मुंबई) 102वीं विज्ञान परिषद में स्पार्क सेवा. मुंबई विश्व विद्यालय में आयोजित इस परिषदमें स्प्रिच्ुअल एप्लीकेशन एण्ड रिसर्च की सुंदर सेवा हुई


 

15 जनवरी (जयपूर) नारित्वदर्शन की सहभागीता. जयपूर अन्तरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टीवल में नारित्व दर्शन को नॉमिनेट किया गया.


 

14 जनवरी (शान्तिवन) रिडिकव्हरींग ऑफ लाईफ. वैज्ञानिक तथा अभियंता प्रभागद्वारा राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया


 

13 जनवरी (शान्तिवन) ब्र.कु. करुणाभाईजी का 75 वाँ जनमदिन. ब्रहमाकुमारीज संस्था के मीडिया उपाध्यक्ष तथा मल्टीमीडिया प्रभारी ब्र.कु. करुणाभाईजी के जनमदिन की प्लेटिनम ज्युबिली हर्षोल्हाससे मनाई गई.


 

12 जनवरी (शांतीवन)दादीजी का 99 वाँ जनमदिन मनाया. ब्रहमाकुमारीज संस्था की मुख्य प्रशासिका ददी जानकीजी का जन्मदिन बहुत ही उमंग उत्साहसे मनाया गया


 

11 जनवरी (मा.आबू) बीके केदारभाई का अभिनंदन किया दादीजीने. राजस्थान सरकारद्वारा उर्जा संरक्षण पुरस्कार प्राप्त करनेवाले बीके केदारभाई (उर्जा ऑडिटर) का अभिनंदन दादी रतनमोहिनीजी, बीके रमेशभाईजीने किया.


 

10 जनवरी (टिकरापारा:बीलासपूर) बालिका शिक्षा शिविर में सदेश. सरस्वती शिशु मंदिर उच्चस्तर मा. विद्यालय में बीके मंजू बहनने दिया ईश्वरीय संदेश.


 

09 जनवरी (राहूरी:महा.) आज की शाम भगवान के नाम. ब्र.कु. सुरजभाई, मा. आबू, ब्र.कु. गीताबहन पुना तथा उषा बहन राहूरी ने दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. बद्रिश हेहाडरायने मीडियाद्वारा पहूंचाया संदेश


 

08 जनवरी (कलपेट्टा:केरला) केंद्रीय विद्यालय में दिया ईश्वरीय संदेश. ब्र.कु. भगवानभाई, आबू पर्वत ने  कही नैतिक मूल्यों की बा


 

07 जनवरी (बार्शि:महा.) कुंकूलोक हायस्कूल में ईश्वरीय संदेश. बीके संगीताबहनने दिया संदेश


 

06 जनवरी (केशोद) महान जादुगर विरागभाई हकुभा को दिया संदेश. बी.के. सत्याबहन, तथा बीके शिल्पा बहनने दिया परिचय.


 

05 जनवरी (हरिद्वार) ऋषीकुल में संत स्नेहमीलन, ब्र.कु.मिनाबहनने परमपिता परमात्मा का दिया सत्य परिच


 

04 जनवारी (बंेगलौर) फ्रि आय चेकींग कॅम्प. सेवाकेंद्र की ओरसे आयोजित कॅम्प में सहभागीयों दिया गया संदे


 

03 जनवरी (लिमा,पेरु:फ्रान्स)कोप-20 में ब्रहमाकुमारीज् की सहभागीता. क्लायमेंट चेंज कॉन्फरन्स में ब्रहमाकुमारीजने किया सहभाग


 

02 जनवरी (वाशी:मुंबई) सदभावना सभा में ब्रहमाकुमारीज् सहभाग. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की औरसे आयोजित इस मीटिंग में बहनोंने दिया संदेश


 

01 जनवरी (तिनसुखीया:आसाम) स्वर्णीम युग की पुन:स्थापना. गीता के भगवान को प्रत्यक्ष करने के सम्मेलनको, बी के ब्रजमोहनभाईजी, देहली, ब्र.कु. उषाबहनजी मा. आबू, बीके आशा बहनजी ने किया सम्बोधित

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